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  • झारखंड के बाहर पांव पसारने की तैयारी में JMM, बिहार और बंगाल  की  सीटों पर नजर

    परवेज़ आलम.  

    झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति पर काम कर रही है। हाल ही में रांची के खेलगांव में संपन्न हुए 13वें महाधिवेशन में यह स्पष्ट संकेत मिला कि JMM अब राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के विस्तार को लेकर गंभीर है। इसका सीधा असर बिहार और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ सकता है ।

    बिहार में JMM की ‘दबाव की राजनीति‘?

    बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और झामुमो ने यहां कम से कम 12 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और अन्य संभावित सहयोगी दलों के साथ तालमेल के पक्ष में है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है।

    गौरतलब है कि झारखंड में राजद और JMM के बीच गठबंधन पहले से है और राजद को हेमंत सरकार में प्रतिनिधित्व भी मिला हुआ है। ऐसे में बिहार में गठबंधन की संभावना तो बनी हुई है, लेकिन JMM अब “बराबरी के साझेदार” के रूप में बात करना चाहता है — और यहीं से तेजस्वी यादव की राजनीतिक गणित गड़बड़ा सकती है।

    JMM जिन 12 सीटों पर नजर बनाए हुए है, वे सभी झारखंड से सटे सीमावर्ती जिले हैं — जमुई, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर और बांका जैसे क्षेत्र, जहां आदिवासी और झारखंडी मूल के लोगों की आबादी भी कम नहीं है। यहां पार्टी के संगठन को पहले से ही सक्रिय करने के निर्देश दिए जा चुके हैं।

    पश्चिम बंगाल में भी रणनीतिक एंट्री

    JMM की रणनीति सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। पार्टी की नजर पश्चिम बंगाल की उन सीमावर्ती आदिवासी बहुल सीटों पर भी है, जहां वह पहले भी उम्मीदवार खड़ा कर चुकी है — जैसे झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा, अलीपुरद्वार, पश्चिम वर्धमान और बीरभूम। पिछली बार भले ही JMM ने आखिरी समय में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दे दिया था, JMM तृणमूल कांग्रेस से तालमेल कर चुनाव मे आना चाहती है । पर क्या ममता बनर्जी जेएमएम को मनमाफिक सीटें देंगी इस पर सवाल है । बता दें कि इन जिलों में आदिवासी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है और JMM इस आधार पर ममता बनर्जी से सीटें मांग सकता है।

    भाजपा शासित राज्यों पर भी नजर

    JMM की राजनीतिक दृष्टि सिर्फ पड़ोसी गैर-भाजपा राज्यों तक सीमित नहीं है। पार्टी ने ओडिशा और असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में भी अपने संगठन को मजबूत करने की योजना बनाई है। ओडिशा के मयूरभंज, क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों में पार्टी पहले से संगठनात्मक सक्रियता बढ़ा रही है। साथ ही, असम में भी आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान और जनजातीय पहचान की मांग को लेकर आंदोलन शुरू करने की घोषणा की गई है। गौर तलब है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने झारखंड चुनाव के दौरान भाजपा के लिए सक्रिय प्रचार किया था। ऐसे में JMM का यह कदम भाजपा के लिए भी चुनौती बन सकता है।

    राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर झामुमो का कदम

    पार्टी के महाधिवेशन में पारित प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा गया है कि JMM अब केवल झारखंड की पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका निभाने की दिशा में बढ़ेगी। हेमंत सोरेन की यह महत्वाकांक्षा न केवल राज्य की सीमाओं को चुनौती देती है, बल्कि पुराने क्षेत्रीय समीकरणों को भी नया रूप देने की संभावना पैदा करती है।

    राजनीतिक संकेत क्या हैं?

    JMM की इस रणनीति का संदेश साफ है — वह अब ‘सहायक पार्टी’ की भूमिका से आगे बढ़कर खुद को निर्णायक ताकत के रूप में देखना चाहता है। यह तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी जैसे सहयोगियों को असहज कर सकता है, जो अब तक इन इलाकों में अपनी मजबूत पकड़ मानते रहे हैं।

    आने वाले विधानसभा चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि JMM की यह नई रणनीति उसे कितनी सफलता दिला पाती है, और विपक्षी एकता के नाम पर बनते-बिगड़ते रिश्तों पर इसका क्या असर होता है।

  • जेल की सलाख़ें से निकल कर हेमंत सोरेन मज़बूत नेता बन कर उभरे

    हेमंत सोरेन के जीवन पर एक नज़र.

    परवेज़ आलम

    रांची, झारखंड : “क्या एक नेता का जेल जाना, उसकी छवि को तोड़ता है या निखारता है? क्या संघर्ष की आग में तपकर ही असली नेता बनता है? और क्या झारखंड अब एक नए नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, या पुराने नामों का ही नया संस्करण देख रहा है?”

    ये सवाल तब ज़्यादा ज़रूरी हो जाते हैं, जब एक नेता जेल से बाहर आते ही न सिर्फ़ फिर से मुख्यमंत्री बनता है, बल्कि अब पूरे संगठन की कमान भी संभाल लेता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हेमंत सोरेन की, जो अब झारखंड मुक्ति मोर्चा के नए केंद्रीय अध्यक्ष हैं। एक दौर में छात्र मोर्चा से राजनीति की शुरुआत करने वाला नौजवान, आज पार्टी का सर्वोच्च चेहरा बन चुका है।

    “हेमंत नहीं रुके, थमे नहीं, झुके नहीं…”

    जेल गए, लेकिन लड़ाई नहीं छोड़ी। 5 महीने के राजनीतिक वनवास के बाद जब हेमंत बाहर आए, तो सिर्फ़ एक नेता नहीं, एक प्रतीक बनकर उभरे — सत्ता के दमन के ख़िलाफ़, अपने अधिकारों के लिए लड़ते झारखंडी स्वाभिमान के प्रतीक।

    हेमंत सोरेन की कहानी कोई सामान्य राजनीतिक यात्रा नहीं है। यह कहानी है नेमरा के एक किसान परिवार से उठे उस बेटे की, जिसने राजनीतिक विरोधियों से लेकर सत्ता तक, सबका सामना किया।

    और अब, 2025 की गर्मियों में — शिबू सोरेन के 38 साल लंबे अध्यक्षीय कार्यकाल का अंत कर, बेटे हेमंत ने वह कुर्सी संभाल ली है, जो कभी उनके पिता के लिए भी संघर्षों की तपिश में गढ़ी गई थी।

    जनता का सवाल — “जेल से नेतृत्व तक, क्या यही लोकतंत्र की परिभाषा है?”

    झारखंड की जनता जानना चाहती है — क्या खनन घोटाले में जेल जाना, राजनीतिक साज़िश थी या सच्चाई?

    लेकिन सच्चाई ये है कि हेमंत जब जेल से बाहर आए, तो पार्टी और ज़्यादा संगठित दिखी। कल्पना सोरेन, उनकी पत्नी, सामने आईं — एक नेता के रूप में, एक रणनीतिकार के रूप में। ये कोई साधारण वापसी नहीं थी, ये एक जोड़ी की ताक़त थी — जिसने सत्ता को फिर से अपनी मुट्ठी में किया।

    संघर्ष की जड़ें — नेमरा से बरहेट तक का रास्ता आसान नहीं था

    नेमरा गांव का एक बच्चा, जो सरकारी स्कूल में पढ़ा, पटना में इंटर तक पहुंचा, और बीआईटी मेसरा जैसे संस्थान में दाखिला लेकर भी राजनीति की पुकार पर पढ़ाई छोड़ दी — आज उसी का नाम झारखंड की हर पंचायत में गूंज रहा है।

    2005 में जब पहली बार चुनाव लड़े, तो हार मिली। खुद के ही दल के सीनियर नेता ने हराया। लेकिन यही वो समय था जब हेमंत ने सीखा — राजनीति में सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है? धैर्य।

    2009 में भाई दुर्गा सोरेन की मौत ने हेमंत को परिवार और राजनीति — दोनों का उत्तराधिकारी बना दिया।

    सियासत का सवाल — “क्या JMM अब हेमंत की पार्टी है?”

    जब दिशोम गुरु यानी शिबू सोरेन ने हेमंत के नाम का प्रस्ताव रखा, तो हज़ारों कार्यकर्ताओं ने नारा लगाया — “हेमंत ही भविष्य है!”

    JMM की केंद्रीय समिति में अब 289 सदस्य हैं। लेकिन सवाल ये भी है — क्या ये सिर्फ़ एक खानदान की विरासत है, या जनआंदोलन की नई शक्ल?

    झारखंड की जनता का सवाल — “कितना बदलेगा हेमंत का झारखंड?”

    2019 में उन्होंने भाजपा को सत्ता से बेदखल किया, 2024 में जेल से आकर फिर मुख्यमंत्री बने। अब पार्टी की कमान भी उन्हीं के हाथ में है। लेकिन क्या इससे झारखंड की ज़मीन पर बदलाव आएगा?

    क्या आदिवासियों की ज़मीन बचेगी? क्या युवाओं को रोज़गार मिलेगा? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर नई नीति बनेगी?

    या फिर, ये भी वही राजनीति निकलेगी — चेहरे बदलते रहेंगे, हालात वही रहेंगे?

     

  • हेमंत सोरेन बने झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष, शिबू सोरेन ने सौंपी विरासत

    परवेज़ आलम.

    झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। 2025 में हुए पार्टी के 13वें महाधिवेशन में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सर्वसम्मति से झामुमो का केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया। यह निर्णय पार्टी के लिए एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है, जहां 38 वर्षों तक अध्यक्ष रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने पुत्र को पार्टी की बागडोर सौंपी।

    महाधिवेशन का आयोजन रांची के खेलगांव में हुआ, जहां हजारों की संख्या में कार्यकर्ता और प्रतिनिधि मौजूद थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता नलिन सोरेन ने शिबू सोरेन को संस्थापक संरक्षक के रूप में प्रस्तावित किया, जिसका समर्थन मथुरा महतो ने किया। इसके बाद शिबू सोरेन ने मंच से हेमंत सोरेन को पार्टी का केंद्रीय अध्यक्ष घोषित किया। घोषणा के तुरंत बाद, मंच पर मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तालियों और नारों से नए अध्यक्ष का जोरदार स्वागत किया।

    पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की घोषणा. 

    महाधिवेशन में झामुमो की नई केंद्रीय समिति की भी घोषणा की गई, जिसमें कुल 284 सदस्य शामिल किए गए। जिलावार रूप से साहिबगंज, दुमका और रांची सहित विभिन्न जिलों से सदस्यों को चुना गया। प्रमुख नामों में खुद हेमंत सोरेन, पंकज मिश्रा, शिबू सोरेन, नलिन सोरेन, बसंत सोरेन, मधु मंसूरी और महुआ माजी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

    हेमंत सोरेन की राजनीतिक यात्रा. 

    हेमंत सोरेन का राजनीतिक सफर संघर्ष, धैर्य और रणनीतिक दूरदर्शिता से भरा रहा है। 2003 में छात्र मोर्चा से शुरुआत करने वाले हेमंत पहली बार 2009 में राज्यसभा के लिए चुने गए। उसी वर्ष दुमका से विधानसभा चुनाव जीतकर राज्य की राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज की। 2010 में वे उपमुख्यमंत्री बने और 2013 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने पार्टी को शानदार सफलता दिलाई, जिसके कारण वे झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री बने।

    हालांकि उनका सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 2024 में उन्हें ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया, जिससे उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। लेकिन जमानत पर बाहर आने के बाद वे फिर से चुनावी मैदान में उतरे और झामुमो के नेतृत्व में INDIA गठबंधन को रिकॉर्ड 56 सीटें दिलाकर सत्ता में वापसी की।

    कल्पना सोरेन की भूमिका. 

    इस कठिन दौर में हेमंत की पत्नी कल्पना सोरेन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब हेमंत जेल में थे, तब कल्पना ने पार्टी के लिए स्टार प्रचारक के रूप में प्रचार किया। उन्होंने न केवल कार्यकर्ताओं को संगठित किया, बल्कि महिला मतदाताओं में भी झामुमो के लिए समर्थन जुटाया। उनके समर्पण और संगठन क्षमता ने हेमंत को जेल से बाहर आने के बाद एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित करने में मदद की।

    झामुमो का भविष्य: राष्ट्रीय विस्तार की योजना. 

    राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत सोरेन ने पार्टी के विस्तार की योजनाओं की घोषणा की। उनका लक्ष्य झारखंड के बाहर, विशेषकर ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में झामुमो को मजबूत करना है। उनका मानना है कि झामुमो सिर्फ एक पार्टी नहीं बल्कि एक आंदोलन है, जिसे राष्ट्रीय मंच पर ले जाने की जिम्मेदारी अब उनकी है।

    नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव. 

    शिबू सोरेन ने 1972 में झामुमो की स्थापना की थी। उनके नेतृत्व में पार्टी ने आदिवासी अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और झारखंड राज्य की मांग को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। अब यह विरासत हेमंत सोरेन के हाथों में है, जो इसे आधुनिक दौर की राजनीति में नई पहचान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

    हेमंत सोरेन का नेतृत्व केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि वैचारिक रूप से भी पार्टी को नई दिशा देगा। उन्होंने अपने पहले दो कार्यकालों में जनहितकारी योजनाएं लागू की, जैसे “अबुआ आवास योजना”, महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता और आरक्षण नीति में बदलाव। इन पहलों ने उन्हें जनता के बीच एक जननेता के रूप में स्थापित किया।

    हेमंत सोरेन का केंद्रीय अध्यक्ष बनना न केवल झामुमो के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि झारखंड की राजनीति में स्थिरता और निरंतरता का संकेत भी है। शिबू सोरेन की विरासत को आगे बढ़ाते हुए, हेमंत एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी—पार्टी की मूल विचारधारा को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर झामुमो को मजबूती प्रदान करना।

  • झामुमो के संविधान में बड़े बदलाव के संकेत : हेमंत सोरेन अध्यक्ष, शिबू सोरेन को संस्थापक संरक्षक का पद

    रांची में आयोजित झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के 13वें महाधिवेशन मे  एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए दिशोम गुरु शिबू सोरेन को   “संस्थापक संरक्षक” का नया पद दिया  है। वहीं अब तक कार्यकारी अध्यक्ष रहे हेमंत सोरेन को सर्वसम्मति से पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है । इस निर्णय पर मंगलवार को फ़ाइनल  मुहर लगेगी ।

    खेलगांव में दिखा झामुमो कार्यकर्ताओं का जोश, जय झारखंड के गगनभेदी नारे. 

    रांची के खेलगांव में चल रहे इस दो दिवसीय महाधिवेशन में राज्यभर से आए लगभग 3500 प्रतिनिधियोंकी उपस्थिति रही। जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व्हीलचेयर पर गुरुजी यानी शिबू सोरेन को मंच तक लेकर पहुंचे, तो पूरा पंडाल “जय झारखंड” के नारों से गूंज उठा।

    हालांकि स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के बावजूद शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन पूरे कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद रहे। उन्होंने हाथ उठाकर उपस्थित कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद भी दिया। इस भावुक क्षण ने उपस्थित सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गहरे तौर पर प्रेरित किया।

    मंगलवार को लगेगी अंतिम मुहर, नई केंद्रीय समिति का गठन भी होगा. 

    महाधिवेशन के दूसरे और अंतिम दिन, इस संशोधन प्रस्ताव पर औपचारिक मुहर लगेगी। इसके साथ ही पार्टी की नई केंद्रीय समिति का भी गठन किया जाएगा, जो आने वाले वर्षों में संगठन की दिशा और रणनीति तय करेगी।

    हेमंत सोरेन की नेतृत्व यात्रा: संदेह से सम्मान तक. 

    2015 के जमशेदपुर महाधिवेशन में जब हेमंत सोरेन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, तब उनके नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए गए थे। लेकिन उन्होंने न केवल संगठन को मजबूत किया, बल्कि 2019 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी शिकस्त दी।

    विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने ‘संघर्ष यात्रा’ निकाल कर रघुवर दास सरकार के खिलाफ जनमत तैयार किया। परिणामस्वरूप झामुमो के नेतृत्व में गठबंधन ने सत्ता में वापसी की और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।

    इसके बाद हुए उपचुनावों में भी झामुमो ने बढ़त बरकरार रखी। जेल में रहते हुए भी उन्होंने गठबंधन के लिए ऐतिहासिक जीत दर्ज करवाई – पांचों आदिवासी आरक्षित लोकसभा सीटें झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने जीतीं।

    2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी को 34 सीटों पर जीत दिलाई और कांग्रेस, राजद, वाम दलों के साथ मिलकर 56 सीटों के बहुमत से दोबारा सरकार बनाई।

    “देश ने देखा – झामुमो सिर्फ राज्य बना नहीं सकता, चला भी सकता है” – हेमंत सोरेन. 

    महाधिवेशन के उद्घाटन भाषण में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झामुमो की ऐतिहासिक भूमिका और झारखंड आंदोलन के बलिदानों को याद किया। उन्होंने कहा:

    “झारखंड को अलग राज्य बनाने का सपना हमारे दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में साकार हुआ। आज वह सपनों का झारखंड बनाने की जिम्मेदारी हमारी है।”

    उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि राज्य के गठन के बाद की सरकारें जनभावनाओं से विमुख रहीं – किसानों की आत्महत्याएं, भूख से मौतें, और सांप्रदायिक तनाव इसी का परिणाम थे।

    उन्होंने झामुमो के नेतृत्व को जन-आंदोलनों से उपजी शक्ति बताते हुए कहा:

    “झारखंड न तो कभी झुका है और न कभी डरा है। हमने देश की सबसे बड़ी पार्टी को भी चुनौती दी और सफल होकर दिखाया।”

    आपकी बदौलत बदला राज्य का भविष्य’ – कार्यकर्ताओं से बोले हेमंत. 

    हेमंत सोरेन ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह जीत केवल किसी एक नेता की नहीं, बल्कि झामुमो के हर जुझारू सिपाही की जीत है। उन्होंने आह्वान किया कि अब चुनौती सिर्फ सत्ता में आना नहीं, बल्कि गांव-गरीब के जीवन में बदलाव लाना है।

    “हमारा उद्देश्य है झारखंड के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना। ये महाधिवेशन पहले से कहीं ज्यादा भव्य है, और यह हमारी जिम्मेदारियों को और बड़ा करता है।”

    16 राजनीतिक प्रस्ताव पारित, बाबा साहेब के नाम पर प्रांगण

    महाधिवेशन की शुरुआत शिबू सोरेन ने की। पहले दिन राज्य सरकार के मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने 108 पन्नों का सांगठनिक दस्तावेज पेश किया, जबकि स्टीफन मरांडी ने 16 राजनीतिक प्रस्ताव पेश किए जिन्हें पारित किया गया।

    इस आयोजन स्थल को “बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर प्रांगण” नाम दिया गया, और इसका संचालन अध्यक्षीय समिति के सदस्य विनोद पांडेय ने किया।झामुमो के इस महाधिवेशन ने न केवल संगठनात्मक बदलावों की आधारशिला रखी है, बल्कि झारखंड की राजनीति में पार्टी की दीर्घकालीन भूमिका को भी और अधिक स्पष्ट कर दिया है। शिबू सोरेन की विरासत को अब हेमंत सोरेन और नए नेतृत्व ने पूरी तरह से संभाल लिया है – और उनकी रणनीति साफ है: सत्ता में बने रहना नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना।

  • कल्पना मुर्मू सोरेन होगी JMM की नई कार्यकारी अध्यक्ष !

    झारखंड की राजनीति में नया अध्याय

    झामुमो के 13वें केंद्रीय महाधिवेशन का उद्घाटन सत्र

    परवेज़ आलम

    झारखंड की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। गांडेय से विधायक और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना मुर्मू सोरेन को झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की नई कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाएगा। यह जानकारी झामुमो के 13वें केंद्रीय महाधिवेशन के दौरान सूत्रों के हवाले से सामने आई है। हालांकि, इसकी औपचारिक घोषणा मंगलवार को होगी ।

    झामुमो के महाधिवेशन का दृश्य भावुक करने वाला रहा.

    रांची के खेलगांव स्थित टाना भगत इंडोर स्टेडियम में आयोजित दो दिवसीय महाधिवेशन का उद्घाटन 14 अप्रैल को हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर दिशोम गुरु शिबू सोरेन, जो अब 81 वर्ष के हो चुके हैं, व्हीलचेयर पर बैठकर मंच पर पहुंचे। उनके साथ उनकी पत्नी रूपी सोरेन भी थीं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खुद अपने माता-पिता को उनके आवास से महाधिवेशन स्थल तक पहुंचाया। इस क्षण की तस्वीरें सामने आईं, जिनमें हेमंत सोरेन अपने पिता की व्हीलचेयर को संभालते नजर आए।

    एक नई विरासत की शुरुआत.

    .झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन अब सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे पीछे हट रहे हैं। ऐसे में पार्टी की बागडोर अगली पीढ़ी को सौंपने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। कल्पना सोरेन का कार्यकारी अध्यक्ष बनना न सिर्फ परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाला कदम है, बल्कि महिला नेतृत्व को भी एक नई पहचान देने वाला बदलाव माना जा रहा है।

    हेमंत सोरेन का भावनात्मक संदेश.

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने महाधिवेशन के अवसर पर सोशल मीडिया पर तस्वीर साझा करते हुए लिखा:

    “झारखंड ही नहीं, पूरे देश-दुनिया के लोग आदरणीय दिशोम गुरुजी को आदर-सम्मान की नजरों से देखते हैं। उनके नेतृत्व और असंख्य क्रांतिकारियों के संघर्ष के बाद हमें अलग राज्य मिला। अब हमें उस आंदोलन की जड़ों को और सींचना है, उसे जन-जन तक पहुंचाना है।”

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में भविष्य की दिशा.

    महाधिवेशन में मुख्यमंत्री ने कहा कि अलग झारखंड राज्य का गठन असंख्य बलिदानों के बाद हुआ है। उन्होंने याद किया कि कैसे शिबू सोरेन के नेतृत्व में हजारों लोग आंदोलन में शामिल हुए और अपनी जान गंवाई। उन्होंने यह भी कहा कि अलग राज्य बनने के बाद राज्य के विकास पर बहुत कम चर्चा हुई और इसकी कमान ऐसे हाथों में गई जो यहां के लोगों के प्रतिनिधि नहीं थे।

    संगठनात्मक प्रस्ताव और भविष्य की रणनीति.

    इस महाधिवेशन में पूर्व उपमुख्यमंत्री स्टीफन मरांडी ने पार्टी का राजनीतिक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें जातिगत जनगणना, ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण, 1932 की स्थानीय नीति और परिसीमन के विरोध को प्रमुखता दी गई। साथ ही यह भी तय किया गया कि पार्टी असम, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में अपने संगठन का विस्तार करेगी।

    भाजपा पर निशाना.

    स्टीफन मरांडी ने आरोप लगाया कि भाजपा ने हेमंत सोरेन के खिलाफ साजिशें रचीं, केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया और उन्हें गलत आरोपों में जेल भेजा गया। इसे उन्होंने लोकतंत्र और संविधान पर हमला बताया।

    वक्फ अधिनियम और आदिवासी अधिकार.

    महाधिवेशन में वक्फ अधिनियम संशोधन के खिलाफ भी प्रस्ताव पारित किया गया। झामुमो ने इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला बताया और कहा कि इस कानून को झारखंड में लागू नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, पार्टी ने जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों और मूलवासियों के हक की बात दोहराई।

    लोकसभा चुनाव की तैयारी.

    महाधिवेशन में यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि पार्टी अब पंचायत से लेकर लोकसभा तक भाजपा की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलेगी। महाधिवेशन के दौरान झामुमो की सांगठनिक रिपोर्ट भी पेश की गई, जिसमें सरकार की उपलब्धियों को भी सामने रखा गया।
    कल्पना मुर्मू सोरेन को JMM की कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की खबर झारखंड की राजनीति में एक नई दिशा और नई उम्मीद के तौर पर देखी जा रही है। इससे एक ओर जहां पार्टी की आंतरिक संरचना मजबूत होगी, वहीं दूसरी ओर राज्य की जनता में यह संदेश जाएगा कि झामुमो परिवार संघर्ष की विरासत को अब नई पीढ़ी के नेतृत्व में आगे बढ़ाने को तैयार है।

     

  • झारखंड वक्फ बोर्ड का बड़ा फैसला: ऑडिट रिपोर्ट नहीं देने वाली संस्थाओं की जाएगी मान्यता

    विवाद सुलझाने के लिए जिलों के दौरे पर जाएंगी कमेटियां. 

    परवेज़ आलम 

    रांची – झारखंड राज्य सुन्नी वक्फ बोर्ड नेअपनी संपत्तियों को लेकर एक अहम निर्णय लिया है। बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उन तमाम संस्थाओं की मान्यता रद्द कर दी जाएगी, जो वक्फ संपत्तियों पर वर्षों से काम तो कर रही हैं, लेकिन अपनी ऑडिट रिपोर्ट या वित्तीय हिसाब-किताब बोर्ड को नहीं सौंप रही हैं। हालांकि, अंतिम कार्रवाई से पहले संबंधित संस्थाओं को चेतावनी पत्र भेजा जाएगा।

    यह निर्णय राज्य के सांसद सरफराज अहमद की अध्यक्षता में राजधानी रांची में आयोजित वक्फ बोर्ड की बैठक में लिया गया। बैठक में यह भी तय किया गया कि सबसे पहले ऐसी संस्थाओं की सूची तैयार की जाएगी, जो वक्फ बोर्ड की जमीन या संपत्तियों पर कार्यरत हैं। इसके बाद उनसे अब तक का वित्तीय लेखा-जोखा और ऑडिट रिपोर्ट मांगी जाएगी। आदेशों की अवहेलना करने पर संबंधित संस्थाओं की मान्यता समाप्त  कर दी जाएगी।

    विवादों को सुलझाने के लिए दौरे पर जाएगी विशेष कमेटी.

    बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि वक्फ संपत्तियों को लेकर राज्य के विभिन्न हिस्सों में जो विवाद चल रहे हैं, उन्हें सुलझाने के लिए विशेष कमेटी गठित की गई है। यह कमेटी 19 अप्रैल को गिरिडीह और 22 अप्रैल को चाईबासा का दौरा करेगी। गिरिडीह में कमेटी के सदस्य पूर्व विधायक निजामुद्दीन अंसारी, ए.के. रसीदी और मोहम्मद फैजी शामिल होंगे।

    वहीं, चाईबासा दौरे में कमेटी में ए.के. रसीदी, मोहम्मद फैजी, महबूब आलम और इबरार अहमद मौजूद रहेंगे। इन दौरों का मकसद संबंधित क्षेत्रों में वक्फ संपत्ति को लेकर चल रहे विवादों को सुलझाना है, ताकि स्थानीय मुस्लिम समु दाय के हित सुरक्षित रह सकें।

    अंजुमन कमेटियों से भी होगी बातचीत.

    बैठक में राजधानी रांची स्थित अंजुमन से जुड़े मामलों पर भी चर्चा की गई। तय हुआ कि इन मामलों को सुलझाने के लिए अंजुमन की विभिन्न कमेटियों से वार्ता की जाएगी। इस दौरान बैठक में पूर्व विधायक निजामुद्दीन अंसारी, सामाजिक कार्यकर्ता इबरार अहमद, मौलाना तहजीबुल हसन रिजवी, शकील अख्तर, ए.के. रशीदी, मोहम्मद फैजी, सरकार के संयुक्त सचिव आसिफ हसन सहित अन्य सदस्य मौजूद थे।

    “झारखंड में वक्फ कानून लागू नहीं होगा” – डॉ इरफान अंसारी

    राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी ने इस पूरे घटनाक्रम पर भाजपा पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार वक्फ कानून में संशोधन कर मुस्लिम समुदाय को परेशान करने की साजिश कर रही है। डॉ अंसारी ने कहा, “भाजपा सरकार ने वक्फ संशोधन कानून लाकर मुसलमानों के अधिकारों को छीनने की कोशिश की है। यह कानून जनविरोधी है और इसका झारखंड में किसी भी हाल में लागू नहीं होने दिया जाएगा।”

    उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के कानूनों से मुस्लिम समाज को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर किया जा रहा है और भाजपा का मकसद जनहित नहीं, बल्कि समुदाय विशेष को निशाना बनाना है।

     

  • गिरिडीह को मिली नई स्वास्थ्य सौगात: मर्सी हॉस्पिटल का भव्य शुभारंभ, एक सपने की हुई पूर्ति

    परवेज़ आलम .

    गिरिडीह : जिलेवासियों के लिए आज का दिन ऐतिहासिक और भावनात्मक दोनों ही रहा। वर्षों से जिस स्वास्थ्य सुविधा की कमी महसूस की जा रही थी, वह आज पूरी हुई। झारखंड सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह के पहले मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल मर्सी हॉस्पिटल का भव्य उद्घाटन किया। समारोह में भारी संख्या में लोग मौजूद रहे और माहौल किसी उत्सव से कम नहीं था।

    स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई उम्मीद.

    मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने उद्घाटन के दौरान अपने संबोधन में कहा, “मर्सी हॉस्पिटल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि गिरिडीह और आसपास के जिलों के लिए नई जिंदगी की उम्मीद है। यह अस्पताल वह चिकित्सा सुविधाएं देगा, जो अब तक केवल बड़े शहरों तक सीमित थीं।”

    मर्सी हॉस्पिटल में मरीजों को वही तकनीक और सेवाएं मिलेंगी जो देश के बड़े मेट्रो शहरों में उपलब्ध हैं। इसका लाभ न केवल गिरिडीह के लोग उठाएंगे, बल्कि कोडरमा, हजारीबाग, धनबाद जैसे आसपास के जिले भी इससे लाभान्वित होंगे।

    एक सपने की कहानी: डॉ. अमित गोंड का संकल्प.

    इस अस्पताल की नींव एक स्वप्न पर रखी गई थी — स्वर्गीय डॉ. अमित गोंड का सपना, जो चाहते थे कि गिरिडीह के लोगों को इलाज के लिए बाहर न जाना पड़े। उन्होंने इस सपने के लिए जीवन भर मेहनत की, पर दुर्भाग्यवश, उद्घाटन से ठीक पहले उनका असमय निधन हो गया।

    हालांकि, यह सपना वहीं नहीं रुका। डॉ. गोंड के परिवार ने इसे अपना मिशन बना लिया। रंजीत कुमार गौड, सुमित कुमार गोंड, नीरज शाहबादी, विश्वजीत सिंह (गुड्डू सिंह) और साहिल सलूजा ने अस्पताल के कार्य को आगे बढ़ाया और आज यह दिन उनके प्रयासों और दृढ़ निश्चय का प्रतीक बन गया।

    तीन चरणों में होगी सेवाओं की शुरुआत. 

    मर्सी हॉस्पिटल के सीईओ संजीत नायक ने बताया कि अस्पताल को तीन चरणों में पूरी तरह कार्यशील किया जाएगा:

    1. प्रथम चरण में –
      ओपीडी, अत्याधुनिक डायग्नोस्टिक लैब, डायलिसिस यूनिट, डेंटल विभाग, सीटी स्कैन, टीएमटी जैसी सेवाएं चालू कर दी गई हैं।
    2. द्वितीय चरण में –
      इमरजेंसी सेवाएं, ऑपरेशन थिएटर, नवजात शिशु और व्यस्क आईसीयू, स्त्री रोग विभाग, एंडोस्कोपी एवं सामान्य सर्जरी यूनिट शुरू की जाएंगी।
    3. तृतीय चरण में –
      कार्डियोलॉजी, एंजियोग्राफी, हार्ट कैथ लैब जैसी सुपर स्पेशलिटी सेवाएं शुरू की जाएंगी, जिससे गिरिडीह मेडिकल सुविधाओं के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।

    समाज का व्यापक समर्थन. 

    इस ऐतिहासिक अवसर पर शहर के तमाम गणमान्य नागरिक निर्मल शाहबादी,अभय शाहबादी,रितेश शाहबादी, वैभव शाहबादी, रमेश प्रभकर, दिलीप झा,सईद अख्तर , अजित कुमार पप्पू ,सरदार चरणजीत सिंह , अधिवक्ता परवेज़ आलम ,चुननु कान्त , दीपक सवर्णकार, प्रशासनिक अधिकारी, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, डॉक्टर्स और सैकड़ों की संख्या में आम जनता उपस्थित रही। यह दिन न केवल एक अस्पताल के उद्घाटन का था, बल्कि गिरिडीह के भविष्य की एक नई शुरुआत का प्रतीक भी था।

  • खेलगांव बनेगा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों का केंद्र- मंत्री सुदिव्य कुमार

    झारखंड की खेल अधोसंरचना को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य के खेल मंत्री सुदिव्य कुमार ने शुक्रवार को झारखंड स्टेट स्पोर्ट्स प्रमोशन सोसाइटी (JSSPS) के संचालन, खेलगांव के अपग्रेडेशन और प्रस्तावित खेल विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD), खेल विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और संबंधित एजेंसियों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

    मंत्री सुदिव्य कुमार ने बैठक में दो टूक कहा कि खेलगांव केवल झारखंड की ही नहीं, बल्कि देश की एक अमूल्य धरोहर है, जिसे विश्वस्तरीय मानकों पर बनाए रखना राज्य सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार चाहती है कि खेलगांव को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का स्थायी आयोजन स्थल बनाया जाए। आगामी 2025 सैफ एथलेटिक्स चैंपियनशिप की तैयारियों के संदर्भ में उन्होने मोरहाबादी स्थित बिरसा मुंडा फुटबॉल स्टेडियम का निरीक्षण कर मौजूदा अवसंरचना और सुविधाओं का मूल्यांकन भी किया। बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करने हेतु विभागीय अधिकारियों को आवश्यक दिशानिर्देश प्रदान किए गए हैं। यह एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता है। मसलन, राज्य सरकार अतिथि प्रतिभागियों, दर्शकों एवं मेजबान प्रतिभागियों को उच्चकोटि का अनुभव प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। मंत्री ने आगे कहा, “मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का सपना है कि झारखंड में एक ऐसा खेल विश्वविद्यालय स्थापित हो, जो न केवल राज्य के युवाओं को बल्कि देश और विदेश के छात्रों को खेल शिक्षा के विभिन्न कोर्सों में अध्ययन का अवसर दे।” हालांकि उन्होंने यह भी माना कि इस दिशा में शुरुआती गति अपेक्षित नहीं रही है, जिसपर चिंता व्यक्त की गई।

    बैठक में मंत्री ने CCL के CMD से विशेष रूप से आग्रह किया कि कोल इंडिया लिमिटेड और CCL मिलकर इस दिशा में ठोस और त्वरित पहल करें, ताकि खेल विश्वविद्यालय की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सके। इस पर CCL प्रमुख ने आश्वस्त किया कि खेलगांव के जीर्णोद्धार और खेल अधोसंरचना सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, और कोल इंडिया से समन्वय स्थापित कर जल्द ही कार्य योजना प्रस्तुत की जाएगी।

    JUIDCO के साथ परियोजना समीक्षा बैठक: शहरी विकास कार्यों में गति लाने के निर्देश.

    शुक्रवार को ही  मंत्री सुदिव्य कुमार ने झारखंड अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कंपनी () के अधिकारियों के साथ एक अलग बैठक की, जिसमें शहरी क्षेत्रों में चल रही विभिन्न परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई। इसमें स्मार्ट सिटी, स्वच्छता, पेयजल आपूर्ति, सड़क निर्माण, ड्रेनेज व्यवस्था और शहरी आवास योजनाएं प्रमुख रूप से शामिल थीं।

    मंत्री ने अधिकारियों को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि सभी योजनाओं को तय समय-सीमा में गुणवत्ता के साथ पूरा किया जाए, ताकि आम शहरी नागरिकों को शीघ्र सुविधा मिल सके। उन्होंने यह भी जोर दिया कि सभी कार्य मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विकासपरक दृष्टिकोण के अनुरूप हों और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए।

    सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है – एक सशक्त, स्मार्ट और खेल-प्रेरित झारखंड का निर्माण।

  • झारखंड की सियासत में बड़ा उलटफेर,ताला मरांडी ने छोड़ी भाजपा,जेएमएम मे शामिल

    परवेज़ आलम. 

    झारखंड की सियासत में शुक्रवार को बड़ा उलटफेर देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और 44 वर्षों बाद एक बार फिर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) में वापसी की।

    ताला मरांडी ने अपना इस्तीफा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को भेजा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि “मैं भाजपा का एक समर्पित सदस्य रहा हूं, पार्टी द्वारा दिए गए सभी अवसरों के लिए आभार प्रकट करता हूं। किंतु वर्तमान परिस्थितियों, व्यक्तिगत कारणों और वैचारिक मतभेदों के कारण मैंने यह निर्णय गहन विचार के बाद लिया है। इसमें किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं है।”

    हेमंत सोरेन की मौजूदगी में हुए शामिल। 

    भाजपा से इस्तीफा देने के कुछ ही घंटों बाद ताला मरांडी ने भोगनाडीह में आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की उपस्थिति में झामुमो की सदस्यता ग्रहण की। हेमंत सोरेन ने उन्हें पार्टी का पारंपरिक पट्टा पहनाकर स्वागत किया। कार्यक्रम में झामुमो के केंद्रीय सचिव पंकज मिश्रा, विधायक कल्पना सोरेन, हेमलाल मुर्मू, धनंजय सोरेन और मोहम्मद ताजुद्दीन जैसे कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।

    राजनीतिक सफर: झामुमो से शुरू, कांग्रेस और भाजपा के रास्तों से फिर लौटे घर.

    करीब 63 वर्षीय ताला मरांडी की राजनीतिक यात्रा काफी लंबी रही है। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1989-90 में एक झामुमो कार्यकर्ता के रूप में की थी। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हुए और 1995 व 2000 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके।

    साल 2003 में भाजपा में शामिल होने के बाद 2005 में पहली बार बोरियो विधानसभा सीट से विधायक बने। उन्होंने झामुमो के कद्दावर नेता लोबिन हेम्ब्रम को हराया। 2014 में उन्होंने एक बार फिर लोबिन को हराकर सीट पर कब्जा जमाया और पार्टी ने उन्हें 2016 में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। हालांकि, कुछ महीनों बाद ही उन्हें पद से हटा दिया गया।

    2019 में भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने आजसू पार्टी का दामन थामा, लेकिन बोरियो से चुनाव हार गए। 2020 के बाद पुनः भाजपा में लौटे और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें राजमहल सीट से टिकट दिया, लेकिन वे विजय हांसदा से 1.5 लाख से अधिक मतों से हार गए।

    राजनीतिक पृष्ठभूमि में बढ़ रही थी नाराजगी. 

    ताला मरांडी की नाराजगी की झलक 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले ही दिखाई देने लगी थी। पार्टी ने बोरियो सीट से एक बार फिर लोबिन हेम्ब्रम को टिकट दे दिया, जिससे वे बेहद असंतुष्ट थे। वहीं उनके बेटों ने पहले ही झामुमो की सदस्यता ले ली थी, जिससे यह संकेत मिल गया था कि परिवार का झुकाव अब झामुमो की ओर है। भाजपा से मोहभंग और लगातार उपेक्षा के चलते अब ताला मरांडी ने झामुमो की ओर वापसी कर ली है, जिसे वह “घर वापसी” कह रहे हैं।

    राजनीति में नई करवट या पुरानी राह की वापसी?

    ताला मरांडी की झामुमो में वापसी महज एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीति में एक सांकेतिक बदलाव की शुरुआत भी हो सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी यह घर वापसी झामुमो के लिए कोई बड़ा सियासी लाभ लेकर आएगी या फिर यह सिर्फ एक व्यक्तिगत यात्रा की पूर्णता भर है।

     

  • भगवान महावीर की जयंती पर निकली भव्य शोभायात्रा

    परवेज़ आलम

    गिरिडीह: अहिंसा, त्याग और करुणा का संदेश देने वाले 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की 2624वीं जयंती गुरुवार को देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। इसी क्रम में झारखंड के गिरिडीह और सरिया शहरों में भी जैन समाज की ओर से भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धा और आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

    सरिया में निकली भक्ति की गंगा

    सरिया के स्टेशन रोड से शुरू हुई शोभायात्रा में भगवान महावीर की सजीव झांकी दो विशेष वाहनों पर सजाई गई थी। रथों में विराजमान भगवान की मूर्ति को फूलों, रंग-बिरंगे कपड़ों और झूमरों से सजाया गया था। साथ ही बच्चों की टोली हाथों में जयकारों की तख्तियां लिए उत्साहपूर्वक नारे लगाते हुए चल रही थी — “जिओ और जीने दो”, “अहिंसा परमो धर्मः”।

    सरिया जैन समाज की अगुवाई में निकली इस शोभायात्रा में प्रमुख रूप से राजेश जैन, डिंपल जैन, संदीप जैन, विक्की जैन, अजित जैन, मोना जैन और संतोष जैन जैसे समाजसेवी शामिल रहे।

    गिरिडीह में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

    वहीं गिरिडीह के बड़ा चौक से निकली शोभायात्रा में हजारों की संख्या में भक्तों ने हिस्सा लिया। महिलाएं पारंपरिक परिधानों में ढोल-नगाड़ों की धुन पर झूमती रहीं, तो पुरुषों की टोली जयकारों के साथ आगे बढ़ती रही। एक विशेष आकर्षण रहा भगवान महावीर का घोड़े पर सुसज्जित रथ, जिसमें अष्टधातु की मूर्ति को नगर भ्रमण कराया गया।

    हर गली में बिखरी भक्ति की रोशनी

    शहर की गलियों से गुजरते हुए शोभायात्रा ने मानो पूरा गिरिडीह को भक्ति के रंग में रंग दिया। मंदिर से निकलते ही रथ की आरती की गई और भगवान के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। दो घोड़ों पर सवार युवक शोभायात्रा का प्रहरी स्वरूप में नेतृत्व करते नजर आए।

    समापन पर जलाभिषेक और भंडारे का आयोजन

    शोभायात्रा के बाद मंदिर प्रांगण में भगवान महावीर स्वामी का जलाभिषेक कर विशेष पूजा अर्चना की गई। दोपहर में श्रद्धालुओं के लिए भव्य भंडारे का आयोजन हुआ और देर शाम तक आरती व अन्य धार्मिक अनुष्ठान चलते रहे।

    इस मौके पर महिला जैन समाज की सदस्य राजश्री जैन ने कहा, “भगवान महावीर का संदेश आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। जब पूरा विश्व हिंसा और संघर्ष से गुजर रहा है, तब ‘जिओ और जीने दो’ का विचार हर घर तक पहुंचना चाहिए।”

    शोभायात्रा में शामिल हुए कई प्रमुख श्रद्धालु

    इस आयोजन में अशोक जैन, अंकित जैन, अजय जैन, पद्म जैन, विजय सेठी, अमित जैन, राजन जैन, अविनाश सेठी, सार्थक जैन और विनीता जैन समेत जैन समाज के अनेक गणमान्य श्रद्धालु शामिल हुए।