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  • रघुवर दास की नई पारी: लौटेंगे सक्रिय राजनीति में

    झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास, अब सक्रिय राजनीति में नई भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। गुरुवार को दोपहर 3 बजे वे विशेष विमान से रांची पहुंचेंगे।  राज्यपाल पद से इस्तीफा देने के बाद वे पहली बार झारखंड आ रहे हैं ।

    शुक्रवार को रघुवर दास भारतीय जनता पार्टी  की सदस्यता ले सकते हैं। इसके बाद वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मिलने  दिल्ली रवाना होंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें संगठन में एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकता है।

    18 अक्टूबर 2023 को बने थे ओडिशा के राज्यपाल। 
    रघुवर दास ने 18 अक्टूबर 2023 को ओडिशा के राज्यपाल का पदभार संभाला था। मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मिजोरम के राज्यपाल हरि बाबू कंभमपति को ओडिशा का नया राज्यपाल नियुक्त किया और रघुवर दास का इस्तीफा स्वीकार कर लिया।

    “भविष्य की भूमिका पार्टी तय करेगी”
    बुधवार को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद रघुवर दास ने कहा, “मैंने भाजपा में बूथ अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक की यात्रा तय की है। पार्टी भविष्य में मेरी भूमिका पर फैसला करेगी। ओडिशा में मेरा अनुभव यादगार रहा। यहां के लोगों का जुनून मुझे हमेशा याद रहेगा।”

    44 वर्षों में दूसरी बार लेंगे सदस्यता।
    1980 में भाजपा की सदस्यता लेकर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले रघुवर दास 44 वर्षों में दूसरी बार पार्टी की सदस्यता लेने जा रहे हैं। उन्होंने कभी पार्टी से अलग राह नहीं पकड़ी। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे पदों पर अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद राज्यपाल बनने के दौरान 14 महीने तक राजनीति से दूर रहे।

    ओडिशा के लिए डबल इंजन सरकार की तारीफ।
    रघुवर दास ने ओडिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली डबल इंजन सरकार की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह सरकार गरीबों के विकास के लिए काम कर रही है और 2036 में ओडिशा के 100वें स्थापना वर्ष तक इसे विकसित राज्य के रूप में देखने की उम्मीद है।

    झारखंड और देश की राजनीति में रघुवर दास की यह वापसी कितनी असरदार होगी, यह समय ही बताएगा।

  • झारखंड में बीजेपी की हार: क्या संघ की पकड़ ढीली हो गई है ?

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट…..

    झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं। 28 आदिवासी सीटों में से सिर्फ़ एक सीट पर जीत, यह आंकड़ा पार्टी की सियासी जमीन खिसकने की कहानी खुद ब खुद कहता है। आदिवासी इलाकों में पार्टी की पकड़ कमजोर हो चुकी है। दिल्ली से लेकर रांची तक मंथन का दौर जारी है, लेकिन क्या बीजेपी उस दर्द की सही नब्ज़ पकड़ पाएगी जिसने उसे इस हार की कगार पर ला दिया ?

    आदिवासी वोटर और बीजेपी का बिखरता समीकरण
    झारखंड में बीजेपी की हार के पीछे आदिवासी वोटरों की नाराज़गी साफ झलकती है। पार्टी ने आरएसएस के जरिए आदिवासियों को जोड़ने की हर कोशिश की, लेकिन ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम समुदाय का गठजोड़, बीजेपी की कोशिशों पर भारी पड़ा। आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव, सरना आदिवासियों की घटती संख्या और संघ की कमजोर होती पकड़ ने बीजेपी की सियासी पकड़ को ढीला कर दिया।

    गुमला, लोहरदगा, बिशुनपुर और सिसई जैसे इलाकों में कभी संघ का मजबूत नेटवर्क हुआ करता था। वनवासी कल्याण केंद्र, एकल विद्यालय, और सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संगठन आदिवासी समुदाय में संघ का प्रभाव बढ़ाते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में इन संगठनों की गतिविधियां धीमी पड़ गई हैं। संघ से जुड़े सूत्र मानते हैं कि आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी से संघ की शाखाएं कमजोर पड़ी हैं।

    दिल्ली में होगा निर्णायक मंथन
    रांची में हार की समीक्षा के बाद अब दिल्ली में 3 दिसंबर को बीजेपी के शीर्ष नेताओं की बैठक होगी। जेपी नड्डा, अमित शाह, और अन्य वरिष्ठ नेता इस हार के कारणों पर मंथन करेंगे। सवाल यह है कि क्या यह बैठक सिर्फ हार के कारणों को तलाशेगी या जमीनी स्तर पर कुछ ठोस बदलाव भी होंगे?

    गुमला से लेकर बिशुनपुर तक: बीजेपी का टूटता किला
    गुमला जिले में बीजेपी को करारी शिकस्त मिली है। कभी इन इलाकों में वनवासी कल्याण केंद्र और विकास भारती जैसे संगठनों का बड़ा प्रभाव था। बिशुनपुर में अशोक भगत की पकड़ इतनी मजबूत थी कि टिकट का फैसला वही करते थे। लेकिन आज वहां झामुमो और चमरा लिंडा का दबदबा है।

    क्या बीजेपी आत्मनिरीक्षण करेगी?
    2019 के चुनाव में 25 सीटें जीतने वाली बीजेपी आज सिर्फ 21 सीटों पर सिमट गई है। आदिवासियों का झुकाव झामुमो और कांग्रेस की ओर बढ़ता जा रहा है। संघ की कमजोर होती भूमिका, बूथ मैनेजमेंट की खामियां और निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं का उत्साह खत्म होना, ये सब पार्टी के लिए खतरे की घंटी है।

    बीजेपी के पास अब ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं। जमीनी स्तर पर काम शुरू करना होगा, नए चेहरे लाने होंगे और पुराने, चूके हुए नेताओं से किनारा करना होगा। झारखंड कभी बीजेपी का गढ़ हुआ करता था, लेकिन अब यह पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बन गया है।

    क्या बीजेपी समय रहते सबक लेगी या यह हार उसकी झोली में आने वाले और बड़े झटकों का ट्रेलर मात्र है? झारखंड की सियासत के इस बदलते परिदृश्य में बीजेपी का भविष्य सवालों के घेरे में है।