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  • शिबू सोरेन के श्राद्ध में 5 लाख लोगों की मेज़बानी की तैयारी

    वीआईपी के लिए बने चार हेलीपैड, सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम

    परवेज़ आलम

    For The News Post4u.

    रामगढ़, नेमरा :  झारखंड की राजनीति के पुरोधा और आदिवासी अस्मिता के प्रतीक, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक दिशोम गुरु  शिबू सोरेन के श्राद्ध भोज की तैयारियां इन दिनों पूरे जोर-शोर से चल रही हैं। अनुमान है कि इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में करीब चार से पांच लाख लोग शामिल होंगे, जिसके लिए पांच विशाल पंडाल और अस्थायी रसोईघरों की व्यवस्था की गई है।

    वीआईपी के लिए विशेष इंतज़ाम.

    देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, कांग्रेस अध्यक्ष, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और विशिष्ट मेहमानों को निमंत्रण भेजा गया है। वीआईपी आवागमन को ध्यान में रखते हुए चार हेलीपैड तैयार किए गए हैं — जिनमें से तीन शिबू सोरेन के घर के पास और एक लगभग तीन किलोमीटर दूर बनाया गया है। 16 अगस्त को होने वाले संस्कार भोज के दिन, विशेष अतिथियों के लिए अलग पार्किंग की सुविधा भी होगी।

    स्थानीय आमंत्रण झारखंड मुक्ति मोर्चा की जिला कमेटियों के माध्यम से भेजे जा रहे हैं। वहीं प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से शिबू सोरेन के पैतृक आवास के 300 मीटर के दायरे में बैरिकेडिंग कर दी है, जहां केवल वीआईपी और करीबी लोग ही प्रवेश कर सकेंगे।

    ग्रामीणों और मेहमानों के लिए व्यवस्था.

    श्राद्ध भोज के लिए तैयार पांच पंडालों में बैठकर भोजन करने की सुविधा होगी। सभी पंडालों के पास ही बड़े-बड़े रसोई घर बनाए गए हैं। विशेष अतिथियों का भोजन शिबू सोरेन के घर के पीछे परोसा जाएगा। कार्यक्रम स्थल तक केवल वीआईपी वाहन ही पहुंचेंगे; आम लोगों के लिए 300 ई-रिक्शा की व्यवस्था की गई है, जो पार्किंग स्थल से लोगों को पंडाल तक लाएंगे।

    सुरक्षा के पुख्ता इंतेजाम.

    कार्यक्रम के दौरान नेमरा को छावनी में तब्दील कर दिया जाएगा। 9 आईपीएस अधिकारी 14 से 16 अगस्त तक और 40 डीएसपी 12 से 17 अगस्त तक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे। पुलिस मुख्यालय ने इसके लिए विशेष आदेश जारी कर दिए हैं।

    गांव में आम आदमी की तरह सीएम सोरेन.

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इन दिनों अपने पैतृक गांव नेमरा में हैं, जहां वे पिता के श्राद्ध कर्म में एक आम ग्रामीण की तरह हिस्सा ले रहे हैं। संथाल समाज और गांव के लोगों के साथ बैठकों में वे हर विधि-विधान की योजना पर चर्चा कर रहे हैं, साथ ही भोज के मेन्यू से लेकर मेहमानों की सेवा तक पर व्यक्तिगत रूप से नजर रख रहे हैं।

    पिता की विरासत को जीते हुए हेमंत सोरेन गांव की गलियों और खेत-खलिहानों में घूमते हैं, किसानों से बात करते हैं और जल, जंगल, ज़मीन की रक्षा पर चर्चा करते हैं। उनका कहना है कि राजनीति उनके लिए सत्ता का साधन नहीं, बल्कि जनसेवा और अधिकारों की रक्षा का संकल्प है — एक सीख जो उन्हें सीधे पिता से मिली है।

    जल, जंगल और ज़मीन: पहचान और संकल्प

    सीएम ने स्पष्ट कहा कि जल, जंगल और ज़मीन झारखंड की पहचान और अस्तित्व का आधार हैं। यही कारण है कि राज्य सरकार इन संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। वे मानते हैं कि यह केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरा-भरा, समृद्ध झारखंड देने का वादा है।

    विरासत का विस्तार.

    गांव की मिट्टी, उसकी खुशबू और हरियाली की ठंडक में हेमंत सोरेन आज भी अपने पिता की परछाईं की तरह दिखते हैं। जनसेवा, सादगी और संघर्ष की वही परंपरा, जिसे दिशोम गुरु ने दशकों तक निभाया, अब मुख्यमंत्री अपने कामों के जरिये आगे बढ़ा रहे हैं।

  • हेमंत सरकार का बड़ा फैसला: झारखंड आंदोलनकारियों को अब मिलेगी समान पेंशन

    RANCHI: झारखंड सरकार ने झारखंड आंदोलनकारियों को सम्मान देने के लिए एक अहम कदम उठाया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर राज्य सरकार ने पेंशन योजना में बदलाव का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत अब आंदोलनकारियों को तीन अलग-अलग कैटेगरी में पेंशन देने के बजाय समान राशि प्रदान की जाएगी।

    प्रस्ताव के अनुसार, आंदोलन के दौरान जेल जाने वाले सभी आंदोलनकारियों को 10 हजार रुपये प्रति माह की पेंशन दी जाएगी। इससे पहले पेंशन की राशि तीन श्रेणियों में बंटी हुई थी:

    सरकार के इस नए फैसले से सभी जेल जाने वाले आंदोलनकारियों को समान पेंशन का लाभ मिलेगा।

    इसके अलावा, झारखंड आंदोलन में भाग लेने वाले लेकिन जेल न जाने वाले आंदोलनकारियों को अब केवल प्रशस्ति पत्र तक ही सीमित नहीं रखा जाएगा। सरकार ने उन्हें सम्मान स्वरूप 1000 से 1500 रुपये तक की राशि देने का भी प्रस्ताव किया है।

    विभागीय मंत्री के पास इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए भेजा गया है। सरकार के इस कदम को आंदोलनकारियों के सम्मान और उनके योगदान को उचित मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    मुख्य बिंदु:

    समान पेंशन: सभी जेल गए आंदोलनकारियों को 10 हजार रुपये प्रतिमाह।
    पहले की व्यवस्था: तीन श्रेणियों में पेंशन (3500, 5000, 7000 रुपये)।
    नई योजना: जेल न जाने वाले आंदोलनकारियों को 1000-1500 रुपये की सम्मान राशि के साथ प्रशस्ति पत्र।
    प्रस्ताव: फाइल को विभागीय मंत्री के पास भेजा गया है।

  • हेमंत सोरेन की कैबिनेट: 11 मंत्री करोड़पति

    RANCHI:  झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार के मंत्रिमंडल का नया अध्याय खुल चुका है, और इसमें हर चेहरा अपने आप में एक कहानी कहता है।  मंत्रिमंडल के सभी 11 मंत्री करोड़पति हैं। वहीं, राजद कोटे से मंत्री संजय प्रसाद यादव अपनी 29 करोड़ रुपये की संपत्ति और 6 आपराधिक मामलों के साथ सबसे चर्चित नाम बन गए हैं।

    सबसे युवा, सबसे वरिष्ठ और संपत्ति 
    अगर उम्र की बात करें, तो कांग्रेस की मांडर से विधायक शिल्पी नेहा तिर्की केवल 31 साल की हैं, जो मंत्रिमंडल की सबसे युवा सदस्य हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के छतरपुर से विधायक राधाकृष्ण किशोर, 66 साल की उम्र में सबसे वरिष्ठ हैं।

    कौन कितना अमीर और कितने केस दर्ज?
    संजय प्रसाद यादव (राजद): 29 करोड़ की संपत्ति, 6 केस।
    दीपिका पांडे सिंह (कांग्रेस): 6 करोड़ की संपत्ति, 1 केस।
    सुदीव्य कुमार (झामुमो): 1.5 करोड़ की संपत्ति।
    योगेंद्र प्रसाद (झामुमो): 1 करोड़ की संपत्ति।
    शिल्पी नेहा तिर्की (कांग्रेस): 1 करोड़ की संपत्ति।
    राधाकृष्ण किशोर (कांग्रेस): 3 करोड़ की संपत्ति।
    दीपक बिरुआ (झामुमो): 3 करोड़ की संपत्ति।
    चमरा लिंडा (झामुमो): 2 करोड़ की संपत्ति, 1 केस।
    रामदास सोरेन (झामुमो): 10 करोड़ की संपत्ति, 2 केस।
    डॉ. इरफान अंसारी (कांग्रेस): 3 करोड़ की संपत्ति।
    हफीजुल हसन (झामुमो): 1 करोड़ की संपत्ति।

  • मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मिली हाइ कोर्ट से राहत

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……

    आज की खबर झारखंड की राजनीति के गलियारों से है, जहां की सांस ली। झारखंड हाईकोर्ट ने ईडी के समन को लेकर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने के आदेश से अंतरिम राहत दी है।

    अब कहानी की परतें खोलते हैं।
    रांची की एमपी-एमएलए कोर्ट ने 25 नवंबर को हेमंत सोरेन को 4 दिसंबर को कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया था। मामला ईडी की ओर से दाखिल शिकायतवाद का है, जिसमें आरोप लगाया गया कि हेमंत सोरेन ने जमीन घोटाले में पूछताछ के लिए भेजे गए 10 समनों में से केवल दो पर उपस्थिति दर्ज कराई। बाकी बार वह अनुपस्थित रहे।

    इस आदेश के खिलाफ हेमंत सोरेन ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और वहां, जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की बेंच ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश पर रोक लगा दी। कोर्ट ने ईडी से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 16 दिसंबर को तय की है।

    अब जरा रुकिए। यह केवल एक कानूनी मसला नहीं है। यह एक राजनीतिक कथा भी है।
    ईडी के समन, सीजेएम कोर्ट का आदेश, फिर मामला एमपी-एमएलए कोर्ट में पहुंचना और अब हाईकोर्ट में राहत मिलना—यह सब क्या संकेत देता है? राजनीति और कानून के इस ताने-बाने में, असल मुद्दा जनता के सरोकारों से कहीं छूट तो नहीं गया?

    हेमंत सोरेन के खिलाफ 19 फरवरी 2024 को शिकायत दर्ज की गई थी। ईडी का आरोप है कि जमीन घोटाले में उनका नाम सामने आया है। समन पर अनुपस्थिति को पीएमएलए की धारा 63 और आईपीसी की धारा 174 के तहत गैरकानूनी बताया गया। लेकिन, यह भी देखना होगा कि क्या यह मामला केवल कानून का पालन न करने का है, या इसके पीछे कोई और कहानी छुपी है?

    राजनीति और कानून के इस खेल में हमेशा सवाल उठते हैं।
    क्या हेमंत सोरेन को दी गई यह राहत उनकी स्थायी सुरक्षा की गारंटी है, या सिर्फ कुछ समय के लिए मिली राजनीतिक सांस? ईडी का अगला कदम क्या होगा? और 16 दिसंबर को अदालत का रुख क्या होगा?

    जब एक मुख्यमंत्री को अदालत में हाजिर होने से राहत मिलती है, तो यह सिर्फ एक कानूनी खबर नहीं होती। यह लोकतंत्र की बारीकियों को समझने का मौका भी होता है।

  • झारखंड में बीजेपी की हार: क्या संघ की पकड़ ढीली हो गई है ?

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट…..

    झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं। 28 आदिवासी सीटों में से सिर्फ़ एक सीट पर जीत, यह आंकड़ा पार्टी की सियासी जमीन खिसकने की कहानी खुद ब खुद कहता है। आदिवासी इलाकों में पार्टी की पकड़ कमजोर हो चुकी है। दिल्ली से लेकर रांची तक मंथन का दौर जारी है, लेकिन क्या बीजेपी उस दर्द की सही नब्ज़ पकड़ पाएगी जिसने उसे इस हार की कगार पर ला दिया ?

    आदिवासी वोटर और बीजेपी का बिखरता समीकरण
    झारखंड में बीजेपी की हार के पीछे आदिवासी वोटरों की नाराज़गी साफ झलकती है। पार्टी ने आरएसएस के जरिए आदिवासियों को जोड़ने की हर कोशिश की, लेकिन ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम समुदाय का गठजोड़, बीजेपी की कोशिशों पर भारी पड़ा। आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव, सरना आदिवासियों की घटती संख्या और संघ की कमजोर होती पकड़ ने बीजेपी की सियासी पकड़ को ढीला कर दिया।

    गुमला, लोहरदगा, बिशुनपुर और सिसई जैसे इलाकों में कभी संघ का मजबूत नेटवर्क हुआ करता था। वनवासी कल्याण केंद्र, एकल विद्यालय, और सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संगठन आदिवासी समुदाय में संघ का प्रभाव बढ़ाते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में इन संगठनों की गतिविधियां धीमी पड़ गई हैं। संघ से जुड़े सूत्र मानते हैं कि आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी से संघ की शाखाएं कमजोर पड़ी हैं।

    दिल्ली में होगा निर्णायक मंथन
    रांची में हार की समीक्षा के बाद अब दिल्ली में 3 दिसंबर को बीजेपी के शीर्ष नेताओं की बैठक होगी। जेपी नड्डा, अमित शाह, और अन्य वरिष्ठ नेता इस हार के कारणों पर मंथन करेंगे। सवाल यह है कि क्या यह बैठक सिर्फ हार के कारणों को तलाशेगी या जमीनी स्तर पर कुछ ठोस बदलाव भी होंगे?

    गुमला से लेकर बिशुनपुर तक: बीजेपी का टूटता किला
    गुमला जिले में बीजेपी को करारी शिकस्त मिली है। कभी इन इलाकों में वनवासी कल्याण केंद्र और विकास भारती जैसे संगठनों का बड़ा प्रभाव था। बिशुनपुर में अशोक भगत की पकड़ इतनी मजबूत थी कि टिकट का फैसला वही करते थे। लेकिन आज वहां झामुमो और चमरा लिंडा का दबदबा है।

    क्या बीजेपी आत्मनिरीक्षण करेगी?
    2019 के चुनाव में 25 सीटें जीतने वाली बीजेपी आज सिर्फ 21 सीटों पर सिमट गई है। आदिवासियों का झुकाव झामुमो और कांग्रेस की ओर बढ़ता जा रहा है। संघ की कमजोर होती भूमिका, बूथ मैनेजमेंट की खामियां और निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं का उत्साह खत्म होना, ये सब पार्टी के लिए खतरे की घंटी है।

    बीजेपी के पास अब ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं। जमीनी स्तर पर काम शुरू करना होगा, नए चेहरे लाने होंगे और पुराने, चूके हुए नेताओं से किनारा करना होगा। झारखंड कभी बीजेपी का गढ़ हुआ करता था, लेकिन अब यह पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बन गया है।

    क्या बीजेपी समय रहते सबक लेगी या यह हार उसकी झोली में आने वाले और बड़े झटकों का ट्रेलर मात्र है? झारखंड की सियासत के इस बदलते परिदृश्य में बीजेपी का भविष्य सवालों के घेरे में है।

  • महिलाओं के खातों में 2500 रुपये । तारीख़ लिख लीजिए, 11 दिसंबर !

    RANCHI: “हेमंत सोरेन सरकार के ‘मंईयां सम्मान योजना’ की पांचवीं किस्त पर नज़र डालिए। वो जो बदलाव की धारा बहती है, वो अब महिलाओं के खातों में 1000 नहीं, पूरे 2500 रुपये लेकर आ रही है। झारखंड के गांव-गांव, शहर-शहर से एक ही आवाज़ गूंज रही है – ‘मंईयां का सम्मान बढ़ा है, हर घर में खुशियां छाई हैं।’”

    झारखंड की सड़कों से लेकर सत्ता के गलियारों तक:
    57 लाख महिलाओं के खातों में 2500 रुपये पहुंचने को हैं तैयार। तारीख़ लिख लीजिए, 11 दिसंबर! कल्याण विभाग पसीना बहा रहा है ताकि हर बहन के चेहरे पर मुस्कान आए। सोचिए, अब तक चार किस्तों में जो 1000 रुपये भेजे गए थे, उनकी जगह 2500 रुपये मिलेंगे।

    चुनावी राजनीति का सियासी खेल:
    विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने ‘गोगो दीदी योजना’ में 2100 रुपये का वादा किया। लेकिन हेमंत सोरेन, जो अपने वादों पर अडिग रहते हैं, उन्होंने सीधे 2500 का दांव खेला। और चुनावी नतीजों ने दिखा दिया कि ये दांव सफल रहा। इंडिया गठबंधन ने प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज की, और मंईयां सम्मान योजना इसमें एक बड़ा कारण बनी।

    झारखंड के घरों की चूल्हे की बातें:
    “अब चूल्हे पर सिर्फ खाना नहीं, सपने भी पकेंगे,” कह रही हैं मरियम बीबी , जो इस योजना से बेहद खुश हैं। ग्रामीण झारखंड में ये योजना एक नई उम्मीद बनकर उभरी है।

    रेवड़ी बांटने जैसे आरोप कहीं खरे नहीं उतरते

    झारखंड में मंईयां योजना को चालू रखने के लिए राज्य सरकार को संसाधनों की कमी होने के आसार अभी तक नहीं है। वित्त विभाग के अधिकारियों की मानें तो पिछले कुछ वर्षों में झारखंड ने कहीं से कर्ज नहीं लिया है और सरप्लस बजट भी रहा है।
    ऐसे में कर्ज लेकर रेवड़ी बांटने जैसे आरोप कहीं खरे नहीं उतरते। सरकार एक बार फिर इस योजना के लिए कोई कर्ज नहीं लेगी। ऐसे में यह तय होता दिख रहा है कि कर्ज लिए बगैर भी मंईयां योजना को जारी रखा जा सकता है। वित्त विभाग के सूत्रों के अनुसार इस उपलब्धि के पीछे पिछले चार-पांच वर्षों से चले आ रहे वित्तीय सुधारों का व्यापक असर है।
    हेमंत सरकार की ये योजना न सिर्फ आर्थिक मदद, बल्कि सामाजिक बदलाव की कहानी भी लिख रही है। ये सिर्फ 2500 रुपये नहीं, ये महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रतीक है।

     

  • झारखंड की नई पहल: दिव्यांग और अनाथ विद्यार्थियों के सपनों को पंख!

    रांची की सुबह आज नई उम्मीदों से रोशन हुई है। झारखंड सरकार ने दिव्यांग और अनाथ विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। 2025-26 के शैक्षणिक सत्र से, राज्य सरकार इन बच्चों की उच्च और तकनीकी शिक्षा का पूरा खर्च उठाएगी।

    क्या है योजना?
    सरकार 10 लाख रुपये तक की ट्यूशन फीस खुद वहन करेगी और हर महीने छात्रों को 4,000 रुपये भत्ता भी दिया जाएगा। छात्रों के लिए एक “ऑनलाइन पोर्टल” तैयार किया जा रहा है, जहां वे इस योजना के तहत आवेदन कर सकेंगे।

    किसे मिलेगा लाभ?
    सरकार की नई “वाल्मीकि छात्रवृत्ति योजना” का उद्देश्य हर साल 12,000 स्नातक और परास्नातक छात्रों और 1,200 व्यावसायिक कोर्स करने वाले विद्यार्थियों तक पहुंचना है। लेकिन ये संख्या आखिरी नहीं है। राज्य के किसी भी संस्थान में नामांकन लेने वाले छात्रों को इसका लाभ मिलेगा। अन्य राज्यों के छात्रों के लिए यह सुविधा केवल टॉप श्रेणी के संस्थानों में पढ़ाई करने वालों तक सीमित रहेगी।

    शर्तें क्या हैं?

    लाभुक को झारखंड का स्थानीय निवासी होना चाहिए।
    डिप्लोमा के लिए दसवीं और डिग्री कोर्स के लिए दसवीं व बारहवीं झारखंड के स्कूलों से उत्तीर्ण होना अनिवार्य है।
    क्यों है ये कदम ऐतिहासिक?
    दिव्यांग और अनाथ बच्चों के लिए शिक्षा की राह अब न केवल आसान होगी, बल्कि यह उनके सपनों को साकार करने का एक बड़ा माध्यम बनेगी। 99.66 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली यह योजना, न केवल आर्थिक बाधाओं को हटाएगी, बल्कि समाज में समावेशिता और समानता का एक नया अध्याय भी लिखेगी।

    सरकार की सोच और तैयारी
    इस योजना की निगरानी के लिए एक विशेष समिति बनाई जाएगी, जिसमें उच्च शिक्षा निदेशक, सामाजिक सुरक्षा निदेशक और तकनीकी शिक्षा निदेशक जैसे विभागीय पदाधिकारी शामिल होंगे। सरकार ने इसे जनवरी-फरवरी 2025 में लांच करने का लक्ष्य तय किया है।

    “ये कदम सिर्फ एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि उन अनगिनत सपनों की बुनियाद है, जो अब उड़ान भरने को तैयार हैं।” झारखंड सरकार की यह पहल एक मिसाल है, जो पूरे देश को दिखाती है कि शिक्षा का हक हर बच्चे का है।

    आइए, इस बदलाव का हिस्सा बनें, जहां हर बच्चा पढ़ेगा, बढ़ेगा और सपनों को हकीकत में बदलेगा!

  • झारखंड और असम: राजनीति के चाय बागानों में नई बयार!

    रांची से पवन हवाओं के संग आई एक नई खबर, झारखंड की मिट्टी से लेकर असम के चाय बागानों तक सियासी सुगंध फैल रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी नई पारी की पहली ही कैबिनेट बैठक में चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासियों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए असम में एक सर्वदलीय टीम भेजने का ऐलान किया। ये फैसला जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा संदेश देता है।

    असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा है कि झारखंड के कुछ इलाकों का अध्ययन करने के लिए उनकी सरकार भी दो प्रतिनिधिमंडल भेजेगी। “हम देखेंगे कि आखिर झारखंड में ऐसी कौन-सी ‘विशेष चीजें’ हैं जो ध्यान खींच रही हैं।”

    पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान झामुमो और भाजपा के बीच घुसपैठ और आदिवासियों की स्थिति पर तीखे आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिले। अब लगता है कि इस राजनीतिक मंथन का ‘अध्ययन यात्रा’ के रूप में नया अध्याय शुरू हो गया है।

    हिमंता बिस्वा सरमा का यह बयान भी दिलचस्प है कि उनकी सरकार 5 दिसंबर को होने वाली कैबिनेट बैठक में इस पर और निर्णय लेगी। लेकिन सवाल उठता है कि यह अध्ययन असल में ज़मीन पर आदिवासियों की स्थिति को बेहतर करने की कोशिश है, या फिर राजनीति के चाय बागानों में सियासी चाय की मिठास बढ़ाने की कवायद?

    हेमंत सोरेन की यह पहल उनके नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में पहले कदमों को निर्णायक बनाने की कोशिश है। लेकिन हिमंता बिस्वा सरमा का पलटवार संकेत देता है कि सियासत की इस चाय में खौलने वाले मुद्दे सिर्फ झारखंड या असम तक सीमित नहीं रहने वाले।

    आखिरकार, राजनीति भी तो उसी चाय की तरह है, जिसकी मिठास उसकी कड़वाहट के सही संतुलन से तय होती है। सवाल ये है कि इस बार इस चाय के प्याले में किसकी चीनी कम या ज्यादा पड़ेगी?

  • हेमंत सोरेन के कैबिनेट विस्तार की डेट तय, नए चेहरों को मिलेगी जगह !

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……
    झारखंड में हेमंत सोरेन की नई सरकार के गठन के बाद कैबिनेट विस्तार को लेकर अटकलें खत्म होती दिख रही हैं। खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कैबिनेट शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले तैयार हो जाएगा। कांग्रेस कोटे से मंत्रियों के नाम तय करने का अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व करेगा।

    मंगलवार तक फाइनल होंगे नाम । 
    सूत्रों के अनुसार, मंगलवार तक मंत्रियों के नाम फाइनल हो सकते हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस बार नए चेहरों को तरजीह देने के मूड में हैं। ऐसे में कुछ अनुभवी विधायकों के साथ नए चेहरे मंत्रिमंडल में शामिल किए जा सकते हैं। राजद से केवल एक मंत्री बनाया जाएगा, जिसके नाम पर अंतिम निर्णय लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव करेंगे।

    महिला मंत्री के नाम पर चर्चा । 
    कांग्रेस कोटे से दीपिका पांडेय सिंह का नाम महिला मंत्री के रूप में सबसे आगे चल रहा है। वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से लुइस मरांडी का नाम भी चर्चा में है। अनुसूचित जाति के मंत्री के लिए कांग्रेस से राधाकृष्ण किशोर और सुरेश बैठा, जबकि राजद से सुरेश पासवान के नाम की संभावनाएं जताई जा रही हैं।

    कांग्रेस नेताओं की दिल्ली दौड़ । 
    शनिवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश नई दिल्ली रवाना हो गए। वहां वे केंद्रीय नेतृत्व से मिलकर कांग्रेस कोटे के मंत्रियों के नाम फाइनल करेंगे। इस दौरान केंद्रीय नेताओं के साथ मुलाकात में अंतिम नामों पर मुहर लगाई जाएगी।

    शीतकालीन सत्र से पहले होगा विस्तार । 
    कैबिनेट विस्तार शीतकालीन सत्र से पहले किया जाएगा। सभी नए मंत्रियों को एक साथ शपथ दिलाई जाएगी। मुख्यमंत्री का मानना है कि नई कैबिनेट झारखंड के विकास को नई दिशा देगी।

    जनता का अपार समर्थन, विकास प्राथमिकता । 
    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा, “झारखंड की जनता ने महागठबंधन को भारी बहुमत देकर यह साफ कर दिया है कि यहां विकास राजनीति की प्राथमिकता है। बांटने की राजनीति का समय अब खत्म हो चुका है।”

    सीएम हाउस में बधाई का दौर । 
    गुरुवार को चौथी बार मुख्यमंत्री बने हेमंत सोरेन को शनिवार को प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं ने बधाई दी। कांग्रेस के रवींद्र सिंह, जलेश्वर महतो, सतीश पाल मुंजनी और रियाज अहमद भी इस मौके पर मौजूद रहे।

    क्या झारखंड में दिखेगा नई राजनीति का चेहरा !
    कैबिनेट विस्तार को लेकर चर्चाएं तेज हैं। नए चेहरे और गठबंधन के संतुलन को साधने की कवायद के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि हेमंत सोरेन की नई टीम झारखंड को किस तरह आगे बढ़ाती है। विकास पर जनता का भरोसा बनाए रखना इस कैबिनेट की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

  • झारखंड की ‘सोरेन गाथा’

    रिपोर्ट: परवेज़ आलम……..

    हेमंत सोरेन का नाम झारखंड की राजनीति में महज एक नेता का नहीं, बल्कि संघर्ष, दृढ़ता और विजयी संकल्प का प्रतीक बन चुका है। गुरुवार को जब उन्होंने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो यह केवल एक पद ग्रहण करने का अवसर नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षण था जो बताता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी साहस और प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ा जा सकता है।

    तीन मोर्चों पर अकेले लड़ाई, सबको चौंकाया .

    हेमंत सोरेन के लिए यह चुनावी सफर आसान नहीं था। तीन मोर्चे थे—कानूनी संकट, पार्टी का आंतरिक संघर्ष, और विपक्षी हमले। 2023 में भूमि घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों और गिरफ्तारी ने उनकी राजनीतिक यात्रा को सबसे चुनौतीपूर्ण बना दिया। लेकिन पांच महीने जेल में बिताने के बाद जब उन्होंने जमानत पर रिहाई पाई, तो उनका यह कहना कि “यह साजिश थी, आदिवासियों की आवाज को दबाने की कोशिश,” पूरे झारखंड में गूंज उठा।

    पार्टी के भीतर बगावत से निपटना भी किसी युद्ध से कम नहीं था। झामुमो को संगठित रखते हुए उन्होंने कांग्रेस और राजद जैसे गठबंधन सहयोगियों को भी विश्वास में बनाए रखा। और विपक्ष ? भाजपा के तीखे हमलों और राजनीतिक चालों के बावजूद, सोरेन का लचीला नेतृत्व और अदम्य साहस झारखंड की जनता के लिए भरोसे का आधार बना रहा।

    संघर्षों से सफलता तक की कहानी .

    हेमंत सोरेन का राजनीतिक सफर संघर्षों से भरा रहा है। 10 अगस्त 1975 को झारखंड के नेमरा गांव में जन्मे सोरेन अपने पिता और झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी माने गए। लेकिन उनके सफर में कठिनाइयां कम नहीं थीं। 2009 में राज्यसभा सदस्य के तौर पर शुरुआत करने वाले सोरेन को जल्दी ही राज्य की राजनीति में गहराई तक उतरना पड़ा।       2013 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने वाले हेमंत, झारखंड के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। लेकिन यह कार्यकाल अधिक लंबा नहीं चला। 2014 में भाजपा सत्ता में आ गई और सोरेन विपक्ष में बैठ गए।

    जनता के लिए नायक, विरोधियों के लिए चुनौती .

    हेमंत सोरेन ने हर बार झारखंड की जनता के मुद्दों को अपने एजेंडे में रखा। उनकी योजनाओं ने सामाजिक सुरक्षा और आदिवासी अधिकारों पर खासा ध्यान दिया। ‘मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना’ के तहत महिलाओं को आर्थिक सहारा, किसानों के ऋण माफी का ऐलान, और ‘आपके अधिकार, आपकी सरकार, आपके द्वार’ जैसी योजनाओं ने उन्हें जनता के बीच खासा लोकप्रिय बना दिया।

    उनकी यह योजनाएं केवल विकास के वादे नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र में जनता को लाने की कोशिश थी। और यही कारण है कि विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद वे झारखंड के सबसे प्रभावशाली और भरोसेमंद नेताओं में अपनी जगह बनाए हुए हैं।

    हेमंत की जीत: झारखंड की उम्मीदें

    चुनावों के नतीजों ने साबित कर दिया कि हेमंत सोरेन केवल एक नेता नहीं, बल्कि झारखंड की उम्मीदों का चेहरा बन चुके हैं। उनकी चौथी पारी झारखंड को नई दिशा देने के लिए कितनी सफल होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इस वक्त, उनकी कहानी न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा है।

    झारखंड की जंग में अकेले उतरकर उन्होंने न केवल जीत हासिल की, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि जब जनता का भरोसा साथ हो, तो कोई भी लड़ाई मुश्किल नहीं होती।