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  • शिबू सोरेन पंचतत्व में विलीन: नेमरा गांव में लाखों नम आंखों ने दी अंतिम विदाई

    परवेज़ आलम.

    The News Post4u.

    रामगढ़, झारखंड: झारखंड आंदोलन के जननायक, पूर्व मुख्यमंत्री ‘दिशोम गुरु’  शिबू सोरेन को उनके पैतृक गांव रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड स्थित नेमरा में पूरे राजकीय सम्मान के साथ मंगलवार को अंतिम संस्कार किया गया। झमाझम बारिश और गम के माहौल के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। इसी के साथ झारखंड की राजनीति का एक युग समाप्त हो गया।

    अंतिम यात्रा: पहाड़ों की गोद में उमड़ा जनसैलाब.

    नेमरा गांव, जो पहाड़ों की तलहटी में बसा एक शांत और साधारण गांव है, मंगलवार को लाखों लोगों की भीड़ से भर गया। आम जनता से लेकर झारखंड आंदोलन के पुराने सिपाही, झामुमो कार्यकर्ता, राजनेता, नौकरशाह,पत्रकार और परिजन—हर कोई ‘दिशोम गुरु’ को अंतिम बार देखने और श्रद्धांजलि देने पहुंचा।

    गांव की गलियों में नारे गूंजते रहे—“शिबू सोरेन अमर रहें”, “जब तक सूरज चांद रहेगा, गुरुजी तेरा नाम रहेगा”।

    बारिश की फुहारों के बीच शाम 6:45 बजे उनका अग्नि संस्कार किया गया। लोग छातों के नीचे भींगते हुए अंतिम विदाई में शामिल होते रहे। मानो आसमान भी इस विदाई में रो रहा हो।

    “गुरुजी को अंतिम जोहार”, “विनम्र श्रद्धांजलि”—ऐसे शब्दों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स रांची से रामगढ़ तक पूरे रास्ते भर लोगों की आंखें नम करते रहे।

    विधानसभा से उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई और फिर पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव नेमरा लाया गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, उनके भाई बसंत सोरेन, और परिवार के अन्य सदस्य पार्थिव शरीर के साथ यात्रा में शामिल रहे।

    सादगी में श्रद्धा: संथाली परंपरा से हुआ अंतिम संस्कार.

    नेमरा गांव पहुंचने के बाद शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार संथाली रीति-रिवाज और परंपराओं के अनुसार किया गया। वहीं, उनका दाह संस्कार उसी बड़का नाला श्मशान घाट में किया गया, जहां उनके पूर्वजों की भी अंत्येष्टि होती रही है।

    मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी पुत्र हेमंत सोरेन ने निभाई। जैसे ही चिता को अग्नि दी गई, गांव के हर कोने से नारे उठे—“शिबू सोरेन अमर रहें”। बारिश की बूंदें उस वक्त भी थमी नहीं थीं, लेकिन लोगों की श्रद्धा के आगे मौसम भी झुक गया।

    राजकीय सम्मान और राष्ट्रीय नेतृत्व की उपस्थिति.

    झारखंड सरकार ने शिबू सोरेन के निधन पर 6 अगस्त तक तीन दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की। साथ ही, 4 और 5 अगस्त को सभी सरकारी दफ्तर बंद रखे गए।

    राजकीय सम्मान के तहत उनकी चिता के पास झंडा फहराया गया, गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया, और शोक ध्वनि के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

    इस दौरान कई राष्ट्रीय नेता नेमरा पहुंचे, जिनमें प्रमुख रूप से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोक सभा मे विपक्ष के नेता राहुल गांधी,तेजस्वी यादव (राजद),संजय सिंह (आप), शताब्दी रॉय (टीएमसी), पप्पू यादव ( सांसद पूर्णिया )

    भारी बारिश के कारण कई नेता हेलिकॉप्टर से नहीं आ सके, और उन्होंने सड़क मार्ग से ही नेमरा गांव पहुंचकर ‘दिशोम गुरु’ को अंतिम सलामी दी।

    प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था.

    गुरुजी की अंतिम यात्रा के दौरान मुख्य सचिव अलका तिवारी, डीजीपी अनुराग गुप्ता, प्रधान सचिव अविनाश कुमार, तथा कई जिलों के डीसी और एसपी सहित उच्चस्तरीय प्रशासनिक अमला मौजूद था। सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रही, लेकिन सादगी और अनुशासन के साथ श्रद्धा का वातावरण भी बना रहा।

    आमजन का जुड़ाव.

    गांव की गलियों में, पहाड़ों के बीच, बारिश से भीगते छतरियों के नीचे खड़े आम लोग—हर आंख नम थी। हर दिल गमगीन। लोगों ने बताया—“गुरुजी सिर्फ नेता नहीं थे, वो आंदोलन थे, वो आवाज थे हमारे हक की”। दुकानें, बाजार, स्कूल—हर जगह मातम पसरा रहा। कुछ विद्यालयों में दिवंगत नेता की आत्मा की शांति के लिए विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित की गईं।

    शिबू सोरेन का जाना, सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है। यह उस संघर्ष का अंत है, जिसने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाया।

    उनकी अंतिम यात्रा सिर्फ एक शारीरिक विदाई नहीं थी, बल्कि झारखंड के इतिहास में लिखी गई एक अविस्मरणीय घटना थी। उनका जीवन संघर्ष, आंदोलन और आदिवासी अस्मिता की मिसाल था।

    गुरुजी चले गए, लेकिन उनकी विचारधारा, उनकी आवाज, उनकी पहचान—हमेशा जीवित रहेगी।
    “दिशोम गुरु अमर रहें!”

  • झारखंड कांग्रेस को राहुल गांधी की सख्त हिदायत, जनहित पर मुखर रहें

    –कार्यकर्ताओं का सम्मान करें, गठबंधन में सामंजस्य बनाए रखें

    परवेज आलम

    For The News Post4u.

    RANCHI : लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी को झारखंड में नई दिशा देने के मकसद से नई  दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक की , जिसमें झारखंड के सभी कांग्रेस विधायक और सभी  मंत्री  शामिल हुये ।  इस बैठक को कांग्रेस की राज्य इकाई में संगठनात्मक मजबूती और गठबंधन सरकार में प्रभावशाली भूमिका सुनिश्चित करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।

    जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता, भाजपा को मौका न देने की सलाह.

    बैठक की शुरुआत में राहुल गांधी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि झारखंड के कांग्रेसी नेता जनता से जुड़े मुद्दों पर आक्रामक और सक्रिय रुख अपनाएं। उन्होंने कहा कि पेसा कानून, ओबीसी आरक्षण और सरना धर्म कोड जैसे संवेदनशील मसलों पर कांग्रेस को स्पष्ट और मज़बूत रुख दिखाना होगा, ताकि भाजपा को जनता के बीच जगह बनाने का कोई मौका न मिले।

    उन्होंने यह भी चेताया कि अगर कांग्रेस जनहित से जुड़ी आवाजें नहीं उठाएगी, तो भाजपा इन मुद्दों को हथियाने की कोशिश करेगी, जो पार्टी की राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है।

    विधायकों को विधानसभा में सक्रियता और जनता से जुड़ाव का निर्देश.

    राहुल ने साफ शब्दों में कहा कि विधायक पहले जनता के प्रतिनिधि हैं, फिर मंत्री। इसलिए उन्हें अपनी विधानसभा में सक्रिय रहकर लोगों की समस्याओं को सीधे सुनना और समाधान के लिए प्रयास करना चाहिए। उन्होंने विधायकों को निर्देश दिया कि वे विधानसभा में मजबूती से अपनी बात रखें और सरकार की योजनाओं को सही तरीके से जनता तक पहुंचाएं।

    गठबंधन धर्म का पालन और झामुमो के साथ समन्वय पर जोर.

    बैठक में राहुल गांधी ने खास तौर पर गठबंधन सहयोगी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के साथ बेहतर तालमेल बनाए रखने की बात कही। उन्होंने नेताओं से कहा कि कांग्रेस को गठबंधन धर्म का सम्मान करते हुए झामुमो के साथ किसी भी प्रकार की टकराव या टकराहट से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे जनता के बीच संयुक्त सरकार की सकारात्मक छवि बनती है।

    संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं की भूमिका को बताया केंद्रीय बिंदु.

    राहुल गांधी ने इस बात पर भी जोर दिया कि पार्टी के स्थानीय संगठनों को सक्रिय और सशक्त किया जाए। उन्होंने मंत्रियों और विधायकों को निर्देश दिया कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं का सम्मान करें, नियमित संवाद रखें और उनकी समस्याओं को प्राथमिकता दें।

    उन्होंने कहा, “कार्यकर्ता ही पार्टी की रीढ़ होते हैं। यदि कार्यकर्ता उत्साहित और संलग्न रहेंगे तो चुनावी सफलता भी सुनिश्चित होगी।” उन्होंने आगामी निकाय चुनावों की तैयारी में कार्यकर्ताओं की भूमिका को केंद्रीय बताया।

    भाजपा की आलोचना और कांग्रेस की वैकल्पिक भूमिका पर बल.

    राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा आमजन से जुड़े मुद्दों को दबाने का प्रयास करती है, लेकिन कांग्रेस को चाहिए कि वह इन मुद्दों को मजबूती से उठाकर जनता के बीच खुद को उनका सच्चा प्रतिनिधि साबित करे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को झारखंड में एक प्रभावशाली और जनहितैषी की भूमिका निभानी होगी, भले ही वह सत्ता का हिस्सा हो।

    प्रदेश अध्यक्ष से असंतोष पर राहुल की समझदारी भरी सलाह.

    बैठक के दौरान कुछ विधायकों ने झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ अपनी असहमति भी जाहिर की, जिस पर राहुल गांधी ने नेताओं से सुलह और सामंजस्य की नीति अपनाने को कहा। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत मतभेद संगठन की एकता को प्रभावित न करें।

    रणनीतिक संदेश और भविष्य की तैयारी.

    इस उच्चस्तरीय बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल भी मौजूद रहे। उन्होंने झारखंड में पार्टी की वर्तमान स्थिति और गठबंधन सरकार के प्रदर्शन की समीक्षा की।

    बैठक मे  राहुल गांधी ने सभी विधायकों और मंत्रियों से कहा कि वे एकजुटता, प्रतिबद्धता और जनसेवा की भावना के साथ काम करें। उन्होंने कहा कि यही समय है जब कांग्रेस को झारखंड में अपनी ताकत को फिर से स्थापित करना है ।

    राहुल गांधी की यह बैठक झारखंड कांग्रेस के लिए एक नई रणनीतिक दिशा, संगठनात्मक पुनर्गठन और गठबंधन धर्म के प्रति प्रतिबद्धता का स्पष्ट संकेत है। यह पहल आगामी चुनावों और राजनीतिक समीकरणों के मद्देनजर कांग्रेस के लिए एक फोकस्ड रोडमैप की तरह काम करेगी।

     

  • राहुल गांधी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट

    2018 के मानहानि का है मामला

    परवेज़ आलम.

    रांची/चाईबासा:  लोकसभा मे विपक्ष के नेता  और काँग्रेस पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर कानूनी संकट में घिरते नजर आ रहे हैं। झारखंड के चाईबासा कोर्ट ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। यह कार्रवाई 2018 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को लेकर दिए गए विवादास्पद बयान पर दर्ज मानहानि मामले में की गई है।

    चाईबासा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) की अदालत ने राहुल गांधी को 26 जून 2025 को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है। इसके खिलाफ राहुल गांधी ने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर वारंट को रद्द करने की मांग की है।

    क्या है पूरा मामला?

    यह मामला 28 मार्च 2018 का है, जब कांग्रेस अधिवेशन के दौरान राहुल गांधी ने अपने भाषण में भाजपा और उस समय के अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसके बाद भाजपा नेता प्रताप कुमार ने जुलाई 2018 में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा चाईबासा CJM कोर्ट में दायर किया था।

    कोर्ट में अनुपस्थिति बनी विवाद का कारण.

    मामले की सुनवाई के दौरान चाईबासा कोर्ट ने राहुल गांधी को कई बार समन जारी कर पेश होने का निर्देश दिया। लेकिन वे शारीरिक रूप से कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। कोर्ट ने पहले समन, फिर बेलबिल वारंट भेजा, लेकिन अनुपस्थिति जारी रहने पर आखिरकार 24 मई 2025 को गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया गया।

    हाईकोर्ट में पहले से लंबित है एक याचिका.

    राहुल गांधी के वकीलों ने इस मामले में पहले ही झारखंड हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर रखी है, जिसमें शारीरिक उपस्थिति से छूट की मांग की गई है। यह याचिका फिलहाल लंबित है। इसी बीच चाईबासा कोर्ट द्वारा गैर-जमानती वारंट जारी कर दिए जाने के बाद, अब उन्होंने एक और याचिका दायर कर इस वारंट को कानूनी रूप से निरस्त करने की अपील की है।

    ग्रीष्मकालीन अवकाश बना बाधा.

    राहुल गांधी की याचिका झारखंड हाईकोर्ट में दाखिल हो चुकी है, लेकिन फिलहाल अदालत ग्रीष्मकालीन अवकाश पर है। ऐसे में इस पर तत्काल सुनवाई संभव नहीं है। यदि कोई विशेष पीठ गठित न की गई, तो यह मामला अवकाश के बाद ही सूचीबद्ध किया जा सकता है।

    राजनीतिक पृष्ठभूमि और संभावित असर.

    यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब कांग्रेस राज्य में विपक्ष को सक्रिय करने की रणनीति पर काम कर रही है। राहुल गांधी पर जारी यह वारंट न सिर्फ उनके खिलाफ कानूनी दबाव बढ़ाता है, बल्कि कांग्रेस की राज्य इकाई के लिए भी एक नई चुनौती खड़ी करता है। हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है।

    राहुल गांधी की ओर से हाईकोर्ट में राहत की उम्मीद की जा रही है, लेकिन कोर्ट की कार्यवाही अवकाश के कारण स्थगित है। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है, और क्या राहुल गांधी को 26 जून को चाईबासा कोर्ट में पेश होना पड़ेगा या उन्हें राहत मिलती है।

  • जातीय जनगणना: कांग्रेस का हथियार अब बीजेपी की रणनीति?

      परवेज़ आलम .

    देश की राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ उस वक्त आया जब मोदी सरकार ने 2026 में होने वाली जनगणना के साथ-साथ जातीय जनगणना (Caste Census) करवाने का ऐलान कर दिया। यह वही मांग थी जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले कई सालों  से अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर पेश कर रहे थे। ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे नारों के जरिए कांग्रेस सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना चुकी थी। लेकिन अब यही मुद्दा, सत्ता पक्ष की रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है। बुधवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट मीटिंग के बाद यह स्पष्ट किया कि सरकार अब जाति आधारित आंकड़ों को भी आधिकारिक रूप से एकत्र करेगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति में रही है और कभी भी ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे लागू नहीं किया। वैष्णव ने कहा कि मोदी सरकार ने समाज के हर वर्ग के हित में फैसले लिए हैं और यह निर्णय भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

     क्यों जातीय जनगणना का फैसला कांग्रेस के लिए झटका है?

    जातीय जनगणना की मांग पर सबसे मुखर रहे राहुल गांधी को यह उम्मीद थी कि यह मुद्दा बीजेपी के ओबीसी और दलित वोट बैंक में सेंध लगाएगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में इस मुद्दे ने विपक्ष को फायदा भी पहुंचाया। लेकिन अब जब मोदी सरकार ने खुद इसे स्वीकार कर लिया है, तो कांग्रेस की बढ़त पर पानी फिरता दिख रहा है। सरकार के इस फैसले ने राहुल गांधी के उस नैरेटिव को कमजोर कर दिया है, जिसमें वे बीजेपी को सामाजिक न्याय विरोधी बताकर घेरते थे।

    पहला असर: बिहार और बंगाल में बीजेपी को लाभ की उम्मीद.

    बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। जातीय जनगणना का मुद्दा यहां सबसे अधिक प्रभावी साबित हो सकता है, क्योंकि राज्य की राजनीति पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आधारित है। हालांकि नीतीश कुमार की सरकार ने पहले ही जातिगत सर्वे कराया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र की ओर से इसे करवाना, ओबीसी मतदाताओं को यह संकेत देगा कि नरेंद्र मोदी सरकार उनकी गिनती और हक़ को लेकर गंभीर है। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगियों, खासकर आरजेडी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

     

     उत्तर प्रदेश में समाजवादी समीकरण पर असर.

    2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण के सहारे बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में हैं। जातीय जनगणना, जिसे अब केंद्र सरकार लागू करेगी, इस समीकरण को भी प्रभावित कर सकती है। बीजेपी की कोशिश होगी कि वह ओबीसी वर्ग को यह भरोसा दिलाए कि पार्टी अब उनकी गिनती और हिस्सेदारी दोनों सुनिश्चित करने जा रही है। इस तरह से विपक्ष के लिए ‘सामाजिक न्याय’ का नैरेटिव खड़ा करना और कठिन हो जाएगा।

    राजनीतिक बढ़त से सामाजिक प्रभाव तक.

    1931 के बाद देश में जातियों की कोई आधिकारिक जनगणना नहीं हुई। आज़ाद भारत में यह पहली बार होगा जब केंद्र सरकार पूरे देश में जातीय आंकड़े जुटाएगी। यह कदम न केवल राजनीतिक असर डालेगा, बल्कि नौकरियों, शिक्षा, कल्याण योजनाओं और संसाधनों के वितरण में भी नए बदलाव की नींव रख सकता है। मोदी सरकार इसे ‘सामाजिक समावेश’ और ‘डाटा आधारित नीति निर्माण’ के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, जो कि कांग्रेस के पुराने वादों को अप्रासंगिक बना देगा।

    कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती.

    राहुल गांधी अब तक इस मुद्दे के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। उन्होंने न केवल केंद्र को घेरा, बल्कि कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस शासित सरकारों से जातीय आंकड़े जारी करने की मांग भी की। अब जबकि बीजेपी खुद यह पहल कर रही है, कांग्रेस के पास या तो इसका स्वागत करने का विकल्प है—जो उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर दिखा सकता है, या विरोध करने का विकल्प—जिससे वे विरोधाभासी नजर आएंगे। इस दोहरे संकट में कांग्रेस को अपनी रणनीति फिर से गढ़नी होगी।

    सत्ता की बाज़ी कैसे पलटी ?

    जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में मुद्दे स्थायी नहीं होते, बल्कि उनका उपयोग और नियंत्रण ही असली खेल है। कांग्रेस ने जिस सामाजिक न्याय के एजेंडे को खड़ा किया, अब उसी को अपनाकर बीजेपी उसे उलझाने की तैयारी में है। 2026 की जनगणना के साथ जातीय गणना का प्रस्ताव, न केवल राहुल गांधी के एजेंडे को कमजोर करता है, बल्कि 2027 तक बीजेपी को ओबीसी समाज में फिर से अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर भी देता है।