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  • अहमदाबाद विमान हादसा: बोइंग 787 की दुर्घटना में सैकड़ों की मौत, जांच और बचाव अभियान जारी

    परवेज़ आलम.

    नई दिल्ली/अहमदाबाद:
    गुजरात की राजधानी अहमदाबाद मंगलवार को उस वक्त स्तब्ध रह गया, जब एयर इंडिया का बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमान उड़ान भरने के महज एक मिनट के भीतर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हृदयविदारक हादसे में अब तक सैकड़ों लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। यह विमान लंदन के गैटविक एयरपोर्ट जा रहा था और इसमें 242 यात्री और चालक दल के सदस्य सवार थे।

    उड़ान भरते ही हादसा.

    यह हादसा दोपहर 1:38 बजे सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरने के तुरंत बाद हुआ। डीजीसीए (नागरिक उड्डयन महानिदेशालय) के अनुसार, टेकऑफ के चंद क्षणों बाद ही पायलट ने ‘मेडे कॉल’ जारी की, जो किसी इमरजेंसी की ओर संकेत करता है। एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, लेकिन इसके बाद पायलट से कोई जवाब नहीं आया और विमान रडार से गायब हो गया।

    यात्रियों की राष्ट्रीयता.

    इस विमान में कम से कम 169 भारतीय, 53 ब्रिटिश, 7 पुर्तगाली और 1 कनाडाई नागरिक सवार थे। चालक दल में 10 केबिन क्रू और 2 पायलट शामिल थे। प्रमुख पायलट कैप्टन सुमीत सभरवाल थे, जिनके पास 8200 से अधिक उड़ान घंटे का अनुभव था, वहीं सह-पायलट क्लाइव कुंदर की 1100 घंटे की उड़ान पृष्ठभूमि रही है।

    हादसे पर सरकार और एयर इंडिया का बयान.

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया को बताया, “यह एक अत्यंत दुखद दुर्घटना है। हमने कई मूल्यवान जीवन खो दिए हैं। इनमें विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। सरकार बचाव कार्य में पूरी तरह जुटी है और विस्तृत जानकारी संबंधित विभागों से साझा की जाएगी।”

    वहीं एयर इंडिया के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर दुख जताते हुए लिखा, “बहुत भारी मन से मैं पुष्टि करता हूं कि एयर इंडिया की फ्लाइट AI171 एक दुखद दुर्घटना का शिकार हुई। हमारी संवेदनाएं प्रभावित परिवारों और उनके प्रियजनों के साथ हैं। हमारी प्राथमिकता हर संभव मदद पहुंचाने की है।”

    एयर इंडिया ने इस घटना के मद्देनज़र एक इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर (1800 5691 444) भी जारी किया है।

    जांच में जुटे डीजीसीए अधिकारी.

    डीजीसीए की टीम मौके पर पहुंच चुकी है। वे ब्लैक बॉक्स (फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर और वॉयस रिकॉर्डर) और गवाहों के बयान इकट्ठा कर रहे हैं। प्रारंभिक जांच में खराब मौसम, तकनीकी खराबी या पायलट की निर्णय क्षमता में त्रुटि को संभावित कारणों में गिना जा रहा है। हालांकि आधिकारिक रिपोर्ट अभी आना बाकी है।

    एयर इंडिया का शोक संकेत.

    एयर इंडिया ने इस त्रासदी पर शोक प्रकट करते हुए अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल की प्रोफाइल फोटो और कवर को काले रंग में बदल दिया है। यह टाटा समूह के अधिग्रहण के बाद एयर इंडिया की पहली बड़ी दुर्घटना है।

    इतिहास की भयावह याद: 1988 की इंडियन एयरलाइंस दुर्घटना.

    यह हादसा अहमदाबाद में 1988 में हुई इंडियन एयरलाइंस फ्लाइट 113 की भयावह दुर्घटना की भी याद दिलाता है, जिसमें 135 यात्रियों में से 133 की जान चली गई थी। उस दुर्घटना की मुख्य वजह भी खराब दृश्यता और पायलट द्वारा मानक प्रक्रियाओं की अनदेखी बताई गई थी।

    12 जून 2025 को हुआ यह हादसा भारतीय विमानन इतिहास में एक और काला अध्याय बन गया है। जांच एजेंसियां इस त्रासदी के पीछे के कारणों को उजागर करने में लगी हैं, वहीं राहत और बचाव कार्य लगातार जारी है। उम्मीद की जा रही है कि जांच पूरी होने के बाद यह सामने आएगा कि कहां चूक हुई और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।

  • जातीय जनगणना: कांग्रेस का हथियार अब बीजेपी की रणनीति?

      परवेज़ आलम .

    देश की राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ उस वक्त आया जब मोदी सरकार ने 2026 में होने वाली जनगणना के साथ-साथ जातीय जनगणना (Caste Census) करवाने का ऐलान कर दिया। यह वही मांग थी जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले कई सालों  से अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर पेश कर रहे थे। ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे नारों के जरिए कांग्रेस सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना चुकी थी। लेकिन अब यही मुद्दा, सत्ता पक्ष की रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है। बुधवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट मीटिंग के बाद यह स्पष्ट किया कि सरकार अब जाति आधारित आंकड़ों को भी आधिकारिक रूप से एकत्र करेगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति में रही है और कभी भी ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे लागू नहीं किया। वैष्णव ने कहा कि मोदी सरकार ने समाज के हर वर्ग के हित में फैसले लिए हैं और यह निर्णय भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

     क्यों जातीय जनगणना का फैसला कांग्रेस के लिए झटका है?

    जातीय जनगणना की मांग पर सबसे मुखर रहे राहुल गांधी को यह उम्मीद थी कि यह मुद्दा बीजेपी के ओबीसी और दलित वोट बैंक में सेंध लगाएगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में इस मुद्दे ने विपक्ष को फायदा भी पहुंचाया। लेकिन अब जब मोदी सरकार ने खुद इसे स्वीकार कर लिया है, तो कांग्रेस की बढ़त पर पानी फिरता दिख रहा है। सरकार के इस फैसले ने राहुल गांधी के उस नैरेटिव को कमजोर कर दिया है, जिसमें वे बीजेपी को सामाजिक न्याय विरोधी बताकर घेरते थे।

    पहला असर: बिहार और बंगाल में बीजेपी को लाभ की उम्मीद.

    बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। जातीय जनगणना का मुद्दा यहां सबसे अधिक प्रभावी साबित हो सकता है, क्योंकि राज्य की राजनीति पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आधारित है। हालांकि नीतीश कुमार की सरकार ने पहले ही जातिगत सर्वे कराया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र की ओर से इसे करवाना, ओबीसी मतदाताओं को यह संकेत देगा कि नरेंद्र मोदी सरकार उनकी गिनती और हक़ को लेकर गंभीर है। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगियों, खासकर आरजेडी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

     

     उत्तर प्रदेश में समाजवादी समीकरण पर असर.

    2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण के सहारे बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में हैं। जातीय जनगणना, जिसे अब केंद्र सरकार लागू करेगी, इस समीकरण को भी प्रभावित कर सकती है। बीजेपी की कोशिश होगी कि वह ओबीसी वर्ग को यह भरोसा दिलाए कि पार्टी अब उनकी गिनती और हिस्सेदारी दोनों सुनिश्चित करने जा रही है। इस तरह से विपक्ष के लिए ‘सामाजिक न्याय’ का नैरेटिव खड़ा करना और कठिन हो जाएगा।

    राजनीतिक बढ़त से सामाजिक प्रभाव तक.

    1931 के बाद देश में जातियों की कोई आधिकारिक जनगणना नहीं हुई। आज़ाद भारत में यह पहली बार होगा जब केंद्र सरकार पूरे देश में जातीय आंकड़े जुटाएगी। यह कदम न केवल राजनीतिक असर डालेगा, बल्कि नौकरियों, शिक्षा, कल्याण योजनाओं और संसाधनों के वितरण में भी नए बदलाव की नींव रख सकता है। मोदी सरकार इसे ‘सामाजिक समावेश’ और ‘डाटा आधारित नीति निर्माण’ के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, जो कि कांग्रेस के पुराने वादों को अप्रासंगिक बना देगा।

    कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती.

    राहुल गांधी अब तक इस मुद्दे के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। उन्होंने न केवल केंद्र को घेरा, बल्कि कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस शासित सरकारों से जातीय आंकड़े जारी करने की मांग भी की। अब जबकि बीजेपी खुद यह पहल कर रही है, कांग्रेस के पास या तो इसका स्वागत करने का विकल्प है—जो उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर दिखा सकता है, या विरोध करने का विकल्प—जिससे वे विरोधाभासी नजर आएंगे। इस दोहरे संकट में कांग्रेस को अपनी रणनीति फिर से गढ़नी होगी।

    सत्ता की बाज़ी कैसे पलटी ?

    जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में मुद्दे स्थायी नहीं होते, बल्कि उनका उपयोग और नियंत्रण ही असली खेल है। कांग्रेस ने जिस सामाजिक न्याय के एजेंडे को खड़ा किया, अब उसी को अपनाकर बीजेपी उसे उलझाने की तैयारी में है। 2026 की जनगणना के साथ जातीय गणना का प्रस्ताव, न केवल राहुल गांधी के एजेंडे को कमजोर करता है, बल्कि 2027 तक बीजेपी को ओबीसी समाज में फिर से अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर भी देता है।

     

  • “क्या अब मुसलमानों को हिन्दू धार्मिक ट्रस्टों में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी-सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम और संवेदनशील सवाल के जरिए वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली बहस को एक नए मोड़ पर पहुंचा दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा – “क्या अब मुसलमानों को हिन्दू धार्मिक ट्रस्टों में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी?” यह सवाल केवल कानूनी नहीं, बल्कि धर्म, समानता और राज्य की तटस्थता से भी जुड़ा हुआ है।

    चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार और के वी विश्वनाथन की बेंच ने इस अधिनियम की कई धाराओं पर गंभीर सवाल उठाए, खासकर ‘वक्फ बाय यूजर’ की धारणा पर।

    क्या है ‘वक्फ बाय यूजर’? और कोर्ट को इसमें आपत्ति क्यों?

    ‘वक्फ बाय यूजर’ एक पारंपरिक इस्लामी अवधारणा है, जिसके अनुसार यदि कोई संपत्ति वर्षों से धार्मिक या समाजसेवी कार्यों के लिए इस्तेमाल हो रही हो, तो उसे वक्फ संपत्ति माना जा सकता है – चाहे इसके आधिकारिक दस्तावेज हों या नहीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया, “ऐसी संपत्तियों को रजिस्टर कैसे किया जाएगा? उनके पास दस्तावेज़ नहीं हैं। इससे संभावित गड़बड़ियाँ भी हो सकती हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हर मामला झूठा है।”

    न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि वे इस प्रथा के पक्ष-विपक्ष में पूर्व ब्रिटिश प्रिवी काउंसिल के फैसलों की समीक्षा कर चुके हैं, जिनमें इस व्यवस्था को मान्यता मिली थी। बेंच का मानना था कि इस धारणा को पूरी तरह से ख़त्म कर देना व्यावहारिक समस्याएँ पैदा कर सकता है।

    केंद्र की दलील और सुप्रीम कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया.

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि “कई मुस्लिम खुद नहीं चाहते कि वे वक्फ अधिनियम के तहत आएं।”

    इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “तो क्या इसका मतलब यह है कि अब आप मुसलमानों को हिंदू धर्मस्थलों के प्रबंधन में शामिल करेंगे? कृपया यह बात स्पष्ट करें।” यह टिप्पणी संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की ओर संकेत करती है।

    बेंच ने यह भी साफ किया कि “100 साल पहले वक्फ घोषित की गई संपत्तियों को मनमाने तरीके से दोबारा वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। कोई भी विधानमंडल किसी न्यायिक निर्णय, आदेश या डिक्री को रद्द नहीं कर सकता – केवल आधार को ही चुनौती दी जा सकती है।”

    क्या यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सुना जाना चाहिए या हाईकोर्ट भेजा जाए?

    बेंच ने याचिकाकर्ताओं और केंद्र से यह भी जानना चाहा कि क्या इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर होनी चाहिए या इसे संबंधित हाईकोर्ट्स को भेजा जाए?

    चीफ जस्टिस खन्ना ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे दो बातें स्पष्ट करें –

    1. क्या यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचार योग्य है?
    2. आप इस कानून में किन प्रमुख मुद्दों पर बहस करना चाहते हैं?

    उन्होंने जोड़ा – “हम यह नहीं कह रहे कि सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार नहीं कर सकता, लेकिन स्पष्टता ज़रूरी है।”

    वरिष्ठ वकीलों की दलीलें: सिब्बल और सिंघवी की आपत्ति.

    याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह अधिनियम असंवैधानिक है क्योंकि यह केवल मुसलमानों को वक्फ बनाने की अनुमति देता है। उन्होंने पूछा – “राज्य यह कैसे तय कर सकता है कि कोई मुसलमान है या नहीं? और यदि कोई पिछले पाँच वर्षों से इस्लाम का पालन कर रहा है तभी वह वक्फ बना सकता है – यह बात राज्य कैसे तय कर सकता है?”

    वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि यह मामला पूरे देश को प्रभावित करता है, इसलिए इसे किसी एक हाईकोर्ट में ट्रांसफर नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार यह एक ‘ऑल इंडिया इश्यू’ है और सुप्रीम कोर्ट को ही इसकी निगरानी करनी चाहिए।

    वक्फ संशोधन अधिनियम 2025: राजनीतिक और कानूनी पृष्ठभूमि.

    वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को संसद के दोनों सदनों से लंबी बहसों के बाद पारित किया गया और 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।

    • राज्यसभा: 128 समर्थन में, 95 विरोध में
    • लोकसभा: 288 समर्थन में, 232 विरोध में

    इस कानून के खिलाफ अब तक 72 याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं, जिनमें प्रमुख नाम हैं:

    • असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM)
    • ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB)
    • जमीयत उलेमा-ए-हिंद
    • DMK
    • कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और मोहम्मद जावेद

    केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की है ताकि कोर्ट कोई भी अंतरिम आदेश पारित करने से पहले केंद्र की दलील सुने।

    वक्फ की कानूनी अवधारणा क्या है?

    वक्फ एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ होता है – किसी संपत्ति को स्थायी रूप से धार्मिक या परोपकारी कार्यों के लिए दान करना। यह संपत्ति किसी मस्जिद, मदरसे, कब्रिस्तान, स्कूल, अनाथालय आदि के लिए इस्तेमाल हो सकती है, लेकिन इसे बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।

    विवाद का मूल बिंदु क्या है?

    विवाद का मुख्य बिंदु ‘वक्फ बाय यूजर’ की मान्यता को समाप्त करना है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह इस्लामी परंपरा का हिस्सा है और इसे अचानक खत्म करना मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है। वहीं सरकार का तर्क है कि इस प्रथा के नाम पर कई फर्जी दावे होते हैं और संपत्तियों पर अवैध कब्जे को वैधता दी जा रही है।

    यह मामला केवल एक कानून की संवैधानिकता नहीं, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मूलभूत सिद्धांतों को परखने वाला बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल – “क्या मुसलमान हिन्दू ट्रस्टों में शामिल हो सकते हैं?” – दरअसल संविधान की आत्मा की परीक्षा है।

    अगली सुनवाई में तय होगा कि यह मामला किस दिशा में जाएगा – लेकिन इतना तो तय है कि ‘वक्फ अधिनियम 2025’ आने वाले समय में देश के धार्मिक और संवैधानिक विमर्श के केंद्र में रहेगा।

  • दिल्ली में 27 साल बाद भाजपा की वापसी, आम आदमी पार्टी सत्ता से बाहर!

    दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री कौन?

    दिल्ली विधानसभा चुनाव की सभी 70 सीटों के नतीजे अब सामने आ रहे हैं और राजधानी की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 27 साल बाद सत्ता में वापसी करती दिख रही है, जबकि तीन बार से दिल्ली की सत्ता संभाल रही आम आदमी पार्टी (AAP) को बाहर होना पड़ेगा।

    क्या है बहुमत का जादुई आंकड़ा?

    चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, दोपहर 3 बजे तक भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है।

    ✔️ भाजपा – 47 सीटों पर आगे (बहुमत के लिए 36 सीटें चाहिए)
    ✔️ आप – 23 सीटों पर बढ़त

    यानी, भाजपा अब दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? भाजपा के अंदर कई नाम चर्चा में हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व अक्सर चौंकाने वाले फैसले लेता रहा है।

    दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री कौन? ये नाम हैं रेस में

    ➡️ विजेंद्र गुप्ता – विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, रोहिणी से प्रत्याशी
    ➡️ रेखा गुप्ता – शालीमार बाग से प्रत्याशी
    ➡️ दुष्यंत गौतम – राष्ट्रीय महामंत्री और भाजपा के अनुसूचित जाति के बड़े नेता, करोल बाग से प्रत्याशी
    ➡️ वीरेंद्र सचदेवा – दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष
    ➡️ प्रवेश वर्मा – पूर्व सांसद और नई दिल्ली से प्रत्याशी
    ➡️ मनोज तिवारी – सांसद और भाजपा का सबसे बड़ा पूर्वांचली चेहरा
    ➡️ आशीष सूद – जनकपुरी से प्रत्याशी

    भाजपा के लिए दिल्ली में सत्ता में वापसी सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बदलाव है। पार्टी अब डबल इंजन सरकार की बात कर रही है, यानी दिल्ली में भी मोदी सरकार की नीतियां लागू होंगी।

    “भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने दिया जनादेश”

    दिल्ली में भाजपा की ऐतिहासिक जीत पर प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा –

    🗣️ “अगर आप जनता के साथ बेईमानी करोगे तो जनता भी वैसा ही परिणाम देगी। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में दिल्ली में डबल इंजन की सरकार बनेगी।”

    उन्होंने आगे कहा –
    “यह चुनाव भाजपा के सुशासन बनाम आप के कुशासन पर केंद्रित था। लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट दिया है। आम आदमी पार्टी के सभी बड़े चेहरे – अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और आतिशी – भ्रष्टाचार का चेहरा हैं और आज उन्हें जनता ने जवाब दे दिया है।”

    क्या अब दिल्ली में नया राजनीतिक अध्याय शुरू होगा?

    भाजपा की इस जीत के बाद दिल्ली की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। आम आदमी पार्टी की सत्ता से विदाई के बाद दिल्ली के विकास का नया मॉडल कैसा होगा, भाजपा किस तरह की नीतियां अपनाएगी, और मुख्यमंत्री कौन बनेगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।

    लेकिन इतना तय है कि दिल्ली की राजनीति में यह चुनाव मील का पत्थर साबित होगा!