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  • एसपी हत्याकांड में हाई कोर्ट के जजों में मतभेद ! एक ने किया बरी, दूसरे जस्टिस ने फांसी की सजा को सही माना

    –अब चीफ जस्टिस तय करेंगे अगली सुनवाई.

    रांची, झारखंड: झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 2013 में पाकुड़ के तत्कालीन एसपी अमरजीत बलिहार और अन्य पांच पुलिसकर्मियों की हत्या मामले में दोषी ठहराए गए दो नक्सलियों की फांसी की सजा पर अलग-अलग निर्णय सुनाया है। अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश को सौंपा जाएगा, जो इसे किसी अन्य पीठ को भेज सकते हैं।

    निचली अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा.

    6 सितंबर 2018 को दुमका के चतुर्थ जिला एवं सत्र न्यायाधीश तौफीकुल हसन की विशेष अदालत ने प्रवीर मुर्मू उर्फ ‘प्रवीर दा’ और सनातन बास्की उर्फ ‘ताला दा’ को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। अदालत ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ की श्रेणी का मामला माना था। दोषियों को हत्या, आपराधिक साजिश और आर्म्स एक्ट के तहत सजा दी गई थी।

    दोषियों ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने बिना ठोस सबूतों के उन्हें दोषी करार दिया।

    हाईकोर्ट के जजों मे मतभेद.

    जस्टिस आर मुखोपाध्याय का निर्णय-दोषियों को संदेह का लाभ.

    जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय ने अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का पक्ष लिया। उनके अनुसार –

    • गवाहों की पहचान प्रक्रिया (टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड) में खामियां थीं।
    • अभियोजन पक्ष के कई गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खा रहे थे।
    • घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और फोरेंसिक साक्ष्य भी अपर्याप्त थे।
    • घायल पुलिसकर्मी बबलू मुर्मू ने भी आरोपियों की पहचान करने से इनकार कर दिया था।

    उनका मानना था कि अभियोजन पक्ष केवल संदेह के आधार पर दोष सिद्ध करने का प्रयास कर रहा था, जबकि अदालत में दोष सिद्ध करने के लिए संदेह से परे प्रमाण आवश्यक हैं।

    जस्टिस संजय प्रसाद का निर्णय: सजा कायम रखने का समर्थन.

    वहीं दूसरी ओर, जस्टिस संजय प्रसाद ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को उचित ठहराया। उनके अनुसार –

    • अभियोजन ने घटना के दो प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को प्रस्तुत किया, जो स्वयं हमले में घायल हुए थे।
    • अभियुक्त सनातन बास्की के इकबालिया बयान में हमले की पूर्व योजना का विवरण था।
    • मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन के पक्ष में थे।
    • यह हमला सुनियोजित, क्रूर और राज्य विरोधी था।

    जस्टिस प्रसाद ने कहा कि यह ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ श्रेणी का अपराध है और इसमें कोई नरमी नहीं बरती जा सकती।

    मुआवजे और पुनर्वास का निर्देश.

    जस्टिस संजय प्रसाद ने अपने फैसले में झारखंड सरकार को यह आदेश भी दिया:

    • तत्कालीन एसपी अमरजीत बलिहार के परिजनों को 2 करोड़ रुपये मुआवजा दिया जाए।
    • उनके पुत्र या पुत्री को डीएसपी या डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्त किया जाए, साथ ही आवश्यकता पड़ने पर आयु सीमा में छूट भी दी जाए।
    • शहीद हुए अन्य पांच पुलिसकर्मियों के परिजनों को 50-50 लाख रुपये मुआवजा और उनकी योग्यता के अनुसार पुलिस विभाग में नियुक्ति दी जाए।

    इस आदेश की प्रति राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी समेत संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।

    2013 मे हुआ था भीषण हमला.

    2 जुलाई 2013 को पाकुड़ के एसपी अमरजीत बलिहार दुमका में एक चुनावी बैठक से लौट रहे थे, तभी लिट्टीपाड़ा के समीप करीब 30 नक्सलियों ने घात लगाकर पुलिस दल पर हमला कर दिया था। इस हमले में एसपी बलिहार सहित छह पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी। नक्सली मौके से दो AK-47, चार INSAS राइफलें, बुलेटप्रूफ जैकेट और मोबाइल भी लूट ले गए थे।

    आगे की कार्रवाई- नई बेंच तय करेगी निर्णय.

    दोनों जजों के भिन्न मत के कारण अब यह मामला झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाएगा। वे तय करेंगे कि इस अपील की सुनवाई के लिए कौन सी बेंच गठित की जाए।

  • नक्सली हमला: चालक सहित 9 जवान  शहीद, जानिए कहाँ है मामला

    By Perwez Alam……..

    छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में आज एक बार फिर से भयावह नक्सली हमला हुआ। नक्सलियों ने सुरक्षाबलों की गाड़ी को IED विस्फोट से निशाना बनाया। इस हमले में 8 डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) के जवान और वाहन चालक शहीद हो गए। यह घटना बीजापुर के कुटरू मार्ग के बेदरे क्षेत्र में हुई, जब जवान एक सफल ऑपरेशन के बाद लौट रहे थे।

    IED विस्फोट की भयावहता।

    घटना की पुष्टि बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी ने की। उन्होंने बताया कि नक्सलियों ने घात लगाकर इस विस्फोट को अंजाम दिया। धमाके की तीव्रता इतनी जबरदस्त थी कि गाड़ी के परखच्चे उड़ गए। जवानों के शव बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गए। मौके पर बने बड़े गड्ढे से इस विस्फोट की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    हमले के पीछे की रणनीति।

    यह हमला उस समय हुआ जब सुरक्षाबल नक्सलियों के खिलाफ एक बड़ी सफलता हासिल कर लौट रहे थे। इस ऑपरेशन में 5 नक्सलियों को मार गिराया गया था। लेकिन, ऐसा प्रतीत होता है कि नक्सलियों ने पहले से ही जवानों की मूवमेंट पर नजर रखी और उनकी वापसी पर हमला करने की योजना बनाई।

    क्या इंटेलिजेंस फेल हुआ?

    हमले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या इंटेलिजेंस फेल हुआ। राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि इस घटना की पूरी जांच की जाएगी। हालांकि, बस्तर रेंज के आईजी का कहना है कि जवान ऑपरेशन की सफलता के बाद लौट रहे थे। जिस जगह पर हमला हुआ, वहां से पहले भी सुरक्षाबलों का काफिला निकला था।

    नक्सलियों का मजबूत खुफिया तंत्र ।

    नक्सलियों का खुफिया तंत्र इतना मजबूत है कि उन्हें जवानों के मूवमेंट की जानकारी अक्सर बच्चों के माध्यम से मिल जाती है। बस्तर के अबूझमाड़ क्षेत्र को नक्सलियों का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। यहां नक्सलियों ने कई सालों से IED बिछा रखी है, जिनकी जानकारी सुरक्षाबलों को नहीं होती।

    नक्सलवाद का घटता प्रभाव और बौखलाहट।

    पिछले एक साल में नक्सलियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई ने उनके प्रभाव को कमजोर कर दिया है। सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के कई सुरक्षित गढ़ों पर हमला कर उन्हें हिला दिया है। इस हमले को नक्सलियों की बौखलाहट और अपनी मौजूदगी का अहसास कराने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

    बीजापुर की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नक्सलवाद से निपटना कितना चुनौतीपूर्ण है। यह लड़ाई केवल बंदूकों की नहीं, बल्कि सूझबूझ और बेहतर रणनीति की भी है।