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  • लालू यादव फिर चुने गए RJD  के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कब्जा, 13वीं बार निर्विरोध चुनाव

    परवेज़ आलम. By The News Post4u.

    राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में नेतृत्व को लेकर चल रही प्रक्रिया एक बार फिर उसी बिंदु पर पहुंची, जहां से पार्टी की पहचान शुरू होती है। पार्टी संस्थापक लालू प्रसाद यादव को लगातार 13वीं बार राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध चुन लिया गया है। यह घोषणा पार्टी के निर्वाचन पदाधिकारी रामचंद्र पूर्वे ने अधिसूचना जारी कर की।

    सोमवार, 23 जून को लालू यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। मंगलवार, 24 जून को दोपहर 2 बजे नामांकन पत्रों की जांच की गई और दोपहर 3 बजे तक नाम वापस लेने की समयसीमा तय थी। लेकिन जब किसी अन्य उम्मीदवार ने न तो नामांकन दाखिल किया और न ही लालू यादव ने अपना नाम वापस लिया, तो उन्हें निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया।

    कब सौंपा जाएगा प्रमाण पत्र?

    निर्वाचन पदाधिकारी रामचंद्र पूर्वे ने बताया कि लालू यादव को निर्वाचन का आधिकारिक प्रमाण पत्र 5 जुलाई 2025 को आयोजित होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में सौंपा जाएगा। इसी बैठक में उनका आधिकारिक रूप से कार्यभार भी घोषित किया जाएगा।

    इसका राजनीतिक महत्व क्या है?

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लालू प्रसाद यादव का एक बार फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना यह दर्शाता है कि पार्टी अब भी पूरी तरह उनके नेतृत्व में विश्वास रखती है। हालांकि लालू यादव सक्रिय राजनीति से स्वास्थ्य कारणों से थोड़ा पीछे रहे हैं, फिर भी उनका करिश्माई प्रभाव, संगठन पर पकड़ और सामाजिक न्याय की राजनीति में उनकी गूंज अब भी बनी हुई है।

     RJD के अंदरूनी समीकरण.

    राजद में लंबे समय से यह अटकलें थीं कि अब पार्टी की कमान तेजस्वी यादव को सौंप दी जाएगी, लेकिन इस बार फिर से लालू यादव की ताजपोशी यह संकेत देती है कि वह अभी भी पार्टी का चेहरा बने रहेंगे और संगठन को अपनी निगरानी में आगे बढ़ाएंगे। संभवतः पार्टी की रणनीति यह है कि वरिष्ठता का नेतृत्व और युवाओं का संचालन साथ-साथ चले।
    लालू प्रसाद यादव का निर्विरोध निर्वाचन न केवल राजद की एकजुटता को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि पार्टी अभी भी अपने संस्थापक के अनुभव और रणनीतिक कौशल पर भरोसा करती है। आने वाले समय में राजद किस तरह से अपनी राजनीति को आगे बढ़ाएगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

  • हेमंत सोरेन-जद यू नेता अशोक चौधरी की मुलाकात ने बढ़ाई सियासी सरगर्मी

    महागठबंधन में अनदेखी से गुस्से मे JMM.

    परवेज़ आलम,राजनीतिक विश्लेषक , द न्यूज़ पोस्ट4U

    बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर महागठबंधन की तैयारियां ज़ोरों पर हैं, लेकिन इन बैठकों में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की गैरमौजूदगी ने सियासी समीकरणों में हलचल पैदा कर दी है। इसी बीच बिहार सरकार के वरिष्ठ मंत्री और JDU नेता अशोक चौधरी की झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है।

    शिष्टाचार मुलाकात या रणनीतिक संदेश?

    अशोक चौधरी की यह मुलाकात 13 जून को हुई और इसकी जानकारी खुद झारखंड मुख्यमंत्री कार्यालय ने सोशल मीडिया पर दी। कहा गया कि यह केवल “शिष्टाचार भेंट” थी, लेकिन इस मुलाकात की टाइमिंग  ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौकन्ना कर दिया है।

    एक दिन पहले यानी 12 जून को पटना में महागठबंधन की अहम बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें RJD, कांग्रेस और अन्य दलों ने हिस्सा लिया, मगर JMM को आमंत्रित नहीं किया गया। इससे पार्टी की नाराजगी अब सार्वजनिक हो गई है।

    JMM ने उठाए सवाल, भेजा सियासी संदेश.

    JMM के महासचिव विनोद पांडे ने साफ तौर पर कहा कि पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में है, लेकिन उन्हें अब तक न तो बैठक में बुलाया गया और न ही चर्चा में शामिल किया गया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि गठबंधन में झामुमो की उपेक्षा करना कई सवाल खड़े करता है।
    झामुमो प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि पार्टी बड़े फैसले पर विचार कर रही है और जल्द ही अगला कदम उठाया जाएगा।

    RJD की दो टूक – ‘जहां गठबंधन, वहीं बैठक’

    दूसरी ओर RJD ने भी स्पष्ट कर दिया है कि बिहार की गठबंधन बैठकें उन्हीं दलों के साथ होंगी, जो महागठबंधन का सक्रिय हिस्सा हैं। RJD के नेताओं ने JMM को सीधी चुनौती देते हुये कहा है कि अगर झारखंड मुक्ति मोर्चा को खुद पर इतना भरोसा है, तो अकेले चुनाव मैदान में उतरकर अपनी ताकत दिखाए। झामुमो की बिहार में चुनाव लड़ने की इच्छा पर RJD के तेवर साफ तौर पर ‘आर या पार’ के संकेत दे रहे हैं।

    JMM की नजर सीमावर्ती सीटों पर.

    JMM बिहार के झारखंड से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों की कुछ सीटों पर चुनाव लड़ना चाहता है। इन इलाकों में पार्टी का आधार मजबूत आधार का दावा किया जा रहा है , पार्टी का दावा है कि पहले भी पार्टी के विधायक इन इलाकों से चुने जा चुके हैं। जिन सीटों पर झामुमो की नजर है, उनमें शामिल हैं:तारापुर, कटोरिया, मनिहारी, झाझा, बांका, ठाकुरगंज,रूपौली, रामपुर, बनमनखी, जमालपुर, पीरपैंती, व चकाई.

    BJP का तंज – “फुफकारता है, काटता नहीं”

    इस सियासी तकरार के बीच बीजेपी ने मौके को भुनाते हुए तंज कसा। पार्टी के बिहार सह प्रभारी दीपक प्रकाश ने JMM पर कटाक्ष करते हुए कहा, “झामुमो सिर्फ फुफकारता है, काटता नहीं। पहले भी चुनाव लड़ने की बात की थी, लेकिन न समर्थन मिला, न सीट।” बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को महागठबंधन की कमजोर होती एकता के संकेत के तौर पर देख रही है।

    क्या दरक रही है तेजस्वी-हेमंत की दोस्ती?

    राजनीतिक समीक्षक अब यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या तेजस्वी यादव और हेमंत सोरेन के बीच की ‘पुरानी दोस्ती’ में दरार आ चुकी है? क्या JMM को महागठबंधन में अब कोई खास भूमिका नहीं दी जाएगी?
    इस मुलाकात के बाद अटकलें हैं कि हेमंत सोरेन जेडीयू या तीसरे मोर्चे के साथ नई संभावनाएं तलाश सकते हैं, जिससे बिहार की राजनीति में नया मोड़ आ सकता है।
    बिहार के चुनावी दंगल में अभी बहुत कुछ तय होना बाकी है, लेकिन झामुमो की नाराजगी और अशोक चौधरी की हेमंत सोरेन से मुलाकात ने संकेत दे दिया है कि पर्दे के पीछे बड़ी हलचल जारी है। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि झामुमो महागठबंधन का हिस्सा रहेगा, या कोई नया गठजोड़ तैयार होगा।

  • हेमंत मंत्रिमंडल में राजद कोटे के मंत्री संजय यादव की कुर्सी खतरे मे है ?

    महागठबंधन की अंदरूनी राजनीति से संतुष्ट नहीं है JMM.

    बिहार चुनाव: टकराव की दिशा में बढ़ रही है सियासत।

    परवेज़ आलम.

    हेमंत मंत्रिमंडल में राजद कोटे के मंत्री संजय यादव की कुर्सी खतरे मे है ? क्या कैबिनेट से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा ? क्या जेएमएम बिहार चुनाव से पहले महागठबंधन से अलग हो जाएगा ? दरअसल झारखंड की सियासत में इन दिनों यह सवाल लगातार उछाले जा  रहें हैं । खासकर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले ? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि JMM की ओर से संकेत मिल रहे हैं कि महागठबंधन की अंदरूनी राजनीति से वह संतुष्ट नहीं है, और स्थिति नहीं संभली तो राजद कोटे से मंत्री संजय यादव की झारखंड कैबिनेट से छुट्टी हो जाएगी ।

    दरअसल, हाल ही में JMM ने एक आधिकारिक बयान जारी कर यह साफ कर दिया है कि वह बिहार में राजद के रवैये से बेहद नाराज है। पार्टी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अगर उन्हें बिहार विधानसभा चुनाव में “सम्मानजनक भागीदारी” नहीं दी गई, तो वह 12 से 15 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर अकेले चुनाव लड़ेगी।

    JMM महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि महागठबंधन की किसी बैठक में पार्टी को शामिल नहीं किया गया है, यहां तक कि गठित की गई 21 सदस्यीय समन्वय समिति में भी JMM को कोई स्थान नहीं मिला। इससे पार्टी खुद को “उपेक्षित और तिरस्कृत” महसूस कर रही है।

    पार्टी ने 2019 के झारखंड विधानसभा चुनावों की याद दिलाई, जब सीमित सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद JMM ने राजद को मंत्री पद दिया था। लेकिन अब बिहार में JMM की अनदेखी की जा रही है, जो पार्टी को मंजूर नहीं है।

    बॉर्डर बेल्ट पर JMM की नजर

    JMM ने साफ तौर पर संकेत दिया है कि वह बिहार-झारखंड सीमावर्ती इलाकों — जैसे चकाई, झाझा, तारापुर, कटोरिया, बांका, मनिहारी, रूपौली, बनमनखी, जमालपुर और धमदाहा — में चुनाव लड़ना चाहती है। इन क्षेत्रों में झारखंडी संस्कृति, भाषा और आदिवासी पहचान की मजबूत मौजूदगी है, जिसका राजनीतिक लाभ JMM उठाना चाहती है।

    पार्टी के सूत्रों के मुताबिक, JMM का असली मकसद 4-5 सीटों की सम्मानजनक साझेदारी है, लेकिन ज्यादा सीटों की मांग कर वो राजनीतिक दबाव बना रही है। अगर बातचीत नहीं बनी, तो पार्टी सीमावर्ती सीटों पर राजद को सीधी चुनौती दे सकती है, और इसके झारखंड सरकार में भी असर दिख सकता है — खासकर संजय यादव की कैबिनेट में मौजूदगी पर।

    JMM का राष्ट्रीय विस्तार का एजेंडा

    झामुमो सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं रहना चाहता। हाल ही में संपन्न पार्टी के केंद्रीय अधिवेशन में यह स्पष्ट कर दिया गया कि JMM अब राष्ट्रीय पहचान बनाना चाहता है। इसके तहत पार्टी बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और छत्तीसगढ़ में भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।

    गौरतलब है कि अतीत में JMM का ओडिशा में छह विधायक, बिहार में एक विधायक और एक सांसद भी रह चुका है। ऐसे में पार्टी को भरोसा है कि सीमावर्ती इलाकों में उसकी पैठ उसे क्षेत्रीय से राष्ट्रीय स्तर तक ले जा सकती है।

    राजद और JMM की पुरानी साझेदारी

    JMM ने यह भी याद दिलाया कि 2024 में तेजस्वी यादव और राजद सांसद मनोज झा ने रांची आकर कई दिनों

     तक रणनीतिक बैठकों में हिस्सा लिया था। तब महागठबंधन के तहत राजद को छह सीटें मिली थीं और मंत्री पद भी। JMM को उम्मीद है कि बिहार में भी उसे उसी स्तर की हिस्सेदारी दी जाएगी।

    क्या बदलेगा बिहार का राजनीतिक समीकरण?

    JMM की सक्रियता और खुले तेवरों ने बिहार की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों में, जहां JMM की प्रभावशाली पकड़ है, वहां उसका अकेले उतरना राजद के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में सीटों के तालमेल को लेकर JMM और राजद के बीच कोई सहमति बनती है या फिर टकराव की दिशा में सियासत आगे बढ़ती है।

     

  • बिहार चुनाव 2025: झामुमो की राजनीतिक बिसात, 12 सीटों पर दावा!

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट……………..

    झारखंड की सियासी सरगर्मी अब बिहार की ओर बढ़ रही है। साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक बिसात बिछने लगी है। इस बार झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने को तैयार है। पार्टी ने 12 विधानसभा सीटों पर दावा ठोक दिया है, और यह मांग सीधे  महागठबंधन (राजद-कांग्रेस) से की गई है।

    झामुमो का तर्क: सीमावर्ती जिलों में मजबूत पकड़। 
    सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, झामुमो ने अपनी दावेदारी पर बड़ा तर्क दिया है—बिहार के सीमावर्ती जिलों में उनका मजबूत जनाधार है। पहले भी पार्टी के विधायक इन इलाकों से चुने जा चुके हैं। जिन सीटों पर झामुमो की नजर है, उनमें शामिल हैं:

    • तारापुर, कटोरिया, मनिहारी, झाझा, बांका, ठाकुरगंज
    • रूपौली, रामपुर, बनमनखी, जमालपुर, पीरपैंती, चकाई

    झामुमो का मास्टरप्लान।
    पार्टी के नेताओं का कहना है कि इन 12 सीटों पर उनके पास न सिर्फ मजबूत कार्यकर्ता आधार है, बल्कि जीतने वाले प्रत्याशी भी तैयार हैं। जल्द ही झामुमो, राजद, और कांग्रेस की महागठबंधन बैठक में यह मांग रखने की तैयारी है।

    2020 का सबक और 2025 की उम्मीद। 
    गौरतलब है कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में झामुमो ने अकेले चुनाव लड़ने का दांव खेला था। लेकिन यह कदम कामयाब नहीं हो सका। इस बार झामुमो को उम्मीद है कि झारखंड की तरह बिहार में भी महागठबंधन सीटों का बंटवारा उसी अंदाज में करेगा।

    क्या कहती है राजनीति?
    बिहार में झामुमो का दांव क्या रंग लाएगा?

    • राजद और कांग्रेस को सीट बंटवारे में झामुमो की मांग माननी होगी या सियासी घमासान बढ़ेगा?
    • सीमावर्ती जिलों में झामुमो के दावे को कितना समर्थन मिलेगा?

    , बिहार की सियासत एक बार फिर गरमाने को तैयार है। झारखंड का झामुमो बिहार में कितनी जगह बना पाएगा, यह देखने वाली बात होगी। लेकिन राजनीति का एक नियम तो तय है—जितनी बड़ी रणनीति, उतना बड़ा खेल!

  • पटना: BPSC परीक्षा विवाद पर राजनीति और प्रदर्शन का संग्राम

    परवेज़ आलम की  विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ………..
    पटना की सड़कों पर गूंजते नारों और गांधी मैदान की दीवारों पर गिरी बैरिकेडिंग ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है: क्या छात्रों की आवाज़ें राजनीति के गलियारों में गुम हो जाएंगी?

    प्रदर्शन के पीछे की कहानी। 
    13 दिसंबर 2024 को हुई 70वीं बीपीएससी प्रीलिम्स परीक्षा से उपजा विवाद अब सड़कों पर उतर आया है। बापू केंद्र पर पेपर देरी से मिलने के आरोपों ने अभ्यर्थियों को आक्रोशित कर दिया। बीपीएससी ने परीक्षा को आंशिक रूप से रद्द करते हुए 4 जनवरी को फिर से परीक्षा कराने का आदेश दिया। लेकिन छात्रों की मांग है कि परीक्षा को पूरी तरह रद्द किया जाए।

    गांधी मैदान बना ‘संघर्ष का मंच’। 
    रविवार को अभ्यर्थियों ने गांधी मैदान में प्रदर्शन किया। इस मार्च ने प्रशासन के पसीने छुड़ा दिए। बिना अनुमति प्रदर्शन करने पर प्रशासन ने सख्ती दिखाई। बैरिकेडिंग तोड़कर अभ्यर्थी मैदान में घुस गए, जिससे स्थिति बेकाबू हो गई। गांधी मैदान में प्रदर्शन के खिलाफ प्रशांत किशोर समेत 700 लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गयी है। बीपीएससी अभ्यर्थियों का प्रदर्शन को लेकर पटना डीएम डॉ चंद्रशेखर सिंह ने मीडिया को बताया कि “गांधी मैदान में प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गयी थी। इसके बावजूद अभ्यर्थी गांधी मैदान में जमाहुए थे।”

    लाठीचार्ज और नाराजगी। 
    प्रदर्शनकारियों की भीड़ जब सीएम हाउस की ओर बढ़ी, तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया। लेकिन बवाल तब और बढ़ गया जब पुलिस ने माइक पर ऐलान किया, “आपके नेता (प्रशांत किशोर) लौट चुके हैं। अब आप भी लौट जाइए।” प्रदर्शनकारी उग्र हो गए और प्रशांत किशोर पर राजनीतिक लाभ के लिए छात्रों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

    प्रशांत किशोर के पांच सवाल
    प्रशांत किशोर ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार के खिलाफ पांच मांगें रखीं:

    1. बीपीएससी पीटी परीक्षा को रद्द कर फिर से आयोजित किया जाए।
    2. अनियमितताओं की न्यायिक जांच हो।
    3. छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं।
    4. लाठीचार्ज के आदेश देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
    5. आत्महत्या करने वाले छात्र सोनू यादव के परिजनों को न्याय मिले।

    उन्होंने कहा, “अगर सरकार बात नहीं मानेगी, तो 2 जनवरी से अनिश्चितकालीन अनशन शुरू करूंगा।”

    सियासी बयानबाजी और सवाल। 
    प्रदर्शन के बीच प्रशांत किशोर का छात्रों के साथ मुलाकात का वीडियो वायरल हुआ। जहां पप्पू यादव ने उन पर राजनीति करने का आरोप लगाया, वहीं तेजस्वी यादव ने कहा, “प्रशांत किशोर छात्रों के आंदोलन को भटका रहे हैं।”

    छात्रों की परीक्षा या राजनीति की परीक्षा?
    पटना की सड़कों पर निकला यह मार्च केवल छात्रों के भविष्य का सवाल नहीं है। यह उस राजनीतिक सर्कस का हिस्सा बनता जा रहा है, जहां मुद्दे गुम हो जाते हैं और मंच नेताओं का हो जाता है।

    क्या सरकार और प्रशासन छात्रों की आवाज सुन पाएंगे? या यह प्रदर्शन भी सिर्फ राजनीति की गूंज बनकर रह जाएगा?

  • BPSC अभ्यर्थियों का ‘शिक्षा सत्याग्रह’: परीक्षा पारदर्शिता पर उठे सवाल

    70वीं बीपीएससी परीक्षा के अभ्यर्थियों ने बुधवार शाम भागलपुर  सैंडिस कंपाउंड में कैंडल मार्च निकालकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। इस मार्च को ‘शिक्षा सत्याग्रह’ का नाम दिया गया, जिसमें अभ्यर्थियों ने “प्रोटेस्ट नहीं – रिक्वेस्ट, विवाद नहीं – संवाद, व्यवधान नहीं – समाधान” के नारों के साथ अपनी मांगें रखीं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी रही।

    परीक्षा में अनियमितताओं का आरोप। 
    अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि BPSC ने कदाचार मुक्त और धांधली मुक्त परीक्षा का दावा किया था, लेकिन इसके विपरीत कई जिलों से गड़बड़ियों की खबरें सामने आईं। बापू सभागार में आयोजित परीक्षा के दौरान अनियमितताओं की पुष्टि हुई, जिससे 12,000 परीक्षार्थियों की परीक्षा स्थगित करनी पड़ी। अभ्यर्थियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में परीक्षा स्थगन से पूरे रिजल्ट पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

    फिर से परीक्षा कराने की मांग। 
    अभ्यर्थियों ने BPSC से परीक्षा दोबारा कराने की मांग की। उनका कहना है कि सभी छात्रों को समान अवसर और पारदर्शी प्रक्रिया का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई छात्रों को 200-300 किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र आवंटित किए गए, जिससे उनकी तैयारी और प्रदर्शन प्रभावित हुआ। इस दूरी का औचित्य समझ से परे है।

    आंदोलन की अगली रणनीति।
    कैंडल मार्च के बाद अभ्यर्थियों ने बैठकर अपनी आगे की रणनीति बनाई। उनका कहना है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे पटना जाकर अपनी बात रखेंगे।

    अभ्यर्थियों की अपील।
    BPSC अभ्यर्थियों ने इस प्रदर्शन को प्रोटेस्ट नहीं, बल्कि एक शांतिपूर्ण अपील के रूप में रखा है। उनका कहना है कि यह आंदोलन विवाद से ज्यादा समाधान की ओर ध्यान केंद्रित करता है। उनकी एकमात्र मांग है कि सभी छात्रों के साथ समान और पारदर्शी व्यवहार हो।

    इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने एक बार फिर परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता की जरूरत को रेखांकित किया है।