Author: The News Post4u

  • “तो क्या राहुल गांधी कोर्ट में पेश होंगे या मिल जाएगी छूट?”

    रांची से बड़ी खबर।

    कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि के मुकदमे पर सुनवाई जारी है। 2018 में अमित शाह पर की गई विवादित टिप्पणी के मामले में, राहुल गांधी ने व्यक्तिगत पेशी से छूट की मांग की है। उनकी इस याचिका पर रांची की एमपी/एमएलए विशेष अदालत ने आंशिक सुनवाई की और आगे की तारीख 7 दिसंबर तय कर दी।

    क्या है मामला?

    राहुल गांधी के खिलाफ 2018 में कांग्रेस अधिवेशन में की गई टिप्पणी को लेकर नवीन झा ने शिकायत दर्ज कराई थी। इसके तहत अदालत ने उन्हें पेश होने का समन भेजा है। अब सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी अदालत में पेश होंगे या उनकी याचिका मंजूर होगी? उनके वकील ने सीआरपीसी की धारा 205 के तहत अगस्त में यह याचिका दाखिल की थी।

    निशिकांत दुबे और मनोज तिवारी को नोटिस

    सुप्रीम कोर्ट ने देवघर एयरपोर्ट मामले में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और मनोज तिवारी को नोटिस जारी किया है। आरोप है कि 2022 में इन सांसदों ने सुरक्षा नियमों का उल्लंघन किया। हाईकोर्ट ने पहले इन पर दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया था, लेकिन झारखंड सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

    सुप्रीम कोर्ट का सवाल

    सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार से पूछा है कि बिना पूर्व अनुमति के जांच जारी रखने का आधार क्या है। अदालत ने कहा कि “जांच के चरण में पूर्व अनुमति का सवाल नहीं उठता,” लेकिन जब मामला संज्ञान में आएगा, तब इसकी जरूरत होगी। अब इस तर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कानूनी मिसालें मांगी हैं।

    क्या आगे होगा?

    • राहुल गांधी मामले की अगली सुनवाई 7 दिसंबर को होगी।
    • निशिकांत दुबे और मनोज तिवारी के मामले में सुप्रीम कोर्ट 18 दिसंबर को सुनवाई करेगा।
  • वक्फ संशोधन विधेयक पर ममता का तीखा वार: ‘संघीय ढांचे और धर्मनिरपेक्षता पर हमला’

    रिपोर्ट: परवेज़ आलम…….

    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार को वक्फ संशोधन विधेयक पर आड़े हाथों लिया है। विधानसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान ममता बनर्जी ने इसे न केवल संघीय व्यवस्था के खिलाफ बताया, बल्कि धर्मनिरपेक्षता पर सीधा प्रहार करार दिया। उनका आरोप साफ था—“यह विधेयक एक खास समुदाय के अधिकारों को कमजोर करने का षड्यंत्र है। मुसलमानों के वक्फ संपत्ति और धार्मिक अधिकारों को इस तरह से खत्म नहीं होने देंगे।”
    ‘हमसे चर्चा क्यों नहीं हुई?’ ममता का सवाल
    ममता बनर्जी ने विधेयक को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा,“यह विधेयक वक्फ संपत्ति को नष्ट कर देगा। इस पर हमसे कोई चर्चा नहीं हुई। केंद्र सरकार की यह नीति न केवल धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है, बल्कि संघीय ढांचे को भी कमजोर करती है। अगर किसी धर्म पर हमला होता है, तो मैं हमेशा इसके खिलाफ आवाज उठाऊंगी।”
    मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि विधेयक को जिस तरह से लाया गया है, वह केंद्र के रवैये को उजागर करता है। “संविधान हमें संघीय ढांचे में परस्पर विश्वास और सलाह-मशविरा करने की बात सिखाता है, लेकिन यहां तो तानाशाही रवैया दिख रहा है,” उन्होंने कहा।
    विपक्ष एकजुट, भाजपा का पलटवार
    ममता बनर्जी के इस आक्रामक रुख के बाद विपक्षी दलों ने भी विधेयक की कड़ी आलोचना की। कई नेताओं ने इसे मुसलमानों के अधिकारों का हनन बताया। वहीं, भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है। भाजपा नेताओं का दावा था कि यह विधेयक धार्मिक अधिकारों को नुकसान पहुंचाने के बजाय व्यवस्थागत सुधार करेगा।
    बांग्लादेश मुद्दे पर ममता का केंद्र को समर्थन
    बांग्लादेश में धार्मिक तनाव के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार को समर्थन देने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा,
    “हम किसी भी धर्म को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते। मैंने इस्कॉन से इस विषय पर चर्चा की है। यह दूसरे देश का मामला है और केंद्र सरकार को इस पर उचित कार्रवाई करनी चाहिए। हम इस मसले पर केंद्र के साथ खड़े हैं।”
    ममता बनर्जी का यह बयान बताता है कि राज्य और केंद्र के बीच मुद्दों पर तालमेल की जरूरत है, लेकिन वक्फ संशोधन विधेयक पर उनका कड़ा विरोध केंद्र-राज्य संबंधों में तल्खी को भी उजागर करता है।
    समिति का कार्यकाल बढ़ा, सियासी हलचल तेज
    वक्फ संशोधन विधेयक पर गठित संसदीय समिति का कार्यकाल बजट सत्र 2025 तक बढ़ा दिया गया है। समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने बैठक के बाद कहा,
    “सभी सदस्य सहमत हैं कि विधेयक का विस्तृत अध्ययन जरूरी है। इसलिए कार्यकाल बढ़ाने का फैसला सर्वसम्मति से लिया गया।”
    यह फैसला इस बात का संकेत है कि वक्फ संशोधन विधेयक पर सियासी जंग अभी लंबी चलने वाली है। विपक्ष जहां इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला बता रहा है, वहीं सरकार इसे पारदर्शिता का कदम मान रही है।
    अंतिम सवाल: क्या संघीय ढांचा सच में खतरे में है?
    ममता बनर्जी ने संघीय ढांचे और धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की जो बात कही, वह सवालों के घेरे में है। क्या वक्फ संशोधन विधेयक से वाकई मुसलमानों के अधिकारों को नुकसान होगा, या यह सुधारवादी कदम है? यह बहस न केवल संसद के भीतर, बल्कि देश के हर कोने में गूंज रही है। लेकिन एक बात तय है—ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को जिस सख्त अंदाज में उठाया है, वह इसे सियासी और सामाजिक रूप से और बड़ा बनाएगा। क्या यह केंद्र बनाम राज्य का नया अध्याय है, या धर्मनिरपेक्षता की बहस का अगला पड़ाव? आने वाला वक्त ही बताएगा।

  • झारखंड की ‘सोरेन गाथा’

    रिपोर्ट: परवेज़ आलम……..

    हेमंत सोरेन का नाम झारखंड की राजनीति में महज एक नेता का नहीं, बल्कि संघर्ष, दृढ़ता और विजयी संकल्प का प्रतीक बन चुका है। गुरुवार को जब उन्होंने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो यह केवल एक पद ग्रहण करने का अवसर नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षण था जो बताता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी साहस और प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ा जा सकता है।

    तीन मोर्चों पर अकेले लड़ाई, सबको चौंकाया .

    हेमंत सोरेन के लिए यह चुनावी सफर आसान नहीं था। तीन मोर्चे थे—कानूनी संकट, पार्टी का आंतरिक संघर्ष, और विपक्षी हमले। 2023 में भूमि घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों और गिरफ्तारी ने उनकी राजनीतिक यात्रा को सबसे चुनौतीपूर्ण बना दिया। लेकिन पांच महीने जेल में बिताने के बाद जब उन्होंने जमानत पर रिहाई पाई, तो उनका यह कहना कि “यह साजिश थी, आदिवासियों की आवाज को दबाने की कोशिश,” पूरे झारखंड में गूंज उठा।

    पार्टी के भीतर बगावत से निपटना भी किसी युद्ध से कम नहीं था। झामुमो को संगठित रखते हुए उन्होंने कांग्रेस और राजद जैसे गठबंधन सहयोगियों को भी विश्वास में बनाए रखा। और विपक्ष ? भाजपा के तीखे हमलों और राजनीतिक चालों के बावजूद, सोरेन का लचीला नेतृत्व और अदम्य साहस झारखंड की जनता के लिए भरोसे का आधार बना रहा।

    संघर्षों से सफलता तक की कहानी .

    हेमंत सोरेन का राजनीतिक सफर संघर्षों से भरा रहा है। 10 अगस्त 1975 को झारखंड के नेमरा गांव में जन्मे सोरेन अपने पिता और झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी माने गए। लेकिन उनके सफर में कठिनाइयां कम नहीं थीं। 2009 में राज्यसभा सदस्य के तौर पर शुरुआत करने वाले सोरेन को जल्दी ही राज्य की राजनीति में गहराई तक उतरना पड़ा।       2013 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने वाले हेमंत, झारखंड के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। लेकिन यह कार्यकाल अधिक लंबा नहीं चला। 2014 में भाजपा सत्ता में आ गई और सोरेन विपक्ष में बैठ गए।

    जनता के लिए नायक, विरोधियों के लिए चुनौती .

    हेमंत सोरेन ने हर बार झारखंड की जनता के मुद्दों को अपने एजेंडे में रखा। उनकी योजनाओं ने सामाजिक सुरक्षा और आदिवासी अधिकारों पर खासा ध्यान दिया। ‘मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना’ के तहत महिलाओं को आर्थिक सहारा, किसानों के ऋण माफी का ऐलान, और ‘आपके अधिकार, आपकी सरकार, आपके द्वार’ जैसी योजनाओं ने उन्हें जनता के बीच खासा लोकप्रिय बना दिया।

    उनकी यह योजनाएं केवल विकास के वादे नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र में जनता को लाने की कोशिश थी। और यही कारण है कि विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद वे झारखंड के सबसे प्रभावशाली और भरोसेमंद नेताओं में अपनी जगह बनाए हुए हैं।

    हेमंत की जीत: झारखंड की उम्मीदें

    चुनावों के नतीजों ने साबित कर दिया कि हेमंत सोरेन केवल एक नेता नहीं, बल्कि झारखंड की उम्मीदों का चेहरा बन चुके हैं। उनकी चौथी पारी झारखंड को नई दिशा देने के लिए कितनी सफल होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इस वक्त, उनकी कहानी न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा है।

    झारखंड की जंग में अकेले उतरकर उन्होंने न केवल जीत हासिल की, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि जब जनता का भरोसा साथ हो, तो कोई भी लड़ाई मुश्किल नहीं होती।

     

  • झारखंड में सोरेन युग की नई शुरुआत : स्टीफन मरांडी होगें प्रोटेम स्पीकर

     परवेज़ आलम की रिपोर्ट……..

    हेमंत सोरेन ने गुरुवार शाम शपथ ली और उसी वक्त से झारखंड को बदलने की दिशा में कदम बढ़ा दिए। शपथ ग्रहण के बाद जब वे प्रोजेक्ट भवन स्थित झारखंड मंत्रालय पहुंचे, तो यह महज औपचारिकता नहीं, बल्कि नए इरादों का ऐलान था। डेढ़-दो घंटे की बैठक में फैसले ऐसे हुए, जो न केवल झारखंड के प्रशासन को नई दिशा देंगे, बल्कि सियासत के बदलते मिजाज का भी संकेत दे गए।

    स्टीफन मरांडी फिर बने प्रोटेम स्पीकर
    हेमंत सोरेन ने एलान किया कि झारखंड विधानसभा का पहला सत्र 9 से 12 दिसंबर के बीच आयोजित होगा। नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाने की जिम्मेदारी जेएमएम के वरिष्ठ विधायक स्टीफन मरांडी को दी गई है। यह नाम केवल एक नियुक्ति नहीं, बल्कि गठबंधन की परंपरा और पुराने भरोसे का प्रतीक है।

    मंईयां सम्मान योजना: महिलाओं के लिए बड़ी राहत
    बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने मंईयां सम्मान योजना के तहत महिलाओं को दिसंबर महीने से ₹2500 देने का निर्देश दिया। यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि राज्य की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अगस्त से नवंबर तक ₹1000-1000 ट्रांसफर किए गए थे, अब यह राशि बढ़ाकर ₹2500 कर दी गई है।

    केंद्र से ₹1.36 लाख करोड़ वसूली: कानूनी कार्यवाही शुरू
    हेमंत सोरेन का कहना है कि झारखंड का ₹1.36 लाख करोड़ केंद्रीय सरकारी उपक्रमों पर बकाया है। इस रकम की वसूली के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की जाएगी। झारखंड जैसे राज्य के लिए यह पैसा केवल बकाया नहीं, बल्कि विकास की उम्मीद है।

    खनिज टैक्स की समीक्षा और आय के नए स्रोत
    मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड, देश के सबसे पिछड़े राज्यों में है। राज्य की आर्थिक मजबूती के लिए खनन क्षेत्र में टैक्स की समीक्षा की जाएगी। अदालत में लंबित टैक्स मामलों का समाधान भी प्राथमिकता में रहेगा।

    सिपाही भर्ती और परीक्षा कैलेंडर का एलान
    हेमंत सोरेन ने झारखंड के युवाओं को लेकर बड़ा ऐलान किया। सिपाही भर्ती प्रक्रिया को सुधारने के साथ ही उन्होंने सभी सरकारी रिक्तियों के लिए 1 जनवरी 2025 तक परीक्षा कैलेंडर प्रकाशित करने का निर्देश दिया।

    असम के चाय बागान मजदूरों पर सर्वदलीय समिति
    राज्य के आदिवासी समुदाय की दशा-दिशा पर ध्यान देते हुए, असम के चाय बागानों में मजदूरी कर रहे झारखंड के मूलवासियों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए सर्वदलीय समिति गठित करने की घोषणा की गई।

    हेमंत सोरेन का यह कार्यकाल झारखंड को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा देने की दिशा में एक नई शुरुआत है। शपथ से लेकर पहले दिन के फैसलों तक, उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह सरकार केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि बदलाव के लिए आई है।

    सोरेन के इरादे साफ हैं। फैसले तेज हैं। अब देखना यह होगा कि इस नई दिशा को प्रशासन कितना अमलीजामा पहनाता है।

  • हेमंत सरकार का बड़ा ऐक्शन: प्रशासनिक उलटफेर से सियासी संदेश

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट……..

    राजनीति में वापसी के साथ ही हेमंत सोरेन ने एक बार फिर अपने इरादे साफ कर दिए हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उनके फैसलों ने यह दिखा दिया कि यह केवल शपथ ग्रहण नहीं, बल्कि सत्ता पर उनकी मजबूत पकड़ का ऐलान है।

    मंजूनाथ भजंत्री, जिन्हें विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के निर्देश पर रांची डीसी के पद से हटाया गया था, अब फिर से रांची के उपायुक्त बनाए गए हैं। यह फैसला न केवल प्रशासनिक महत्व रखता है, बल्कि इसके पीछे छिपे सियासी संदेश को समझना भी जरूरी है।

    भजंत्री की वापसी: एक रणनीतिक चाल
    भजंत्री, जिनकी पहचान एक सख्त और परिणामोन्मुख अधिकारी के रूप में होती है, को वापस लाने का मतलब है कि सोरेन सरकार पुराने भरोसेमंद सिपाहियों के सहारे नई पारी खेलना चाहती है। इस बदलाव के साथ ही वरुण रंजन को रांची डीसी से हटाकर जुडको का डायरेक्टर बनाया गया है।

    डीजीपी का अतिरिक्त प्रभार: अनुराग गुप्ता को फिर मिली जिम्मेदारी
    अनुराग गुप्ता, जो एसीबी के डीजी के रूप में अपनी काबिलियत साबित कर चुके हैं, को झारखंड डीजीपी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। मौजूदा डीजीपी अजय कुमार को पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन का एमडी बनाकर एक अलग जिम्मेदारी दी गई है। यह बदलाव दिखाता है कि हेमंत सरकार हर मोर्चे पर नई ऊर्जा और नए नेतृत्व को तरजीह दे रही है।

    वरुण रंजन को दिया नया रोल
    वरुण रंजन, जिनकी प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर पहले भी चर्चाएं रही हैं, अब झारखंड औद्योगिक आधारभूत संरचना विकास निगम (JIIDCO) के एमडी बनाए गए हैं। उनके इस नई भूमिका में जाने का मतलब है कि सरकार विकास योजनाओं को प्राथमिकता देना चाहती है।

    शपथ के बाद ऐक्शन में सरकार
    हेमंत सोरेन की सरकार के गठन के बाद यह बड़े फैसले केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं हैं। ये उस बड़े खेल की शुरुआत हैं, जो विधानसभा चुनाव 2024 के पहले से ही तय दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।

    मंजूनाथ की ताजपोशी और चुनावी संदेश
    सवाल यह है कि मंजूनाथ भजंत्री को दोबारा रांची का डीसी बनाकर क्या हेमंत सोरेन ने विरोधियों को यह संदेश दिया है कि वह अपने लोगों पर भरोसा करते हैं और किसी भी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं?

    इस सियासी और प्रशासनिक दांव का असर झारखंड केप्रशासनिक संतुलन पर क्या पड़ेगा, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन फिलहाल, हेमंत सोरेन सरकार ने यह साफ कर दिया है कि उनके फैसले तेज हैं, रणनीति सटीक है, और इरादे मजबूत।

  • हेमंत कैबिनेट की आज पहली बैठक,होंगे कई अहम फैसले

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट…..

    RANCHI : मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शपथ ग्रहण के बाद आज यानि गुरुवार को कैबिनेट की पहली बैठक होगी । इस बैठक में झारखंड विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का फैसला लिया जा सकता है ताकि विश्वास मत हासिल किया जा सके। हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं  और अब उनकी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक पर सबकी निगाहें टिकी हैं। इस बैठक से कई बड़े फैसले निकलने की उम्मीद है, जो न सिर्फ गठबंधन के चुनावी वादों को हकीकत में बदलने का काम करेंगे, बल्कि झारखंड की जनता को राहत का संदेश भी देंगे।
    भगवान बिरसा और सिदो-कान्हू के नाम पर बड़ा फैसला ?
    झारखंड के सबसे बड़े पुरस्कार का नाम बदलकर भगवान बिरसा मुंडा-भगवान सिदो-कान्हू पुरस्कार करने का प्रस्ताव आज कैबिनेट में पेश हो सकता है। यह फैसला राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को सम्मान देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
    रसोई गैस सिलेंडर @450 रुपये: जनता को राहत का तोहफा?
    बैठक में झारखंड के हर जरूरतमंद परिवार को 450 रुपये में रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने की योजना को मंजूरी मिल सकती है। गठबंधन के चुनावी घोषणापत्र में इसे सात गारंटी में शामिल किया गया था, और अब इसे जमीन पर उतारने की तैयारी हो रही है।
    मंईयां सम्मान योजना में पहले ही बढ़ाई गई राशि
    शपथ ग्रहण से पहले हुई अंतिम कैबिनेट बैठक में मंईयां सम्मान योजना की राशि बढ़ाकर 2500 रुपये करने का प्रस्ताव पारित किया जा चुका है। इसे दिसंबर से लागू किया जाएगा। नई सरकार इस योजना को और विस्तार देने पर विचार कर रही है।
    1932 के खतियान और सरना कोड पर चर्चा
    कैबिनेट की प्राथमिकता में 1932 के खतियान आधारित स्थानीयता नीति और सरना धर्म कोड लाने की दिशा में कदम बढ़ाने की उम्मीद है। इससे राज्य की स्थानीय पहचान और संस्कृति को मजबूती मिलने की संभावना है।
    सात गारंटी: जनता से वादों की दिशा में पहला कदम—
    1. स्थानीयता की गारंटी: 1932 खतियान आधारित स्थानीयता नीति और सरना धर्म कोड लागू करने का वादा।
    2. मंईयां सम्मान की गारंटी: दिसंबर 2024 से 2500 रुपये की सम्मान राशि।
    3. सामाजिक न्याय की गारंटी: एसटी, एससी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण और कल्याण योजनाएं।
    4. खाद्य सुरक्षा की गारंटी: गरीब परिवारों को 450 रुपये में गैस सिलेंडर और 7 किलो राशन।
    5. रोजगार और स्वास्थ्य की गारंटी: 10 लाख युवाओं को नौकरी और 15 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा।
    6. शिक्षा की गारंटी: हर प्रखंड में डिग्री कॉलेज और 500 एकड़ में औद्योगिक पार्क।
    7. किसान कल्याण की गारंटी: धान का एमएसपी 3200 रुपये और लघु वनोपज पर समर्थन मूल्य में 50% वृद्धि।

    झारखंड के लोग इस कैबिनेट बैठक से बड़े फैसलों की उम्मीद कर रहे हैं। हेमंत सरकार अगर इन वादों को पूरा करती है, तो यह न सिर्फ जनता का विश्वास जीतने में सफल होगी, बल्कि झारखंड की राजनीति में एक नई इबारत लिखेगी।

  • दशकों बाद संसद में गांधी परिवार की त्रिमूर्ति!

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट…….

    केरल के वायनाड से 52 वर्षीय प्रियंका गांधी वाड्रा की ऐतिहासिक जीत ने लोकसभा में एक नई कहानी लिख दी। दशकों बाद पहली बार संसद में गांधी परिवार के तीन सदस्य साथ नजर आ रहे हैं। लेकिन प्रियंका का संसद में पदार्पण सिर्फ जीत तक सीमित नहीं था; ये एक राजनीतिक और सांस्कृतिक बयान भी था।

    साड़ी, संविधान और इंदिरा की छवि—

    प्रियंका जब सफेद साड़ी पर गोल्डन बॉर्डर में संसद भवन पहुंचीं, तो हर निगाह उन पर टिक गई। उनका लुक वायरल हो गया, और लोगों को उनमें देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की झलक नजर आई। चलने का अंदाज, शपथ के दौरान संविधान की किताब थामे हुए उनका संजीदा अंदाज, हर बात इंदिरा की याद दिला गई।

    वाड्रा का जवाब, प्रियंका का समय—

    इस चर्चा को हवा तब मिली, जब प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा ने एक इंटरव्यू में इस तुलना पर सवालों का जवाब दिया। उन्होंने कहा, “प्रियंका भले ही इंदिरा गांधी जैसी दिखती हैं, लेकिन वह अपने समय के हिसाब से राजनीति कर रही हैं। तब और अब की राजनीति में बहुत फर्क है।”

    ‘दूसरी इंदिरा गांधी’ के नारे—

    ये तुलना नई नहीं है। कांग्रेस के मंचों पर दूसरी इंदिरा गांधी के नारे लगते रहे हैं। 2019 में दिल्ली में आयोजित प्रियंका के पहले रोड शो में ये नारा पहली बार गूंजा था—
    “प्रियंका नहीं आंधी है, दूसरी इंदिरा गांधी है!” उस रोड शो में प्रियंका ने अपनी शैली से समर्थकों का दिल जीत लिया था, और आज वायनाड की जीत के बाद उनके समर्थकों का ये विश्वास और भी मजबूत हो गया है।     लोकसभा में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी वाड्रा का एक साथ होना कांग्रेस के लिए एक संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक है। दशकों बाद, गांधी परिवार की यह त्रिमूर्ति भारतीय राजनीति के मंच पर एक नई कहानी लिखने को तैयार है।

  • हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली

    परवेज आलम की रिपोर्ट…..

    झारखंड की राजनीति ने रच दिया इतिहास। 2024 के विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की प्रचंड जीत के बाद हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मोरहाबादी के मैदान में ऐसा नज़ारा था, जो शायद दशकों तक याद किया जाएगा।

    राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने शाम चार बजे हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। हेमंत अब झारखंड के 14वें मुख्यमंत्री हैं। तीन बार पहले भी इस कुर्सी पर विराजमान हो चुके अर्जुन मुंडा और शिबू सोरेन के बाद, हेमंत का यह चौथा कार्यकाल एक नई कहानी लिखने को तैयार है।

    इंडिया गठबंधन की चमक और शपथ का मंच—

    जिस तरह से मोरहाबादी के मंच पर इंडिया गठबंधन के नेता जुटे, वो किसी शक्ति प्रदर्शन से कम नहीं था। राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल से लेकर अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, और यहां तक कि तमिलनाडु से उदयनिधि स्टालिन तक… हर किसी की मौजूदगी ने इस समारोह को राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना दिया। शिबू सोरेन, जो खुद दिशोम गुरु कहे जाते हैं, अपने बेटे की इस चौथी पारी के गवाह बने।

    नतीजों का संदेश—

    2024 के विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने 81 में से 56 सीटें जीतकर साबित कर दिया कि झारखंड की जनता का भरोसा उनके साथ है। झामुमो ने 34 सीटों पर कब्जा जमाया, जो इसका अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। कांग्रेस को 16, आरजेडी को 4, और भाकपा-माले को 2 सीटें मिलीं।

    सुरक्षा और उत्सव—

    मोरहाबादी मैदान में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी, लेकिन माहौल में जोश और जश्न का संगम दिखा। हजारों समर्थकों ने अपने नेता का स्वागत किया। झारखंड का भविष्य नई उम्मीदों से भर चुका है, और इंडिया गठबंधन के लिए यह एक बड़ी जीत का प्रतीक है।

    मोरहाबादी के मंच से झारखंड के हर कोने तक एक संदेश गया—यह जीत सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि झारखंड के सपनों को नई दिशा देने की शुरुआत है। हेमंत सोरेन की चौथी पारी कितनी सफल होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इस शपथ ग्रहण ने झारखंड की राजनीति को एक नई उड़ान जरूर दी है।

  • झारखंड की राजनीति में नया पेंच: कांग्रेस की ‘चार विधायकों पर एक मंत्री’

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट……
    झारखंड की सत्ता की गोटियां बिछ रही हैं और कांग्रेस ने पुराना पत्ता फेंका है—चार विधायकों पर एक मंत्री का फॉर्मूला। 2019 में इस फॉर्मूले ने कांग्रेस को चार मंत्री पद दिलवाए थे, जब उसके पास 16 विधायक थे। हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली सरकार में तब जेएमएम के 30 विधायक थे, और पार्टी ने मुख्यमंत्री समेत सात मंत्री पद अपने हिस्से किए थे। आरजेडी को एक मंत्री पद मिला था।

    अब क्या बदला?
    इस बार कांग्रेस के पास फिर से 16 विधायक हैं, लेकिन पेंच यह है कि इंडिया ब्लॉक के कुल विधायकों की संख्या 56 है। कांग्रेस के फॉर्मूले से 14 मंत्रियों की गुंजाइश बनती है, लेकिन कानून कहता है कि झारखंड विधानसभा (81 सीटें) में मंत्रियों की संख्या 12 से अधिक नहीं हो सकती। इसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हैं।

    फिर क्यों कर रही है कांग्रेस ये डिमांड?
    साफ है, बार्गेनिंग पावर कमजोर हुई है। 2019 में जेएमएम को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के 11 विधायकों की जरूरत थी। इस बार जेएमएम को केवल सात विधायकों का सहारा चाहिए। ऐसे में कांग्रेस का पुराना फॉर्मूला प्रैक्टिकल तो नहीं, लेकिन दांवपेंच का हिस्सा जरूर है।

    लेफ्ट का खेल और आरजेडी की चुनौती
    इस बार लेफ्ट भी गठबंधन का हिस्सा है। कोयलांचल और संथाल में लेफ्ट का जनाधार मजबूत है, और लोकसभा चुनाव से पहले हेमंत सोरेन ने उसे साथ लाने की पहल की थी। ऐसे में लेफ्ट को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होगा। आरजेडी भी एक मंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठा है।

    नंबर गेम और गठबंधन की सियासत
    जेएमएम की स्थिति मजबूत है। कांग्रेस को दरकिनार कर भी गठबंधन 40 के आंकड़े पर पहुंच रहा है, जो बहुमत से महज एक कम है। ऐसे में कांग्रेस का दबाव बनाना स्वाभाविक है, लेकिन इस बार उसकी बात कितनी सुनी जाएगी, यह कहना मुश्किल है।

    क्या होगा आगे?
    हेमंत सोरेन की सरकार के लिए मंत्रीमंडल का संतुलन साधना बड़ी चुनौती है। क्या कांग्रेस अपने फॉर्मूले पर अड़ी रहेगी? क्या लेफ्ट को मंत्री पद मिलेगा? और आरजेडी कहां खड़ा होगा? जवाब आने वाले दिनों में झारखंड की सियासत तय करेगी।

     

  • झारखंड : कौन होगा विपक्ष का नया महारथी ?

    परवेज़ आलम कि रिपोर्ट …….

    झारखंड की राजनीति एक बार फिर करवट लेने को तैयार है। गुरुवार को सीएम हेमंत सोरेन चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। नई सरकार के गठन के साथ ही विधानसभा का सत्र प्रारंभ होगा, लेकिन असली दिलचस्पी है विपक्ष की तरफ से कौन होगा नया चेहरा?

    भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा

    भाजपा, जिसके पास 21 विधायकों की टीम है, इस बार नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर माथापच्ची में जुटी है। प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी का नाम सबसे आगे है। मरांडी ने इस बार भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की है, लेकिन उनके सामने चंपई सोरेन भी चुनौती बनकर खड़े हैं।

    चंपई सोरेन, जो झामुमो छोड़ भाजपा में आए, एक आदिवासी चेहरा हैं। उनकी पहचान सिर्फ विधायक तक सीमित नहीं है, बल्कि वो बांग्लादेशी घुसपैठ जैसे मुद्दों पर मुखर रहे हैं। भाजपा इस बार हेमंत सोरेन सरकार को उन्हीं के अंदाज में घेरने के लिए आदिवासी नेता को आगे करने की सोच सकती है।

    अनुभव बनाम नयापन

    दूसरी तरफ, सदन में भाजपा के कई बड़े चेहरे नदारद रहेंगे। अमर कुमार बाउरी, बिरंची नारायण, अनंत ओझा जैसे दिग्गज चुनाव हार चुके हैं। अब सवाल उठता है कि ऐसे में भाजपा अपने नए विधायकों पर कितनी निर्भर हो पाएगी?

    सीपी सिंह, जो लंबे समय से चुनाव जीतते आ रहे हैं और सदन में अपनी मुखरता के लिए जाने जाते हैं, सामान्य जाति के मजबूत उम्मीदवार हैं। वहीं, अगर ओबीसी और महिला सशक्तिकरण पर ध्यान दिया गया, तो नीरा यादव भी इस दौड़ में आ सकती हैं।

    विपक्ष की नई रणनीति

    भाजपा को अब नए चेहरे और नए तेवर की जरूरत है। सत्येंद्र तिवारी और प्रकाश राम को इस बार सरकार पर हमला बोलने की बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। साथ ही, जमुआ से जीतकर आईं मंजू देवी, जो उच्च शिक्षित हैं, विपक्ष की आवाज को धार देने का काम कर सकती हैं।

    आखिरी सवाल:

    भाजपा किसे चुनेगी—अनुभव का तजुर्बा, आदिवासी पहचान, या फिर महिला सशक्तिकरण? यह तय करेगा झारखंड की राजनीति का अगला अध्याय।