Category: Jharkhand

  • झारखंड की राजनीति में बड़ा उलटफेर: बाबूलाल मरांडी बने नेता प्रतिपक्ष

    -परवेज़ आलम

    ………आखिरकार  इंतजार खत्म हुआ। चार महीने की राजनीतिक उथल-पुथल, अटकलों का बाजार, गुप्त बैठकों और सियासी कयासों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में बड़ा फैसला ले लिया है। पार्टी ने अनुभवी नेता और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को विधायक दल का नेता चुन लिया है। यानी अब वह झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाएंगे।

    चार महीने की देरी: भाजपा की रणनीति या आंतरिक असमंजस?

    झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही भाजपा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी। इस पद के लिए कई दिग्गज नेताओं के नाम सामने आए, जिनमें नवीन जायसवाल, नीरा यादव, और सीपी सिंह  का नाम प्रमुख था। लेकिन आखिरकार बाजी बाबूलाल मरांडी के हाथ लगी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इस निर्णय पर मुहर लगा दी। पर्यवेक्षक भूपेंद्र यादव ने विधायकों से चर्चा की । पर्यवेक्षक भूपेन्द्र यादव ने कहा कि विधायकों ने सर्वसम्मति से बाबूलाल मरांडी को नेता चुना है। नवीन जायसवाल,नीरा यादव, राज सिन्हा ने इसके लिए प्रस्ताव रखा। इसे सभी विधायकों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।और सर्वसम्मति से मरांडी को नेता चुने जाने की घोषणा की।

    लेकिन सवाल यह उठता है कि यह फैसला आने में चार महीने क्यों लगे? क्या भाजपा के भीतर मतभेद थे, या फिर यह किसी रणनीति का हिस्सा था? पार्टी सूत्रों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व शुरू से ही मरांडी को लेकर स्पष्ट था, लेकिन सत्ता संतुलन साधने के लिए समय लिया गया और जब आखिरी फैसला हुआ, तो अनुभव और कद को ध्यान में रखते हुए बाबूलाल मरांडी के नाम पर मुहर लगी।

     

     

    बता दें कि छठी विधानसभा के गठन के बाद से भाजपा विधायक दल के पास नेता नहीं था। भाजपा विधायक दल के नेता ही नेता प्रतिपक्ष होंगे। इस तरह से बाबूलाल मरांडी झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होंगे। वे अभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं।

    मरांडी की प्रतिक्रिया: पीएम मोदी के सपने को साकार करने की प्रतिबद्धता

    नेता प्रतिपक्ष चुने जाने के बाद बाबूलाल मरांडी ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत का जो संकल्प लिया है, उसे पूरा करने में हम भी अपना योगदान देंगे। झारखंड के लोगों की सेवा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हम पूरी ताकत से काम करेंगे।”

    भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद से जल्द देंगे इस्तीफा

    बाबूलाल मरांडी इस समय झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। अब जब वे नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, तो जल्द ही प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर संगठन में नए अध्यक्ष की नियुक्ति का रास्ता साफ करेंगे। भाजपा नेतृत्व अब इस पर फैसला करेगा कि झारखंड में संगठन की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए।

    बाबू लाल मरंडी की झारखंड की  राजनीति मे वापसी 

    बाबूलाल मरांडी की राजनीति कभी भाजपा तो कभी अलग राह पकड़ती रही। लेकिन यह भी सच है कि वह एक मजबूत जननेता के रूप में उभरे हैं। 2006 में उन्होंने भाजपा से अलग होकर झारखंड विकास मोर्चा बनाया, लेकिन 2020 में दोबारा भाजपा में वापसी कर ली।

    उनका सियासी कद केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहा। वाजपेयी सरकार में उन्होंने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में राज्य मंत्री की भूमिका भी निभाई।

    बाबूलाल मरांडी: झारखंड की राजनीति का बड़ा नाम

    बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं और झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे हैं। उन्होंने हमेशा से प्रदेश की राजनीति में एक अहम भूमिका निभाई है। आइए, उनके राजनीतिक सफर पर एक नजर डालते हैं:

    • जन्म और शिक्षा: 11 जनवरी 1958 को गिरिडीह जिले के कोदईबांक गांव में जन्मे बाबूलाल मरांडी ने रांची विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर किया है।
    • संघ से जुड़ाव: पढ़ाई के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए और बाद में झारखंड क्षेत्र के विश्व हिंदू परिषद (VHP) का संगठन सचिव बने।
    • मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल: 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन के बाद वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने और 17 मार्च 2003 तक इस पद पर रहे।
    • झारखंड विकास मोर्चा की स्थापना: 2006 में भाजपा से अलग होकर उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) की स्थापना की। हालांकि, 2020 में उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया।
    • लोकसभा में भूमिका: वे 12वीं, 13वीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा में सांसद रह चुके हैं। 1998 से 2000 के बीच एनडीए सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय) भी रहे।
    • विधानसभा में वापसी: 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने धनवार सीट से जीत दर्ज की और फिर से झारखंड विधानसभा में सक्रिय हो गए।

    नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारी

    अब जब बाबूलाल मरांडी झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। आइए, जानते हैं कि विपक्ष के नेता के रूप में उनकी प्रमुख भूमिकाएं क्या होंगी:

    1. विपक्ष का नेतृत्व: सभी विपक्षी दलों को एकजुट करना और उनकी आवाज को विधानसभा में मजबूती से उठाना।
    2. सरकार की नीतियों पर नजर: सरकार के फैसलों की समीक्षा करना और जनता के हितों के खिलाफ नीतियों का विरोध करना।
    3. विधानसभा में प्रभावी बहस: सदन में सरकार को जवाबदेह ठहराना और बहस के दौरान ठोस तर्क प्रस्तुत करना।
    4. जनता की समस्याओं पर ध्यान: जनता की समस्याओं को विधानसभा में उठाना और सरकार से समाधान की मांग करना।
    5. सरकार की जवाबदेही तय करना: किसी भी गलत फैसले या नीतिगत चूक पर सरकार से सवाल पूछना और उसे जवाबदेह ठहराना।

    भाजपा की आगे की रणनीति?

    अब जब भाजपा ने झारखंड में नेता प्रतिपक्ष का चयन कर लिया है, तो पार्टी की अगली रणनीति सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्ष खड़ा करने की होगी। झारखंड में भाजपा अब आगामी चुनावों के लिए जमीन तैयार करेगी और हेमंत सोरेन सरकार को घेरने की योजना बनाएगी।

    बाबूलाल मरांडी का झारखंड की राजनीति में कद काफी बड़ा है। उन्होंने मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और प्रदेश अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर काम किया है। अब नेता प्रतिपक्ष के रूप में वे झारखंड में भाजपा के लिए एक मजबूत चेहरा होंगे। भाजपा की रणनीति, झारखंड की राजनीति और विधानसभा में उनकी भूमिका पर सभी की नजरें टिकी होंगी। देखना दिलचस्प होगा कि वे विपक्ष की भूमिका को कितनी मजबूती से निभाते हैं और सरकार को कितनी कड़ी चुनौती देते हैं।

     

  • केंद्र सरकार झारखंड का हक नहीं देगी , तो राज्य की कोयला खदानें बंद कर दूंगा – सीएम हेमंत

    एक छटाक भी खनिज झारखंड से बाहर नहीं जाने दूंगा-हेमंत सोरेन 

    परवेज़ आलम

    झारखंड की सियासत में एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकार की तलवारें खिंच गई हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंगलवार को गिरिडीह में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के 52वें स्थापना दिवस पर केंद्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया और 1.36 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि की मांग को लेकर सख्त लहजे में चेतावनी दे डाली।

    दिल्ली बनाम झारखंड: सौतेला व्यवहार का आरोप

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंच से साफ कहा कि अगर केंद्र सरकार झारखंड का हक नहीं देती है, तो राज्य की खदानें बंद कर दी जाएंगी। एक छटाक भी खनिज राज्य से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा। यह कोई सामान्य बयान नहीं, बल्कि एक बड़े संघर्ष की शुरुआत का ऐलान था। झारखंड खनिज संपदाओं से भरपूर है, लेकिन इसके बावजूद आर्थिक असमानता और सरकारी फंडिंग में भेदभाव की बातें लंबे समय से उठती रही हैं। हेमंत सोरेन ने कहा कि राज्य की आर्थिक बदहाली के लिए पिछली सरकार जिम्मेदार है, लेकिन अब विकास की रफ्तार पकड़ ली गई है।

    अबुआ आवास योजना: जब दिल्ली ने पीठ फेर ली तो…

    झारखंड में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत राज्य को राशि नहीं मिली, जिससे मजबूरन राज्य सरकार को अपनी योजना शुरू करनी पड़ी। हेमंत सोरेन की सरकार ने अबुआ आवास योजना लॉन्च की, जिससे गरीबों को अपने सिर पर छत नसीब हो सके। यह योजना बताती है कि राज्य सरकार अपने संसाधनों के बलबूते भी जनता को राहत देने को तैयार है। लेकिन यह भी एक हकीकत है कि केंद्रीय सहायता के बिना किसी भी राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो सकती।

    नीति आयोग की रिपोर्ट: झारखंड की नई उड़ान

    हेमंत सोरेन ने कहा कि नीति आयोग भी यह मान रहा है कि झारखंड देश के चार सबसे तेजी से विकास करने वाले राज्यों में से एक है। यह बयान विपक्षी दलों को नागवार गुजर रहा है, क्योंकि झारखंड की यह छवि उनके राजनीतिक एजेंडे में फिट नहीं बैठती। मुख्यमंत्री का यह दावा एक उम्मीद जगाता है कि अगर सही दिशा में योजनाओं का क्रियान्वयन हुआ, तो राज्य गरीबी और पिछड़ेपन के धब्बे से उबर सकता है।

    मंईयां योजना पर फर्जीवाड़े का सवाल

    महिलाओं के लिए शुरू की गई ‘मंईयां सम्मान योजना’ का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ लोग फर्जी तरीके से इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। पुरुषों द्वारा महिलाओं के नाम पर पैसा निकालने की खबरें सामने आई हैं। यह सवाल वाकई गंभीर है कि क्या राज्य की योजनाएं उन्हीं लोगों के हाथ में जा रही हैं, जिनके लिए वे बनाई गई हैं? मुख्यमंत्री ने इसे रोकने की बात कही और भ्रष्टाचार पर सख्ती बरतने की चेतावनी दी।

    महिलाओं के विकास के लिए आधा बजट

    महिलाओं की आर्थिक मजबूती के लिए झारखंड सरकार आधे बजट का इस्तेमाल कर रही है। मंईयां सम्मान योजना को 1000 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये किया गया। लेकिन इस योजना में फर्जीवाड़े की खबरों ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या सरकार की योजनाओं का असल लाभ जनता तक पहुंच रहा है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जब-जब सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी होती है, तो इसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।

    झारखंड बनाम केंद्र: कोयले की राजनीति

    झारखंड की अर्थव्यवस्था में कोयले का बड़ा योगदान है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चेतावनी दी कि अगर राज्य को 1.36 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि नहीं दी गई, तो कोयले की खदानें बंद कर दी जाएंगी। यह चेतावनी सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक बड़े संघर्ष का संकेत है। झारखंड की खदानें देशभर में ऊर्जा की आपूर्ति करती हैं। अगर यहां उत्पादन रोका गया, तो इसका असर पूरे देश पर पड़ सकता है।

    गांवों से चलेगी सरकार

    हेमंत सोरेन ने कहा कि उनकी सरकार सिर्फ रांची से नहीं, बल्कि गांवों से भी चलेगी। उन्होंने पंचायतों और गांवों में जाकर समस्याओं के समाधान की बात कही। जाति, आय और निवासी प्रमाण पत्र अब पंचायत स्तर पर ही बनने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इससे गांव के लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से राहत मिलेगी।

    कल्पना सोरेन की भावनात्मक अपील

    जेएमएम स्थापना दिवस समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन भी शामिल हुईं। उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए भावुक होकर कहा कि जब हेमंत सोरेन जेल में थे, तब झारखंड की जनता ने उनके परिवार को सहारा दिया। कल्पना सोरेन ने कहा कि झारखंड की जनता ने उन्हें बहू नहीं, बल्कि बेटी की तरह अपनाया। यह बयान राजनीतिक रूप से भी अहम था, क्योंकि इससे झामुमो कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके पूर्व झामुमो गिरिडीह जिला कमिटी की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के सर पर ताज पहनाकर एवं भारी भरकम फूलों का माला पहना दोनों का भव्य स्वागत किया गया। वहीं पार्टी के 52वें जन्मदिन के अवसर पर केक भी काटा गया। बाद में दोनों ने शहीदों के वेदी पर माल्यार्पण किया।

    कल्पना मुर्मू सोरेन ने राजनीतिक जीवन की पहली वर्षगांठ  मनाई

    इंडिया गठबंधन की स्टार प्रचारक और झारखंड मुक्ति मोर्चा की नेत्री कल्पना मुर्मू सोरेन 4 मार्च 2024 को गिरिडीह मे ही पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की थी. गिरिडीह के ऐहतिहासिक झंडा मैदान में पार्टी के  स्थापना दिवस समारोह मे  कल्पना सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा का दामन थामा था. यहां पर पार्टी की विधिवत सदस्यता लेने के बाद कल्पना मुर्मू सोरेन ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी थी.

    भविष्य की राह: क्या वाकई बदलेगा झारखंड?

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दावा किया कि झारखंड को अगले 5 सालों में इतना आगे बढ़ाया जाएगा कि पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या झारखंड इस विकास की रफ्तार को बनाए रख पाएगा? राज्य की सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पारदर्शिता है। अगर इन दोनों मोर्चों पर सरकार मजबूत कदम उठाने में सफल रही, तो झारखंड वाकई उन राज्यों में शुमार हो सकता है, जो तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

    यह राज्य झारखंडियो की सोच से चलेगा-सोनू

    सभा को संबोधित करते हुये नगर विकास व पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने कहा कि जिस पौधा को गिरिडीह में 51 साल पहले शिबू सोरेन ने रोपा था वह आज विशाल वृक्ष का रूप ले लिया है। उन्होने ने कहा कि जनता ने हेमंत सोरेन को 56 सीटों का बहुमत दिया, हेमंत पर यह भरोसा जताया है कि जो काम अधूरे रह गए हैं उसे पूरा करना है. दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने जिस सोना झारखंड की कल्पना की थी वह सोना झारखण्ड धरातल पर उतारने का समय है. मैं आपको भरोसा देना चाहता हूं राजनीतिक साजिश करने वाले कितनी भी ताकत लगा ले लेकिन गिरिडीह के इस ऐतिहासिक झंडा मैदान से यह संदेश स्पष्ट है कि यह राज्य झारखंडियो की सोच से चलेगा.

    सभा को सम्बोधित करते राज्यसभा सांसद सरफराज अहमद ने कहा कि हेमंत सोरेन के जेल जाने से कल्पना के रूप में एक बड़ी नेत्री का जन्म हुआ है। इससे भाजपा पश्चाताप कर रहा होगा। हेमंत सोरेन की तरह कल्पना सोरेन को जनता का प्यार मिला. कल जब हेमंत सोरेन की सरकार ने बजट पेश किया तो झारखंडी होने का सबूत भी दिया. सभा को पूर्व विधायक निजामुद्दीन अंसारी, केदार हाजरा, बेबी देवी, प्रणव वर्मा आदि ने भी संबोधित किया। समारोह की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष संजय सिंह ने एवं संचालन अजीत कुमार पप्पू, महालाल सोरेन, शहनवाज ने किया।

    संघर्ष जारी रहेगा!

    झारखंड के सियासी मंच से एक बार फिर साफ हो गया कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच टकराव जारी रहेगा। कोयला खदानों को बंद करने की चेतावनी, महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की सक्रियता और केंद्र से बकाया राशि की मांग—ये सारे मुद्दे आने वाले समय में झारखंड की राजनीति को गर्माने वाले हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का बयान एक चेतावनी थी, लेकिन यह चेतावनी कब एक बड़े आंदोलन में बदल जाएगी, यह देखने वाली बात होगी।

    गिरिडीह शहर को दुल्हन की तरह सजाया गया था

    बता दें कि स्थापना दिवस को लेकर यह पहला मौका था जब झामुमो जिला समिति द्वारा पूरे शहर को दुल्हन की तरह सजाया गया था । शहरी क्षेत्र के सभी प्रमुख मार्गों एवं सभी चौक-चौराहे  और सड़कों हरे लाइट से सजाया गया था । जगह-जगह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, दिशोम गुरु शिबू सोरेन, मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन के बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए थे । वहीं  पूरा शहर पार्टी के झंडे से पाट दिया गया था ।

  • झारखंड मुक्ति मोर्चा: संघर्ष, सत्ता और सतत यात्रा

    परवेज़ आलम

    झारखंड की राजनीति में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक आंदोलन की तरह है। यह संघर्ष और सत्ता की वो कहानी है, जिसने झारखंड की राजनीति को न केवल नया रूप दिया, बल्कि इसे एक अलग पहचान भी दिलाई। झारखंड आंदोलन से जन्मी यह पार्टी आज सत्ता के केंद्र में है, लेकिन क्या इसका मूल संघर्ष अभी भी वही है? क्या झामुमो अपने मूल सिद्धांतों पर कायम है या सत्ता की राजनीति में उलझ चुका है?

    झंडा मैदान से शुरू हुआ सफर

    4 मार्च 1973 को गिरिडीह के ऐतिहासिक झंडा मैदान में एक रैली के दौरान झामुमो की नींव रखी गई थी। यह महज एक पार्टी की स्थापना नहीं थी, बल्कि झारखंडी अस्मिता की एक नई शुरुआत थी। 52 साल बाद, वही झंडा मैदान फिर से इतिहास को दोहराने जा रहा है। 4 मार्च को झामुमो अपना 52वां स्थापना दिवस मनाएगा, जिसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित कई बड़े नेता शिरकत करेंगे। संध्या 5 बजे से शुरू होने वाले इस समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रहेगी।

    सज चुका है झंडा मैदान, दिख रहा सिर्फ हरा रंग

    गिरिडीह के झंडा मैदान और आसपास के इलाकों में झामुमो का रंग बिखर चुका है। 40 से अधिक तोरणद्वार लगाए गए हैं। हजारों होर्डिंग और झंडों से पूरा शहर हरे रंग में रंग चुका है। कार्यकर्ताओं में जोश है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या झामुमो केवल सत्ता तक सीमित रह गया है, या अब भी झारखंड के मूल मुद्दों पर संघर्षरत है? क्या हेमंत सरकार जनआंदोलन के उस मूलभूत लक्ष्य को पूरा कर रही है, जिसके लिए झारखंड अलग राज्य बना?

    शिबू सोरेन: 34 वर्षों से पार्टी की कमान

    झारखंड की राजनीति में एक अनोखी बात यह है कि झामुमो की कमान पिछले 34 वर्षों से एक ही व्यक्ति, शिबू सोरेन, के हाथों में है। 2021 में हुए अधिवेशन में उन्हें 10वीं बार अध्यक्ष और हेमंत सोरेन को तीसरी बार कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया। यह दिखाता है कि पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की गुंजाइश अब भी सीमित है।

    पांच बार सत्ता में झामुमो, लेकिन क्या बदल पाया झारखंड?

    झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद से झामुमो अब तक पांच बार सत्ता में आ चुका है। दिलचस्प यह है कि हर बार मुख्यमंत्री सोरेन परिवार से ही बना।

    • 2005, 2008, 2009 में शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने।
    • 2013-14 और फिर 2019 से अब तक हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं।

    हालांकि, इनमें से चार सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं। कुछ सरकारें महज़ कुछ दिन चलीं, कुछ छह महीने तो कुछ 14 महीने ही चल सकीं। सवाल यह है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा बार-बार सत्ता में आने के बावजूद अपने एजेंडे को लागू करने में क्यों विफल रहा?

    2019 और 2024: ऐतिहासिक जीत, लेकिन क्या असली बदलाव आया?

    2019 में झामुमो ने 81 में से 30 सीटें जीतकर कांग्रेस और आरजेडी के साथ सरकार बनाई। 2024 में पार्टी ने 34 सीटों पर जीत दर्ज की और गठबंधन ने कुल 81 में से 56 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की। लेकिन क्या यह जीत सिर्फ सत्ता की जीत थी, या झारखंड के आम लोगों को भी इसका कोई फायदा हुआ? क्या इस सरकार में शिक्षा, रोजगार और जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दे हल हो पाए?

    संघर्ष के दिन: जब शिबू सोरेन को अंडरग्राउंड होना पड़ा

    झारखंड मुक्ति मोर्चा का जन्म केवल एक राजनीतिक दल के रूप में नहीं हुआ था, बल्कि यह झारखंड की अस्मिता की लड़ाई थी। जब शिबू सोरेन 12 साल के थे, तब सूदखोरों ने उनके पिता की हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने महाजनों और शोषण के खिलाफ संघर्ष शुरू किया, जो कई बार हिंसक भी हुआ। उन्हें कई बार अंडरग्राउंड होना पड़ा। आखिरकार, धनबाद के जिलाधिकारी के.बी. सक्सेना और कांग्रेस नेता ज्ञानरंजन की पहल से उन्होंने आत्मसमर्पण किया और जेल गए।

    ‘सोनोत संताल’ और ‘शिवाजी समाज’ के विलय से बनी झामुमो

    1972 में ‘सोनोत संताल’ और विनोद बिहारी महतो के नेतृत्व वाले ‘शिवाजी समाज’ के विलय से झामुमो का गठन हुआ। ट्रेड यूनियन नेता ए.के. राय की इसमें अहम भूमिका रही।

    • पहले अध्यक्ष: विनोद बिहारी महतो
    • पहले महासचिव: शिबू सोरेन

    1972 मे धनबाद के डीसी केबी सक्सेना थे वे आदिवासियों के शोषण के  विरुद्ध कड़ी कारवाई करने वाले ईमानदार अधिकारियों मे गिने जाते थे । उनकी कार्यशैली और विचारधारा ने शिबू सोरेन को काफी प्रभावित किया । डीसी केबी सक्सेना  का आकर्षण उन्हे प्रसाशन के करीब ले आया । इससे उनकी संघरशीलता बाधित हुई और  आपताकाल के दौरान उन्होने 20 सूत्री कार्यक्रम का समर्थन किया । काँग्रेस की उनकी निकटता बढ़ती गयी और विनोद बिहारी महतो तथा एके राय से दूरी बढ़ाने लगी ।  1980 के चुनाव मे शिबू सोरेन ने काँग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन कर लिया और महतो समर्थक उनसे अलग हो गए  और जेएमएम विभाजित हो गया । 1980 में शिबू सोरेन पहली बार दुमका से सांसद बने। बिहार विधानसभा चुनाव में संथाल परगना की 18 में से 9 सीटें जीतकर पार्टी ने पहली बार अपनी ताकत दिखाई।1990 मे बिहार मे जब पहली बार लालू प्रसाद की सरकार बनी तो जेएमएम ने सरकार को संरता के एवज मे सत्ता सुख का आनंद उठाया ।

    हेमंत सोरेन: नया नेतृत्व, लेकिन पुरानी राजनीति?

    2015 में जमशेदपुर अधिवेशन में हेमंत सोरेन को कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया और पार्टी एक नए दौर में प्रवेश कर गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नया दौर झारखंड की असली समस्याओं को हल कर सका है? आज भी आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की लड़ाई जारी है। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार झारखंड की बड़ी समस्या बने हुए हैं।

    क्या झारखंड को नई राजनीति की जरूरत है?

    झामुमो की राजनीति अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रही है। सवाल यह है कि क्या झारखंड को एक नई राजनीति की जरूरत है? क्या झामुमो अपनी पारिवारिक राजनीति से बाहर निकलकर नए नेतृत्व को जगह देगा? झारखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति आज भी खराब बनी हुई है। क्या झामुमो अब भी जनआंदोलन की उस धार को बरकरार रख पाएगा?

    संघर्ष से सत्ता तक: लेकिन आगे क्या?

    झारखंड मुक्ति मोर्चा की यात्रा केवल सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं है। यह झारखंड की आत्मा से जुड़ा आंदोलन है, जिसने राज्य को अलग पहचान दिलाई। लेकिन अब जब पार्टी सत्ता में है, तो क्या यह अपने मूल संघर्ष को भूल रही है? क्या यह पार्टी सत्ता और सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाए रख पाएगी? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

     

  • हेमंत सोरेन 2.0 सरकार का पहला बजट पेश , हेमंत सोरेन अपने आत्मबल से लबरेज दिखे

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

    झारखंड विधानसभा में जब वित्त मंत्री डॉ. राधाकृष्ण किशोर ने 1.45 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया, तो कागज़ पर यह एक महत्वाकांक्षी दस्तावेज़ लगा। लेकिन जब इस बजट की तह में उतरते हैं, तो सवाल उठते हैं कि क्या यह वास्तव में झारखंड की जनता के सपनों और उम्मीदों का बजट है या फिर आंकड़ों की बाजीगरी मात्र?

    बजट का आकार बड़ा, लेकिन क्या प्रभाव भी बड़ा?

    झारखंड सरकार ने इस बार का बजट 1,45,400 करोड़ रुपये का रखा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 13% अधिक है। सरकार ने यह भी दावा किया कि राजस्व व्यय में 20.48% की वृद्धि हुई है और पूंजीगत व्यय में 7.81% की बढ़ोतरी की गई है। लेकिन असली सवाल यह है कि इस बढ़े हुए बजट का लाभ किसे मिलेगा?

    सरकार ने दावा किया कि सामाजिक क्षेत्र के लिए 62,840 करोड़ रुपये और आर्थिक क्षेत्र के लिए 44,675 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। लेकिन यह पैसा किन योजनाओं में और किस तरह खर्च होगा, इसकी ठोस रूपरेखा बजट भाषण में नदारद रही।

    क्या बजट सिर्फ सरकारी आश्वासन है?

    राज्य की अर्थव्यवस्था को 2030 तक 10 ट्रिलियन रुपये तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इसके लिए ठोस रणनीति क्या होगी? बजट में इसका जवाब नहीं मिलता।

    मंईयां सम्मान योजना के तहत 18 से 50 साल की महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये देने का वादा किया गया है। इसके लिए 13,363 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। लेकिन दो महीने तक राशि रुकी रही, और अब सरकार होली के पहले एकमुश्त 7500 रुपये देने का वादा कर रही है। सवाल यह है कि अगर बजट में धनराशि पहले से आवंटित थी, तो यह देरी क्यों हुई?

    मंईयां सम्मान योजना

    झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार की सत्ता में वापसी के बाद पेश पहले बजट में मंईयां सम्मान का असर दिखा. मंईयां सम्मान देने वाले विभाग का बजट एक झटके में लगभग डबल हो गया. 11 से अधिक विभागों के बजट में कटौती करते हुए सरकार ने एक विभाग का बजट 95 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है. झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने शिक्षा और कल्याण विभाग को छोड़ सभी विभागों के बजट पर कैंची चला दी है. वर्ष 2025-26 के बजट में सबसे बड़ा फायदा कल्याण एवं समाज कल्याण विभाग को हुआ है. इस मद में सरकार ने वर्ष 2024-25 के बजट में कुल बजट की राशि का 8.96 फीसदी का प्रावधान किया था. वर्ष 2025-26 के बजट में इसमें बंपर बढ़ोतरी करते हुए 17.47 प्रतिशत कर दिया है. यह पिछले बजट की तुलना में करीब 95 प्रतिशत अधिक है. शिक्षा विभाग के बजट में 0.69 प्रतिशत की वृद्धि की गयी है. ओल्ड पेंशन स्कीम लागू होने की वजह से सरकार ने पेंशन मद में बजट में 0.22 प्रतिशत की वृद्धि की गयी

    रोजगार और आर्थिक विकास: सिर्फ़ दावे या कोई ठोस योजना?

    झारखंड में बेरोजगारी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। इस बजट में युवाओं के लिए कितनी नौकरियां सृजित होंगी? इसका कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया। राज्य सरकार ने यह तो बताया कि आर्थिक विकास दर 7.5% रहेगी, लेकिन इस विकास दर का आम जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा, यह स्पष्ट नहीं किया गया।

    कृषि क्षेत्र और छोटे व्यापारियों के लिए बजट में क्या ठोस योजनाएं हैं? राज्य में लाखों किसान सूखे और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं, लेकिन उनके लिए सिर्फ़ कर्ज़माफी के दावे हैं, स्थायी समाधान नहीं।

    बजट में कर्ज़ और घाटे का गणित

    सरकार ने दावा किया कि राजकोषीय घाटा 1.1% तक सीमित रखा गया है और ऋण-जीडीपी अनुपात को 27.3% पर लाने का लक्ष्य है। लेकिन यह आंकड़े तब तक बेकार हैं जब तक कि राज्य के राजस्व स्रोतों को बढ़ाने के लिए कोई ठोस रणनीति न बने। सरकार का अनुमान है कि 2025-26 में 61,056 करोड़ रुपये राजस्व आएगा, लेकिन यह कैसे आएगा, इसका स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया।

    क्या यह जनता का बजट है?

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार का यह पहला बजट कई मायनों में प्रतीकात्मक है। यह बजट राज्य की राजनीतिक मजबूरियों को दर्शाता है। इसमें विकास के दावे हैं, लेकिन योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल उठते हैं।

    झारखंड जैसे राज्य, जहां के संसाधनों का बड़ा हिस्सा बाहरी कंपनियों और राज्यों को जाता है, वहाँ यह बजट आत्मनिर्भरता का संदेश नहीं देता। रोजगार के अवसरों को बढ़ाने और राज्य की जनता को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बजट में कोई ठोस पहल नहीं दिखती।

    क्या यह बजट जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप है?

    झारखंड का यह बजट आंकड़ों और दावों से भरा पड़ा है, लेकिन जब हम इसकी गहराई में जाते हैं, तो यह कहीं न कहीं खोखला नज़र आता है। बजट भाषण में ‘स्वाभिमान’, ‘स्वावलंबन’ और ‘विकास’ जैसे शब्दों की भरमार थी, लेकिन क्या यह सिर्फ़ भाषण तक सीमित रह जाएगा, या ज़मीनी हकीकत में भी बदलाव लाएगा? यह देखना अभी बाकी है।

  • इनर व्हील क्लब गिरिडीह सनशाइन ने सर्वाइकल कैंसर जागरूकता के लिए भव्य कार रैली का आयोजन किया

    गिरिडीह: इनर व्हील क्लब ऑफ गिरिडीह सनशाइन ने सर्वाइकल कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एक भव्य कार रैली का आयोजन किया। यह आयोजन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सप्ताह “अपराजिता” के तहत किया गया और डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन अलकनंदा बक्सी द्वारा दिए गए लक्ष्य के अनुरूप था।

    कार्यक्रम का भव्य उद्घाटन

    रैली की शुरुआत पूर्व डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन पूनम सहाय द्वारा गुब्बारे उड़ाकर की गई। इस अवसर पर उपस्थित सभी सदस्यों ने सर्वाइकल कैंसर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की और जागरूकता फैलाने की शपथ ली। आयोजन में शामिल सभी कारों को विभिन्न प्रकार के संदेशों और पोस्टरों से सजाया गया था, जिससे कैंसर से बचाव के उपायों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।

    कार्यक्रम के दौरान क्लब की सदस्यों ने सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है, लेकिन समय रहते इसका पता चल जाए तो इसे रोका जा सकता है।

     

    रैली में उत्साहपूर्वक शामिल हुए क्लब के सदस्य

    रविवार की सुबह आयोजित इस विशेष रैली में 20 कारों ने भाग लिया, जिनमें क्लब की 40 से अधिक महिलाएँ शामिल हुईं। इस रैली का मुख्य उद्देश्य सर्वाइकल कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाना और इसके रोकथाम के उपायों के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाना था। गिरिडीह की मुख्य सड़कों से गुज़रती हुई इन सजी-धजी गाड़ियों ने शहरवासियों का ध्यान आकर्षित किया। कारों पर लगाए गए स्लोगन और बैनर लोगों के लिए प्रेरणादायक संदेश दे रहे थे। इनमें से कुछ प्रमुख संदेश थे:

    • “सर्वाइकल कैंसर से बचाव संभव है, जागरूकता ही सुरक्षा है!”
    • “नियमित जांच कराएं, स्वस्थ जीवन अपनाएं!”
    • “टीकाकरण से करें बचाव, सर्वाइकल कैंसर को भगाएं दूर!”

    सर्वश्रेष्ठ कारों को किया गया सम्मानित

    इस रैली के दौरान सबसे सुंदर और संदेशपरक तरीके से सजाई गई कारों को सम्मानित किया गया।

    • सर्वश्रेष्ठ कार: सचिन राखी झुनझुनवाला की कार को पहला स्थान प्राप्त हुआ।
    • द्वितीय स्थान: पूनम सहाय की कार को दूसरा स्थान मिला।
    • तृतीय स्थान: आईपीपी सुमन गौरीसरिया की कार तीसरे स्थान पर रही।

    इन विजेताओं को आगामी 8 मार्च को विशेष पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। कार्यक्रम के दौरान महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि इस तरह के आयोजनों से समाज में जागरूकता फैलाने में कितनी मदद मिलती है।

    जागरूकता अभियान को बढ़ावा देने का प्रयास

    इस अभियान के तहत इनर व्हील क्लब ऑफ गिरिडीह सनशाइन ने महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम और समय पर टीकाकरण के महत्व के बारे में जानकारी दी। क्लब की अध्यक्ष सोनाली तरवे ने बताया कि इस तरह के आयोजन समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा, “हमारा उद्देश्य केवल जागरूकता बढ़ाना ही नहीं, बल्कि लोगों को सही जानकारी देना भी है, ताकि वे समय पर इस बीमारी से बचाव के लिए कदम उठा सकें।”

    क्लब सचिव राखी झुनझुनवाला ने बताया कि क्लब की सदस्य समय-समय पर विभिन्न स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करती रहती हैं। उन्होंने बताया कि महिलाओं को इस विषय पर खुलकर बातचीत करनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोगों तक यह जानकारी पहुँच सके।

    कार्यक्रम में क्लब के सभी पदाधिकारी रहे सक्रिय

    इस कार्यक्रम को सफल बनाने में क्लब की कई प्रमुख सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। क्लब सचिव राखी झुनझुनवाला, आईपीपी सुमन गौरीसरिया, कोषाध्यक्ष स्मृति आनंद, आईएसओ सुनीता शर्मा, और संपादक दीप्ति सिन्हा ने मिलकर इस आयोजन को प्रभावशाली बनाया।

    कार्यक्रम के दौरान डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी महिलाओं को जानकारी दी और बताया कि कैंसर से बचने के लिए शुरुआती लक्षणों को पहचानना कितना ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि महिलाओं को अगर बार-बार असामान्य रक्तस्राव, पीठ दर्द, पेशाब में जलन, या असहजता महसूस हो रही हो तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

    सर्वाइकल कैंसर क्या  है?

    सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाला एक गंभीर लेकिन रोके जाने योग्य कैंसर है, जो गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि के कारण होता है। गर्भाशय ग्रीवा, गर्भाशय  और योनि  को जोड़ने वाला निचला हिस्सा होता है।

    सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण

    सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) संक्रमण है। HPV एक सामान्य वायरस है, जो मुख्य रूप से असुरक्षित यौन संपर्क के माध्यम से फैलता है। हालांकि, यह संक्रमण आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह कैंसर में परिवर्तित हो सकता है।

    सर्वाइकल कैंसर: एक गंभीर मुद्दा

    सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) संक्रमण के कारण होता है। यह एक धीमी गति से बढ़ने वाला कैंसर है, जिसे यदि प्रारंभिक अवस्था में पहचान लिया जाए तो सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, निम्नलिखित उपाय अपनाकर इस बीमारी से बचा जा सकता है:

    1. HPV टीकाकरण: यह 9 से 26 वर्ष की आयु की लड़कियों और महिलाओं के लिए अत्यधिक प्रभावी होता है।
    2. नियमित पैप स्मीयर टेस्ट: यह जांच सर्वाइकल कैंसर के प्रारंभिक संकेतों का पता लगाने में मदद करती है।
    3. सुरक्षित यौन संबंध: जागरूकता और सुरक्षा उपाय अपनाने से इस वायरस के संक्रमण को रोका जा सकता है।
    4. स्वस्थ जीवनशैली: धूम्रपान से बचाव, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से कैंसर का खतरा कम किया जा सकता है।

    इनर व्हील क्लब का सामाजिक योगदान

    इनर व्हील क्लब ऑफ गिरिडीह सनशाइन हमेशा से सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित रहा है। यह क्लब न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य और सशक्तिकरण पर काम करता है, बल्कि समाज के अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सक्रिय रहता है। क्लब की सदस्याओं का कहना है कि भविष्य में भी इस तरह के जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता रहेगा, ताकि समाज में स्वास्थ्य और शिक्षा को बढ़ावा मिल सके।

    इनर व्हील क्लब ने इस जागरूकता अभियान के तहत कुछ प्रमुख संकल्प लिए:

    • महिलाओं को मुफ्त सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग की सुविधा प्रदान करने के लिए स्थानीय अस्पतालों से संपर्क करना।
    • स्कूलों और कॉलेजों में जाकर युवा लड़कियों को HPV वैक्सीन के महत्व के बारे में जागरूक करना।
    • कैंसर सर्वाइकल के अलावा अन्य प्रकार के कैंसर जैसे स्तन कैंसर पर भी जागरूकता अभियान चलाना।
    • समाज में स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी कार्य करना।

    इस आयोजन की सफलता ने साबित कर दिया कि यदि समाज के सभी वर्ग मिलकर किसी समस्या के समाधान की दिशा में कार्य करें, तो एक बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इस रैली ने न केवल गिरिडीह में बल्कि आसपास के इलाकों में भी सर्वाइकल कैंसर जागरूकता की एक नई लहर पैदा की है।

  • बिना नेता प्रतिपक्ष के पारित होगा झारखंड विधान सभा का बजट !

    भाजपा में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की खोज जारी, पर कब खत्म होगा इंतजार?

    – परवेज़ आलम

    झारखंड में विधानसभा चुनाव को बीते तीन महीने हो चुके हैं, लेकिन क्या मजाल कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब तक नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर कोई फैसला ले पाई हो! बजट सत्र की गूंज विधानसभा में गूंजने लगी है, लेकिन मुख्य विपक्षी दल के नेता का नाम अब तक सस्पेंस बना हुआ है। सवाल यह उठता है कि जब सत्ता पक्ष अपनी जिम्मेदारियों में जुटा हुआ है, तो विपक्ष का यह ढुलमुल रवैया किस ओर इशारा करता है?

    बिना नेता प्रतिपक्ष के बजट ! यह कैसी राजनीति?

    3 मार्च को राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर विधानसभा में बजट पेश करने वाले हैं। लेकिन यह बजट इतिहास में इस बात के लिए भी दर्ज होगा कि जब इसे विधानसभा में पेश किया जाएगा, तो वहां विपक्ष का कोई मुखिया मौजूद नहीं होगा! यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गंभीर चूक मानी जा रही है। यह महज संयोग नहीं, बल्कि भाजपा के आंतरिक असंतुलन का संकेत भी देता है।

    विधानसभा अध्यक्ष की नाराजगी, लेकिन भाजपा बेफिक्र!

    झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो ने इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जता दी है। उनका साफ कहना है कि विपक्ष में नेता का होना अनिवार्य है, ताकि सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चल सके। लेकिन क्या भाजपा इस बात को गंभीरता से ले रही है? या फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए झारखंड की राजनीतिक तस्वीर फिलहाल किसी प्राथमिकता में नहीं है?

    दिल्ली में अटकी फाइल, इंतजार में रांची!

    नेता प्रतिपक्ष का चयन आखिर क्यों नहीं हो पा रहा? सूत्रों की मानें तो भाजपा की केंद्रीय कमेटी अब तक इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है। पार्टी के कई बड़े नेता झारखंड आ चुके हैं, लेकिन हर बार सिर्फ कयास और अटकलों का दौर चलता है, नतीजा कुछ नहीं निकलता।

    कौन होगा अगला नेता प्रतिपक्ष? संभावित नामों की सूची लंबी!

    अगर झारखंड की राजनीति के गलियारों में सुगबुगाहट सुनी जाए, तो भाजपा के भीतर कई नामों की चर्चा है।

    1. बाबू लाल मराण्डी :पूर्व मुख्य मंत्री व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष,विधायी कार्यों का लंबा अनुभव
    2. सीपी सिंह: रांची विधायक, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कद्दावर नेता।
    3. नीरा यादव: कोडरमा विधायक, महिला चेहरा।
    4. नवीन जायसवाल: हटिया विधायक, ओबीसी समाज से आते हैं और भाजपा की सामाजिक संतुलन नीति के तहत इनका नाम भी चर्चा में है।

    लेकिन असल सवाल यह है कि चर्चा कब खत्म होगी और भाजपा अपने नेता के नाम पर अंतिम मुहर कब लगाएगी?

    प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी खाली, कब मिलेगा नया अध्यक्ष?

    झारखंड भाजपा सिर्फ नेता प्रतिपक्ष की ही नहीं, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष की भी तलाश में है। रघुवर दास के ओड़ीसा के राज्यपाल से इस्तीफे के बाद से ही यह कयास लगाया जा रहा था कि इन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद कि जिम्मेवारी मिल सकती है पर आलाकमान कोई निर्णय लेने कि स्थिति मे फिलवक्त नहीं दिखती । पार्टी संगठन के स्तर पर सांगठनिक चुनाव अभी जारी है और जिला स्तर पर इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही प्रदेश अध्यक्ष का नाम सामने आएगा। लेकिन तब तक कार्यकर्ताओं को सिर्फ इंतजार ही करना होगा।

    क्या भाजपा की रणनीति झारखंड में कमजोर पड़ रही है?

    झारखंड में भाजपा को एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने की जरूरत है, लेकिन पार्टी का यह ढुलमुल रवैया न केवल कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस पैदा कर रहा है, बल्कि इसका राजनीतिक नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। अगर भाजपा जल्द ही नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा नहीं करती, तो यह उसकी साख पर सवाल खड़े करने वाला साबित हो सकता है।

    आखिर कब खत्म होगा यह इंतजार?

    झारखंड में भाजपा का राजनीतिक अस्थिरता का यह दौर कब खत्म होगा? भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व कब नींद से जागेगा? और क्या झारखंड में विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए भाजपा सच में गंभीर है? ये तमाम सवाल भाजपा के लिए जितने महत्वपूर्ण हैं, उतने ही झारखंड की जनता के लिए भी। क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सत्ता के साथ एक मजबूत विपक्ष भी जरूरी होता है।

  • जेल ब्रेक: सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल, 6 कक्षपाल निलंबित

    रिपोर्ट-परवेज़ आलम

    …….तो आखिर वही हुआ जिसका डर था। एक और जेल ब्रेक, एक और सुरक्षा में सेंध, और प्रशासन के हाथ-पांव फूले हुए! रांची के होटवार स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा से फरार PLFI उग्रवादी समीर तिर्की का 24 घंटे बाद भी कोई सुराग नहीं मिला। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस जेल से कैदी इतने आराम से फरार कैसे हो जाते हैं?

    तीन लेयर की सुरक्षा में आखिर सेंध कैसे?

    बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। तीन परतों की सुरक्षा व्यवस्था होने का ढोल पीटा जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि इन दावों के बीच से ही समीर तिर्की चकमा देकर निकल गया! सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि जेल प्रशासन की नाक के नीचे आखिर यह हुआ कैसे? क्या यह सिर्फ लापरवाही है, या फिर कुछ और?

    जेल प्रशासन की घोर लापरवाही, 6 कक्षपाल निलंबित

    हर बार की तरह इस बार भी लापरवाही का ठीकरा जेल प्रशासन पर फूटा है। जेल आईजी सुदर्शन मंडल ने आनन-फानन में छह कक्षपालों को निलंबित कर दिया है। इनमें बीचा मुण्डा, सतन नायक, सोमन लोहार, राकेश कुमार सिंह, रामजीत महतो और गोपाल सिंह के नाम शामिल हैं। इन पर आरोप है कि इनकी लापरवाही के चलते समीर तिर्की फरार हो सका। लेकिन क्या सिर्फ इन छह लोगों की गलती है, या फिर इसमें कोई अंदरूनी मिलीभगत भी है?

    जेलर और अधीक्षक का पद खाली, फिर कौन जिम्मेदार?

    अब ज़रा इस जेल की व्यवस्था पर गौर कीजिए। बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में न तो स्थायी अधीक्षक है और न ही स्थायी जेलर। मतलब यह कि जो लोग वहां तैनात हैं, वे केवल प्रभार में काम कर रहे हैं। तो फिर सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या यह पूरा तंत्र ही ध्वस्त हो चुका है?

    कैदी निकला, कैमरे देखते रहे!

    कैदी के फरार होने का CCTV फुटेज भी सामने आया है। इसमें साफ दिख रहा है कि समीर तिर्की जेल के मुख्य गेट की ओर बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब मुख्य गेट पर 10 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, तो फिर समीर कैसे बच निकला? कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने जानबूझकर इसे अनदेखा किया? क्या यह एक सुनियोजित जेल ब्रेक था?

    समीर तिर्की: कौन है यह फरार कैदी?

    गुमला का रहने वाला समीर तिर्की कोई साधारण अपराधी नहीं था। वह पहले पहाड़ी चिता नामक उग्रवादी संगठन से जुड़ा था, फिर जोनल कमांडर परमेश्वर गोप और एरिया कमांडर बसंत तिर्की के साथ कई वारदातों को अंजाम दिया। 2013 में अपहरण और हत्या के मामले में उसे पकड़ा गया था, और 2022 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

    प्रशासन की नींद अब तक नहीं खुली!

    24 घंटे बाद भी पुलिस के हाथ खाली हैं। तमाम संभावित ठिकानों पर छापेमारी हो रही है, लेकिन नतीजा शून्य! रांची के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन से लेकर गुमला स्थित उसके घर तक, हर जगह तलाशी ली जा रही है, मगर कोई सुराग नहीं।

    जेल प्रशासन पर बड़े सवाल

    1. कैसे तीन लेयर की सुरक्षा में सेंध लगी?
    2. कैमरों के सामने कैदी बाहर निकलता रहा, कोई कुछ क्यों नहीं बोला?
    3. स्थायी अधीक्षक और जेलर की पोस्टिंग क्यों नहीं हुई?
    4. क्या यह किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है?

    इन सवालों के जवाब किसके पास हैं? या फिर यह भी किसी और जेल ब्रेक की तरह धीरे-धीरे भुला दिया जाएगा? प्रशासन मौन है, सरकार मौन है, लेकिन यह मामला मौन नहीं रहेगा।

  • स्कॉलर B.Ed कॉलेज में पांच दिवसीय लेक्चर सीरीज का आयोजन: छात्रों के बौद्धिक विकास पर जोर

    रिपोर्ट -चन्दन पांडेय

    गिरिडीह: शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि सोचने, समझने और आत्मविश्लेषण की क्षमता विकसित करना भी है। इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए स्कॉलर B.Ed कॉलेज, बनहत्ती में 1 मार्च से 5 मार्च 2025 तक पांच दिवसीय लेक्चर सीरीज का आयोजन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य छात्रों के बौद्धिक विकास, सकारात्मक चिंतन एवं सृजनात्मक क्षमता को प्रोत्साहित करना था।

    कार्यक्रम की भव्य शुरुआत

    कार्यक्रम की शुरुआत कॉलेज प्राचार्या डॉ. शालिनी खोवाला एवं डीएलएड प्रभारी डॉ. हरदीप कौर द्वारा मुख्य अतिथि गिरिडीह कॉलेज गिरिडीह के प्राचार्य डॉ. अनुज कुमार एवं मुख्य वक्ता डॉ. मृत्युंजय प्रसाद (प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ़ एजुकेशन, विनोबा भावे यूनिवर्सिटी) को पुष्पगुच्छ एवं सॉल भेंट कर स्वागत करने से हुई। इसके पश्चात दीप प्रज्वलित कर विधिवत कार्यक्रम की शुरुआत की गई।

    शिक्षकों का मार्गदर्शन और प्रेरणादायक विचार

    प्राचार्या डॉ. शालिनी खोवाला ने अपने स्वागत भाषण में अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके विचार इस संस्थान को नई दिशा प्रदान करेंगे। उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा सिर्फ जानकारी अर्जित करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका उपयोग समाज को सशक्त बनाने में होना चाहिए।

    मुख्य अतिथि डॉ. अनुज कुमार ने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा, “आप भावी शिक्षक हैं, और समाज में आपकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाकर ही सफलता प्राप्त की जा सकती है। आपको निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी होगी, जिससे आप शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन ला सकें।”

    मुख्य वक्ता डॉ. मृत्युंजय प्रसाद ने अपने व्याख्यान में सकारात्मक शिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, “अगर शिक्षण में सकारात्मकता नहीं है, तो ऐसा शिक्षण किसी काम का नहीं। सकारात्मक शिक्षण राष्ट्र को ऊर्जा प्रदान करता है।” संस्कृत की पंक्तियों का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि जब हम साथ-साथ खेलेंगे, खाएंगे और पढ़ेंगे, तभी हमारा देश सशक्त बनेगा।

    लेक्चर सीरीज के विषय

    इस पांच दिवसीय कार्यक्रम के तहत विभिन्न विषयों पर गहन चर्चा की गई:

    1. सकारात्मक शिक्षण वातावरण बनाए रखना और छात्र व्यवहार प्रबंधन की रणनीतियाँ
    2. भाषा विकास के सिद्धांत और प्रभावी भाषा कौशल को बढ़ावा देना
    3. बाल विकास के चरण: संज्ञानात्मक, सामाजिक विकास और भावनात्मक पहलू
    4. प्रभावी पाठ योजना बनाना और उद्देश्यों को विषय वस्तु के साथ संरेखित करना
    5. 21वीं सदी के लिए प्रभावी शिक्षण रणनीतियाँ

    आयोजन समिति और सहभागिता

    इस कार्यक्रम के समन्वयक आशीष राज, डॉ. संतोष कुमार चौधरी एवं डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे। मंच संचालन की जिम्मेदारी आशीष राज और डॉ. संतोष कुमार चौधरी ने संभाली, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संतोष कुमार चौधरी द्वारा किया गया।

    इस अवसर पर डॉ. सुधांशु शेखर जमैयार, रंजीत कुमार, स्मिता कुमारी समेत अन्य सहायक प्राध्यापकगण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में प्रशिक्षु छात्रों ने भाग लिया और अपने शैक्षिक विकास के लिए इस अवसर का लाभ उठाया।

    इस पांच दिवसीय लेक्चर सीरीज से  छात्रों को न केवल शिक्षण क्षेत्र की गहरी समझ प्रदान  करेगा , बल्कि उन्हें शिक्षण के आधुनिक और प्रभावी तरीकों से भी अवगत कराया जाएगा । यह पहल भविष्य के शिक्षकों के लिए मार्गदर्शक साबित होगी और शिक्षा के क्षेत्र में एक नए परिवर्तन की नींव रखेगी

     

  • विधानसभा: लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर ! सीएम ने विधायकों को दिलाई लोकतांत्रिक मूल्यों की शपथ

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

    झारखंड विधानसभा के सभागार में जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने माइक संभाला, तो उनका संदेश बिल्कुल स्पष्ट था— “विधानसभा भवन लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है!” और यह मंदिर किसी धर्म, जाति या व्यक्ति विशेष की जागीर नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं का पवित्र स्थल है।

    शनिवार को नव-निर्वाचित विधायकों के लिए आयोजित दो दिवसीय प्रबोधन सह प्रशिक्षण कार्यक्रम के शुभारंभ पर मुख्यमंत्री ने लोकतंत्र की इस पवित्रता को रेखांकित किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि “इस सदन में भले ही पक्ष और विपक्ष के विचार अलग हों, लेकिन यह लोकतांत्रिक व्यवस्था सबको साथ लेकर चलने के लिए है।”

    जनप्रतिनिधियों की पाठशाला!

    अब जरा समझिए, यह प्रशिक्षण सत्र कोई साधारण औपचारिकता नहीं थी।
    बजट सत्र से पहले विधायकों को उनके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का स्मरण कराना था। यानी, उन्हें सिखाया गया कि कैसे प्रश्नकाल में सरकार से जवाब मांगा जाए, शून्यकाल में जनहित के मुद्दे उठाए जाएं, विधायिका की कार्यवाही को प्रभावी बनाया जाए, और सबसे जरूरी— लोकतंत्र की ताकत को समझा जाए। छठी झारखंड विधान सभा के सदस्यों के प्रशिक्षण को ध्यान में रखकर आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।

    बात सिर्फ विधायकों की नहीं, लोकतंत्र की गरिमा की भी!

    हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन में कहा,
    👉 “सीखने की कोई उम्र नहीं होती।”
    👉 “जो भी इस सदन में आते हैं, वे सीखते भी हैं और जनता की आकांक्षाओं को पटल पर रखते भी हैं।”
    👉 “सदन की कार्यवाही में सभी सदस्यों को साथ लेकर राज्य को समृद्ध और विकसित बनाने के लिए आगे बढ़ना जरूरी है।”

    यानी, यह सिर्फ सत्ता की कुर्सी का सवाल नहीं, जनता के प्रति जवाबदेही का संकल्प है।

    मुख्यमंत्री, राज्यसभा के उपसभापति, संसदीय कार्य मंत्री और अन्य गणमान्य

    सिर्फ भाषण नहीं, एक मजबूत संदेश!

    यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का संकल्प था।
    झारखंड विधानसभा के प्रबोधन कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, विधानसभाध्यक्ष रबींद्र नाथ महतो, संसदीय कार्य मंत्री राधा कृष्ण किशोर, मंत्रीगण और कई गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में विधायकों को उनके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का स्मरण कराया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बजट सत्र के दौरान विधायकों को सदन की कार्यवाही को बेहतर ढंग से समझने और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में योगदान देने के लिए तैयार करना था।

    कार्यक्रम में विधायकों की भूमिका, प्रश्नकाल का महत्व, शून्यकाल, व्यवधान, विधि निर्माण, बजट और वित्तीय मामलों पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही, नए और अनुभवी विधायकों के बीच विचारों के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित किया गया।

     

    सवाल यह है कि क्या यह सत्र महज औपचारिकता था या विधायकों ने वास्तव में कुछ सीखा?
    क्योंकि लोकतंत्र का यह मंदिर तभी पवित्र रहेगा, जब इसमें जनता की आवाज गूंजेगी, न कि सत्ता का अहंकार!

    तो अगली बार जब विधानसभा की कार्यवाही में हंगामा हो, तो याद रखिएगा— यहां सिर्फ कुर्सियों की नहीं, लोकतंत्र की परीक्षा होती है!

     

  •  मैट्रिक की हिंदी और विज्ञान परीक्षा रद्द , जैक ने नए शेड्यूल का किया ऐलान

    झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) ने मैट्रिक परीक्षा के दो अहम विषय—हिंदी और विज्ञान—की रद्द परीक्षा की नई तारीखों का ऐलान कर दिया है ।  गौरतलब है कि  सोशल मीडिया पर पेपर लीक की खबर  सुर्खियां बनी थी और बाद मे जैक ने इन दोनों विषयों  की  परीक्षा रद्द कर दी  ।

    जैक की ओर से जारी बयान में कहा गया कि 18 फरवरी 2025 को आयोजित हिंदी (कोर्स A और B) और 20 फरवरी 2025 को हुई विज्ञान की परीक्षा को अमान्य घोषित कर दिया गया है। यानी इन परीक्षाओं को दोबारा आयोजित किया जाएगा।

    नया परीक्षा शेड्यूल जारी

    अगर आप भी उन छात्रों में शामिल हैं जिन्होंने यह परीक्षा दी थी, तो नए डेट्स नोट कर लीजिए—
    📌 हिंदी A और हिंदी B की पुनर्परीक्षा: 7 मार्च 2025 (शुक्रवार)
    📌 विज्ञान की पुनर्परीक्षा: 8 मार्च 2025 (शनिवार)

    अब छात्रों को दोबारा अपनी तैयारी करनी होगी, लेकिन सवाल यही है—बार-बार परीक्षा रद्द होने से छात्रों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?