मुंबई से रिपोर्ट……
मुंबई का आजाद मैदान। देवेंद्र फडणवीस तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली । उनके साथ एकनाथ शिंदे और अजित पवार ने भी उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मैदान खचाखच भरा हुआ था। एक तरफ भीड़ थी, दूसरी तरफ चेहरे। चेहरे, जिनके पीछे चमकती कैमरों की रोशनी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सलमान खान और सचिन तेंदुलकर तक पहुंचे। शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा, शिवसेना, और एनसीपी के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ सरकारी योजनाओं से लाभान्वित लोग भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने देवेंद्र फडणवीस को बधाई देते हुए उनके कार्यकाल को सफल होने की शुभकामनाएं दीं।
देवेंद्र फडणवीस तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने हैं।
• पहली बार: 2014 में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार के दौरान।
• दूसरी बार: 2019 में मात्र 80 घंटे के लिए।
• तीसरी बार: अब 2024 में।
राजनीतिक सफर
• 22 साल की उम्र: 1992 में नागपुर नगर पालिका के पार्षद बने।
• 27 साल की उम्र: 1997 में नागपुर के मेयर बने।
• 1999: पहली बार विधायक चुने गए।
• 2014: महाराष्ट्र के दूसरे सबसे युवा मुख्यमंत्री बने।
• 2019: मुख्यमंत्री पद पर वापसी, लेकिन केवल 80 घंटे के लिए।
व्यक्तिगत जीवन और पढ़ाई
• जन्म: 22 जुलाई 1970, नागपुर।
• शिक्षा: लॉ में स्नातक, बिजनेस और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की पढ़ाई जर्मनी से।
• परिवार: पिता गंगाधर राव संघ और जनसंघ से जुड़े थे।
• पत्नी: अमृता फडणवीस।
दिलचस्प बातें
1. देवेंद्र फडणवीस ने इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी का विरोध करते हुए इंदिरा कॉन्वेंट स्कूल से अपना नाम कटवा लिया था।
2. उन्होंने 2006 में मॉडलिंग भी की थी, और अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें “मॉडल विधायक” कहकर बुलाते थे।
3. फडणवीस ने बजट पर एक किताब भी लिखी है।
राजनीति के इस रंगमंच पर सब कुछ लिखा हुआ है। हर संवाद तय है। हर तालियों की गूंज सुनियोजित। लेकिन जनता का क्या? जो हर बार इन वादों की पटकथा में कहीं खो जाती है।
“तो सवाल यही है—क्या महाराष्ट्र के लिए देवेंद्र फडणवीस की यह नई पारी वाकई नई सुबह होगी? या फिर वही पुरानी कहानी, जहां नेता बड़े हो जाते हैं और जनता छोटी?”
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देवेंद्र फडणवीस तीसरी बार बने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री
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झारखंड में बीजेपी की हार: क्या संघ की पकड़ ढीली हो गई है ?
परवेज़ आलम की रिपोर्ट…..
झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं। 28 आदिवासी सीटों में से सिर्फ़ एक सीट पर जीत, यह आंकड़ा पार्टी की सियासी जमीन खिसकने की कहानी खुद ब खुद कहता है। आदिवासी इलाकों में पार्टी की पकड़ कमजोर हो चुकी है। दिल्ली से लेकर रांची तक मंथन का दौर जारी है, लेकिन क्या बीजेपी उस दर्द की सही नब्ज़ पकड़ पाएगी जिसने उसे इस हार की कगार पर ला दिया ?
आदिवासी वोटर और बीजेपी का बिखरता समीकरण
झारखंड में बीजेपी की हार के पीछे आदिवासी वोटरों की नाराज़गी साफ झलकती है। पार्टी ने आरएसएस के जरिए आदिवासियों को जोड़ने की हर कोशिश की, लेकिन ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम समुदाय का गठजोड़, बीजेपी की कोशिशों पर भारी पड़ा। आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव, सरना आदिवासियों की घटती संख्या और संघ की कमजोर होती पकड़ ने बीजेपी की सियासी पकड़ को ढीला कर दिया।गुमला, लोहरदगा, बिशुनपुर और सिसई जैसे इलाकों में कभी संघ का मजबूत नेटवर्क हुआ करता था। वनवासी कल्याण केंद्र, एकल विद्यालय, और सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संगठन आदिवासी समुदाय में संघ का प्रभाव बढ़ाते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में इन संगठनों की गतिविधियां धीमी पड़ गई हैं। संघ से जुड़े सूत्र मानते हैं कि आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी से संघ की शाखाएं कमजोर पड़ी हैं।
दिल्ली में होगा निर्णायक मंथन
रांची में हार की समीक्षा के बाद अब दिल्ली में 3 दिसंबर को बीजेपी के शीर्ष नेताओं की बैठक होगी। जेपी नड्डा, अमित शाह, और अन्य वरिष्ठ नेता इस हार के कारणों पर मंथन करेंगे। सवाल यह है कि क्या यह बैठक सिर्फ हार के कारणों को तलाशेगी या जमीनी स्तर पर कुछ ठोस बदलाव भी होंगे?गुमला से लेकर बिशुनपुर तक: बीजेपी का टूटता किला
गुमला जिले में बीजेपी को करारी शिकस्त मिली है। कभी इन इलाकों में वनवासी कल्याण केंद्र और विकास भारती जैसे संगठनों का बड़ा प्रभाव था। बिशुनपुर में अशोक भगत की पकड़ इतनी मजबूत थी कि टिकट का फैसला वही करते थे। लेकिन आज वहां झामुमो और चमरा लिंडा का दबदबा है।क्या बीजेपी आत्मनिरीक्षण करेगी?
2019 के चुनाव में 25 सीटें जीतने वाली बीजेपी आज सिर्फ 21 सीटों पर सिमट गई है। आदिवासियों का झुकाव झामुमो और कांग्रेस की ओर बढ़ता जा रहा है। संघ की कमजोर होती भूमिका, बूथ मैनेजमेंट की खामियां और निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं का उत्साह खत्म होना, ये सब पार्टी के लिए खतरे की घंटी है।बीजेपी के पास अब ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं। जमीनी स्तर पर काम शुरू करना होगा, नए चेहरे लाने होंगे और पुराने, चूके हुए नेताओं से किनारा करना होगा। झारखंड कभी बीजेपी का गढ़ हुआ करता था, लेकिन अब यह पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बन गया है।
क्या बीजेपी समय रहते सबक लेगी या यह हार उसकी झोली में आने वाले और बड़े झटकों का ट्रेलर मात्र है? झारखंड की सियासत के इस बदलते परिदृश्य में बीजेपी का भविष्य सवालों के घेरे में है।
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भगवान बिरसा मुंडा के वंशज को अंतिम विदाई: पीएम सीएम ने दी श्रद्धांजलि
रांची से रिपोर्ट …..
भगवान बिरसा मुंडा के वंशज मंगल मुंडा के निधन की खबर ने झारखंड के आदिवासी समाज को गहरे शोक में डाल दिया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद रिम्स अस्पताल पहुंचे और श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर मंगल मुंडा को श्रद्धांजलि दी।
उलिहातू में शोक की लहर।
मंगल मुंडा का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव उलिहातू पहुंचते ही पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। बिरसा मुंडा के गांव में श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया। मंगल मुंडा के पिता सुखराम मुंडा, मां लखिमनी देवी और परिवार के अन्य सदस्यों का रो-रोकर बुरा हाल है। शुक्रवार को आदिवासी परंपराओं के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।दुर्घटना के बाद इलाज के लिए भेजा गया था रिम्स ।
मंगल मुंडा 25 नवंबर को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें खूंटी से रांची के रिम्स अस्पताल लाया गया, जहां मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने डॉक्टरों को उनके इलाज में कोई कसर न छोड़ने के निर्देश दिए। उनके इलाज के लिए डॉक्टरों की एक विशेष टीम बनाई गई थी।मुख्यमंत्री का रिम्स दौरा ।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन खुद रिम्स पहुंचे और मंगल मुंडा के स्वास्थ्य की जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन से यह सुनिश्चित करने को कहा कि भगवान बिरसा मुंडा के वंशज को सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधा मिले।मंगल मुंडा का निधन ।
सिर में गंभीर चोटों के कारण तमाम प्रयासों के बावजूद मंगल मुंडा को बचाया नहीं जा सका। 28 नवंबर की रात 12:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके छोटे भाई ने सोशल मीडिया पर इस दुखद समाचार को साझा किया, जिसके बाद से आदिवासी समाज में शोक की लहर है।भगवान बिरसा के वंशज को अंतिम विदाई ।
45 वर्षीय मंगल मुंडा के निधन ने एक बार फिर भगवान बिरसा मुंडा की विरासत और आदिवासी समाज के संघर्ष को याद करने का मौका दिया है। झारखंड के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ने उनके प्रति संवेदना व्यक्त की। लेकिन -
हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली
परवेज आलम की रिपोर्ट…..
झारखंड की राजनीति ने रच दिया इतिहास। 2024 के विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की प्रचंड जीत के बाद हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मोरहाबादी के मैदान में ऐसा नज़ारा था, जो शायद दशकों तक याद किया जाएगा।
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने शाम चार बजे हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। हेमंत अब झारखंड के 14वें मुख्यमंत्री हैं। तीन बार पहले भी इस कुर्सी पर विराजमान हो चुके अर्जुन मुंडा और शिबू सोरेन के बाद, हेमंत का यह चौथा कार्यकाल एक नई कहानी लिखने को तैयार है।
इंडिया गठबंधन की चमक और शपथ का मंच—
जिस तरह से मोरहाबादी के मंच पर इंडिया गठबंधन के नेता जुटे, वो किसी शक्ति प्रदर्शन से कम नहीं था। राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल से लेकर अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, और यहां तक कि तमिलनाडु से उदयनिधि स्टालिन तक… हर किसी की मौजूदगी ने इस समारोह को राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना दिया। शिबू सोरेन, जो खुद दिशोम गुरु कहे जाते हैं, अपने बेटे की इस चौथी पारी के गवाह बने।
नतीजों का संदेश—
2024 के विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने 81 में से 56 सीटें जीतकर साबित कर दिया कि झारखंड की जनता का भरोसा उनके साथ है। झामुमो ने 34 सीटों पर कब्जा जमाया, जो इसका अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। कांग्रेस को 16, आरजेडी को 4, और भाकपा-माले को 2 सीटें मिलीं।
सुरक्षा और उत्सव—
मोरहाबादी मैदान में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी, लेकिन माहौल में जोश और जश्न का संगम दिखा। हजारों समर्थकों ने अपने नेता का स्वागत किया। झारखंड का भविष्य नई उम्मीदों से भर चुका है, और इंडिया गठबंधन के लिए यह एक बड़ी जीत का प्रतीक है।
मोरहाबादी के मंच से झारखंड के हर कोने तक एक संदेश गया—यह जीत सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि झारखंड के सपनों को नई दिशा देने की शुरुआत है। हेमंत सोरेन की चौथी पारी कितनी सफल होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इस शपथ ग्रहण ने झारखंड की राजनीति को एक नई उड़ान जरूर दी है।