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  • गिरिडीह: ‘मन की बात’ की 123वीं कड़ी का आयोजन, जनभागीदारी और राष्ट्र भावना का दिखा उत्साह

    By The News Post4u

    गिरिडीह: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रेरणास्पद मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात’  की 123वीं कड़ी का सीधा प्रसारण रविवार को गिरिडीह में बेहद उत्साह, गरिमा और राष्ट्र भावना के साथ आयोजित किया गया।

    कार्यक्रम में जिले के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों, महिला स्वयं सहायता समूहों, युवा कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया। कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और गर्व का क्षण तब आया जब गिरिडीह सीधे पूरे देश के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ा। यह गिरिडीहवासियों के लिए न सिर्फ एक विशेष अवसर था, बल्कि यह क्षण उन्हें राष्ट्र के साथ जुड़ने का गौरव भी प्रदान कर गया।  इस अवसर ने गिरिडीह में लोकतांत्रिक सहभागिता और राष्ट्र निर्माण के प्रति जनजागरूकता को नई ऊर्जा दी। आयोजन सिर्फ एक रेडियो प्रसारण भर नहीं था, बल्कि यह एक प्रेरणादायक सामाजिक मिलन बन गया जिसमें सभी ने एक साथ बैठकर प्रधानमंत्री के विचारों को सुना और आत्मसात किया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद प्रतिनिधि दिनेश यादव, बिनय सिंह, भाजपा जिला अध्यक्ष महादेव दुबे, उद्योगपति अमरजीत सिंह सलूजा,चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निर्मल झुनझुनवाला, मुकेश जालान, विकास खेतान,निर्मल स्लामपुरिया,संजीव कुमार व साहिल शर्मा उपस्थित थे ।

  • दुबई में फंसे झारखंड के 15 मजदूरों ने भेजा भावुक संदेश, भारत वापसी की लगाई गुहार

    भोजन के लाले, बीमारियां बढ़ीं, ठेकेदार ने झाड़ा पल्ला, अब सरकार ही आखिरी उम्मीद

    परवेज़ आलम. By The News Post4u.

    झारखंड के गिरिडीह, धनबाद और हजारीबाग जिलों से दुबई में काम की तलाश में गए 15 मजदूर इन दिनों बेहद मुश्किल हालात में जी रहे हैं। दुबई की “मसाई कांट्रैक्टिंग एलएलसी” नामक कंपनी में काम करने गए इन मजदूरों ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर केंद्र और राज्य सरकार से मदद की भावुक अपील की है। मजदूरों का कहना है कि बीते तीन महीनों से उन्हें वेतन नहीं मिला है, जिस कारण भुखमरी की नौबत आ गई है।

    वीडियो में मजदूरों ने रोते हुए बताया कि अब उनके पास दो वक्त की रोटी तक का इंतजाम नहीं है। कुछ मजदूर बीमार भी हैं लेकिन उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। उन्होंने बताया कि वहां उन्हें न खाना सही मिल रहा है, न रहने की उचित व्यवस्था है। जिन उम्मीदों के साथ वे विदेश गए थे, अब वही उम्मीदें दम तोड़ रही हैं।

    ठेकेदार ने भी छोड़ा साथ.
    मजदूरों ने बताया कि वे एक ठेकेदार के भरोसे दुबई पहुंचे थे। शुरुआत में ठेकेदार ने उन्हें अच्छे वेतन और सुविधाओं का आश्वासन दिया था, लेकिन अब ठेकेदार ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया है। कंपनी ने पिछले तीन महीने से सैलरी नहीं दी और काम के बदले बस इंतजार थमा दिया है।

    इन मजदूरों की सूची में शामिल हैं:

    • हजारीबाग जिले से: चुरामन महतो, चंद्रिका महतो, कैलाश महतो, विष्णु महतो, जगन्नाथ सिंह, लाखन सिंह, सुखदेव सिंह, अर्जुन महतो, त्रिलोकी महतो, बालेश्वर महतो
    • गिरिडीह जिले से: बैजनाथ महतो, महेंद्र महतो, सीताराम महतो, मूरत महतो
    • धनबाद जिले से: संजय कुमार महतो

    भूख से मौत की आशंका, सरकार से सीधी अपील.

    वीडियो में मजदूरों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधा अनुरोध करते हुए कहा, “अब बस एक ही आस बची है—कृपया हमें जल्द से जल्द अपने देश वापस लाने का इंतजाम करें। यहां हर दिन हमारी हालत बद से बदतर होती जा रही है। अगर अब भी देरी हुई, तो कुछ मजदूर भूख से दम तोड़ देंगे।”

    नाइजर में गिरिडीह के 5 मजदूर पहले से अगवा.
    इस बीच, गिरिडीह जिले के बगोदर इलाके से अफ्रीकी देश नाइजर में पहले से ही 5 मजदूर अगवा हैं और अब दुबई में यह नया संकट सामने आया है। ऐसे में राज्य में चिंता और आक्रोश दोनों बढ़ रहे हैं।

    परिवारों की बढ़ती चिंता, प्रशासन अब तक मौन.
    इन मजदूरों के परिजन झारखंड में बेहद चिंतित हैं। रोजाना कोई न कोई रिश्तेदार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, लेकिन अभी तक प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान या पहल सामने नहीं आई है। यह चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।

    अब देखना यह होगा कि सरकार इन मजलूम मजदूरों की पुकार को कब तक अनसुना करती है और क्या कोई ठोस कदम जल्द उठाया जाएगा या नहीं। मजदूरों की जिंदगी अब सरकार की संवेदनशीलता पर टिकी है।

     

  • खुफिया इनपुट के बावजूद नहीं हुई सुरक्षा तैयारी, पहलगाम हमले पर खरगे ने केंद्र सरकार को घेरा

    परवेज़ आलम.

    रांची: झारखंड की राजधानी रांची में आयोजित ‘संविधान बचाओ रैली’ के मंच से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले का हवाला देते हुए खरगे ने दावा किया कि हमले से तीन दिन पहले प्रधानमंत्री को खुफिया रिपोर्ट भेजी गई थी। इसके आधार पर पीएम मोदी ने तो अपनी यात्रा रद्द कर दी, लेकिन आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया, जिसके कारण 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई। खरगे ने कहा, हमले से तीन दिन पहले प्रधानमंत्री को इंटेलिजेंस इनपुट मिला था, जिसके बाद उन्होंने अपना कश्मीर दौरा रद्द कर दिया। लेकिन सवाल यह है कि अगर उन्हें खतरे की जानकारी थी, तो आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर क्या किया गया?”

    जब जानकारी थी, तो सुरक्षा क्यों नहीं ?

    खरगे ने सवाल किया कि यदि प्रधानमंत्री को खतरे की गंभीर जानकारी थी, तो उसी रिपोर्ट को सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय पुलिस के साथ क्यों नहीं साझा किया गया? उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री खुद खतरों से बच गए, लेकिन आम लोगों को क्यों मरने के लिए छोड़ दिया गया?” उन्होंने केंद्र को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि जब सरकार खुद इंटेलिजेंस फेल्योर को स्वीकार कर रही है, तो उसे इन मौतों की जवाबदेही भी लेनी चाहिए।

    आतंकवाद के खिलाफ समर्थन, लेकिन चूक पर सवाल जरूरी.

    कांग्रेस अध्यक्ष ने यह स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ सरकार के हर कड़े कदम का समर्थन करती है। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि “समर्थन का मतलब यह नहीं कि सरकार अपनी लापरवाही पर पर्दा डाले।”

    मीडिया रिपोर्ट का हवाला, पीएम का दौरा रद्द.

    खरगे ने एक अखबार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 19 अप्रैल को प्रधानमंत्री को पहलगाम में खतरे की जानकारी मिली थी, जिसके बाद उन्होंने कश्मीर का दौरा रद्द कर दिया। “जब पीएम खुद नहीं गए, तो यह जानकारी आम लोगों को सुरक्षित रखने के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल हुई?” उन्होंने पूछा।

    रोजगार और अर्थव्यवस्था पर भी उठाए सवाल.

    रैली में खरगे ने आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि देश में 30 लाख सरकारी पद खाली हैं, लेकिन मोदी सरकार इन्हें भरने में रुचि नहीं ले रही। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीति बन गई है – “PSU बंद करो और गरीबों की नौकरी छीनो।”

    उन्होंने यह भी कहा कि कई सरकारी उपक्रमों में कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला, जबकि सरकार दावा करती है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत है। उन्होंने कहा, “अगर जमीन पर हालात नहीं सुधरते, तो आंकड़े महज भ्रम पैदा करने का जरिया बन जाते हैं।”

    जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय की मांग.

    खरगे ने केंद्र सरकार से जल्द जातीय जनगणना शुरू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि ओबीसी आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाए और 50% की सीमा खत्म की जाए। उन्होंने कहा, “वोट हमारा और राज तुम्हारा – यह अब नहीं चलेगा। अब वोट भी हमारा होगा और सरकार भी हमारी होगी।” उन्होंने मोदी सरकार पर पिछड़े वर्गों और गरीबों की आवाज को दबाने का आरोप लगाया।

    सरना धर्मकोड और HEC की बदहाली का मुद्दा.

    रैली में खरगे ने झारखंड के अहम मुद्दों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आगामी जनगणना में सरना धर्मकोड को मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष जारी रखना होगा। साथ ही HEC (हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन) की खराब स्थिति के लिए भी उन्होंने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, “जहां दो-दो साल से वेतन नहीं मिला, वहां कर्मचारी कैसे काम करेंगे? मोदी सरकार की नीति एससी, एसटी और ओबीसी को हाशिए पर ढकेलने की है।”

    संगठन और संविधान की रक्षा का आह्वान.

    खरगे ने कार्यकर्ताओं से पार्टी को मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “अगर कांग्रेस कमजोर हुई, तो न कोई मंत्री रहेगा, न मुख्यमंत्री। संविधान को बचाना है तो एकजुट संघर्ष जरूरी है।”

    शहीद नेताओं को श्रद्धांजलि और जनता का धन्यवाद

    अपने संबोधन के अंत में खरगे ने महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि “देश पहले है, जाति, धर्म और पार्टी बाद में।” उन्होंने झारखंड की जनता को इंडियागठबंधन को समर्थन देने के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि राज्य में जनहितैषी सरकार बेहतर ढंग से काम कर रही है।

    मंच पर दिखी कांग्रेस की ताकत

    संविधान बचाओ रैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावे कांग्रेस संगठन महासचिव के.सी.वेणुगोपाल, छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव, कार्यक्रम संयोजक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू, पूर्व मंत्री सुबोधकांत सहाय, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर के अलावे कांग्रेस कोटे के हेमंत सरकार के मंत्री राधाकृष्ण किशोर, दीपिका पांडे सिंह, डॉ इरफान अंसारी, शिल्पी नेहा तिर्की आदि मौजूद थे

    इस दौरान कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ के बीच कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का जमकर स्वागत किया गया. रैली में भारी संख्या में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने पार्टी के उत्साह को और मजबूती दी।

  • बिना नेता प्रतिपक्ष के पारित होगा झारखंड विधान सभा का बजट !

    भाजपा में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की खोज जारी, पर कब खत्म होगा इंतजार?

    परवेज़ आलम

    झारखंड में विधानसभा चुनाव को बीते तीन महीने हो चुके हैं, लेकिन क्या मजाल कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अब तक नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर कोई फैसला ले पाई हो! बजट सत्र की गूंज विधानसभा में गूंजने लगी है, लेकिन मुख्य विपक्षी दल के नेता का नाम अब तक सस्पेंस बना हुआ है। सवाल यह उठता है कि जब सत्ता पक्ष अपनी जिम्मेदारियों में जुटा हुआ है, तो विपक्ष का यह ढुलमुल रवैया किस ओर इशारा करता है?

    बिना नेता प्रतिपक्ष के बजट ! यह कैसी राजनीति?

    3 मार्च को राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर विधानसभा में बजट पेश करने वाले हैं। लेकिन यह बजट इतिहास में इस बात के लिए भी दर्ज होगा कि जब इसे विधानसभा में पेश किया जाएगा, तो वहां विपक्ष का कोई मुखिया मौजूद नहीं होगा! यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गंभीर चूक मानी जा रही है। यह महज संयोग नहीं, बल्कि भाजपा के आंतरिक असंतुलन का संकेत भी देता है।

    विधानसभा अध्यक्ष की नाराजगी, लेकिन भाजपा बेफिक्र!

    झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो ने इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जता दी है। उनका साफ कहना है कि विपक्ष में नेता का होना अनिवार्य है, ताकि सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चल सके। लेकिन क्या भाजपा इस बात को गंभीरता से ले रही है? या फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए झारखंड की राजनीतिक तस्वीर फिलहाल किसी प्राथमिकता में नहीं है?

    दिल्ली में अटकी फाइल, इंतजार में रांची!

    नेता प्रतिपक्ष का चयन आखिर क्यों नहीं हो पा रहा? सूत्रों की मानें तो भाजपा की केंद्रीय कमेटी अब तक इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है। पार्टी के कई बड़े नेता झारखंड आ चुके हैं, लेकिन हर बार सिर्फ कयास और अटकलों का दौर चलता है, नतीजा कुछ नहीं निकलता।

    कौन होगा अगला नेता प्रतिपक्ष? संभावित नामों की सूची लंबी!

    अगर झारखंड की राजनीति के गलियारों में सुगबुगाहट सुनी जाए, तो भाजपा के भीतर कई नामों की चर्चा है।

    1. बाबू लाल मराण्डी :पूर्व मुख्य मंत्री व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष,विधायी कार्यों का लंबा अनुभव
    2. सीपी सिंह: रांची विधायक, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कद्दावर नेता।
    3. नीरा यादव: कोडरमा विधायक, महिला चेहरा।
    4. नवीन जायसवाल: हटिया विधायक, ओबीसी समाज से आते हैं और भाजपा की सामाजिक संतुलन नीति के तहत इनका नाम भी चर्चा में है।

    लेकिन असल सवाल यह है कि चर्चा कब खत्म होगी और भाजपा अपने नेता के नाम पर अंतिम मुहर कब लगाएगी?

    प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी खाली, कब मिलेगा नया अध्यक्ष?

    झारखंड भाजपा सिर्फ नेता प्रतिपक्ष की ही नहीं, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष की भी तलाश में है। रघुवर दास के ओड़ीसा के राज्यपाल से इस्तीफे के बाद से ही यह कयास लगाया जा रहा था कि इन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद कि जिम्मेवारी मिल सकती है पर आलाकमान कोई निर्णय लेने कि स्थिति मे फिलवक्त नहीं दिखती । पार्टी संगठन के स्तर पर सांगठनिक चुनाव अभी जारी है और जिला स्तर पर इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही प्रदेश अध्यक्ष का नाम सामने आएगा। लेकिन तब तक कार्यकर्ताओं को सिर्फ इंतजार ही करना होगा।

    क्या भाजपा की रणनीति झारखंड में कमजोर पड़ रही है?

    झारखंड में भाजपा को एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने की जरूरत है, लेकिन पार्टी का यह ढुलमुल रवैया न केवल कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस पैदा कर रहा है, बल्कि इसका राजनीतिक नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। अगर भाजपा जल्द ही नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा नहीं करती, तो यह उसकी साख पर सवाल खड़े करने वाला साबित हो सकता है।

    आखिर कब खत्म होगा यह इंतजार?

    झारखंड में भाजपा का राजनीतिक अस्थिरता का यह दौर कब खत्म होगा? भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व कब नींद से जागेगा? और क्या झारखंड में विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए भाजपा सच में गंभीर है? ये तमाम सवाल भाजपा के लिए जितने महत्वपूर्ण हैं, उतने ही झारखंड की जनता के लिए भी। क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सत्ता के साथ एक मजबूत विपक्ष भी जरूरी होता है।

  • अजमेर शरीफ: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर पीएम मोदी चढ़ाएंगे चादर

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट …………..

    एक बार फिर अजमेर शरीफ से जुड़ी खबर सुर्खियों मे है । इस बार खबर के केंद्र मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है । मोदी जी इस बार भी ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाएंगे। ये उनकी 11वीं चादर होगी।

    पीएम मोदी की चादर और संदेश

    हर साल की तरह पीएम मोदी ने इस बार भी अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू और बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी को चादर सौंप दी है। शाम 6 बजे की औपचारिकता के बाद यह चादर अजमेर शरीफ भेजी जाएगी। मोदी जी ने एक्स पर तस्वीरें पोस्ट कीं और लिखा:
    मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर पवित्र चादर पेश की। यह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स के दौरान प्रतिष्ठित अजमेर शरीफ दरगाह पर रखी जाएगी।”

    यह परंपरा मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू हुई और अब तक जारी है।

    उर्स के रंग: बॉलीवुड से लेकर राजनीति तक। 

    दरगाह में चादर पेश करने वालों की लंबी फेहरिस्त है। इस बार केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के संरक्षक इंद्रेश कुमार के साथ बॉलीवुड के कुछ सितारे भी अपनी चादरें लेकर पहुंचे। हर कोई देश में शांति और भाईचारे की दुआ मांग रहा है।

    विरोध की सियासत। 

    अब कहानी में ट्विस्ट लाने का काम किया हिंदू सेना ने। संगठन के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दावा किया कि दरगाह दरअसल एक प्राचीन संकट मोचन महादेव मंदिर है। उन्होंने पीएमओ को खत लिखकर अपील की है कि जब तक मामला अदालत में लंबित है, तब तक पीएम की ओर से चादर चढ़ाने का कार्यक्रम रोक दिया जाए।

    दरगाह या मंदिर: क्या कहती है अदालत?

    गुप्ता जी का दावा है कि चौहान वंश ने इस मंदिर का निर्माण कराया था और उन्होंने कोर्ट में इसके वैज्ञानिक सर्वे की मांग की है। 24 जनवरी को इस मामले की सुनवाई होनी है।

    राजनीति का नया अध्याय?

    एक तरफ पीएम मोदी का चादर भेजना अल्पसंख्यक समुदाय के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ हिंदू सेना इसे धर्म और इतिहास का मामला बता रही है।

    आखिर क्या है अजमेर शरीफ की खासियत?

    ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। पीएम की चादर एक संदेश है कि आस्था और भाईचारा राजनीति से ऊपर है।

    अब देखना ये है कि 4 जनवरी को जब किरेन रिजिजू चादर लेकर दरगाह पहुंचेंगे, तब यह मामला सुलह का रास्ता अपनाता है या और बड़ा विवाद बनता है।

     

     

  • शांति वन में मनमोहन सिंह का होगा अंतिम संस्कार

    नई दिल्ली: शनिवार की सुबह शांति वन में जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंतिम विदाई दी जाएगी, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक युग का अंत होगा। वह युग, जिसने भारत को आर्थिक उदारीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ाया। सुबह 8 बजे उनके पार्थिव शरीर को उनके सरकारी आवास से कांग्रेस मुख्यालय लाया जाएगा। यहाँ पार्टी के नेता और उनके चाहने वाले उन्हें अंतिम विदाई देंगे। यह अंतिम यात्रा महज एक रस्म नहीं है। यह वह पल है जब कांग्रेस पार्टी के इतिहास को दोबारा लिखा जा रहा है।

    गांधी परिवार से परे मनमोहन सिंह की स्मृति पर जोर. 
    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर यमुना किनारे एक स्थायी स्मारक के लिए जगह मांगी। यह स्मारक उस शख्स के लिए होगा जिसने भारत की आवाज को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दी।

    प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल की रक्षामंत्री राजनाथ सिंह से बातचीत, खरगे की चिट्ठी और सोनिया-राहुल गांधी का हर पल मनमोहन सिंह के परिवार के साथ खड़ा रहना—ये सब एक बात को स्पष्ट करते हैं: कांग्रेस इस बार कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती।

    शांति वन: जहां इतिहास खुद को दोहराता है. 
    करना अपने आप में प्रतीकात्मक है। यह वही जगह है, जहां देश के अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों को अंतिम विदाई दी गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस स्मारक की राजनीति मनमोहन सिंह की यादों के साथ न्याय कर पाएगी?

    एक पत्र, एक स्मृति, और ओबामा का कथन. 
    खरगे के पत्र में एक खास बात थी: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का वह बयान, जिसमें उन्होंने कहा था, “जब भारत के प्रधानमंत्री बोलते हैं, तो पूरी दुनिया सुनती है।” यह वाक्य न सिर्फ मनमोहन सिंह की गरिमा को दर्शाता है, बल्कि यह भी कि एक साधारण परिवार से आए व्यक्ति ने वैश्विक स्तर पर भारत का कद कैसे बढ़ाया।

    गांधी परिवार की छाया से बाहर निकलने की कोशिश?
    नरसिम्हा राव के समय हुई चूक को लेकर आलोचनाएं कांग्रेस को अब भी घेरती हैं। ऐसे में मनमोहन सिंह के मामले में पार्टी इस बार सतर्क दिख रही है। उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय लाना और सम्मानपूर्वक अंतिम यात्रा निकालना, इन सबके पीछे एक राजनीतिक संदेश भी है। शनिवार को जब शांति वन में मनमोहन सिंह को अंतिम विदाई दी जाएगी, तब यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं होगी। यह वह पल होगा जब कांग्रेस पार्टी अपनी संवेदनशीलता और राजनीतिक सोच का प्रदर्शन करेगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह स्मारक और यह यात्रा इतिहास में कैसे दर्ज होती है।

  • मनमोहन सिंह: सादगी का महानायक, भारतीय राजनीति की सबसे शांत आवाज़ का मौन होना

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट …………

    डॉ. मनमोहन सिंह – एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति को न सिर्फ नई दिशा दी बल्कि अपने व्यक्तित्व से राजनीति की परिभाषा भी बदली। गुरुवार, 26 दिसंबर 2024, देश के लिए एक ऐसा दिन जब उसने अपनी सबसे शांत और विनम्र आवाज़ को खो दिया। एम्स दिल्ली में 92 साल की उम्र में इस पूर्व प्रधानमंत्री का निधन हुआ, और उनके साथ खत्म हुआ एक युग। गुरशरण कौर और अपनी तीन बेटियों के साथ सादगी से भरा उनका जीवन सिर्फ उनकी पारिवारिक सीमाओं तक नहीं था। डॉ. मनमोहन सिंह का हर कदम, हर निर्णय, सादगी और गहराई से परिभाषित था।

    वो सफर अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत से दिल्ली तक।
    26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत  में जन्मे मनमोहन सिंह ने बंटवारे के बाद भारत को अपना घर बनाया। उनकी शिक्षा की कहानी भारत की हर महत्वाकांक्षी आत्मा के लिए प्रेरणा है। पंजाब विश्वविद्यालय से शुरुआत, फिर कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड – शिक्षा के हर पड़ाव ने उनके विचारों को और निखारा।

    आर्थिक सुधारों का महानायक। 
    1991 का वो दौर जब भारत आर्थिक संकट से जूझ रहा था। वित्त मंत्री के रूप में डॉ. सिंह ने जो फैसले लिए, उन्होंने भारत को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया। उदारीकरण के जरिए उन्होंने देश के लिए वैश्विक अवसरों के दरवाजे खोले।

    प्रधानमंत्री: सत्ता से परे एक दृष्टिकोण। 
    2004 से 2014 तक के दो कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने देश को सामाजिक योजनाओं और आर्थिक सुधारों के जरिए मजबूत करने का प्रयास किया। वो शायद पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जो सत्ता में रहते हुए भी “सत्ता” से दूर थे।

    एक आदर्श जिसने राजनीति को मानवीय बनाया। 
    मनमोहन सिंह कभी भी उग्र भाषणों के लिए नहीं जाने गए। लेकिन उनकी चुप्पी अक्सर विरोधियों के शोर से भारी पड़ी। उनका हर निर्णय गहराई और देश की भलाई को प्राथमिकता देता था।

    आज जब पूरा देश शोक में है, तब ये याद रखना जरूरी है कि उनका जीवन सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि एक आदर्श का था। सादगी, ईमानदारी, और निष्ठा का जो संदेश उन्होंने छोड़ा है, वो हमेशा भारतीय राजनीति को राह दिखाता रहेगा।

  • रघुवर दास की नई पारी: लौटेंगे सक्रिय राजनीति में

    झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास, अब सक्रिय राजनीति में नई भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। गुरुवार को दोपहर 3 बजे वे विशेष विमान से रांची पहुंचेंगे।  राज्यपाल पद से इस्तीफा देने के बाद वे पहली बार झारखंड आ रहे हैं ।

    शुक्रवार को रघुवर दास भारतीय जनता पार्टी  की सदस्यता ले सकते हैं। इसके बाद वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मिलने  दिल्ली रवाना होंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें संगठन में एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकता है।

    18 अक्टूबर 2023 को बने थे ओडिशा के राज्यपाल। 
    रघुवर दास ने 18 अक्टूबर 2023 को ओडिशा के राज्यपाल का पदभार संभाला था। मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मिजोरम के राज्यपाल हरि बाबू कंभमपति को ओडिशा का नया राज्यपाल नियुक्त किया और रघुवर दास का इस्तीफा स्वीकार कर लिया।

    “भविष्य की भूमिका पार्टी तय करेगी”
    बुधवार को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद रघुवर दास ने कहा, “मैंने भाजपा में बूथ अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक की यात्रा तय की है। पार्टी भविष्य में मेरी भूमिका पर फैसला करेगी। ओडिशा में मेरा अनुभव यादगार रहा। यहां के लोगों का जुनून मुझे हमेशा याद रहेगा।”

    44 वर्षों में दूसरी बार लेंगे सदस्यता।
    1980 में भाजपा की सदस्यता लेकर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले रघुवर दास 44 वर्षों में दूसरी बार पार्टी की सदस्यता लेने जा रहे हैं। उन्होंने कभी पार्टी से अलग राह नहीं पकड़ी। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे पदों पर अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद राज्यपाल बनने के दौरान 14 महीने तक राजनीति से दूर रहे।

    ओडिशा के लिए डबल इंजन सरकार की तारीफ।
    रघुवर दास ने ओडिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली डबल इंजन सरकार की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह सरकार गरीबों के विकास के लिए काम कर रही है और 2036 में ओडिशा के 100वें स्थापना वर्ष तक इसे विकसित राज्य के रूप में देखने की उम्मीद है।

    झारखंड और देश की राजनीति में रघुवर दास की यह वापसी कितनी असरदार होगी, यह समय ही बताएगा।

  • वन नेशन-वन इलेक्शन बिल पर सियासी ड्रामा: अनुपस्थित सांसदों पर भाजपा की सख्ती

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट……

    आज चर्चा में है ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ बिल। सवाल वही पुराना—ये बिल क्या है, क्यों है, और आखिर इसे पास कराने की इतनी हड़बड़ी क्यों?”

    लोकसभा में मंगलवार को जब इस बहुचर्चित बिल पर वोटिंग होनी थी, तब भाजपा के कई सांसद नदारद थे। पार्टी ने तीन लाइन का ‘व्हिप’ जारी किया था, लेकिन फिर भी 20 से ज्यादा सांसद सदन में नहीं पहुंचे। अब इनकी गैरमौजूदगी पर भाजपा ने ‘नोटिस’ जारी करने का फैसला लिया है। पर ये सवाल क्यों नहीं उठता कि जिस पार्टी ने ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया, उसके अपने सिपाही इस ‘युद्ध’ से क्यों गायब हो गए?”

    “बिल के पक्ष में पड़े 269 वोट, विपक्ष में 198 वोट। यानी गणित बता रहा है कि सियासत में ‘पक्ष और विपक्ष’ दोनों की गिनती से लोकतंत्र की असली नब्ज टटोली जा रही है। लेकिन जब सत्ताधारी दल की ताकत ‘व्हिप’ के बावजूद पूरी नहीं दिखी, तो क्या ये संकेत है ‘अंदरूनी असहमति’ का?”

    “दो तिहाई बहुमत की बात करें तो 362 सांसद चाहिए। लोकसभा में NDA के पास 292 सीटें हैं और राज्यसभा में सिर्फ 112। संविधान बदलने के लिए जरूरी ‘मैजिक नंबर’ अभी दूर है। इसलिए जेपीसी का रास्ता अख्तियार किया गया। सरकार कहती है ‘विचार-विमर्श’ होगा, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ से लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर?”

    “क्योंकि देखिए, चुनाव सिर्फ मतदान नहीं, जनता का त्योहार है। सवाल ये है कि ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ से ‘चुनाव की आत्मा’ खत्म तो नहीं हो जाएगी? क्या जनता का ‘शोर’ कम करने की कवायद चल रही है? और भाजपा के सांसदों की गैरमौजूदगी क्या सिर्फ इत्तेफाक है या इशारा? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब सरकार के पास भले ही न हो, लेकिन वक्त जरूर मांगेगा।”

     

  • वन नेशन, वन इलेक्शन: क्या भारत में बदलने जा रहा है चुनावी इतिहास ?

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ………

    केंद्र की मोदी सरकार कल यानि मंगलवार को  लोकसभा में वन नेशन, वन इलेक्शन बिल पेश कर सकती है। इसको लेकर बीजेपी ने अपने सांसदों के लिए तीन-लाइन का व्हिप जारी कर दिया है। यह व्हिप कल यानी मंगलवार के लिए जारी हुआ है, और इसका सीधा मतलब है कि बिल को लेकर सरकार पूरी तैयारी में है।

    जेपीसी गठन की चर्चा। 
    बिल पेश होने के बाद इसे संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने की संभावना जताई जा रही है। यही नहीं, कल ही इस समिति का गठन भी हो सकता है, जिसमें बीजेपी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सदस्य शामिल होंगे।

    सरकार का पक्ष। 
    सरकार का कहना है कि एनडीए के सभी घटक दल वन नेशन, वन इलेक्शन के पक्ष में हैं। विपक्ष इसे लेकर विरोध कर रहा है, लेकिन सरकार इसे “राजनीतिक विरोध” मान रही है, न कि तार्किक।

    क्या है वन नेशन, वन इलेक्शन?
    अब बात करते हैं इस बिल की मूल भावना की।
    वन नेशन, वन इलेक्शन का मतलब है कि लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव एक साथ कराए जाएं। यह विचार नया नहीं है। 1952 से लेकर 1967 तक भारत में सभी चुनाव एक साथ हुए थे।

    लेकिन, 1967 के बाद राज्यों में सरकारें गिरने और मध्यावधि चुनाव होने की वजह से यह व्यवस्था टूट गई। अब हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में चुनाव होते रहते हैं, जिससे न केवल समय और पैसा बर्बाद होता है, बल्कि विकास कार्यों पर भी असर पड़ता है।

    सरकार के तर्क:

    लागत में कमी: अलग-अलग चुनाव कराने में सरकारी खजाने से बड़ी राशि खर्च होती है।
    प्रशासनिक दक्षता: एक साथ चुनाव से प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव कम होगा।
    विकास में गति: बार-बार आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य रुकते हैं।

    विपक्ष का तर्क:

    संविधान की भावना पर सवाल: विपक्ष का कहना है कि संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकार अलग-अलग चुनाव कराने की स्वतंत्रता में निहित हैं।
    व्यावहारिकता की चुनौती: इतने बड़े देश में एक साथ चुनाव कराना कितना व्यवहारिक है, यह बड़ा सवाल है।
    कल क्यों अहम है?
    सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने सभी सांसदों को बिल की कॉपी पहले ही वितरित कर दी थी। हालांकि, शुक्रवार को इसे लोकसभा के एजेंडा से हटा दिया गया था। लेकिन अब, तीन-लाइन का व्हिप जारी होने के बाद, यह तय माना जा रहा है कि बिल कल पेश होगा।

    बड़ा सवाल:

    क्या यह बिल पास हो पाएगा?
    क्या भारत चुनावी बदलाव के इस ऐतिहासिक पल को देखेगा?
    क्या विपक्ष इसे सिर्फ “राजनीतिक विरोध” के तौर पर देख रहा है, या वाकई इसमें संविधानिक और व्यावहारिक चुनौतियां हैं?
    आपकी इस पर क्या राय है?
    क्या वन नेशन, वन इलेक्शन वाकई लोकतंत्र को मजबूत करेगा या यह सिर्फ एक राजनीतिक कदम है? अपनी राय The News Post4u पर जरूर दे ।