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  • हेमंत सरकार का बड़ा ऐक्शन: प्रशासनिक उलटफेर से सियासी संदेश

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट……..

    राजनीति में वापसी के साथ ही हेमंत सोरेन ने एक बार फिर अपने इरादे साफ कर दिए हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उनके फैसलों ने यह दिखा दिया कि यह केवल शपथ ग्रहण नहीं, बल्कि सत्ता पर उनकी मजबूत पकड़ का ऐलान है।

    मंजूनाथ भजंत्री, जिन्हें विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के निर्देश पर रांची डीसी के पद से हटाया गया था, अब फिर से रांची के उपायुक्त बनाए गए हैं। यह फैसला न केवल प्रशासनिक महत्व रखता है, बल्कि इसके पीछे छिपे सियासी संदेश को समझना भी जरूरी है।

    भजंत्री की वापसी: एक रणनीतिक चाल
    भजंत्री, जिनकी पहचान एक सख्त और परिणामोन्मुख अधिकारी के रूप में होती है, को वापस लाने का मतलब है कि सोरेन सरकार पुराने भरोसेमंद सिपाहियों के सहारे नई पारी खेलना चाहती है। इस बदलाव के साथ ही वरुण रंजन को रांची डीसी से हटाकर जुडको का डायरेक्टर बनाया गया है।

    डीजीपी का अतिरिक्त प्रभार: अनुराग गुप्ता को फिर मिली जिम्मेदारी
    अनुराग गुप्ता, जो एसीबी के डीजी के रूप में अपनी काबिलियत साबित कर चुके हैं, को झारखंड डीजीपी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। मौजूदा डीजीपी अजय कुमार को पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन का एमडी बनाकर एक अलग जिम्मेदारी दी गई है। यह बदलाव दिखाता है कि हेमंत सरकार हर मोर्चे पर नई ऊर्जा और नए नेतृत्व को तरजीह दे रही है।

    वरुण रंजन को दिया नया रोल
    वरुण रंजन, जिनकी प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर पहले भी चर्चाएं रही हैं, अब झारखंड औद्योगिक आधारभूत संरचना विकास निगम (JIIDCO) के एमडी बनाए गए हैं। उनके इस नई भूमिका में जाने का मतलब है कि सरकार विकास योजनाओं को प्राथमिकता देना चाहती है।

    शपथ के बाद ऐक्शन में सरकार
    हेमंत सोरेन की सरकार के गठन के बाद यह बड़े फैसले केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं हैं। ये उस बड़े खेल की शुरुआत हैं, जो विधानसभा चुनाव 2024 के पहले से ही तय दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।

    मंजूनाथ की ताजपोशी और चुनावी संदेश
    सवाल यह है कि मंजूनाथ भजंत्री को दोबारा रांची का डीसी बनाकर क्या हेमंत सोरेन ने विरोधियों को यह संदेश दिया है कि वह अपने लोगों पर भरोसा करते हैं और किसी भी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं?

    इस सियासी और प्रशासनिक दांव का असर झारखंड केप्रशासनिक संतुलन पर क्या पड़ेगा, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन फिलहाल, हेमंत सोरेन सरकार ने यह साफ कर दिया है कि उनके फैसले तेज हैं, रणनीति सटीक है, और इरादे मजबूत।

  • झारखंड में नक्सली आतंक का अंत: छोटू खरवार की हत्या से वर्चस्व की जंग का पर्दाफाश !

    RANCHI: छोटू खरवार की मौत झारखंड के लिए एक नए युग की शुरुआत है। यह सिर्फ एक नक्सली कमांडर का खात्मा नहीं, बल्कि वर्चस्व की राजनीति में छिड़ी अंदरूनी जंग का खुलासा है। झारखंड पुलिस और सुरक्षा बलों ने जहां इसे बड़ी जीत माना है, वहीं नक्सली संगठनों के लिए यह चेतावनी है कि आतंक और अपराध का अंत तय है। लातेहार की धरती एक बार फिर खून से लाल हो गई, लेकिन इस बार कहानी उलट है। 15 लाख के इनामी नक्सली कमांडर छोटू खरवार, जो कभी दहशत का दूसरा नाम था, मंगलवार रात वर्चस्व की जंग में मारा गया। पुलिस ने उसके शव को बरामद कर लिया है। छोटू खरवार, जिसे नक्सली संगठनों में “सुजीत जी” के नाम से भी जाना जाता था, झारखंड के लातेहार, पलामू, गढ़वा, और गुमला जैसे जिलों में 100 से ज्यादा संगीन मामलों में वांछित था।

    कौन था छोटू खरवार?

    छोटू, भाकपा (माओवादी) संगठन की रीजनल कमेटी का सदस्य था और आतंक, रंगदारी और हिंसा का एक ऐसा अध्याय था, जिसे झारखंड कभी भूल नहीं सकता। पुलिस और एनआईए ने उसके सिर पर इनाम रखा था—15 लाख झारखंड पुलिस की ओर से और 3 लाख एनआईए की ओर से।

    2018 में एनआईए ने छोटू के खिलाफ मामला टेकओवर किया था। उसकी पत्नी ललिता देवी तक को पुलिस ने 2019 में गिरफ्तार किया था, जब छोटू के पैसे को निवेश कराने के दस्तावेज मिले। छोटू ने सहारा इंडिया के जरिए लाखों का लेनदेन किया था, जिससे पुलिस को उसके आर्थिक नेटवर्क का अंदाजा हुआ।

    कैसे मारा गया छोटू?

    मंगलवार रात, लातेहार के नावाडीह इलाके में नक्सलियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में छोटू मारा गया। झारखंड पुलिस ने उसके शव को बरामद कर लिया है। ऑपरेशन ऑक्टोपस के दौरान बूढ़ापहाड़ से भाग निकले नक्सलियों में छोटू भी शामिल था। इसके बाद वह कोयल-शंख जोन में संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन ये कोशिशें अब खत्म हो गई हैं।

    आतंक से तस्करी तक: छोटू की कहानी

    छोटू ने हत्या, विस्फोट, आगजनी, पुलिस पर हमले जैसे अनगिनत अपराध किए। उसने हाल ही में लातेहार के छिपादोहर इलाके में एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी की हत्या की थी। 2016 में, पुलिस ने उसकी संपत्तियों और लेवी वसूली के सबूत जुटाए थे।

     

    2016: लातेहार में सहारा इंडिया के मैनेजर से 3 लाख की बरामदगी।
    2018: एनआईए ने छोटू के खिलाफ केस संभाला।
    2019: पत्नी की गिरफ्तारी, आर्थिक नेटवर्क का खुलासा।
    2023: ऑपरेशन ऑक्टोपस के बाद से भूमिगत।
    2024: वर्चस्व की लड़ाई में मौत।

    झारखंड के जंगलों में अब नक्सली ताकत की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। छोटू का खात्मा यही संदेश देता है—बंदूक का अंत हमेशा खून से लिखा जाता है।