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  • गिरिडीह के युवा नेता की राहुल गांधी से खास मुलाकात

    द न्यूज़ पोस्ट4यू डेस्क.
    GIRIDIH : नई दिल्ली में गुरुवार को  NSUI के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर Ayush Sinha ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व लोक सभा मे विपक्ष के नेता  Rahul Gandhi से खास मुलाकात की। यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि झारखंड के भविष्य को लेकर एक गंभीर और सार्थक संवाद साबित हुई।

    सूत्रों के मुताबिक, आयुष सिन्हा ने झारखंड से जुड़े कई अहम मुद्दों—जैसे शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियाँ, युवाओं के रोजगार के अवसर और संगठन को मजबूत करने की रणनीतियाँ—को विस्तार से राहुल गांधी के सामने रखा।

    राहुल गांधी ने इन सभी मुद्दों को गंभीरता से सुना और भरोसा दिलाया कि झारखंड के विकास और युवाओं के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने कहा कि राज्य के युवाओं की आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती से उठाया जाएगा।

    इस मुलाकात का एक दिलचस्प और मानवीय पहलू भी सामने आया, जब आयुष सिन्हा ने राहुल गांधी को अपने विवाह समारोह में शामिल होने का न्योता दिया। राहुल गांधी ने इस निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार करते हुए उन्हें शुभकामनाएँ दीं।
    कुल मिलाकर, यह मुलाकात न सिर्फ संगठनात्मक दृष्टि से अहम मानी जा रही है, बल्कि झारखंड के युवाओं की आवाज़ को देश की राजनीति के केंद्र तक पहुँचाने की दिशा में एक मजबूत कदम भी साबित हो रही है।

  • ………..और मुकाबला डिप्टी मेयर की कुर्सी का, नया राजनीतिक “मैच” शुरू

    परवेज़ आलम.

    द न्यूज़ पोस्ट4यू

    झारखंड की सियासत में मेयर चुनाव के बाद अब एक नया राजनीतिक “मैच” शुरू हो चुका है—और यह मुकाबला है डिप्टी मेयर की कुर्सी का। नौ नगर निगमों में पार्षदों की गिनती, बैठकों का दौर, सम्मान समारोह और डिनर डिप्लोमेसी… सब कुछ तेज हो गया है। आइए समझते हैं कि इस वक्त झारखंड के नगर निगमों में किसकी दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है और कहां किस तरह की राजनीतिक हलचल है।

    मेयर के बाद अब डिप्टी मेयर की जंग

    मेयर चुनाव खत्म होते ही अब राजनीतिक दलों की नजर डिप्टी मेयर के पद पर टिक गई है। भाजपा, कांग्रेस और झामुमो—तीनों दल अपने-अपने समर्थित पार्षदों को एकजुट करने में जुट गए हैं। नगर निगमों में इस पद के लिए लॉबिंग और लामबंदी तेज हो गई है। पार्षदों के सम्मान समारोह हो रहे हैं, बैठकों का दौर चल रहा है और कई जगहों पर “डिनर डिप्लोमेसी” भी देखने को मिल रही है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कहीं हॉर्स ट्रेडिंग न हो जाए। ऐसे में दल अपने पार्षदों पर नजर बनाए हुए हैं ताकि आखिरी वक्त में क्रॉस वोटिंग की स्थिति न बने।

    रांची में डिनर डिप्लोमेसी और शक्ति प्रदर्शन.

    राजधानी रांची में डिप्टी मेयर की रेस काफी दिलचस्प हो गई है।

    • भाजपा ने पार्षदों का सम्मान समारोह आयोजित कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।
    • इस बैठक में 53 में से 42 पार्षदों की मौजूदगी बताई जा रही है।

    वहीं दूसरी ओर कांग्रेस भी पीछे नहीं है।

    • कांग्रेस नेताओं ने एक बड़े होटल में पार्षदों के साथ डिनर मीटिंग की।
    • इस बैठक में 37 पार्षदों के शामिल होने का दावा किया गया है।

    कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पार्षदों ने डिप्टी मेयर के नाम तय करने का अधिकार पार्टी को दे दिया है।

    गिरिडीह में झामुमो की मजबूत स्थिति

    गिरिडीह नगर निगम में समीकरण कुछ अलग दिख रहे हैं। यहां मेयर पद पर झामुमो समर्थित उम्मीदवार की जीत के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि डिप्टी मेयर भी झामुमो समर्थित पार्षद ही बनेंगे। बताया जा रहा है कि भाजपा के पास यहां 10 से भी कम पार्षदों का समर्थन है, जबकि झामुमो समर्थित पार्षदों की संख्या ज्यादा बताई जा रही है। लालों राइन व सुमित कुमार दोनों jmm से हैं के बीच ही रश काशी चल रही है ।

    हजारीबाग और मेदिनीनगर में ये नाम आगे।

    राज्य के अन्य नगर निगमों में भी डिप्टी मेयर को लेकर तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो रही है।

    • मेदिनीनगर: कांग्रेस समर्थित मनोज सिंह मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।
    • हजारीबाग: यहां मिताली रश्मि का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है

    धनबाद, देवघर और आदित्यपुर में कांटे की टक्कर।

    कुछ नगर निगमों में मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।

    • धनबाद: यहां अरुण चौहान और सुमन सिंह के बीच सीधी टक्कर बताई जा रही है। अरुण चौहान को झामुमो का समर्थन मिलने की चर्चा है।
    • देवघर: पहली बार की पार्षद टीप चटर्जी डिप्टी मेयर पद के लिए मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं।
    • चास: यहां पांच से छह पार्षदों के बीच मुकाबला बताया जा रहा है।
    • आदित्यपुर और मानगो: इन दोनों नगर निगमों में भाजपा और कांग्रेस समर्थित पार्षदों के बीच सीधी टक्कर के संकेत मिल रहे हैं।

    कब होगा शपथ ग्रहण और डिप्टी मेयर का चुनाव.

    अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि डिप्टी मेयर का चुनाव कब होगा। अलग-अलग नगर निगमों में शपथ ग्रहण और चयन की तारीखें तय कर दी गई हैं।

    • देवघर नगर निगम – 13 मार्च
    • हजारीबाग नगर निगम – 13 मार्च
    • मेदिनीनगर नगर निगम – 14 मार्च
    • गिरिडीह नगर निगम – 16 मार्च
    • आदित्यपुर नगर निगम – 16 मार्च
    • मानगो नगर निगम – 17 मार्च
    • चास नगर निगम – 17 मार्च
    • धनबाद नगर निगम – 18 मार्च
    • रांची नगर निगम – 19 मार्च

    अंतिम तस्वीर अभी बाकी.

    कुल मिलाकर झारखंड के नौ नगर निगमों में डिप्टी मेयर की कुर्सी को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है। पार्षदों की संख्या, दलों की रणनीति और आखिरी वक्त की राजनीतिक चालें—इन सबके बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिर किसके सिर सजता है डिप्टी मेयर का ताज। आने वाले कुछ दिन झारखंड की नगर राजनीति के लिए बेहद अहम साबित होने वाले हैं।

  • नगर निगम चुनाव की उल्टी गिनती शुरू,शहर की सियासत चरम पर

    परवेज़ आलम.

     The News Post4U.

    गिरिडीह नगर निगम चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। अब बस कुछ ही घंटे बचे हैं… और शहर की सियासत अपने चरम पर है। आपके शहर की सरकार कौन चलाएगा ? किसके हाथ होगी मेयर की कुर्सी? और कौन जीतेगा इस बार की “हॉट सीट”?

    चहुकोनिया मुकाबला… लेकिन असली टक्कर दो के बीच !

    कागज़ पर मुकाबला चार कोनों का दिख रहा है… लेकिन ज़मीन पर असली लड़ाई सिमटती दिख रही है दो चेहरों के बीच— भाजपा समर्थित उम्मीदवार डॉ शैलेन्द्र चौधरीऔर जेएमएम समर्थित प्रत्याशी प्रमिला मेहरा। लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है…

    भाजपा के दो बागी चेहरे—नागेश्वर दास और प्रकाश दास—अब जेएमएम के पाले में जा चुके हैं। और भाजपा के ही बागी कामेश्वर पासवान… पार्टी के लिए गले की हड्डी बने हुए हैं। यानी…
    मुकाबला सिर्फ विरोधियों से नहीं, अपनों से भी है!

     कुल 16 उम्मीदवार मैदान में.

    मेयर पद के लिए 16 उम्मीदवार मैदान में हैं। तीन बड़े राजनीतिक समर्थन साफ दिख रहे हैं—

    • प्रमिला मेहरा को झामुमो का समर्थन
    • डॉ शैलेन्द्र चौधरी को भाजपा का समर्थन
    • समीर राज चौधरी को कांग्रेस का समर्थन

    पिछले चुनाव में समीर राज चौधरी 20,595 वोट लाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। इस बार सवाल ये है—क्या वे उस वोट बैंक को फिर से समेट पाएंगे?

    बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर.

    यह चुनाव सिर्फ स्थानीय नहीं है… यह प्रतिष्ठा की लड़ाई भी है। झारखंड सरकार में मंत्री और नगर विकास विभाग संभाल रहे सुदीव्य कुमार सोनू—गिरिडीह उनके ही क्षेत्र में आता है। उनकी साख भी इस चुनाव से जुड़ी है।

    दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी— साथ ही भाजपा के कई दिग्गज नेता—यहां आकर मोर्चा संभाल चुके हैं। यह लड़ाई मेयर की कुर्सी से आगे बढ़कर राजनीतिक संदेश की लड़ाई बन चुकी है।

    आंकड़ों की बात करें तो…

    गिरिडीह नगर निगम क्षेत्र 36 वार्डों में बंटा है। कुल 137 बूथ हैं।
    कुल मतदाता—1 लाख 50 हजार 992. महिला मतदाता—75,725
    पुरुष मतदाता—75,266 और एक किन्नर मतदाता भी इस लोकतंत्र का हिस्सा है। अब सवाल—किसका गणित बैठेगा?

    गैर-दलीय चुनाव… लेकिन पूरी तरह दलीय रणनीति.

    कागज़ पर यह “गैर-दलीय” चुनाव है। लेकिन ज़मीन पर? पूरी तरह दलीय! राज्य के 48 शहरी निकायों में यही तस्वीर है। 23 फरवरी को मतदान होगा… और चार दिन बाद तस्वीर साफ हो जाएगी।

    सत्तारूढ़ गठबंधन के दो चेहरे—
    झारखंड मुक्ति मोर्चा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस— यहां आमने-सामने हैं और तीसरे कोने पर मजबूती से खड़ी है भारतीय जनता पार्टी। यानी सीधी त्रिकोणीय जंग.

    सवाल आपके लिए…

    क्या वोट विकास पर पड़ेगा? या जातीय समीकरण पर? क्या मुस्लिम वोट निर्णायक होंगे?
    क्या हिंदू वोट गोलबंद होंगे ? क्या बागी उम्मीदवार खेल बिगाड़ देंगे? और सबसे बड़ा सवाल—
    क्या यह चुनाव 2029 की बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों का ट्रेलर है?

    आख़िर में .

    सभी प्रत्याशी एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। जनसंपर्क, बैठकें, रणनीति, समीकरण… सब अपने चरम पर हैं । लेकिन अंत में फैसला आपके हाथ में है । 23 फरवरी को आप तय करेंगे—
    गिरिडीह की कमान किसे सौंपी जाए। चुनाव भले “गैर-दलीय” हो… लेकिन सियासत पूरी तरह “दलीय” हो चुकी है।

  • निकाय  चुनाव “गैर-दलीय” है… लेकिन सियासत पूरी तरह दलीय हो चुकी है।

    परवेज़ आलम.

    द न्यूज़ पोस्ट4यू .
    राज्य के 48 शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव इस बार सीधे मुकाबले से निकलकर त्रिकोणीय जंग में बदल गए हैं। 23 फरवरी को मतदान होगा और चार दिन बाद तस्वीर साफ हो जाएगी। पांच साल बाद हो रहे इन चुनावों की खास बात यह है कि ये कागज़ पर गैर-दलीय हैं, लेकिन ज़मीन पर राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं।

    सत्तारूढ़ इंडिया ब्लॉक के दो बड़े चेहरे—झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस—अब आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। संयुक्त उम्मीदवार पर सहमति नहीं बन पाई, और नतीजा यह कि दोनों दलों ने नौ नगर निगमों में महापौर पद के लिए अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही 20 नगर परिषदों और 19 नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद के लिए भी खुला समर्थन दिया गया है।

    गैर-दलीय चुनाव, पर दलीय रणनीति

    8 फरवरी को नाम वापसी की आखिरी तारीख बीतते ही तस्वीर साफ हो गई—गठबंधन की एकजुटता यहां नहीं दिखेगी। हालांकि, कांग्रेस और जेएमएम दोनों इसे “मतभेद” मानने से इनकार कर रहे हैं।
    कांग्रेस प्रवक्ता का कहना है—“यह विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं है। यहां मुद्दे मोहल्लों के हैं, नालियों और सड़कों के हैं, हर वार्ड की अपनी प्राथमिकताएं हैं।”
    जेएमएम प्रवक्ताभी यही तर्क देते हैं—“जब चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं हो रहा, तो स्थानीय चेहरा और उसकी स्वीकार्यता ज्यादा मायने रखती है।”

    लेकिन सवाल यह है कि अगर चुनाव पूरी तरह स्थानीय है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर दलों की सक्रियता क्यों?

    बीजेपी की शहरी पकड़

    राज्य के प्रमुख शहरी केंद्र—रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, देवघर, हजारीबाग, गिरिडीह और मेदिनीनगर—परंपरागत रूप से भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे हैं। एनडीए खेमे में भाजपा को अपने सहयोगियों एजेएसयू, जद(यू) और लोजपा (रामविलास) से खास चुनौती नहीं दिख रही।

    यानी मुकाबला असल में तीन कोनों वाला है—भाजपा, जेएमएम और कांग्रेस।

    जेएमएम की शहरी परीक्षा

    अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि यह दरअसल जेएमएम का “अर्बन एक्सपेरिमेंट” है। 81 सदस्यीय विधानसभा में जेएमएम की 34 सीटों में से करीब 90 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों से आती हैं। ग्रामीण इलाकों में मजबूत पकड़ के बावजूद बड़े शहरों में पार्टी अब तक सीमित रही है।

    छह साल से सत्ता में रहने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जेएमएम अब शहरों में भी अपनी जमीन तलाश रही है। यही वजह है कि पार्टी ने कई मजबूत स्थानीय चेहरों—यहां तक कि दूसरे दलों के बागी नेताओं—को भी समर्थन दिया है।

    गठबंधन पर असर?

    क्या यह नगर निकाय चुनाव भविष्य में इंडिया ब्लॉक की एकता को प्रभावित करेगा?
    फिलहाल दोनों दल इसे महज़ स्थानीय रणनीति बता रहे हैं। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर नतीजे चौंकाने वाले रहे, तो इसका असर 2029 की बड़ी लड़ाइयों तक महसूस किया जा सकता है।

    फिलहाल तस्वीर साफ है—
    चुनाव भले ही “गैर-दलीय” हो,
    लेकिन सियासत पूरी तरह “दलीय” है।

    23 फरवरी को मतदाता तय करेंगे कि शहरों की कमान किसके हाथ जाएगी—परिणाम सिर्फ मेयर और अध्यक्ष नहीं चुनेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि झारखंड की शहरी राजनीति किस करवट बैठ रही है।

     

  • नगर निकाय चुनाव में महागठबंधन में दरार ! JMM – CONGRESS आमाने सामने

    परवेज़ आलम.

    द न्यूज़ पोस्ट4यू डेस्क.

    गिरिडीह :  नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी के बीच एक बड़ी सियासी खबर सामने आ रही है।
    नाम वापसी शुक्रवार को होगी लेकिन उससे पहले ही महागठबंधन में दरार साफ़ दिखाई देने लगी है। मेयर चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस आमने-सामने खड़ी नजर आ रही हैं।

    दरअसल, दोनों ही दलों ने अपने-अपने समर्थित प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। जेएमएम ने जहां पार्टी की वरिष्ठ नेता प्रमिला मेहरा को मेयर पद के लिए समर्थन देने का ऐलान किया है, तो वहीं कांग्रेस ने अपने नेता डॉ. समीर राज चौधरी को मैदान में उतार दिया है।

    गुरुवार को अलग-अलग जगहों पर हुई प्रेस वार्ताओं में दोनों दलों के जिला अध्यक्षों ने अपने-अपने प्रत्याशियों के नाम का औपचारिक ऐलान किया।

    जेएमएम का दावा – विकास के लिए एकजुट हैं कार्यकर्ता

    गोयनका सेवा सदन में आयोजित प्रेस वार्ता में जेएमएम जिलाध्यक्ष संजय सिंह ने कहा कि प्रमिला मेहरा शुरू से ही आम लोगों की समस्याओं को गंभीरता से उठाती रही हैं। उनका कहना था कि प्रमिला मेहरा के नेतृत्व में
    शहर के विकास को एक नई दिशा मिलेगी और झारखंड मुक्ति मोर्चा पूरी ताकत के साथ उनके समर्थन में मैदान में उतरेगा। इस मौके पर पार्टी के कई वरिष्ठ और युवा कार्यकर्ता मौजूद रहे,
    जिनमें अजीत कुमार पप्पू, शाहनवाज अंसारी, सुमन सिन्हा, रॉकी सिंह, अभय सिंह, कृष्ण मुरारी शर्मा, चांद रशीद, टुन्ना सिंह, देवचरण दास, अजय सिंह, दिलीप रजक, सुमित सहित
    बड़ी संख्या में जेएमएम कार्यकर्ता शामिल थे।

    कांग्रेस का पलटवार – जनहित के मुद्दों को समझते हैं समीर

    वहीं दूसरी ओर, अलकापुरी में कांग्रेस ने भी शक्ति प्रदर्शन किया।
    मेयर प्रत्याशी सह कांग्रेस नेता डॉ. समीर राज चौधरी के समर्थन में प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। कांग्रेस जिला अध्यक्ष सतीश केडिया ने कहा कि डॉ. समीर राज चौधरी अनुभवी, शिक्षित और जनता के मुद्दों को गहराई से समझने वाले नेता हैं। उनका दावा है  कि डॉ. समीर के नेतृत्व में नगर निगम का समुचित विकास होगा और आम लोगों की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। इस मौके पर अजय सिन्हा मंटू, मदन लाल विश्वकर्मा, साबिर खान  समेत कई कांग्रेस कार्यकर्ता मौजूद रहे।

    बीजेपी ने पहले ही खोल दिया था पत्ता

    आपको बता दें कि इससे पहले भारतीय जनता पार्टी ने मेयर पद के लिए
    डॉ. शैलेंद्र चौधरी को अपना समर्थित प्रत्याशी घोषित किया था। हालांकि, बीजेपी की इस घोषणा के बावजूद पार्टी से जुड़े नेता कामेश्वर पासवान, प्रकाश कुमार दास और नागेश्वर दास
    ने भी नामांकन दाखिल कर दिया है, जिससे मुकाबला और दिलचस्प होता जा रहा है

    महागठबंधन में अंदरूनी चुनौती भी बनी सिरदर्द

    इतना ही नहीं, कांग्रेस और जेएमएम दोनों के लिए चुनौती अपने ही घर से खड़ी हो गई है।

    कांग्रेस के एक और नेता जोगेश्वर महथा पहले ही मेयर पद के लिए नामांकन दाखिल कर चुके हैं। वहीं जेएमएम से जुड़े पप्पू रजक भी मेयर की रेस में अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं।

    अब बड़ा सवाल यही है— क्या नाम वापसी से पहले महागठबंधन की यह दरार भरेगी?
    या फिर यह चुनावी लड़ाई महागठबंधन के लिए नई मुश्किलें खड़ी करने वाली है?

    नगर निगम चुनाव में अब मुकाबला पूरी तरह दिलचस्प हो चुका है— हर निगाह नाम वापसी की तारीख और आगे की सियासी चालों पर टिकी है।

  • झारखंड निकाय चुनाव की सुगबुगाहट तेज़, कांग्रेस और राजद चुनाव मे उतरने को बेताब  

    झामुमो को है सरकार की रणनीति का इंतजार.

    By The News post4u | परवेज़ आलम.

    झारखंड में नगर निकाय चुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही नहीं हुआ हो, पर सियासी दलों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) जैसे इंडिया गठबंधन के प्रमुख घटक दलों ने जहां चुनाव को लेकर रणनीति बनानी शुरू कर दी है, वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) फिलहाल सरकार की ओर से आधिकारिक रुख का इंतजार कर रहा है।

    48 नगर निकाय, चुनाव की तैयारी में जुटे दल.

    राज्य में 48 शहरी निकाय हैं, जिनमें नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत शामिल हैं। आने वाले महीनों में इन क्षेत्रों में नई नगर सरकारों के गठन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। ऐसे में राजनीतिक दल अपनी संगठनात्मक मजबूती और जनाधार को बढ़ाने की दिशा में जुट गए हैं।

    राजद: हर जिले में एक्टिव मोड में.

    राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष संजय सिंह यादव ने सभी जिलों के पार्टी पदाधिकारियों को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि वे स्थानीय स्तर पर निकाय चुनाव की तैयारी युद्ध स्तर पर शुरू करें। उनका मानना है कि यदि पार्टी चुनाव नहीं लड़ती है, तो उसका जनाधार कम हो जाता है और समर्थक इधर-उधर बिखर जाते हैं।

    संजय यादव ने साफ कर दिया है कि राजद निकाय चुनाव को संगठन विस्तार का एक मौका मानती है और इस बार वह पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरेगी।

    कांग्रेस: सभी 49 शहरी निकायों में उतरेगी मैदान में.

    कांग्रेस पार्टी ने भी चुनाव को लेकर बेहद गंभीरता दिखाई है। पार्टी ने रांची नगर निगम क्षेत्र को मॉडल मानते हुए पूरे राज्य के लिए चुनावी रणनीति बनाई है। कांग्रेस का कहना है कि चाहे चुनाव दलीय आधार पर हो या गैर-दलीय, वह अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से जनता के बीच जाएगी और अधिक से अधिक सीटें जीतने का प्रयास करेगी।

    हाल ही मे रांची के कार्निवल हॉल में “चुनौती: संगठन, संपर्क और संघर्ष” नाम से एक व्यापक संगठनात्मक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें प्रदेश प्रभारी के. राजू, प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, पूर्व मेयर रमा खलखो और अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हुए थे ।

    कांग्रेस की महत्वपूर्ण घोषणाएं.

    • हर वार्ड के लिए कांग्रेस अपना अलग मेनिफेस्टो  जारी करेगी।
    • प्रत्येक मोहल्ले में 21 समर्पित कार्यकर्ताओं की कमेटी बनाई जाएगी।
    • कार्यकर्ताओं को भाजपा के “संवैधानिक हनन” के खिलाफ लोगों को जागरूक करने को कहा गया।

    प्रदेश प्रभारी के. राजू ने स्पष्ट किया है  कि कांग्रेस इन चुनावों के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि शहरी भारत में भी उसकी नीतियों को समर्थन मिल रहा है। वहीं राजेश कच्छप ने कहा कि अगर पार्टी के भीतर “स्लीपर सेल” जैसे गुप्त तत्व न हों, तो कांग्रेस मेयर और डिप्टी मेयर के पद पर आसानी से कब्जा जमा सकती है।

    झामुमो को अभी सरकार की रणनीति का इंतजार.

    वहीं झामुमो की ओर से फिलहाल चुनावी घोषणाओं और तैयारियों पर संयम बरता जा रहा है। पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा कि नगर निकाय चुनावों के स्वरूप को लेकर सरकार के स्पष्ट रुख का इंतजार किया जा रहा है।

    यदि चुनाव दलीय  आधार पर होते हैं तो पार्टी की रणनीति अलग होगी, और अगर गैर-दलीय  ढांचे में होते हैं तो पूरी रणनीति बदल दी जाएगी।

    पांडेय ने कांग्रेस और राजद की तैयारियों को लेकर कहा, “चुनाव के लिए शोर मचाना अब पुरानी राजनीति हो गई है। जो लोग मानते थे कि झामुमो का शहरी इलाकों में कोई आधार नहीं है, वे अब हकीकत देख रहे हैं।” उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की नीतियों और विकास कार्यों ने झारखंड के शहरी मतदाताओं के बीच पार्टी की छवि को मजबूत किया है।

    उन्होंने पिछली रांची मेयर चुनाव का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि वर्षा गाड़ी की जीत को “राजनीतिक साजिश” से रोका गया था।

    राजनीतिक विश्लेषण.

    निकाय चुनाव भले ही गैर-दलीय  कहे जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सभी प्रमुख दल इसमें अपने जनाधार को मापने और 2029  विधानसभा व  लोकसभा चुनावों की बुनियाद मजबूत करने के नजरिए से देख रहे हैं।

    • राजद इसे ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी इलाकों में अपने आधार को विस्तार देने का मौका मान रही है।
    • कांग्रेस इस चुनाव को संगठन के पुनर्निर्माण और सत्ता वापसी की तैयारी का प्लेटफॉर्म बना रही है।
    • झामुमो अपनी शहरी उपस्थिति को न केवल बनाए रखना, बल्कि भाजपा से टक्कर लेने के लिए नई रणनीति के साथ उतरने का संकेत दे रही है।

     

    झारखंड में नगर निकाय चुनाव भले ही अभी औपचारिक रूप से घोषित न हुए हों, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियों से यह स्पष्ट है कि यह चुनाव सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया भर नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक सेमीफाइनल साबित हो सकता है।

     

  • कांग्रेस की बैठक में नेताओं ने मंथन किया, कार्यकर्ताओं ने जताई उपेक्षा की पीड़ा

    परवेज़ आलम.

    गिरिडीह : कांग्रेस पार्टी झारखंड में अपने संगठन को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय नजर आ रही है। इसी कड़ी में मंगलवार को पार्टी के झारखंड प्रभारी के. राजू और प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने गिरिडीह जिले के मधुबन स्थित प्रसिद्ध जैन तीर्थस्थल सम्मेद शिखर में ‘संगठन सृजन’ नामक बैठक की। यह बैठक मधुबन गेस्ट हाउस में आयोजित की गई, जहां जिले के कांग्रेस जिलाध्यक्ष धनंजय राम, कार्यकारी जिलाध्यक्ष सतीश केडिया, वरिष्ठ कोंग्रेस  नेता अजय सिन्हा  मंटू सभी प्रखंड, मंडल और बूथ स्तर के अध्यक्ष मौजूद रहे।

    बैठक का उद्देश्य और चिंता:

    बैठक को “संगठन सृजन” का नाम इसलिए दिया गया क्योंकि इसका मूल उद्देश्य गिरिडीह सहित पूरे झारखंड में कांग्रेस संगठन को फिर से मजबूत बनाना था। इस दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर विशेष चिंता जताई गई कि हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में गिरिडीह जैसे राजनीतिक रूप से अहम जिले में कांग्रेस ने एक भी प्रत्याशी नहीं उतारा। यह निर्णय पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़ा करता है, खासकर तब जब कुछ विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के पास मजबूत आधार रहा है और वहां उम्मीदवार खड़े किए जा सकते थे।

    कार्यकर्ताओं की नाराजगी:

    बैठक के दौरान कई बूथ अध्यक्षों और प्रखंड प्रतिनिधियों ने संगठन के भीतर हो रही अनदेखी को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को तवज्जो नहीं मिल रही है, और प्रशासनिक अधिकारी उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते

    हालांकि, समय की कमी के कारण आधे घंटे तक चली इस बैठक में कई कार्यकर्ता अपनी बात नहीं रख सके, जिससे उनमें असंतोष देखने को मिला

    बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में के.राजू ने कहा,

    कार्यकर्ताओं की बातों को गंभीरता से सुना गया है। कांग्रेस पार्टी जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगी। सभी सुझावों को पार्टी के रणनीतिकारों तक पहुंचाया जाएगा।”

    जब मीडिया ने उनसे नीति आयोग की उस रिपोर्ट पर सवाल पूछा जिसमें भारत की अर्थव्यवस्था ने जापान को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बात कही गई है, तो के. राजू ने जवाब देने से यह कहकर इनकार कर दिया कि उन्होंने अभी तक उस खबर को देखा नहीं है।

     

  • झारखंड में सरना धर्म कोड को लेकर सियासी संग्राम तेज, कांग्रेस-झामुमो का केंद्र सरकार पर दबाव

    परवेज़ आलम.

    झारखंड की राजनीति में इन दिनों सरना धर्म कोड एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरा है। राज्य की सत्ता में साझेदार झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस, दोनों दल इस मुद्दे को लेकर हमलावर रुख अपनाए हुए हैं और केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा रहे हैं। उनका उद्देश्य आदिवासी समुदाय के धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को संविधानिक मान्यता दिलवाना है.

    कांग्रेस का राजभवन के समक्ष प्रदर्शन.

    सोमवार को रांची में कांग्रेस ने राजभवन के बाहर धरना-प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में पार्टी के झारखंड प्रभारी के. राजू, सह प्रभारी श्रीबेला प्रसाद, प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश समेत कई वरिष्ठ नेता, विधायक और मंत्री शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में केंद्र सरकार से जनगणना में अलग सरना धर्म कोड की मांग की।

    प्रदर्शन के दौरान के. राजू ने कहा कि,

    “आदिवासियों का यह मौलिक अधिकार है कि उन्हें उनके धर्म और पहचान के आधार पर एक अलग धर्म कोड मिले, ठीक वैसे ही जैसे अन्य राज्यों में कुछ आदिवासी समूहों को मिला है।

    झामुमो का 27 मई को राज्यव्यापी प्रदर्शन.

    झामुमो भी इस मुद्दे को लेकर पीछे नहीं है। पार्टी ने 27 मई को राज्यभर में जिला मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। इस अभियान का प्रमुख नारा है:
    सरना कोड नहीं तो जनगणना नहीं”।

    यह आंदोलन आदिवासी अस्मिता और सांस्कृतिक अधिकारों की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है, जो आगामी विधानसभा चुनावों में झामुमो और कांग्रेस की रणनीति का अहम हिस्सा है.

    आदिवासी वोट बैंक पर सीधा फोकस.

    झारखंड की लगभग 26% आबादी आदिवासी है, और राज्य की 28 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। 2019 और 2024 में इन सीटों पर झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया है। इस पृष्ठभूमि में सरना धर्म कोड पर मुखर रुख इस वोट बैंक को और मज़बूत करने की रणनीति मानी जा रही है.

    भाजपा का अस्पष्ट रवैया और राजनीतिक नुकसान.

    वहीं, भाजपा इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख नहीं अपना पाई है। उसने सरना और ईसाई आदिवासियों के बीच एक अंतर पैदा करने की कोशिश की, यह कहते हुए कि ईसाई आदिवासी आरक्षण का अनुचित लाभ ले रहे हैं। लेकिन यह रणनीति 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में नाकाम रही

    • विधानसभा चुनावों में भाजपा सिर्फ एक आदिवासी आरक्षित सीट जीत सकी।
    • लोकसभा चुनावों में वह एक भी आदिवासी सुरक्षित सीट पर जीत दर्ज नहीं कर पाई

    गठबंधन की जमीनी रणनीति.

    झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने स्थानीय और सांस्कृतिक मुद्दों को प्राथमिकता दी है — जैसे कि:

    • सरना धर्म कोड
    • 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति
    • मंइयां सम्मान योजना

    इन मुद्दों ने आदिवासी और स्थानीय गैर-आदिवासी समुदायों के बीच गठबंधन की स्थिति को मजबूत किया है। इसके उलट, भाजपा की “रोटी, बेटी और माटी” जैसी भावनात्मक रणनीतियां और बांग्लादेशी घुसपैठ जैसे मुद्दे जनता से कनेक्ट नहीं कर पाए.

    केंद्र की भूमिका होगी निर्णायक.

    सरना धर्म कोड के मुद्दे पर राज्य सरकार की आक्रामकता एक रणनीतिक कदम है, जिससे केंद्र सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाया जा सके। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है

    झारखंड में सरना धर्म कोड अब केवल धार्मिक या सांस्कृतिक विषय नहीं रहा, यह सीधे तौर पर राजनीतिक,रणनीति और जनाधार की लड़ाई का केंद्र बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखा जाना बाकी है कि केंद्र की प्रतिक्रिया, इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाती है या संवैधानिक समाधान की ओर ले जाती है।

  • पूर्व सांसद व काँग्रेस नेता तिलकधारी सिंह नहीं रहे

    शिक्षक से सांसद तक का प्रेरणादायक सफर थमा.

    गिरिडीह: झारखंड की राजनीति ने एक अनुभवी और सज्जन नेता को खो दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और दो बार कोडरमा से लोकसभा सांसद रहे तिलकधारी सिंह का सोमवार को निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे और पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। गिरिडीह के नवजीवन अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

    तिलकधारी सिंह की तबीयत 8 अप्रैल से लगातार खराब चल रही थी। 19 अप्रैल को  राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और नगर विकास मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने अस्पताल जाकर उनका हालचाल लिया था । इससे पहले पूर्व सीएम रघुवर दास, बाबू लाल मरंडी और केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने भी  अस्पताल जाकर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी । सोमवार की दोपहर टीडी सिंह के  जीवन का आखिरी पन्ना बंद हो गया। निधन की जानकारी उनके पुत्र किशोर सिंह ने दी।

    गांव से दिल्ली तक: शिक्षक से सांसद बनने की यात्रा.

    तिलकधारी सिंह का जन्म 8 जनवरी 1938 को गिरिडीह जिले के देवरी प्रखंड अंतर्गत चतरो गांव में हुआ था। शिक्षा के प्रति गहरी रुचि रखने वाले सिंह ने बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1962 में शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया। चकाई हाई स्कूल में वर्षों तक सेवा देने के बाद उन्होंने सामाजिक जीवन की ओर रुख किया।

    1968 में उन्होंने मुखिया पद का चुनाव लड़ा और जीतकर ग्रामीण राजनीति में प्रवेश किया। इसके बाद वे जिला परिषद के अध्यक्ष भी बने। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है – उन्होंने जिले में कई सरकारी स्कूलों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी।

    राजनीति में कांग्रेस का मजबूत चेहरा.

    1977 में वे कांग्रेस के गिरिडीह जिला अध्यक्ष बने। इसके बाद 1980 में धनवार विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए। फिर 1984 में कांग्रेस ने उन्हें कोडरमा लोकसभा सीट से टिकट दिया, और उन्होंने जीत दर्ज कर संसद में प्रवेश किया। इस चुनाव में उन्होंने बीजेपी के रीतलाल प्रसाद वर्मा को हराया था और 208731 वोट हासिल किए थे – जो कुल मतों का 58.8 प्रतिशत था।

    1999 में उन्होंने दूसरी बार कोडरमा से जीत दर्ज की और संसद पहुंचे। अपने राजनीतिक जीवन में वे सांसद के साथ-साथ विधायक, जिला परिषद अध्यक्ष, और कांग्रेस संगठन के अहम पदों पर रहे।

    राजनीतिक विरासत और परिवार.

    राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहते हुए, वृद्धावस्था में उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र धनंजय सिंह को सौंपी। वर्तमान में धनंजय सिंह कांग्रेस के गिरिडीह जिला अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं।

    सरल स्वभाव के कारण लोकप्रिय नेता.

    तिलकधारी सिंह को उनके सादे जीवन और सरल स्वभाव के लिए जाना जाता था। आम जनता से लेकर बड़े नेताओं तक, सभी को उनके बोलचाल की शैली और व्यवहार में विनम्रता आकर्षित करती थी। वे ज़िले मे भूमिहार समाज के बड़े नेता थे ।

    श्रद्धांजलियाँ और राजनीतिक शोक

    पूर्व सांसद के निधन पर पूरे गिरिडीह जिले में शोक की लहर दौड़ गई है। मंत्री सुदिव्य कुमार ने उन्हें गिरिडीह की राजनीति का ‘पितामह’ बताते हुए कहा, उनकी कमी गिरिडीह की राजनीतिक धरातल पर हमेशा महसूस की जाएगी। उनका योगदान अमिट है ।

    शोक व्यक्त करने वालों में सासंद डॉ सरफराज अहमद ,बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रकाश सहाय, कांग्रेस नेता अजय सिन्हा, कार्यकारी अध्यक्ष सतीश केडिया, पूर्व विधायक निर्भय शाहबादी,अभय शाहबादी , लोजपा नेता राज कुमार राज सहित अनेक बुद्धिजीवी और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं।