Tag: madhupur news

  • वायरल वीडियो पर झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी की सफाई: “बेटे कृष को राजनीतिक साजिश के तहत घसीटा जा रहा है”

    By: परवेज़ आलम.

    For The News Post4u.

    रांची, 19 जुलाई 2025
    झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी के बेटे कृष अंसारी इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो को लेकर सुर्खियों में हैं। वीडियो में कृष अंसारी राजधानी रांची के प्रमुख अस्पतालों – रिम्स (RIMS) और पारस हॉस्पिटल में मरीजों से बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि कृष अस्पतालों का “निरीक्षण” कर रहे थे, जिससे सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    क्या है वायरल वीडियो का मामला?

    वायरल हो रहे इस वीडियो में कृष अंसारी कुछ युवकों के साथ अस्पतालों में मरीजों से बातचीत करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में उनके साथ मौजूद युवक कहते सुने जा सकते हैं – “ये मंत्री जी के बेटे हैं, अपनी समस्याएं बताइए।” इसके बाद से ही कृष पर “नेतागिरी” और “बिना अधिकार निरीक्षण” के आरोप लगने लगे।

    हालांकि, वीडियो की सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि किसी न्यूज माध्यम द्वारा नहीं की गई है, लेकिन मामला तूल पकड़ता देख अब स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने खुद X (पूर्व ट्विटर) पर बयान जारी कर साफ-साफ जवाब दिया है।

    मंत्री इरफान अंसारी की प्रतिक्रिया: “तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है”

    अपने आधिकारिक पोस्ट में स्वास्थ्य मंत्री ने कहा:

    “सच्चाई को समझें। मेरे बेटे कृष को बेवजह और दुर्भावनापूर्ण तरीके से एक झूठे विवाद में घसीटा जा रहा है। कुछ मीडिया संस्थानों और राजनीतिक स्वार्थी तत्वों द्वारा इस विषय को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।”

    मंत्री ने स्पष्ट किया कि कृष किसी सरकारी निरीक्षण या राजनीतिक उद्देश्य से अस्पताल नहीं गया था। उन्होंने बताया कि कृष रिम्स में अपने शिक्षक आदित्य कुमार झा के बीमार पिता का हालचाल लेने गया था।

    “मानवीय आधार पर की गई मदद को राजनीति का रंग दिया जा रहा”

    डॉ. इरफान अंसारी ने आगे बताया कि पिछली रात कुछ आदिवासी परिवार उनके सरकारी आवास पर मदद के लिए पहुंचे थे, जो रिम्स में इलाज के लिए परेशान थे। उनके आग्रह पर कृष मानवीय भाव से उनकी मदद के लिए अस्पताल गया, ताकि वे आवश्यक चिकित्सा सहायता प्राप्त कर सकें।

    उन्होंने यह भी जोड़ा कि संयोग से रिम्स में भर्ती एक वरिष्ठ पत्रकार के परिजन को भी चिकित्सकीय सहयोग की ज़रूरत थी, और कृष ने उन्हें भी पूरी संवेदनशीलता से सहयोग किया।

    “सेवा करना अपराध कब से हो गया?” – इरफान अंसारी

    मंत्री ने वीडियो के राजनीतिकरण पर गहरी नाराज़गी जताते हुए कहा:

    “आज जिस तरह से एक सामान्य मानवीय कर्तव्य को तोड़-मरोड़ कर राजनीति का रंग चढ़ाया जा रहा है, वह दुखद और चिंताजनक है। कृष एक होनहार छात्र है, जो छुट्टियों में रांची आया है। वह पूर्व सांसद फुरकान अंसारी का पोता है, जिन्होंने झारखंड के अलग राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। क्या ऐसे परिवार में सेवा की भावना होना कोई अपराध है?”

    विपक्ष ने उठाए सवाल, मंत्री ने ठहराया ‘राजनीतिक साजिश’

    इस पूरे विवाद को लेकर विपक्ष के कुछ नेताओं ने सरकार पर प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन और राजनीतिक परिवारवाद का आरोप लगाया है। वहीं, इरफान अंसारी ने इसे साफ तौर पर एक राजनीतिक साजिश और चरित्र हनन का प्रयास बताया है।

    वायरल वीडियो के बहाने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के परिवार को लेकर उठे विवाद ने झारखंड की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। जहां एक ओर मंत्री इसे सेवा भावना बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ वर्ग इसे शक्ति का दुरुपयोग कहा जा रहा है ।

    अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मामला राजनीतिक बहस तक सीमित रहता है या प्रशासनिक जाँच का विषय बनता है।

  • मंत्री हफीजुल हसन ने दी सफाई , भाजपा बर्खास्तगी की मांग पर अड़ी  

    झारखंड की सियासी फिजा इन दिनों एक बयान से राजनीति गरमाई हुई है। राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीजुल हसन का एक कथित बयान— “शरीयत संविधान से ऊपर है” — राजनीतिक हलकों में बीते चार दिनों से हलचल मचा रखा  है। विपक्षी दल भाजपा ने इस बयान को लेकर मंत्री पर सीधा हमला बोला है और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से उनकी तत्काल बर्खास्तगी की मांग की है।

    लेकिन क्या मंत्री ने सचमुच ऐसा कहा था? या फिर बयान को संदर्भ से काट कर, अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुसार परोसा गया? राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप नई बात नहीं, लेकिन जब बात संविधान और धार्मिक मूल्यों की हो, तो सावधानी और संवेदनशीलता दोनों की जरूरत होती है।

    भाजपा का हमला: ‘संविधान से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं’

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस कथन को भारतीय संविधान का अपमान बताते हुए तीखा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि हसन का यह बयान सामाजिक सौहार्द्र के लिए खतरा है और झारखंड जैसे विविधता वाले राज्य में इस तरह की सोच की कोई जगह नहीं हो सकती। मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से साफ शब्दों में मांग की कि हसन को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया जाए।

    मंत्री की सफाई: ‘बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया’

    इस पूरे विवाद के बीच मंत्री हफीजुल हसन ने मीडिया के सामने आकर सफाई दी और कहा कि उनका बयान गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा, “मैं बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बनाए संविधान को सर्वोपरि मानता हूं। मेरी राजनीति हमेशा सामाजिक न्याय, समावेशिता और बराबरी के सिद्धांतों पर आधारित रही है। मैं ऐसे किसी भी बयान का समर्थन नहीं करता जो देश के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध हो।”

    हसन ने आगे जोड़ा, “संविधान ही हमें धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। मेरा विश्वास उसी संविधान पर है, जिसने हमें यह आजादी और अधिकार दिए हैं।”

    भाजपा नेताओं पर पलटवार: ‘नफरत की राजनीति बंद हो’

    हसन ने अपनी सफाई में भाजपा नेताओं पर भी पलटवार किया। उन्होंने कहा, “देश के कई केंद्रीय मंत्री मंच से अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ बातें करते आए हैं— किसी ने ‘गोली मारो’ के नारे लगवाए, तो किसी ने देश छोड़ने की धमकी दी। क्या वह संविधान की रक्षा है या संविधान से खिलवाड़?”

    उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म को लेकर प्रेम होना स्वाभाविक है, लेकिन यह प्रेम दूसरे धर्म के प्रति नफरत नहीं बन जाना चाहिए। “हम सबको अपने-अपने धर्म से लगाव हो सकता है, लेकिन उस लगाव में दूसरों के धर्म का अपमान न हो, यही संविधान की आत्मा है,” उन्होंने कहा।

    “संवैधानिक मूल्यों से नहीं हटूंगा”: हसन का संकल्प.

    बयान के अंत में हसन ने यह स्पष्ट किया कि वे अपने संवैधानिक कर्तव्यों से कभी पीछे नहीं हटेंगे। “मैं झारखंड के हर समुदाय के लिए न्याय, समानता और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हूं। संविधान मेरी राजनीति की धुरी है और वही मेरी सोच की दिशा तय करता है।”

    यह विवाद केवल एक बयान का नहीं है। यह एक बड़े विमर्श का हिस्सा है—धर्म और संविधान के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती का। जब राजनीतिक दल इस संतुलन को अपने-अपने नजरिए से तोड़ते-मरोड़ते हैं, तो सवाल उठता है: क्या वाकई चिंता संविधान की है या उसका इस्तेमाल सियासी लाभ के लिए हो रहा है?

     

  • पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं मंत्री हफीजुल हसन

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ………

    आज हम बात करेंगे झारखंड की राजनीति के उस चेहरे की, जो अपने। मधुपुर की जनता के लिए यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। राजनीति में पिता के साये में पले-बढ़े हफीजुल ने जिस सफर की शुरुआत की, आज वह झारखंड की सत्ता का एक अहम चेहरा हैं।”

    हफीजुल हसन अंसारी, झामुमो के दिवंगत नेता हाजी हुसैन अंसारी के पुत्र हैं। पिता के निधन के बाद, उन्होंने सरकारी नौकरी को छोड़कर राजनीति की ओर रुख किया।

    “चलिए, थोड़ा पीछे चलते हैं। यह कहानी 2020 से शुरू होती है, जब कोरोना के संक्रमण ने झारखंड की सियासत से हाजी हुसैन अंसारी जैसे कद्दावर नेता को छीन लिया। हेमंत सोरेन की कैबिनेट में मंत्री रहे हाजी साहब का  जाना झारखंड के लिए एक बड़ी क्षति थी। लेकिन सवाल उठा कि उनकी खाली हुई जगह को कौन भरेगा?”

    2021 का उपचुनाव आया। मधुपुर विधानसभा की सीट पर झामुमो ने हफीजुल को मौका दिया और उन्होंने न सिर्फ जीत हासिल की, बल्कि यह दिखा दिया कि वे राजनीति में अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलने के लिए तैयार हैं।

    “लेकिन सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं था। सवाल था, क्या वे अपने पिता की तरह जनता के विश्वास पर खरे उतरेंगे? और यहीं से उनके सियासी सफर की असली शुरुआत होती है।”

    बीआईटी सिंदरी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले हफीजुल ने झारखंड राज्य खनिज निगम में बतौर सर्वेयर करियर शुरू किया। लेकिन राजनीति शायद उनके खून में थी। पिता के साथ 1995 से ही साये की तरह रहे हफीजुल ने राजनीति के गुर वहीं सीखे।

    “यह कहना आसान है कि राजनीति विरासत में मिली। लेकिन क्या यह विरासत इतनी आसान थी? हफीजुल ने अपने पिता के अभियान में शामिल होकर जमीनी राजनीति की वो हर बारीकी सीखी, जो सिर्फ किताबों में नहीं मिलती।”

    2021 से लेकर आज तक हफीजुल हसन अंसारी ने मंत्री पद संभाला। चाहे चंपाई सोरेन की कैबिनेट हो, या फिर हेमंत सोरेन की सत्ता वापसी, हर बार उन्होंने अपनी भूमिका निभाई। लेकिन सवाल यह है—क्या मधुपुर की जनता उन्हें सिर्फ अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में देखती है, या उनकी खुद की पहचान भी बन चुकी है?

    “चार भाइयों में सबसे बड़े हफीजुल हसन अंसारी की यह यात्रा सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि एक संघर्ष की है। लेकिन यह संघर्ष अब भी जारी है। राजनीति में जनता का विश्वास जितना कठिन है, उसे बनाए रखना उससे भी कठिन। और यही हफीजुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।”

    “तो क्या वे झारखंड की राजनीति में अपने पिता की तरह कद्दावर नेता बन पाएंगे? या फिर यह कहानी भी सियासत की भूल-भुलैया में खो जाएगी?”