NEW DELHI : पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। देशभर से लोग उनके अद्वितीय योगदान को याद कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। इसी क्रम में, राज्यसभा सांसद डॉ. सरफराज अहमद ने भी गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह भारत में आर्थिक सुधारों के सूत्रधार थे। उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक कार्य जैसे मनरेगा, राइट टू फूड, राइट टू एजुकेशन, आरटीआई और आधार पहचान पत्र जैसे कदम आज भी देश के विकास में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।
डॉ. अहमद ने याद किया कि अपने राजनीतिक जीवन के दौरान, जब वे एकीकृत बिहार में कांग्रेस के सक्रिय नेता थे, उनकी मुलाकात डॉ. मनमोहन सिंह से पटना में हुई थी। उन्होंने कहा, “डॉ. मनमोहन सिंह से समय-समय पर सीखने का अवसर मिला। वे दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे। भले ही वे कम बोलते थे, लेकिन उनके काम ने हमेशा उनकी सोच और दृष्टिकोण को बखूबी व्यक्त किया। उनके निधन से देश को अपूरणीय क्षति हुई है।”
डॉ. मनमोहन सिंह के द्वारा किए गए कार्यों को याद करते हुए डॉ. अहमद ने कहा कि उनका नेतृत्व और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। उनका शांत और स्थिर स्वभाव उन्हें एक महान नेता और आदर्श व्यक्तित्व बनाता है।
NEW DELHI : इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश शेखर कुमार यादव के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव देना क्या न्यायपालिका पर सीधा हमला है, या फिर न्याय की परिभाषा पर खुद न्यायपालिका को सोचने का मौका?
एक कार्यक्रम में न्यायमूर्ति यादव की कथित टिप्पणियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। राज्यसभा में 55 विपक्षी सांसदों नेमहाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, पी चिदंबरम, रणदीप सिंह सुरजेवाला, प्रमोद तिवारी, विवेक तन्खा, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, मनोज कुमार झा, साकेत गोखल, मुकुल वासनिक, नसीर हुसैन, राघव चड्ढा, फौजिया खान, संजय सिंह, एए रहीम, वी शिवदासन और रेणुका चौधरी जैसे नेता इस प्रस्ताव के केंद्र में हैं। सवाल यह है कि जब न्यायाधीश से संवैधानिक दायित्वों का पालन अपेक्षित है, तो क्या यह मामला संविधान के अनुच्छेद 51ए (ई) के खिलाफ जाता है, जो सद्भाव को बढ़ावा देने की बात करता है?
“न्याय का चेहरा और राजनीति का साया”
विहिप के मंच पर अल्पसंख्यकों को लेकर कथित टिप्पणी क्या एक न्यायाधीश के सार्वजनिक व्यवहार के मानदंडों का उल्लंघन है? या फिर यह उस विचारधारा का हिस्सा है, जो संविधान के सेकुलर फ्रेमवर्क को चुनौती देती है?
सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया।इलाहाबाद हाईकोर्ट से रिपोर्ट मांगी गई। पर विपक्ष ने इसी बीच राज्यसभा में नोटिस देकर यह जता दिया कि इस बार बात सिर्फ भाषण की नहीं, न्यायपालिका की गरिमा की है।
“महाभियोग और बहुसंख्यकवाद की राजनीति”
नोटिस में आरोप है कि न्यायमूर्ति यादव की टिप्पणियां पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। क्या यह महज संयोग है कि यह टिप्पणी बहुसंख्यकवाद को प्राथमिकता देने वाली राजनीति के करीब नजर आती है? विपक्ष के नेता कहते हैं कि न्यायपालिका का कोई भी हिस्सा अगर संविधान से भटकेगा, तो उस पर सवाल उठेंगे।
“आखिर न्याय कौन करेगा?”
महाभियोग प्रस्ताव के इस नोटिस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका कितनी स्वतंत्र है? और अगर स्वतंत्र है, तो क्या वह राजनीति से प्रभावित हो रही है?
न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के हर शब्द की कीमत होती है। पर जब वह शब्द संविधान से टकराते हैं, तो जवाबदेही तय करना जरूरी हो जाता है।
अब देखना यह है कि राज्यसभा के सभापति इस नोटिस को मंजूरी देते हैं या नहीं। और क्या यह मामला न्यायपालिका में सुधार की नई बहस की शुरुआत करेगा?
संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है, और इस बार जो संसद में हो रहा है, वह न केवल संसदीय राजनीति का एक ताजातरीन रूप है, बल्कि यह लोकतंत्र के साख और मंशा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। हंगामा, शोरगुल, और आरोपों-प्रतयारोपों का दौर अब संसद के हर कोने से उठ रहा है। इन हालात में, राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ पर विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है। करीब 60 सांसदों के हस्ताक्षर से इस प्रस्ताव का समर्थन किया गया है। लेकिन सत्ता पक्ष अपने बहुमत का हवाला देते हुए कह रहा है कि यह प्रस्ताव सफल नहीं हो पाएगा।
अब, विपक्ष ने जो आरोप लगाए हैं, वह न केवल जगदीप धनखड़ की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं, बल्कि यह भी एक सख्त संदेश देते हैं कि विपक्ष अब किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठेगा। विपक्ष का कहना है कि न तो वह झुकेंगे, न दबेंगे, न रुकेंगे। संविधान, संसदीय मर्यादाओं और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर कुर्बानी के लिए तैयार हैं। दस महत्वपूर्ण बिंदुओं में विपक्ष ने अपनी बात रखी, जिन पर गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है।राज्यसभा सांसद डॉ सरफराज अहमद ने जगदीप धनखड़ के खिलाफ लाये गए अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करते हुये कहा कि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर एक साथ है । उन्होने कह कि उनके 40 साल के संसदीय जीवन मे एसी स्थिति कभी नहीं देखि है ।
पहला बिंदु है – संसद में बात कहने का अधिकार। विपक्ष का आरोप है कि सभापति महोदय लगातार उन्हें बोलने से रोकते हैं। जबकि सत्ता पक्ष के सदस्य बेझिजक झूठ बोलते हैं, मीडिया की खबरों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी विपक्ष पर थोपते हैं।
दूसरा गंभीर आरोप है – सभापति का दुरुपयोग। विपक्ष का कहना है कि सभापति ने अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करते हुए कई बार सदस्यों को एकतरफा निलंबित किया।
तीसरा आरोप यह है कि सभापति सदन के बाहर भी विपक्षी नेताओं की आलोचना करते हैं और उनकी आलोचना भाजपा के पक्ष में की जाती है। यह पारंपरिक संसदीय गरिमा से काफी दूर का मामला है।
इतिहास में इस पद को गरिमा के साथ संभालने वालों ने कभी अपनी राजनीति या पार्टी का पक्ष नहीं लिया, लेकिन धनखड़ साहब ने तो सीधे-सीधे RSS की प्रशंसा की और स्वयं को ‘RSS का एकलव्य’ घोषित कर दिया, जो संविधान की भावना से खिलवाड़ है।
टीवी कवरेज का भी विरोध किया गया है। विपक्ष का कहना है कि संसद के अंदर होने वाले विरोध प्रदर्शन और उनकी आवाज़ को जानबूझकर मीडिया से हटा दिया जाता है। कैमरे केवल सत्ता पक्ष के सांसदों को दिखाते हैं और विपक्षी नेताओं की आवाज़ को काले पर्दे में छिपा दिया जाता है।
रूल 267 का उल्लंघन करते हुए विपक्षी सदस्य को नोटिस भी नहीं दिए जाते, जबकि सत्ता पक्ष के सांसदों को इसे लेकर कोई प्रतिबंध नहीं होता।
समझिए, यह कोई हल्का-फुल्का मुद्दा नहीं है। यह सीधे तौर पर हमारे संसदीय लोकतंत्र की धारा और दिशा से जुड़ा है। जहां तक सवाल विपक्ष के सवालों का है, तो इस पूरे मामले में यही कहा जा सकता है कि संसद अब सिर्फ एक मुकदमे की तरह न सिमट जाए। यह खामोशी नहीं, एक निर्णायक आवाज़ की बुनियाद है।
NEW DELHI : संसद के शीतकालीन सत्र में हंगामे की गूंज पहले ही तेज थी, लेकिन गुरुवार को राज्यसभा में ऐसा वाकया हुआ जिसने सदन की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए। सभापति जगदीप धनखड़ ने जानकारी दी कि राज्यसभा की सीट नंबर 222 से 500 रुपये के नोटों की गड्डी बरामद हुई है। सीट, जो वर्तमान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी को आवंटित है, अब सियासत के तूफान के केंद्र में है।
कैसे हुआ खुलासा?
सभापति धनखड़ ने सदन को बताया, “सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद सुरक्षा जांच में सीट संख्या 222 पर नोटों की एक गड्डी पाई गई। गड्डी में 500 रुपये के 100 नोट थे। फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि नोट असली हैं या नकली।”
इस खुलासे के बाद सदन में हंगामा शुरू हो गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस मुद्दे पर आमने-सामने आ गए। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने इसे “सदन की गरिमा पर चोट” बताते हुए तुरंत जांच की मांग की।
सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर
भाजपा के अन्य नेताओं जैसे कि किरेन रिजिजू और पीयूष गोयल ने भी इस मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता बताई। वहीं, विपक्ष इसे सत्ता पक्ष की सुनियोजित चाल करार दे रहा है।
अभिषेक मनु सिंघवी ने अब तक इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है, लेकिन कांग्रेस इसे “राजनीतिक साजिश” मान रही है।
नोट असली हैं या नकली? जांच जारी
यह सवाल हर किसी के दिमाग में है कि सदन जैसी संवेदनशील जगह पर नोटों की गड्डी कैसे पहुंची? अगर ये असली हैं, तो क्यों और अगर नकली हैं, तो किस मकसद से?
सभापति धनखड़ ने कहा है कि मामले की जांच जारी है और सभी तथ्यों की गहराई से पड़ताल की जाएगी। उन्होंने सदन के सदस्यों को इस मामले पर संयम बरतने की भी अपील की।
संसद की गरिमा पर चोट या नई राजनीतिक रणनीति?
सदन में नोटों की गड्डी का पाया जाना सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के मंदिर में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
क्या यह वाकई सदन की गरिमा पर चोट है?
या फिर यह सत्ता और विपक्ष के बीच जारी सियासी खेल का हिस्सा है?
संसद के इस सत्र में यह घटना आने वाले दिनों में हंगामे का कारण बनेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस जांच के नतीजे सदन के भीतर की राजनीति के धुंधलके को साफ कर पाएंगे, या फिर यह मामला भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में दब जाएगा?