Tag: BJP

  • बाबूलाल मरांडी की सुरक्षा पर उठे सवाल, 13 साल पुरानी बुलेटप्रूफ गाड़ी बदलने की मांग

    बाबूलाल मरांडी की सुरक्षा पर उठे सवाल, 13 साल पुरानी बुलेटप्रूफ गाड़ी बदलने की मांग

    The News Post4U Desk

    रांची: झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। उनके वरीय आप्त सचिव राजेंद्र तिवारी ने राज्य के गृह सचिव को पत्र लिखकर सुरक्षा में इस्तेमाल हो रहे पुराने और जर्जर वाहनों को तत्काल बदलने की मांग की है।

    पत्र में बताया गया है कि बाबूलाल मरांडी को उपलब्ध कराई गई बुलेटप्रूफ सफारी करीब 13 वर्ष पुरानी हो चुकी है और क्षेत्रीय दौरों के दौरान अक्सर खराब हो जाती है। इसके अलावा उनकी सुरक्षा में तैनात तीन जिप्सियां भी अत्यधिक जर्जर अवस्था में हैं। बताया गया है कि ये वाहन 4 लाख किलोमीटर से अधिक चल चुके हैं, जिससे उनकी विश्वसनीयता और सुरक्षा क्षमता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    राजेंद्र तिवारी ने पत्र में उल्लेख किया है कि इस संबंध में पुलिस मुख्यालय को कई बार अवगत कराया जा चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। उनका कहना है कि सुरक्षा वाहनों की वर्तमान स्थिति किसी भी आपातकालीन परिस्थिति में गंभीर खतरे का कारण बन सकती है।

    गौरतलब है कि बाबूलाल मरांडी लंबे समय से नक्सली और उग्रवादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे के सामने आने के बाद राज्य सरकार और गृह विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

  • ………..और मुकाबला डिप्टी मेयर की कुर्सी का, नया राजनीतिक “मैच” शुरू

    ………..और मुकाबला डिप्टी मेयर की कुर्सी का, नया राजनीतिक “मैच” शुरू

    परवेज़ आलम.

    द न्यूज़ पोस्ट4यू

    झारखंड की सियासत में मेयर चुनाव के बाद अब एक नया राजनीतिक “मैच” शुरू हो चुका है—और यह मुकाबला है डिप्टी मेयर की कुर्सी का। नौ नगर निगमों में पार्षदों की गिनती, बैठकों का दौर, सम्मान समारोह और डिनर डिप्लोमेसी… सब कुछ तेज हो गया है। आइए समझते हैं कि इस वक्त झारखंड के नगर निगमों में किसकी दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है और कहां किस तरह की राजनीतिक हलचल है।

    मेयर के बाद अब डिप्टी मेयर की जंग

    मेयर चुनाव खत्म होते ही अब राजनीतिक दलों की नजर डिप्टी मेयर के पद पर टिक गई है। भाजपा, कांग्रेस और झामुमो—तीनों दल अपने-अपने समर्थित पार्षदों को एकजुट करने में जुट गए हैं। नगर निगमों में इस पद के लिए लॉबिंग और लामबंदी तेज हो गई है। पार्षदों के सम्मान समारोह हो रहे हैं, बैठकों का दौर चल रहा है और कई जगहों पर “डिनर डिप्लोमेसी” भी देखने को मिल रही है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कहीं हॉर्स ट्रेडिंग न हो जाए। ऐसे में दल अपने पार्षदों पर नजर बनाए हुए हैं ताकि आखिरी वक्त में क्रॉस वोटिंग की स्थिति न बने।

    रांची में डिनर डिप्लोमेसी और शक्ति प्रदर्शन.

    राजधानी रांची में डिप्टी मेयर की रेस काफी दिलचस्प हो गई है।

    • भाजपा ने पार्षदों का सम्मान समारोह आयोजित कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।
    • इस बैठक में 53 में से 42 पार्षदों की मौजूदगी बताई जा रही है।

    वहीं दूसरी ओर कांग्रेस भी पीछे नहीं है।

    • कांग्रेस नेताओं ने एक बड़े होटल में पार्षदों के साथ डिनर मीटिंग की।
    • इस बैठक में 37 पार्षदों के शामिल होने का दावा किया गया है।

    कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पार्षदों ने डिप्टी मेयर के नाम तय करने का अधिकार पार्टी को दे दिया है।

    गिरिडीह में झामुमो की मजबूत स्थिति

    गिरिडीह नगर निगम में समीकरण कुछ अलग दिख रहे हैं। यहां मेयर पद पर झामुमो समर्थित उम्मीदवार की जीत के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि डिप्टी मेयर भी झामुमो समर्थित पार्षद ही बनेंगे। बताया जा रहा है कि भाजपा के पास यहां 10 से भी कम पार्षदों का समर्थन है, जबकि झामुमो समर्थित पार्षदों की संख्या ज्यादा बताई जा रही है। लालों राइन व सुमित कुमार दोनों jmm से हैं के बीच ही रश काशी चल रही है ।

    हजारीबाग और मेदिनीनगर में ये नाम आगे।

    राज्य के अन्य नगर निगमों में भी डिप्टी मेयर को लेकर तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो रही है।

    • मेदिनीनगर: कांग्रेस समर्थित मनोज सिंह मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।
    • हजारीबाग: यहां मिताली रश्मि का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है

    धनबाद, देवघर और आदित्यपुर में कांटे की टक्कर।

    कुछ नगर निगमों में मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।

    • धनबाद: यहां अरुण चौहान और सुमन सिंह के बीच सीधी टक्कर बताई जा रही है। अरुण चौहान को झामुमो का समर्थन मिलने की चर्चा है।
    • देवघर: पहली बार की पार्षद टीप चटर्जी डिप्टी मेयर पद के लिए मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं।
    • चास: यहां पांच से छह पार्षदों के बीच मुकाबला बताया जा रहा है।
    • आदित्यपुर और मानगो: इन दोनों नगर निगमों में भाजपा और कांग्रेस समर्थित पार्षदों के बीच सीधी टक्कर के संकेत मिल रहे हैं।

    कब होगा शपथ ग्रहण और डिप्टी मेयर का चुनाव.

    अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि डिप्टी मेयर का चुनाव कब होगा। अलग-अलग नगर निगमों में शपथ ग्रहण और चयन की तारीखें तय कर दी गई हैं।

    • देवघर नगर निगम – 13 मार्च
    • हजारीबाग नगर निगम – 13 मार्च
    • मेदिनीनगर नगर निगम – 14 मार्च
    • गिरिडीह नगर निगम – 16 मार्च
    • आदित्यपुर नगर निगम – 16 मार्च
    • मानगो नगर निगम – 17 मार्च
    • चास नगर निगम – 17 मार्च
    • धनबाद नगर निगम – 18 मार्च
    • रांची नगर निगम – 19 मार्च

    अंतिम तस्वीर अभी बाकी.

    कुल मिलाकर झारखंड के नौ नगर निगमों में डिप्टी मेयर की कुर्सी को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है। पार्षदों की संख्या, दलों की रणनीति और आखिरी वक्त की राजनीतिक चालें—इन सबके बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिर किसके सिर सजता है डिप्टी मेयर का ताज। आने वाले कुछ दिन झारखंड की नगर राजनीति के लिए बेहद अहम साबित होने वाले हैं।

  • नगर निगम चुनाव की उल्टी गिनती शुरू,शहर की सियासत चरम पर

    नगर निगम चुनाव की उल्टी गिनती शुरू,शहर की सियासत चरम पर

    परवेज़ आलम.

     The News Post4U.

    गिरिडीह नगर निगम चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। अब बस कुछ ही घंटे बचे हैं… और शहर की सियासत अपने चरम पर है। आपके शहर की सरकार कौन चलाएगा ? किसके हाथ होगी मेयर की कुर्सी? और कौन जीतेगा इस बार की “हॉट सीट”?

    चहुकोनिया मुकाबला… लेकिन असली टक्कर दो के बीच !

    कागज़ पर मुकाबला चार कोनों का दिख रहा है… लेकिन ज़मीन पर असली लड़ाई सिमटती दिख रही है दो चेहरों के बीच— भाजपा समर्थित उम्मीदवार डॉ शैलेन्द्र चौधरीऔर जेएमएम समर्थित प्रत्याशी प्रमिला मेहरा। लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है…

    भाजपा के दो बागी चेहरे—नागेश्वर दास और प्रकाश दास—अब जेएमएम के पाले में जा चुके हैं। और भाजपा के ही बागी कामेश्वर पासवान… पार्टी के लिए गले की हड्डी बने हुए हैं। यानी…
    मुकाबला सिर्फ विरोधियों से नहीं, अपनों से भी है!

     कुल 16 उम्मीदवार मैदान में.

    मेयर पद के लिए 16 उम्मीदवार मैदान में हैं। तीन बड़े राजनीतिक समर्थन साफ दिख रहे हैं—

    • प्रमिला मेहरा को झामुमो का समर्थन
    • डॉ शैलेन्द्र चौधरी को भाजपा का समर्थन
    • समीर राज चौधरी को कांग्रेस का समर्थन

    पिछले चुनाव में समीर राज चौधरी 20,595 वोट लाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। इस बार सवाल ये है—क्या वे उस वोट बैंक को फिर से समेट पाएंगे?

    बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर.

    यह चुनाव सिर्फ स्थानीय नहीं है… यह प्रतिष्ठा की लड़ाई भी है। झारखंड सरकार में मंत्री और नगर विकास विभाग संभाल रहे सुदीव्य कुमार सोनू—गिरिडीह उनके ही क्षेत्र में आता है। उनकी साख भी इस चुनाव से जुड़ी है।

    दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी— साथ ही भाजपा के कई दिग्गज नेता—यहां आकर मोर्चा संभाल चुके हैं। यह लड़ाई मेयर की कुर्सी से आगे बढ़कर राजनीतिक संदेश की लड़ाई बन चुकी है।

    आंकड़ों की बात करें तो…

    गिरिडीह नगर निगम क्षेत्र 36 वार्डों में बंटा है। कुल 137 बूथ हैं।
    कुल मतदाता—1 लाख 50 हजार 992. महिला मतदाता—75,725
    पुरुष मतदाता—75,266 और एक किन्नर मतदाता भी इस लोकतंत्र का हिस्सा है। अब सवाल—किसका गणित बैठेगा?

    गैर-दलीय चुनाव… लेकिन पूरी तरह दलीय रणनीति.

    कागज़ पर यह “गैर-दलीय” चुनाव है। लेकिन ज़मीन पर? पूरी तरह दलीय! राज्य के 48 शहरी निकायों में यही तस्वीर है। 23 फरवरी को मतदान होगा… और चार दिन बाद तस्वीर साफ हो जाएगी।

    सत्तारूढ़ गठबंधन के दो चेहरे—
    झारखंड मुक्ति मोर्चा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस— यहां आमने-सामने हैं और तीसरे कोने पर मजबूती से खड़ी है भारतीय जनता पार्टी। यानी सीधी त्रिकोणीय जंग.

    सवाल आपके लिए…

    क्या वोट विकास पर पड़ेगा? या जातीय समीकरण पर? क्या मुस्लिम वोट निर्णायक होंगे?
    क्या हिंदू वोट गोलबंद होंगे ? क्या बागी उम्मीदवार खेल बिगाड़ देंगे? और सबसे बड़ा सवाल—
    क्या यह चुनाव 2029 की बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों का ट्रेलर है?

    आख़िर में .

    सभी प्रत्याशी एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। जनसंपर्क, बैठकें, रणनीति, समीकरण… सब अपने चरम पर हैं । लेकिन अंत में फैसला आपके हाथ में है । 23 फरवरी को आप तय करेंगे—
    गिरिडीह की कमान किसे सौंपी जाए। चुनाव भले “गैर-दलीय” हो… लेकिन सियासत पूरी तरह “दलीय” हो चुकी है।

  • निकाय  चुनाव “गैर-दलीय” है… लेकिन सियासत पूरी तरह दलीय हो चुकी है।

    निकाय  चुनाव “गैर-दलीय” है… लेकिन सियासत पूरी तरह दलीय हो चुकी है।

    परवेज़ आलम.

    द न्यूज़ पोस्ट4यू .
    राज्य के 48 शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव इस बार सीधे मुकाबले से निकलकर त्रिकोणीय जंग में बदल गए हैं। 23 फरवरी को मतदान होगा और चार दिन बाद तस्वीर साफ हो जाएगी। पांच साल बाद हो रहे इन चुनावों की खास बात यह है कि ये कागज़ पर गैर-दलीय हैं, लेकिन ज़मीन पर राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं।

    सत्तारूढ़ इंडिया ब्लॉक के दो बड़े चेहरे—झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस—अब आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। संयुक्त उम्मीदवार पर सहमति नहीं बन पाई, और नतीजा यह कि दोनों दलों ने नौ नगर निगमों में महापौर पद के लिए अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही 20 नगर परिषदों और 19 नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद के लिए भी खुला समर्थन दिया गया है।

    गैर-दलीय चुनाव, पर दलीय रणनीति

    8 फरवरी को नाम वापसी की आखिरी तारीख बीतते ही तस्वीर साफ हो गई—गठबंधन की एकजुटता यहां नहीं दिखेगी। हालांकि, कांग्रेस और जेएमएम दोनों इसे “मतभेद” मानने से इनकार कर रहे हैं।
    कांग्रेस प्रवक्ता का कहना है—“यह विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं है। यहां मुद्दे मोहल्लों के हैं, नालियों और सड़कों के हैं, हर वार्ड की अपनी प्राथमिकताएं हैं।”
    जेएमएम प्रवक्ताभी यही तर्क देते हैं—“जब चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं हो रहा, तो स्थानीय चेहरा और उसकी स्वीकार्यता ज्यादा मायने रखती है।”

    लेकिन सवाल यह है कि अगर चुनाव पूरी तरह स्थानीय है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर दलों की सक्रियता क्यों?

    बीजेपी की शहरी पकड़

    राज्य के प्रमुख शहरी केंद्र—रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, देवघर, हजारीबाग, गिरिडीह और मेदिनीनगर—परंपरागत रूप से भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे हैं। एनडीए खेमे में भाजपा को अपने सहयोगियों एजेएसयू, जद(यू) और लोजपा (रामविलास) से खास चुनौती नहीं दिख रही।

    यानी मुकाबला असल में तीन कोनों वाला है—भाजपा, जेएमएम और कांग्रेस।

    जेएमएम की शहरी परीक्षा

    अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि यह दरअसल जेएमएम का “अर्बन एक्सपेरिमेंट” है। 81 सदस्यीय विधानसभा में जेएमएम की 34 सीटों में से करीब 90 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों से आती हैं। ग्रामीण इलाकों में मजबूत पकड़ के बावजूद बड़े शहरों में पार्टी अब तक सीमित रही है।

    छह साल से सत्ता में रहने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जेएमएम अब शहरों में भी अपनी जमीन तलाश रही है। यही वजह है कि पार्टी ने कई मजबूत स्थानीय चेहरों—यहां तक कि दूसरे दलों के बागी नेताओं—को भी समर्थन दिया है।

    गठबंधन पर असर?

    क्या यह नगर निकाय चुनाव भविष्य में इंडिया ब्लॉक की एकता को प्रभावित करेगा?
    फिलहाल दोनों दल इसे महज़ स्थानीय रणनीति बता रहे हैं। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर नतीजे चौंकाने वाले रहे, तो इसका असर 2029 की बड़ी लड़ाइयों तक महसूस किया जा सकता है।

    फिलहाल तस्वीर साफ है—
    चुनाव भले ही “गैर-दलीय” हो,
    लेकिन सियासत पूरी तरह “दलीय” है।

    23 फरवरी को मतदाता तय करेंगे कि शहरों की कमान किसके हाथ जाएगी—परिणाम सिर्फ मेयर और अध्यक्ष नहीं चुनेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि झारखंड की शहरी राजनीति किस करवट बैठ रही है।