Category: Politics

  • जब तक सरना धर्म कोड को मान्यता नहीं मिलती, तब तक “नो सेंसस”-मंत्री सुदिव्य कुमार

    GIRIDIH: झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने 27 मई 2025 को राज्यभर में सरना धर्म कोड की मान्यता की मांग को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन किया। गिरिडीह जिले में यह प्रदर्शन टावर चौक के निकट आयोजित किया गया, जिसमें राज्य सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सहित दर्जनों पार्टी नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला उपाध्यक्ष शहनवाज अंसारी ने की, जबकि संचालन अजीत कुमार पप्पु और कोलेश्वर सोरेन ने किया।

    मंत्री सुदिव्य कुमार ने धरने को संबोधित करते हुए कहा कि जैसे दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने 1972 में झारखंड को अलग राज्य बनाने की बात कही थी और वह सपना 15 नवंबर 2000 को साकार हुआ, उसी तरह अब उन्होंने देश के 12 करोड़ आदिवासियों के लिए सरना धर्म कोड की मान्यता की बात कही है, और यह भी पूरा होकर रहेगा।

    गौरतलब है कि झारखंड विधानसभा ने 11 नवंबर 2020 को एक विशेष सत्र में सर्वसम्मति से सरना धर्म कोड विधेयक पारित किया था और इसे राज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार को अनुमोदन के लिए भेजा गया था। हालांकि, लगभग पांच वर्षों के बाद भी केंद्र सरकार ने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है, जिससे आदिवासी समुदाय में गहरा असंतोष है।

    सारना धर्म, जिसे “पवित्र वन का धर्म” भी कहा जाता है, आदिवासी समुदायों द्वारा प्रकृति पूजा पर आधारित एक धार्मिक विश्वास है, जो झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और छत्तीसगढ़ में प्रचलित है। इस धर्म के अनुयायी जल, जंगल और जमीन की पूजा करते हैं और इसे अपनी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।

    कार्यक्रम में केदार हाजरा, प्रणव वर्मा, दिलीप रजक, दिलीप मंडल, बबली मरांडी, प्रमिला मेहरा, ज्योति सोरेन, नुनुराम किस्कु, कोलेश्वर सोरेन, प्रधान मुर्मू, हरिलाल मरांडी, बिरजु मरांडी, राकेश सिंह रॉकी, अभय सिंह, योगेन्द्र सिंह, राकेश सिंह टुन्ना, शिवम आजाद, सुमित कुमार, अशोक राम, मेहताब मिर्जा, कृष्ण मुरारी, अनिल राम, महावीर मुर्मू, प्रदोष कुमार, भरत यादव, नूर अहमद, हसनैन अली, मो. जाकीर, छक्कु साव, विजय सिंह, सन्नी रईन, नरेश यादव, पप्पु रजक, हरि मोहन कंधवे, अमित चंद्रवंशी सहित दर्जनों कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

    JMM ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरना धर्म कोड को मान्यता नहीं मिलती, तब तक “नो सेंसस” के नारे के साथ चरणबद्ध आंदोलन जारी रहेगा।

     

  • तेज प्रताप यादव RJD और परिवार से 6 साल के लिए निष्कासित

    लालू प्रसाद यादव का बड़ा फैसला, बिहार की राजनीति में मचा हलचल

    परवेज़ आलम.

    बिहार की राजनीति एक बार फिर तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को न केवल पार्टी से छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया, बल्कि उन्हें परिवार से भी अलग कर देने का ऐलान कर दिया है। इस फैसले ने न सिर्फ यादव परिवार में दरार की अटकलों को हवा दी है, बल्कि आरजेडी के भीतर आंतरिक कलह और सियासी समीकरणों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

    लालू यादव ने इस विषय पर ट्वीट करते  हुए लिखा “”निजी जीवन में नैतिक मूल्यों की अवहेलना करना हमारे सामाजिक न्याय के लिए सामूहिक संघर्ष को कमज़ोर करता है। ज्येष्ठ पुत्र की गतिविधि, लोक आचरण तथा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हमारे पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों के अनुरूप नहीं है। अतएव उपरोक्त परिस्थितियों के चलते उसे पार्टी और परिवार से दूर करता हूं। अब से पार्टी और परिवार में उसकी किसी भी प्रकार की कोई भूमिका नहीं रहेगी। उसे पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित किया जाता है। अपने निजी जीवन का भला-बुरा और गुण-दोष देखने में वह स्वयं सक्षम है। उससे जो भी लोग संबंध रखेंगे वो स्वविवेक से निर्णय लें। लोकजीवन में लोकलाज का सदैव हिमायती रहा हूं। परिवार के आज्ञाकारी सदस्यों ने सावर्जनिक जीवन में इसी विचार को अंगीकार कर अनुसरण किया है।

    तेज प्रताप के निष्कासन की वजह मानी जा रही है हाल ही में वायरल हुआ वह वीडियो जिसमें वह अनुष्का यादव के साथ नजर आ रहे हैं। खबरों के मुताबिक तेज प्रताप ने इस रिश्ते को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया है। उन्होंने यह भी बताया कि वह पिछले 12 वर्षों से अनुष्का से प्रेम करते थे और अब उन्होंने उनसे विवाह कर लिया है

    तेज प्रताप की छवि: रंगीन, धार्मिक और विवादास्पद.

    तेज प्रताप यादव हमेशा से ही बिहार की राजनीति में अपनी अनोखी शैली, धार्मिक रूप और सोशल मीडिया पर सक्रियता के लिए चर्चा में रहे हैं। कभी भगवान शिव, तो कभी श्रीकृष्ण के रूप में दिखाई देना, होली पर पारंपरिक वेशभूषा पहनकर आयोजन करना—तेज प्रताप ने हमेशा खुद को अलग दिखाने की कोशिश की।

    राजनीतिक करियर की बात करें तो उन्होंने 2015 में महुआ सीट से जीत दर्ज की और नीतीश कुमार की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने। फिर 2020 में हसनपुर से विधायक चुने गए और दूसरी बार नीतीश सरकार में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री का पद संभाला। हालांकि, उनकी कार्यशैली और विवादास्पद बयान अक्सर पार्टी की मुश्किलें बढ़ाते रहे।

    निजी जीवन में भी विवादों से घिरे रहे तेज प्रताप.

    तेज प्रताप का निजी जीवन भी सुर्खियों से अछूता नहीं रहा है। 2018 में उन्होंने बिहार के पूर्व मंत्री चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय से शादी की थी। यह रिश्ता ज्यादा लंबा नहीं चला और तलाक की प्रक्रिया अब भी अदालत में लंबित है। अब अनुष्का यादव के साथ उनकी नई शुरुआत ने राजनीतिक और पारिवारिक हलकों में भूचाल ला दिया है।

    पप्पू यादव ने तेज प्रताप का किया समर्थन, लालू के फैसले पर उठाए सवाल.

    तेज प्रताप यादव के निष्कासन के बाद जन अधिकार पार्टी (JAP) के नेता और पूर्णिया सांसद पप्पू यादव खुलकर उनके समर्थन में सामने आए हैं। उन्होंने तेज प्रताप को “ईमानदार प्रेमी” बताते हुए लालू प्रसाद यादव से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है।

    “तेज प्रताप ने कोई अपराध नहीं किया है। उन्होंने समाज के सामने सच स्वीकार किया। ऐसे में उन्हें सजा देना कहां तक उचित है?” – पप्पू यादव

    उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि देश की राजनीति में ऐसे कई नेता हैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, जबकि तेज प्रताप को सिर्फ इसलिए निष्कासित किया गया क्योंकि उन्होंने प्रेम को स्वीकार किया

    राजनीतिक असर: RJD को फायदा या विरोधियों को मिलेगा मुद्दा?

    तेज प्रताप के निष्कासन से RJD को अनुशासन का संदेश देने का मौका मिला है, लेकिन साथ ही यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इससे पार्टी को चुनावी नुकसान होगा। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा विरोधी दलों के लिए एक बड़ा हथियार बन सकता है। वहीं, तेज प्रताप यादव के समर्थकों में इस फैसले को लेकर नाराज़गी देखी जा रही है।

    अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या तेज प्रताप कोई नया राजनीतिक विकल्प तलाशेंगे, क्या वे बगावती रुख अपनाएंगे, या फिर यह पारिवारिक कलह समय के साथ शांत हो जाएगा ।

  • देश की सेनाओं के शौर्य पर गर्व: ओम बिरला ने ऑपरेशन सिंदूर को बताया आतंकवाद के विरुद्ध भारत की नई नीति का प्रतीक

    रांची : झारखंड दौरे पर आए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने रविवार को कहा कि देश को अपनी सेनाओं के शौर्य और पराक्रम पर गर्व है। उन्होंने कहा कि भारत की सेनाएं न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा कर रही हैं, बल्कि आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक लड़ाई में भी नई नीति और स्पष्ट रणनीति के साथ अग्रसर हैं।

    वे जमशेदपुर स्थित लोयोला स्कूल के फैजी ऑडिटोरियम में आयोजित सिंहभूम चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्लेटिनम जुबली समारोह में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने अपने भाषण में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अभियान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब केवल रक्षात्मक नीति नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ा चुका है।

    “यदि कोई देश भारत में आतंकवाद फैलाने की कोशिश करेगा, तो उसका परिणाम ऑपरेशन सिंदूर से भी अधिक कठोर होगा,” ओम बिरला ने स्पष्ट चेतावनी दी।

    झारखंड पहुंचते ही बिरसा मुंडा को किया नमन.

    रविवार को दोपहर 12:41 बजे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला रांची से हवाई मार्ग द्वारा जमशेदपुर के सोनारी एयरपोर्ट पहुंचे। यहां से वे सीधे लोयोला स्कूल पहुंचे, जहां पारंपरिक जनजातीय रीति-रिवाजों के अनुसार उनका भव्य स्वागत किया गया।

    इससे पहले, रांची में उनके आगमन पर झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रविंद्र नाथ महतो और रक्षा राज्य मंत्री एवं रांची के सांसद संजय सेठ ने एयरपोर्ट पर उनका आत्मीय स्वागत किया। इसके बाद वे बिरसा चौक पहुँचे, जहाँ उन्होंने धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

    “भगवान बिरसा मुंडा ने न केवल आदिवासियों के अधिकारों, बल्कि उनकी संस्कृति, जंगल और ज़मीन के लिए भी संघर्ष किया। उनकी प्रेरणा आज भी देश के लिए पथप्रदर्शक है,” ओम बिरला ने कहा।

    आदिवासी समाज से जुड़ाव और सम्मान की भावना.

    ओम बिरला के दौरे को झारखंड में विशेष महत्व दिया जा रहा है, खासकर आदिवासी समुदाय के बीच। बिरसा मुंडा की धरती पर आकर उन्होंने अपने संबोधन में इस क्षेत्र की ऐतिहासिक चेतना और संस्कृति को सम्मान देने की बात कही। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की आत्मनिर्भरता और गौरवशाली परंपराएं देश की ताकत हैं।

    कड़ी सुरक्षा व्यवस्था, राजभवन में रात्रि विश्राम.

    लोकसभा अध्यक्ष की यात्रा को लेकर प्रशासन ने रांची और जमशेदपुर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। उनके कार्यक्रमों की श्रृंखला में शामिल होकर वे रविवार रात्रि को राजभवन में विश्राम करेंगे।

    ओम बिरला के दौरे का उद्देश्य न केवल राजनीतिक और प्रशासनिक संवाद है, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक पहलों को भी बल देना है। वे रांची में कई अन्य कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेंगे, जहाँ वे व्यापार, उद्योग, शिक्षा और समाज के विविध वर्गों से संवाद करेंगे।

  • मइयां सम्मान योजना : किस्तों के इंतजार में लाखों महिलाएं, सवालों के घेरे में प्रशासनिक प्रक्रिया

    परवेज़ आलम.

    झारखंड सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मुख्यमंत्री मइयां सम्मान योजना एक बार फिर सुर्खियों में है। अप्रैल और मई माह की किस्त का इंतजार कर रहीं लाभार्थी महिलाएं अब यह जानने को बेताब हैं कि आखिर उनके खातों में सम्मान राशि ट्रांसफर क्यों नहीं हो रही। जबकि महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग ने 13 मई को ही राज्यभर के जिलों को 9,609 करोड़ रुपये आवंटित कर दिए हैं।

    तो फिर पैसा लाभुकों के खाते में क्यों नहीं  ?

    सरकारी गाइडलाइन के अनुसार, हर माह की 15 तारीख तक लाभुकों के बैंक खातों में सम्मान राशि भेज दी जानी चाहिए। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठ रहा है कि जब राशि का आवंटन समय पर हो चुका है, तो ट्रांसफर में देरी क्यों हो रही है ? जानकारी के अनुसार, अधिकांश जिलों ने 15 मई से पहले ही तकनीकी और प्रशासनिक तैयारी पूरी कर ली थी।

    हालांकि विभाग की ओर से निर्देश जारी किया गया है कि राशि केवल उन्हीं महिलाओं को दी जाए, जो इसके लिए पूरी तरह पात्र हैं। इसीलिए आधार सीडिंग और खातों का सत्यापन (cross verification) तेजी से किया जा रहा है। जिला कोषांगों का कहना है कि उन्हें राज्य मुख्यालय से ‘ग्रीन सिग्नल’ मिलने की देर है, उसके बाद राशि तुरंत ट्रांसफर कर दी जाएगी।

    एक साथ दो किस्त या सिर्फ एक ? बनी हुई है अनिश्चितता.

    13 मई को राशि आवंटन के समय यह उम्मीद जताई गई थी कि अप्रैल और मई – दोनों महीनों की संयुक्त किस्त (5,000 रु.) लाभुकों को दी जाएगी। मगर अब सूत्रों के मुताबिक, केवल अप्रैल माह की किस्त दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। विभागीय स्तर पर कोई स्पष्ट आदेश नहीं जारी किया गया है, जिससे स्थिति को लेकर भ्रम और भी गहरा गया है।

    सबसे ज्यादा लाभुक कहां   ?

    योजना के आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे अधिक लाभुक गिरिडीह जिले से हैं, इसके बाद रांची, धनबाद, बोकारो और पलामू क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें स्थान पर हैं। हालांकि विभाग की ओर से यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस बार कितने लाभार्थियों को सम्मान राशि दी जाएगी।

    एक अनुमान के अनुसार, करीब 43 लाख महिलाएं इस बार सम्मान राशि पाने वाली हैं। यह संख्या पहले जारी 56.61 लाख लाभुकों की सूची से काफी कम है। जनवरी में जब पहली बार राशि ट्रांसफर की गई थी, तो बड़ी संख्या में अपात्र लाभुकों की पहचान हुई थी। इसके बाद ही लाभुकों के आधार से लिंक खातों की अनिवार्यता तय की गई।

    पहले भी हो चुकी है छंटनी और संशोधन.

    मार्च महीने में एक साथ जनवरी, फरवरी और मार्च की किस्त 37.55 लाख महिलाओं को भेजी गई थी। उसके बाद, जब खातों की जांच-पड़ताल पूरी हुई, तो अप्रैल में 5.52 लाख अतिरिक्त लाभुकों को राशि दी गई थी। इसका मतलब है कि विभाग द्वारा अपात्र लाभुकों की छंटनी और नए पात्र लाभार्थियों को शामिल करने की प्रक्रिया अभी भी जारी है।

    आगे क्या?

    फिलहाल, जिला कोषांगों से लेकर लाभार्थियों तक — सबकी निगाहें राज्य मुख्यालय से मिलने वाले अंतिम निर्देश पर टिकी हैं। लेकिन अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि यह ‘ग्रीन सिग्नल’ आखिर कब मिलेगा।

    इस योजना को लेकर सरकार की गंभीरता और पारदर्शिता की मंशा तो स्पष्ट है, लेकिन सूचना के अभाव और स्पष्ट संवाद की कमी ने योजना के क्रियान्वयन को लेकर असमंजस की स्थिति उत्पन्न कर दी है।
    मुख्यमंत्री मइयां सम्मान योजना सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से एक सराहनीय पहल है, लेकिन यदि इसके वितरण में पारदर्शिता और त्वरित प्रक्रिया सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह योजना अपनी राजनीतिक और सामाजिक साख को कमजोर कर सकती है। लाभुकों का धैर्य जवाब न दे, इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार समय रहते स्थिति स्पष्ट करे और भरोसे का माहौल बनाए रखे।

     

  • भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच अमित शाह का  झारखंड दौरा टला, पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक रद्द

    BY THE NEWS POST4U

    RANCHI: भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के मद्देनज़र केंद्र सरकार ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। इन्हीं फैसलों की श्रृंखला में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का झारखंड दौरा और रांची में होने वाली पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक रद्द कर दी गई है। अमित शाह को 9 मई को रांची पहुंचना था और 10 मई को बैठक में भाग लेना था।

    केंद्र सरकार की बैठक पर लगा विराम

    सूत्रों के मुताबिक, 10 मई को रांची में पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक आयोजित होनी थी, जिसमें बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों को शामिल होना था। बैठक में क्षेत्रीय विकास, आंतरिक सुरक्षा, सीमावर्ती क्षेत्रों की चुनौतियाँ और केंद्र-राज्य समन्वय जैसे मुद्दों पर चर्चा प्रस्तावित थी। हालाँकि बैठक रद्द करने का कोई आधिकारिक कारण सरकार की ओर से सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि भारत-पाकिस्तान के बीच उत्पन्न हुए संभावित सैन्य तनाव की पृष्ठभूमि में यह निर्णय लिया गया है।

    सीमावर्ती राज्यों के CM और LG के साथ हुई अहम बैठक

    गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उपराज्यपालों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की, जिनकी सीमाएँ पाकिस्तान और नेपाल से लगती हैं। इस बैठक में सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की गई और संवेदनशील इलाकों में सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दिए गए। केंद्र सरकार का उद्देश्य देश की सीमाओं को पूर्णतः सुरक्षित बनाए रखना है।

    झारखंड सरकार का केंद्र को समर्थन.

    झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के प्रति समर्थन जताते हुए कहा, “यह समय देश की एकता और अखंडता के लिए एकजुट रहने का है। केंद्र और सेना जो भी निर्णय लेंगी, झारखंड सरकार उसका समर्थन करेगी।” उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और वर्तमान हालात में राजनीतिक बयानबाज़ी से परहेज़ करते हुए देशहित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने बैठक की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली थीं और गृह मंत्री को राजकीय अतिथि घोषित किया गया था, लेकिन राष्ट्रीय हितों के मद्देनज़र जो भी फैसला लिया गया है, वह स्वागत योग्य है।

     

     

  • देवघर में आयोजित हुई उच्चस्तरीय बैठक, श्रावणी मेला 2025 की तैयारियों का खाका तैयार

    देवघर :  आगामी राजकीय श्रावणी मेला 2025 की भव्य और सुरक्षित आयोजन को लेकर मंगलवार को  देवघर परिसदन सभागार में एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता झारखंड सरकार में नगर विकास एवं आवास, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, पर्यटन, कला-संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री सुदिव्य कुमार  सोनू ने की।

    बैठक में पर्यटन सचिव, देवघर व दुमका के उपायुक्त, पर्यटन निदेशक, और अन्य विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। सभी विभागों की तैयारियों कीसमीक्षा करते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि श्रावणी मेले के दौरान श्रद्धालुओं को हर संभव सुविधा, सुरक्षा और सहजता प्रदान की जाए।

    श्रावणी मेला: केवल आयोजन नहीं, आस्था का उत्सव.

    बैठक को संबोधित करते हुए मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा, “श्रावणी मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान है। लाखों श्रद्धालुओं की आस्था इससे जुड़ी है। हमारा लक्ष्य है कि हर श्रद्धालु को सुरक्षित, व्यवस्थित और सम्मानजनक अनुभव मिले।” उन्होंने सभी विभागों को आपसी समन्वय और समयबद्ध कार्यों की प्राथमिकता पर बल देते हुए निर्देशित किया।

    VIP दर्शन पर रोक: समानता को प्राथमिकता.

    एक बड़ा निर्णय यह लिया गया कि इस बार श्रावणी मेले में हर सोमवार को VIP और VVIP दर्शन की सुविधा पूर्णतः बंद रहेगी। इस कदम का उद्देश्य यह है कि किसी भी श्रद्धालु को विशेषाधिकार की वजह से पीछे न हटना पड़े और सभी को समान अवसर मिल सके।

    तकनीक का मेल से रिश्ता: स्मार्ट मेला 2025.

    इस वर्ष मेला क्षेत्र में तकनीकी हस्तक्षेप को बढ़ाते हुए डिजिटल और AI आधारित सुविधाओं को प्रमुखता दी जा रही है:

    • AI आधारित इंटीग्रेटेड मेला कंट्रोल रूम
    • AI चैटबोट – श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन, फीडबैक और हेल्पलाइन सेवाएं
    • AI ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम
    • QR कोड आधारित फीडबैक सिस्टम
    • लोकेशन बेस्ड अटेंडेंस सिस्टम
    • डिजिटल पवेलियन – संस्कृति और पर्यटन को डिजिटल रूप में दिखाने की पहल

    श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं.

    श्रावणी मेला 2025 में श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु इन विशेष व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया:

    • स्वास्थ्य केंद्र और सहायता केंद्र
    • टेंट सिटी, स्वच्छ स्नानगृह, शौचालय, कूड़ेदान
    • पेयजल व्यवस्था, मिस्ट कूलिंग (इंद्र वर्षा)
    • सजावट और स्वागत तोरण द्वारों की भव्य योजना

    सुरक्षा और विधि-व्यवस्था की व्यापक योजना.

    मंत्री ने साफ किया कि मेले में श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोपरि है। इस हेतु:

    • थाना और ट्रैफिक नियंत्रण केंद्र की व्यवस्था
    • अपराध नियंत्रण, वाहन पार्किंग, रूटलाइनिंग की स्पष्ट रणनीति
    • CCTV निगरानी, ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाबल और आपातकालीन प्रतिक्रिया दल

    हर विभाग को मिला समयबद्ध कार्य का निर्देश.

    नगर विकास, पेयजल एवं स्वच्छता, जनसंपर्क, बिजली, स्वास्थ्य, भवन निर्माण आदि विभागों को अपने-अपने कार्यों को समय पर और गुणवत्ता के साथ पूर्ण करने का निर्देश दिया गया।

    श्रावणी मेला 2025: श्रद्धा, व्यवस्था और तकनीक का संगम.

    11 जुलाई से 09 अगस्त 2025 तक चलने वाले इस राजकीय आयोजन को सफल बनाने के लिए झारखंड सरकार पूरी तरह संकल्पित है। इस बार का मेला केवल आस्था का नहीं, बल्कि सुनियोजित व्यवस्था और तकनीक के संगम का प्रतीक होगा।

  • खुफिया इनपुट के बावजूद नहीं हुई सुरक्षा तैयारी, पहलगाम हमले पर खरगे ने केंद्र सरकार को घेरा

    परवेज़ आलम.

    रांची: झारखंड की राजधानी रांची में आयोजित ‘संविधान बचाओ रैली’ के मंच से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले का हवाला देते हुए खरगे ने दावा किया कि हमले से तीन दिन पहले प्रधानमंत्री को खुफिया रिपोर्ट भेजी गई थी। इसके आधार पर पीएम मोदी ने तो अपनी यात्रा रद्द कर दी, लेकिन आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया, जिसके कारण 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई। खरगे ने कहा, “हमले से तीन दिन पहले प्रधानमंत्री को इंटेलिजेंस इनपुट मिला था, जिसके बाद उन्होंने अपना कश्मीर दौरा रद्द कर दिया। लेकिन सवाल यह है कि अगर उन्हें खतरे की जानकारी थी, तो आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर क्या किया गया?”

    जब जानकारी थी, तो सुरक्षा क्यों नहीं ?

    खरगे ने सवाल किया कि यदि प्रधानमंत्री को खतरे की गंभीर जानकारी थी, तो उसी रिपोर्ट को सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय पुलिस के साथ क्यों नहीं साझा किया गया? उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री खुद खतरों से बच गए, लेकिन आम लोगों को क्यों मरने के लिए छोड़ दिया गया?” उन्होंने केंद्र को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि जब सरकार खुद इंटेलिजेंस फेल्योर को स्वीकार कर रही है, तो उसे इन मौतों की जवाबदेही भी लेनी चाहिए।

    आतंकवाद के खिलाफ समर्थन, लेकिन चूक पर सवाल जरूरी.

    कांग्रेस अध्यक्ष ने यह स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ सरकार के हर कड़े कदम का समर्थन करती है। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि “समर्थन का मतलब यह नहीं कि सरकार अपनी लापरवाही पर पर्दा डाले।”

    मीडिया रिपोर्ट का हवाला, पीएम का दौरा रद्द.

    खरगे ने एक अखबार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 19 अप्रैल को प्रधानमंत्री को पहलगाम में खतरे की जानकारी मिली थी, जिसके बाद उन्होंने कश्मीर का दौरा रद्द कर दिया। “जब पीएम खुद नहीं गए, तो यह जानकारी आम लोगों को सुरक्षित रखने के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल हुई?” उन्होंने पूछा।

    रोजगार और अर्थव्यवस्था पर भी उठाए सवाल.

    रैली में खरगे ने आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि देश में 30 लाख सरकारी पद खाली हैं, लेकिन मोदी सरकार इन्हें भरने में रुचि नहीं ले रही। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीति बन गई है – “PSU बंद करो और गरीबों की नौकरी छीनो।”

    उन्होंने यह भी कहा कि कई सरकारी उपक्रमों में कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला, जबकि सरकार दावा करती है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत है। उन्होंने कहा, “अगर जमीन पर हालात नहीं सुधरते, तो आंकड़े महज भ्रम पैदा करने का जरिया बन जाते हैं।”

    जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय की मांग.

    खरगे ने केंद्र सरकार से जल्द जातीय जनगणना शुरू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि ओबीसी आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाए और 50% की सीमा खत्म की जाए। उन्होंने कहा, “वोट हमारा और राज तुम्हारा – यह अब नहीं चलेगा। अब वोट भी हमारा होगा और सरकार भी हमारी होगी।” उन्होंने मोदी सरकार पर पिछड़े वर्गों और गरीबों की आवाज को दबाने का आरोप लगाया।

    सरना धर्मकोड और HEC की बदहाली का मुद्दा.

    रैली में खरगे ने झारखंड के अहम मुद्दों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आगामी जनगणना में सरना धर्मकोड को मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष जारी रखना होगा। साथ ही HEC (हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन) की खराब स्थिति के लिए भी उन्होंने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, “जहां दो-दो साल से वेतन नहीं मिला, वहां कर्मचारी कैसे काम करेंगे? मोदी सरकार की नीति एससी, एसटी और ओबीसी को हाशिए पर ढकेलने की है।”

    संगठन और संविधान की रक्षा का आह्वान.

    खरगे ने कार्यकर्ताओं से पार्टी को मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “अगर कांग्रेस कमजोर हुई, तो न कोई मंत्री रहेगा, न मुख्यमंत्री। संविधान को बचाना है तो एकजुट संघर्ष जरूरी है।”

    शहीद नेताओं को श्रद्धांजलि और जनता का धन्यवाद

    अपने संबोधन के अंत में खरगे ने महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि “देश पहले है, जाति, धर्म और पार्टी बाद में।” उन्होंने झारखंड की जनता को ‘इंडिया‘ गठबंधन को समर्थन देने के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि राज्य में जनहितैषी सरकार बेहतर ढंग से काम कर रही है।

    मंच पर दिखी कांग्रेस की ताकत

    संविधान बचाओ रैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावे कांग्रेस संगठन महासचिव के.सी.वेणुगोपाल, छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, विधायक दल के नेता प्रदीप यादव, कार्यक्रम संयोजक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू, पूर्व मंत्री सुबोधकांत सहाय, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर के अलावे कांग्रेस कोटे के हेमंत सरकार के मंत्री राधाकृष्ण किशोर, दीपिका पांडे सिंह, डॉ इरफान अंसारी, शिल्पी नेहा तिर्की आदि मौजूद थे

    इस दौरान कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ के बीच कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का जमकर स्वागत किया गया. रैली में भारी संख्या में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने पार्टी के उत्साह को और मजबूती दी।

  • रांची में ‘संविधान बचाओ रैली’ को संबोधित करेंगे मल्लिकार्जुन खरगे, भाजपा ने साधा तीखा निशाना

    By the news post4u

    रांची: कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 6 मई को एक दिवसीय दौरे पर विशेष विमान से रांची पहुंचेंगे। इस दौरे के दौरान वे रांची के ऐतिहासिक पुराने विधानसभा मैदान में आयोजित ‘संविधान बचाओ’ रैली को संबोधित करेंगे। यह रैली देश के मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की अवधारणा को बचाने के उद्देश्य से आयोजित की जा रही है।

    कांग्रेस के झारखंड प्रदेश मुख्य प्रवक्ता लाल किशोर नाथ शाहदेव ने बताया कि खरगे पहली बार झारखंड प्रदेश कांग्रेस की पोलिटिकल अफेयर कमेटी और विस्तारित कार्यसमिति की बैठक में भाग लेंगे। साथ ही रैली के बाद होटल बीएनआर चाणक्य में पार्टी के जिला अध्यक्षों की बैठक को भी संबोधित करेंगे, जहां संगठनात्मक मुद्दों पर रणनीतिक चर्चा होगी।

    रैली की व्यापक तैयारी.

    ‘संविधान बचाओ’ रैली को सफल बनाने के लिए कांग्रेस के विधायक, सांसद, मंत्री और जिला स्तर के पदाधिकारी घर-घर जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। भीषण गर्मी और बारिश की आशंका को ध्यान में रखते हुए आयोजन स्थल पर विशेष जर्मन हैंगर और दो अतिरिक्त पंडाल लगाए जा रहे हैं ताकि राज्य भर से आने वाले कार्यकर्ताओं और आम लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

    शाहदेव ने बताया कि इस रैली में जातिगत जनगणना की दिशा में मिली प्रारंभिक सफलता की जानकारी साझा की जाएगी और अनुच्छेद 15(5) के शीघ्र क्रियान्वयन की मांग को प्रमुखता दी जाएगी। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने हाल ही में एक पत्र भेजा है जिसमें राज्य स्तर पर नियंत्रण कक्ष और नोडल पदाधिकारी की नियुक्ति कर गतिविधियों की निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही 30 मई तक चलने वाले घर-घर अभियान और चौपालों के आयोजन की योजना भी बनाई गई है।

    भाजपा का तीखा हमला: “बिल्ली हज को चली”

    कांग्रेस की इस पहल पर झारखंड भाजपा ने कड़ा हमला बोला है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस की ‘संविधान बचाओ’ रैली को “70 चूहे खाकर बिल्ली हज को चली” जैसी कहावत से जोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने लंबे शासनकाल में संविधान की सबसे ज्यादा अवहेलना की है, और अब वही पार्टी खुद को संविधान का रक्षक बताने का नाटक कर रही है।

    मरांडी ने कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए निजी हितों के लिए संविधान में 80 बार संशोधन किए। 1951 में ही नेहरू ने पहला संशोधन किया, और आपातकाल के दौरान तो संविधान को कुचल ही दिया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं के लिए संविधान अब “जेबी किताब” बन चुका है।

    भाजपा नेता ने मल्लिकार्जुन खरगे से मांग की कि रांची की रैली से पहले उन्हें मंच पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या कांग्रेस उस मंत्री के बयान से सहमत है, जो कहता है कि “मेरे लिए शरीयत ऊपर है और संविधान नीचे।”

    मरांडी ने यह भी कहा कि अगर कांग्रेस को वास्तव में संविधान पर विश्वास है तो नेशनल हेराल्ड मामले में राहुल गांधी से पूछताछ पर उसके नेता सड़कों पर क्यों उतर आते हैं। उन्होंने कांग्रेस पर संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर राज्य सरकारों को गिराने का भी आरोप लगाया।
    6 मई को होने जा रही ‘संविधान बचाओ’ रैली सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश में सामाजिक न्याय और संविधान की व्याख्या को लेकर छिड़ी बहस का केंद्र बन चुकी है। जहां कांग्रेस इसे लोकतंत्र और अधिकारों की लड़ाई बता रही है, वहीं भाजपा इसे ढोंग और पाखंड करार दे रही है। देखना होगा कि इस रैली के जरिए कांग्रेस क्या संदेश देने में सफल होती है, और भाजपा इसका किस तरह से जवाब देती है।

  • झारखंड में राशन व्यवस्था पर ओटीपी की नई शर्त: तकनीक के जाल में उलझे भूख से जूझते लोग

    By The News Post4U

    चाईबासा/लातेहार – झारखंड के ग्रामीण इलाकों में राशन जैसी बुनियादी जरूरत को हासिल करना अब सिर्फ पात्रता या ज़रूरत की बात नहीं रही। अब इसके लिए आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर और उस पर आने वाला ओटीपी यानी ‘वन टाइम पासवर्ड’ जरूरी हो गया है। यह सुनने में एक तकनीकी प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन ज़मीन पर इसके नतीजे भूख, अपमान और असहायता के रूप में सामने आ रहे हैं।

    लातेहार जिले की हमीदा बीबी (39) की कहानी इस व्यवस्था की जमीनी सच्चाई बयां करती है। हमीदा जुलाई 2024 में अपने दो नाबालिग बेटों का नाम राशन कार्ड में जुड़वाने के लिए जन सेवा केंद्र गई थीं। लेकिन वहां ऑपरेटर ने उन्हें बताया कि आवेदन को आगे बढ़ाने के लिए उनके आधार से लिंक मोबाइल नंबर पर आया ओटीपी दर्ज करना होगा। हमीदा ने फोन चेक किया, लेकिन कोई संदेश नहीं आया। कुछ देर बाद पता चला – उनका मोबाइल नंबर आधार से लिंक ही नहीं है।

    बदलते नियम, बिना सूचना.

    यह समस्या अकेली हमीदा की नहीं है। झारखंड की नई पीडीएस (जन वितरण प्रणाली) गाइडलाइन के तहत अब राशन कार्ड में किसी भी तरह का बदलाव — जैसे सदस्य जोड़ना या हटाना, नाम या उम्र में सुधार — बिना ओटीपी के नहीं हो सकता। पहले तक केवल मुखिया का आधार नंबर और राशन कार्ड नंबर काफी था, लेकिन अब ओटीपी के बिना सिस्टम आगे नहीं बढ़ता।

    राज्य के अधिकारी दावा करते हैं कि यह कदम सुरक्षा बढ़ाने और फर्जीवाड़ा रोकने के लिए उठाया गया है। लेकिन गांव की महिलाओं और सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए यह बदलाव एक नई दीवार बनकर खड़ा हो गया है।

    “मुखिया हैं, पर मोबाइल नहीं तो कुछ नहीं कर सकते”

    झारखंड के कई हिस्सों में महिलाएं ही घर की मुखिया हैं — यह व्यवस्था राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की एक प्रगतिशील पहल का हिस्सा है। लेकिन जब आधार से जुड़ा मोबाइल ही नहीं है, तो ये महिलाएं सिस्टम में अदृश्य हो जाती हैं।

    सरयू ब्लॉक के चोरहा पंचायत की एक महिला ने बताया कि वह अपनी सास की मृत्यु के बाद घर की मुखिया बनीं, लेकिन महीनों की कोशिश के बाद भी राशन कार्ड में अपना नाम नहीं जुड़वा सकीं। “कई बार प्रखंड और जिला मुख्यालय गई, लेकिन कोई हल नहीं निकला,” उन्होंने कहा, “अब तो हार मान ली है।”

    तकनीक बनी बाधा, ना कि समाधान.

    आधार और मोबाइल से जुड़ी यह नई अनिवार्यता ग्रामीण महिलाओं के लिए एक ऐसी तकनीकी बाधा बन गई है, जिसे पार करना कई बार असंभव होता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार झारखंड में 10% घरों में मोबाइल फोन ही नहीं है। और जिनके पास मोबाइल है भी, वहां अक्सर नंबर निष्क्रिय होते हैं, या किसी पुरुष रिश्तेदार के नाम पर होते हैं।

    2023 में NSSO के सर्वे के अनुसार, देश में 10 में से 7 गैर-मोबाइल उपयोगकर्ता महिलाएं हैं। ऐसे में ओटीपी आधारित प्रमाणीकरण की बाध्यता महिलाओं को अपने ही अधिकारों से वंचित कर रही है।

    बिचौलियों का खेल, बढ़ती जेब पर चोट.

    जहां सिस्टम जटिल है, वहां बिचौलियों की आमद तय मानी जाती है। बरहेट जैसे इलाकों में लोगों से आधार या राशन अपडेट कराने के लिए ₹500 से लेकर ₹1,600 तक वसूले गए। यह वे सेवाएं हैं जो सामान्यतः मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध होनी चाहिए थीं।

    कई लोगों को अपने दस्तावेज अपडेट कराने के लिए बार-बार प्रखंड कार्यालय जाना पड़ता है, जिससे ना सिर्फ परिवहन खर्च बढ़ता है, बल्कि उस दिन की मजदूरी भी चली जाती है।

    क्या राज्य अपने हकदारों को पहचानता है?

    राशन, सब्सिडी और जन-कल्याण की योजनाएं कोई उपकार नहीं हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत ये नागरिकों का कानूनी अधिकार हैं — और इसमें सबसे अहम पात्र हैं महिलाएं और गरीब। लेकिन आधार-ओटीपी प्रमाणीकरण जैसे तकनीकी बदलावों ने इन हकदारों को सिस्टम से दूर धकेलना शुरू कर दिया है।

    संवेदनशील समाधान की ज़रूरत.

    डिजिटलीकरण अपने आप में समस्या नहीं है — समस्या है उसका एकमुश्त और बिना तैयारी के लागू किया जाना। झारखंड सरकार को चाहिए कि वो:

    • वैकल्पिक प्रक्रिया लागू करे जहां ओटीपी की अनिवार्यता न हो।
    • मोबाइल-आधार लिंकिंग की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाए।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक आधार केंद्र स्थापित करे।
    • जन-जागरूकता के माध्यम से पात्र लोगों को बदलावों की जानकारी दे।
    • और सबसे जरूरी, महिलाओं की डिजिटल पहुंच को प्राथमिकता के साथ मजबूत किया जाए।

    जब तक यह सुनिश्चित नहीं किया जाता कि तकनीकी बदलावों का लाभ समाज के सबसे वंचित हिस्से तक पहुंचे — तब तक डिजिटलीकरण भूख, अपमान और असमानता का दूसरा नाम ही बना रहेगा।

    *लेखक लिबटेक इंडिया से जुड़े हैं, जो कोलेबरेटिव रिसर्च एंड डिसेमिनेशन (CORD) का एक केंद्र है।

  • जातीय जनगणना: कांग्रेस का हथियार अब बीजेपी की रणनीति?

      परवेज़ आलम .

    देश की राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ उस वक्त आया जब मोदी सरकार ने 2026 में होने वाली जनगणना के साथ-साथ जातीय जनगणना (Caste Census) करवाने का ऐलान कर दिया। यह वही मांग थी जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले कई सालों  से अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर पेश कर रहे थे। ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे नारों के जरिए कांग्रेस सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना चुकी थी। लेकिन अब यही मुद्दा, सत्ता पक्ष की रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है। बुधवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट मीटिंग के बाद यह स्पष्ट किया कि सरकार अब जाति आधारित आंकड़ों को भी आधिकारिक रूप से एकत्र करेगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति में रही है और कभी भी ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे लागू नहीं किया। वैष्णव ने कहा कि मोदी सरकार ने समाज के हर वर्ग के हित में फैसले लिए हैं और यह निर्णय भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

     क्यों जातीय जनगणना का फैसला कांग्रेस के लिए झटका है?

    जातीय जनगणना की मांग पर सबसे मुखर रहे राहुल गांधी को यह उम्मीद थी कि यह मुद्दा बीजेपी के ओबीसी और दलित वोट बैंक में सेंध लगाएगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में इस मुद्दे ने विपक्ष को फायदा भी पहुंचाया। लेकिन अब जब मोदी सरकार ने खुद इसे स्वीकार कर लिया है, तो कांग्रेस की बढ़त पर पानी फिरता दिख रहा है। सरकार के इस फैसले ने राहुल गांधी के उस नैरेटिव को कमजोर कर दिया है, जिसमें वे बीजेपी को सामाजिक न्याय विरोधी बताकर घेरते थे।

    पहला असर: बिहार और बंगाल में बीजेपी को लाभ की उम्मीद.

    बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। जातीय जनगणना का मुद्दा यहां सबसे अधिक प्रभावी साबित हो सकता है, क्योंकि राज्य की राजनीति पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आधारित है। हालांकि नीतीश कुमार की सरकार ने पहले ही जातिगत सर्वे कराया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र की ओर से इसे करवाना, ओबीसी मतदाताओं को यह संकेत देगा कि नरेंद्र मोदी सरकार उनकी गिनती और हक़ को लेकर गंभीर है। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगियों, खासकर आरजेडी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

     

     उत्तर प्रदेश में समाजवादी समीकरण पर असर.

    2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण के सहारे बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में हैं। जातीय जनगणना, जिसे अब केंद्र सरकार लागू करेगी, इस समीकरण को भी प्रभावित कर सकती है। बीजेपी की कोशिश होगी कि वह ओबीसी वर्ग को यह भरोसा दिलाए कि पार्टी अब उनकी गिनती और हिस्सेदारी दोनों सुनिश्चित करने जा रही है। इस तरह से विपक्ष के लिए ‘सामाजिक न्याय’ का नैरेटिव खड़ा करना और कठिन हो जाएगा।

    राजनीतिक बढ़त से सामाजिक प्रभाव तक.

    1931 के बाद देश में जातियों की कोई आधिकारिक जनगणना नहीं हुई। आज़ाद भारत में यह पहली बार होगा जब केंद्र सरकार पूरे देश में जातीय आंकड़े जुटाएगी। यह कदम न केवल राजनीतिक असर डालेगा, बल्कि नौकरियों, शिक्षा, कल्याण योजनाओं और संसाधनों के वितरण में भी नए बदलाव की नींव रख सकता है। मोदी सरकार इसे ‘सामाजिक समावेश’ और ‘डाटा आधारित नीति निर्माण’ के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, जो कि कांग्रेस के पुराने वादों को अप्रासंगिक बना देगा।

    कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती.

    राहुल गांधी अब तक इस मुद्दे के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। उन्होंने न केवल केंद्र को घेरा, बल्कि कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस शासित सरकारों से जातीय आंकड़े जारी करने की मांग भी की। अब जबकि बीजेपी खुद यह पहल कर रही है, कांग्रेस के पास या तो इसका स्वागत करने का विकल्प है—जो उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर दिखा सकता है, या विरोध करने का विकल्प—जिससे वे विरोधाभासी नजर आएंगे। इस दोहरे संकट में कांग्रेस को अपनी रणनीति फिर से गढ़नी होगी।

    सत्ता की बाज़ी कैसे पलटी ?

    जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में मुद्दे स्थायी नहीं होते, बल्कि उनका उपयोग और नियंत्रण ही असली खेल है। कांग्रेस ने जिस सामाजिक न्याय के एजेंडे को खड़ा किया, अब उसी को अपनाकर बीजेपी उसे उलझाने की तैयारी में है। 2026 की जनगणना के साथ जातीय गणना का प्रस्ताव, न केवल राहुल गांधी के एजेंडे को कमजोर करता है, बल्कि 2027 तक बीजेपी को ओबीसी समाज में फिर से अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर भी देता है।