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  • ‘मांझी थान और जाहेर थान सिर्फ पूजा स्थल नहीं हैं, यह पहचान हैं-मराण्डी

    गिरिडीह : झारखंड की मिट्टी में बसे एक ऐसे सांस्कृतिक विरासत की बात बताते हैं , जो सिर्फ पूजा स्थल नहीं, बल्कि एक पूरे समाज की पहचान है। संथाल समाज की आत्मा, उनकी परंपरा, और उनकी जड़ों का प्रतीक—मांझी थान और जाहेर थान।  और इस चर्चा के केंद्र में हैं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी।”

    आज बाबूलाल मरांडी अपने गांव कोदईबांक में पहुंचे। गांव के मुहाने पर मांझीथान के निर्माण के लिए भूमि पूजन किया। यह महज एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उस समाज के प्रति एक संवेदनशील दृष्टिकोण था, जो अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए संघर्षरत है।

    “बाबूलाल मरांडी ने कहा,। अगर ये समाप्त हो गए, तो समझिए, हमारी पहचान भी समाप्त हो जाएगी।’”

    संथाल समाज की परंपरा में मांझी थान और जाहेर थान का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं है। यह उनके इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। मांझी थान उस धरती से जुड़ाव का प्रतीक है, जहां यह समाज अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ बसता है।

    “बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट कहा, ‘हम तभी तक संथाल हैं, जब तक जाहेर थान और मांझी थान की पूजा करते हैं। यह हमारी पहचान है, हमारी जड़ें हैं।’”

    बाबूलाल मरांडी ने अपने इस कदम से एक बड़ी बात कही। यह केवल आस्था का सवाल नहीं, बल्कि एक समुदाय की सांस्कृतिक आत्मा को बचाने की पहल है।

     

  • मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मिली हाइ कोर्ट से राहत

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……

    आज की खबर झारखंड की राजनीति के गलियारों से है, जहां की सांस ली। झारखंड हाईकोर्ट ने ईडी के समन को लेकर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने के आदेश से अंतरिम राहत दी है।

    अब कहानी की परतें खोलते हैं।
    रांची की एमपी-एमएलए कोर्ट ने 25 नवंबर को हेमंत सोरेन को 4 दिसंबर को कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया था। मामला ईडी की ओर से दाखिल शिकायतवाद का है, जिसमें आरोप लगाया गया कि हेमंत सोरेन ने जमीन घोटाले में पूछताछ के लिए भेजे गए 10 समनों में से केवल दो पर उपस्थिति दर्ज कराई। बाकी बार वह अनुपस्थित रहे।

    इस आदेश के खिलाफ हेमंत सोरेन ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और वहां, जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की बेंच ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश पर रोक लगा दी। कोर्ट ने ईडी से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 16 दिसंबर को तय की है।

    अब जरा रुकिए। यह केवल एक कानूनी मसला नहीं है। यह एक राजनीतिक कथा भी है।
    ईडी के समन, सीजेएम कोर्ट का आदेश, फिर मामला एमपी-एमएलए कोर्ट में पहुंचना और अब हाईकोर्ट में राहत मिलना—यह सब क्या संकेत देता है? राजनीति और कानून के इस ताने-बाने में, असल मुद्दा जनता के सरोकारों से कहीं छूट तो नहीं गया?

    हेमंत सोरेन के खिलाफ 19 फरवरी 2024 को शिकायत दर्ज की गई थी। ईडी का आरोप है कि जमीन घोटाले में उनका नाम सामने आया है। समन पर अनुपस्थिति को पीएमएलए की धारा 63 और आईपीसी की धारा 174 के तहत गैरकानूनी बताया गया। लेकिन, यह भी देखना होगा कि क्या यह मामला केवल कानून का पालन न करने का है, या इसके पीछे कोई और कहानी छुपी है?

    राजनीति और कानून के इस खेल में हमेशा सवाल उठते हैं।
    क्या हेमंत सोरेन को दी गई यह राहत उनकी स्थायी सुरक्षा की गारंटी है, या सिर्फ कुछ समय के लिए मिली राजनीतिक सांस? ईडी का अगला कदम क्या होगा? और 16 दिसंबर को अदालत का रुख क्या होगा?

    जब एक मुख्यमंत्री को अदालत में हाजिर होने से राहत मिलती है, तो यह सिर्फ एक कानूनी खबर नहीं होती। यह लोकतंत्र की बारीकियों को समझने का मौका भी होता है।

  • बांग्लादेश घुसपैठ पर निशिकांत का ‘सियासी ब्यान ‘: खतियान 1932, घुसपैठिए बाहर !

    रांची :    गोड्डा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने अपने तीखे बयान से सियासी तापमान बढ़ा दिया है। बांग्लादेशी घुसपैठ पर भाजपा का रुख साफ करते हुए उन्होंने एनआरसी लागू करने और 1932 के खतियान के आधार पर लोगों को चिह्नित करने की बात कही है। दुबे का कहना है कि जिनके पास खतियान नहीं होगा, उन्हें बोरे में पैक कर बांग्लादेश भेजा जाएगा।

    ‘मुद्दों से समझौता नहीं’: दुबे का एलान

    डॉ. दुबे का दावा है कि भाजपा की सियासत चुनावी हार-जीत के ऊपर है। उनका कहना है, “घुसपैठ और आदिवासी जनसंख्या घटने का मुद्दा जमीनी है। भाजपा और संघ परिवार इसे सदन से सड़क तक उठाता रहेगा।” विधानसभा चुनाव के बाद संथाल परगना में हुई घटनाओं को दुबे ने बांग्लादेशी घुसपैठ का ‘सबूत’ बताया।

    ‘संथाल परगना में जनसांख्यिकी संकट’

    सांसद ने आदिवासी जनसंख्या घटने के मुद्दे को भी जोरशोर से उठाया। घुसपैठियों के कारण संथाल परगना के जनसांख्यिकी स्वरूप में बदलाव हो रहा है, और यह भाजपा के लिए एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। दुबे ने कहा, “घुसपैठ और आदिवासियों के हक के खिलाफ जो भी ताकतें काम कर रही हैं, उन्हें बेनकाब किया जाएगा।”

    ‘खतियान 1932’: भाजपा की नई रणनीति?

    सांसद ने एनआरसी को 1932 के खतियान से जोड़ते हुए इसे भाजपा की प्रतिबद्धता बताया। यह प्रस्ताव झारखंड में नया राजनीतिक भूचाल ला सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञ इसे भाजपा की “आदिवासी पहचान और बाहरी बनाम स्थानीय” के मुद्दे पर नई रणनीति मान रहे हैं।

    क्या यह रणनीति कारगर होगी?

    राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा की यह सख्त भाषा चुनावी हार के झटके से उबरने की कोशिश है, या यह झारखंड में पार्टी के ‘कट्टरवाद बनाम समावेशिता’ के एजेंडे का हिस्सा है?

    डॉ. दुबे के बयानों में राजनीतिक तल्खी जितनी ज्यादा है, जमीनी क्रियान्वयन उतना ही चुनौतीपूर्ण दिखता है। क्या 1932 के खतियान को एनआरसी का आधार बनाना व्यावहारिक होगा? और क्या घुसपैठ का मुद्दा झारखंड के चुनावी परिदृश्य में भाजपा को फायदा पहुंचाएगा?

    झारखंड में भाजपा की सियासी राह मुश्किल दिख रही है। डॉ. निशिकांत दुबे का यह बयान हार से उपजी हताशा है या नई रणनीति का आगाज? जवाब वक्त देगा। लेकिन इतना तय है कि भाजपा झारखंड की राजनीति को ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ और ‘आदिवासी बनाम घुसपैठिया’ के फ्रेम में बांधने की तैयारी में है।

  • महिलाओं के खातों में 2500 रुपये । तारीख़ लिख लीजिए, 11 दिसंबर !

    RANCHI: “हेमंत सोरेन सरकार के ‘मंईयां सम्मान योजना’ की पांचवीं किस्त पर नज़र डालिए। वो जो बदलाव की धारा बहती है, वो अब महिलाओं के खातों में 1000 नहीं, पूरे 2500 रुपये लेकर आ रही है। झारखंड के गांव-गांव, शहर-शहर से एक ही आवाज़ गूंज रही है – ‘मंईयां का सम्मान बढ़ा है, हर घर में खुशियां छाई हैं।’”

    झारखंड की सड़कों से लेकर सत्ता के गलियारों तक:
    57 लाख महिलाओं के खातों में 2500 रुपये पहुंचने को हैं तैयार। तारीख़ लिख लीजिए, 11 दिसंबर! कल्याण विभाग पसीना बहा रहा है ताकि हर बहन के चेहरे पर मुस्कान आए। सोचिए, अब तक चार किस्तों में जो 1000 रुपये भेजे गए थे, उनकी जगह 2500 रुपये मिलेंगे।

    चुनावी राजनीति का सियासी खेल:
    विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने ‘गोगो दीदी योजना’ में 2100 रुपये का वादा किया। लेकिन हेमंत सोरेन, जो अपने वादों पर अडिग रहते हैं, उन्होंने सीधे 2500 का दांव खेला। और चुनावी नतीजों ने दिखा दिया कि ये दांव सफल रहा। इंडिया गठबंधन ने प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज की, और मंईयां सम्मान योजना इसमें एक बड़ा कारण बनी।

    झारखंड के घरों की चूल्हे की बातें:
    “अब चूल्हे पर सिर्फ खाना नहीं, सपने भी पकेंगे,” कह रही हैं मरियम बीबी , जो इस योजना से बेहद खुश हैं। ग्रामीण झारखंड में ये योजना एक नई उम्मीद बनकर उभरी है।

    रेवड़ी बांटने जैसे आरोप कहीं खरे नहीं उतरते

    झारखंड में मंईयां योजना को चालू रखने के लिए राज्य सरकार को संसाधनों की कमी होने के आसार अभी तक नहीं है। वित्त विभाग के अधिकारियों की मानें तो पिछले कुछ वर्षों में झारखंड ने कहीं से कर्ज नहीं लिया है और सरप्लस बजट भी रहा है।
    ऐसे में कर्ज लेकर रेवड़ी बांटने जैसे आरोप कहीं खरे नहीं उतरते। सरकार एक बार फिर इस योजना के लिए कोई कर्ज नहीं लेगी। ऐसे में यह तय होता दिख रहा है कि कर्ज लिए बगैर भी मंईयां योजना को जारी रखा जा सकता है। वित्त विभाग के सूत्रों के अनुसार इस उपलब्धि के पीछे पिछले चार-पांच वर्षों से चले आ रहे वित्तीय सुधारों का व्यापक असर है।
    हेमंत सरकार की ये योजना न सिर्फ आर्थिक मदद, बल्कि सामाजिक बदलाव की कहानी भी लिख रही है। ये सिर्फ 2500 रुपये नहीं, ये महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सम्मान का प्रतीक है।

     

  • झारखंड और असम: राजनीति के चाय बागानों में नई बयार!

    रांची से पवन हवाओं के संग आई एक नई खबर, झारखंड की मिट्टी से लेकर असम के चाय बागानों तक सियासी सुगंध फैल रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी नई पारी की पहली ही कैबिनेट बैठक में चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासियों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए असम में एक सर्वदलीय टीम भेजने का ऐलान किया। ये फैसला जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा संदेश देता है।

    असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा है कि झारखंड के कुछ इलाकों का अध्ययन करने के लिए उनकी सरकार भी दो प्रतिनिधिमंडल भेजेगी। “हम देखेंगे कि आखिर झारखंड में ऐसी कौन-सी ‘विशेष चीजें’ हैं जो ध्यान खींच रही हैं।”

    पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान झामुमो और भाजपा के बीच घुसपैठ और आदिवासियों की स्थिति पर तीखे आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिले। अब लगता है कि इस राजनीतिक मंथन का ‘अध्ययन यात्रा’ के रूप में नया अध्याय शुरू हो गया है।

    हिमंता बिस्वा सरमा का यह बयान भी दिलचस्प है कि उनकी सरकार 5 दिसंबर को होने वाली कैबिनेट बैठक में इस पर और निर्णय लेगी। लेकिन सवाल उठता है कि यह अध्ययन असल में ज़मीन पर आदिवासियों की स्थिति को बेहतर करने की कोशिश है, या फिर राजनीति के चाय बागानों में सियासी चाय की मिठास बढ़ाने की कवायद?

    हेमंत सोरेन की यह पहल उनके नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में पहले कदमों को निर्णायक बनाने की कोशिश है। लेकिन हिमंता बिस्वा सरमा का पलटवार संकेत देता है कि सियासत की इस चाय में खौलने वाले मुद्दे सिर्फ झारखंड या असम तक सीमित नहीं रहने वाले।

    आखिरकार, राजनीति भी तो उसी चाय की तरह है, जिसकी मिठास उसकी कड़वाहट के सही संतुलन से तय होती है। सवाल ये है कि इस बार इस चाय के प्याले में किसकी चीनी कम या ज्यादा पड़ेगी?

  • झारखंड में मिली हार के कारणो की तलाश मे जुटी बीजेपी

    झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली भारी हार के बाद अब पार्टी हार के कारणों की तलाश में जुट गई है। इसके लिए 30 नवंबर और 1 दिसंबर को राज्य स्तर पर समीक्षा बैठक आयोजित की जा रही है। इस बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष शामिल होंगे। साथ ही, हारने वाले प्रत्याशी, जिला अध्यक्ष, जिला प्रभारी, प्रमंडलीय प्रभारी और कोर कमेटी के सदस्य भी मौजूद रहेंगे। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता प्रदीप सिन्हा ने इसे बेहद महत्वपूर्ण बैठक बताते हुए कहा कि इसमें हार के कारणों को गहराई से समझने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने यह भी माना कि चुनाव परिणाम से कार्यकर्ताओं में नाराजगी स्वाभाविक है, और इसे वरिष्ठ नेताओं के सामने रखा जाएगा।

    संगठन में बदलाव की संभावना

    शनिवार और रविवार को प्रदेश स्तर पर बैठकें होंगी, जिनमें चुनाव प्रबंधन समिति, जिला प्रभारी और जिलाध्यक्षों की बैठकें शामिल हैं। इसके बाद 3 दिसंबर को राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव परिणामों की समीक्षा होगी। बैठक के बाद प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री, जिलाध्यक्ष और प्रभारियों में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।

    इस चुनाव में बीजेपी के कई बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा, जिनमें नेता प्रतिपक्ष अमर कुमार बाउरी, मुख्य सचेतक बिरंची नारायण, विधायक अनंत ओझा, भानु प्रताप शाही, अमित मंडल, गीता कोड़ा और सीता सोरेन शामिल हैं। बताया जा रहा है कि बीजेपी की हार का एक बड़ा कारण स्थानीय मुद्दों की अनदेखी और बाहरी नेताओं को टिकट देना रहा। समीक्षा बैठक के बाद ही स्पष्ट होगा कि पार्टी आगे क्या कदम उठाने वाली है।

  • हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली

    परवेज आलम की रिपोर्ट…..

    झारखंड की राजनीति ने रच दिया इतिहास। 2024 के विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की प्रचंड जीत के बाद हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मोरहाबादी के मैदान में ऐसा नज़ारा था, जो शायद दशकों तक याद किया जाएगा।

    राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने शाम चार बजे हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। हेमंत अब झारखंड के 14वें मुख्यमंत्री हैं। तीन बार पहले भी इस कुर्सी पर विराजमान हो चुके अर्जुन मुंडा और शिबू सोरेन के बाद, हेमंत का यह चौथा कार्यकाल एक नई कहानी लिखने को तैयार है।

    इंडिया गठबंधन की चमक और शपथ का मंच—

    जिस तरह से मोरहाबादी के मंच पर इंडिया गठबंधन के नेता जुटे, वो किसी शक्ति प्रदर्शन से कम नहीं था। राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल से लेकर अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, और यहां तक कि तमिलनाडु से उदयनिधि स्टालिन तक… हर किसी की मौजूदगी ने इस समारोह को राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना दिया। शिबू सोरेन, जो खुद दिशोम गुरु कहे जाते हैं, अपने बेटे की इस चौथी पारी के गवाह बने।

    नतीजों का संदेश—

    2024 के विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने 81 में से 56 सीटें जीतकर साबित कर दिया कि झारखंड की जनता का भरोसा उनके साथ है। झामुमो ने 34 सीटों पर कब्जा जमाया, जो इसका अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। कांग्रेस को 16, आरजेडी को 4, और भाकपा-माले को 2 सीटें मिलीं।

    सुरक्षा और उत्सव—

    मोरहाबादी मैदान में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी, लेकिन माहौल में जोश और जश्न का संगम दिखा। हजारों समर्थकों ने अपने नेता का स्वागत किया। झारखंड का भविष्य नई उम्मीदों से भर चुका है, और इंडिया गठबंधन के लिए यह एक बड़ी जीत का प्रतीक है।

    मोरहाबादी के मंच से झारखंड के हर कोने तक एक संदेश गया—यह जीत सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि झारखंड के सपनों को नई दिशा देने की शुरुआत है। हेमंत सोरेन की चौथी पारी कितनी सफल होगी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इस शपथ ग्रहण ने झारखंड की राजनीति को एक नई उड़ान जरूर दी है।

  • झारखंड: 89% नवनिर्वाचित विधायक धनकुबेर !

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……….
    झारखंड में विधानसभा चुनाव के बाद एक बेहद दिलचस्प आंकड़ा सामने आया है। क्या आप जानते हैं कि इस बार झारखंड में 89% नवनिर्वाचित विधायक ‘करोड़पति’ हैं? चलिए आपको समझाते हैं इस रिपोर्ट का हर पहलू।
    झारखंड इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने  चुनाव जीतने वाले 81 विधायकों में से 80 ने अपने हलफनामों का विश्लेषण किया है  और क्या मिला? कुल 71 विधायक करोड़पति निकले !
    2019 के मुकाबले बड़ा इजाफा
    याद कीजिए, 2019 में ऐसे विधायकों की संख्या 56 थी। और 2014 में सिर्फ 41! यानी करोड़पति विधायकों का ग्राफ ऊपर ही जा रहा है। इस बार तो 20% ज्यादा करोड़पति विधायक चुनकर आए हैं।
    किसकी पार्टी में कितने करोड़पति?
    सबसे ज्यादा करोड़पति विधायकों का रिकॉर्ड झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पास है।
    • JMM: 28
    • भाजपा: 20
    • कांग्रेस: 14
    • राजद: 4
    • भाकपा (माले): 2
    • लोजपा (रामविलास), जद (यू), आजसू पार्टी: 1-1
    सबसे अमीर विधायक कौन?
    यहां सबसे बड़ी सुर्खी हैं कांग्रेस के लोहरदगा विधायक रामेश्वर उरांव, जिनकी कुल संपत्ति 42.20 करोड़ रुपये है।
    औसत संपत्ति भी बढ़ी!
    चुनाव जीतने वाले हर विधायक की औसत संपत्ति 6.90 करोड़ रुपये निकली। 2019 में यह 3.87 करोड़ रुपये थी। यानी झारखंड की राजनीति में धनकुबेरों का दबदबा साफ दिख रहा है।
    तो सवाल उठता है…
    क्या राजनीति में धन कुबेर बनना ज़रूरी हो गया है ? या ये महज संयोग है? क्या करोड़ों की संपत्ति विकास का प्रतिबिंब है या राजनीति में बढ़ते खर्च का परिणाम?
    झारखंड की राजनीति के इन दिलचस्प पहलुओं पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

  • अयोध्या के बाद देवघर में भी बीजेपी को हारी

    परवेज़ आलम 
    RANCHI: झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी को एक और बड़ा झटका लगा है। भोले बाबा की नगरी देवघर में इस बार इंडिया गठबंधन ने कमल को मुरझा दिया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रत्याशी सुरेश पासवान ने बीजेपी के नारायण दास को 39,000 से ज्यादा वोटों से हराकर यह सीट जीत ली। देवघर से मिली इस हार ने बीजेपी की हिंदुत्व राजनीति और उसके विकास मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरेश पासवान ने 1,56,079 वोट हासिल किए, जबकि नारायण दास को 1,16,358 मतों पर ही संतोष करना पड़ा।
    बीजेपी की हिंदुत्व रणनीति फेल?
    देवघर, जिसे भोले बाबा की नगरी के नाम से जाना जाता है, हिंदुत्व की राजनीति के लिए एक अहम केंद्र माना जाता है। बीजेपी ने हमेशा धार्मिक स्थलों के विकास को अपने एजेंडे में प्राथमिकता दी है।
    • काशी विश्वनाथ कॉरिडोर हो,
    • उज्जैन का महाकाल लोक,
    • या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण,
    बीजेपी ने धार्मिक नगरी में भारी निवेश किया।
    देवघर में भी एयरपोर्ट का निर्माण और कई अन्य विकास कार्य किए गए। लेकिन, इसके बावजूद देवघर की जनता ने बीजेपी को नकार दिया और इंडिया गठबंधन के साथ खड़ी हो गई।
    अयोध्या से देवघर तक हार का सिलसिला
    यह हार बीजेपी के लिए नई नहीं है। इसी साल लोकसभा चुनाव में भी अयोध्या के अंतर्गत आने वाली फैजाबाद लोकसभा सीट पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था।
    समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अवधेश प्रसाद ने बीजेपी को हराया था। अब देवघर में इंडिया गठबंधन ने यह सिलसिला जारी रखते हुए बीजेपी को करारी शिकस्त दी है।
    देवघर चुनाव: इंडिया गठबंधन का दबदबा
    झारखंड विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन (जेएमएम, कांग्रेस, आरजेडी, सीपीआई-एमएल) ने सत्ता में अपनी पकड़ बरकरार रखी है।
    देवघर में इंडिया गठबंधन की बड़ी जीत
    देवघर की हार बीजेपी के लिए सिर्फ एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि उसके धार्मिक और विकासवादी राजनीति पर बड़ा सवाल है।
    इंडिया गठबंधन इसे बड़ी जीत मानते हुए प्रचारित कर रहा है। क्या यह हार बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे का असर कम होने का संकेत है? या जनता ने विकास के नाम पर सिर्फ दावे करने वालों को नकार दिया है?
    राजनीतिक संदेश
    देवघर और अयोध्या जैसी धार्मिक नगरी में हार का सिलसिला बीजेपी के लिए चेतावनी है। जहां हिंदुत्व बीजेपी का कोर मुद्दा है, वहीं अब जनता इस मुद्दे से इतर वास्तविक विकास और जमीनी मुद्दों पर अपना निर्णय सुना रही है।