Tag: aicc

  • झारखंड में कांग्रेस का ‘आभार समागम, अमित शाह पर जमकर बरसे नेता

    रांची: झारखंड काँग्रेस के  ‘आभार समागम’  बैठक मे मुख्य फोकस अदानी मुद्दे और केंद्रीय राजनीति पर रहा ।  शनिवार को रांची मे आयोजित ‘आभार समागम’  बैठक में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का धन्यवाद व्यक्त किया गया। इस कार्यक्रम में प्रदेश प्रभारी गुलाम अहमद मीर, प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, इरफान अंसारी, सुबोधकांत सहाय, अंबा प्रसाद समेत कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए।

    नेताओं ने कहा कि इंटरनेशनल एजेंसियों की सनसनीखेज रिपोर्टों ने अदानी समूह की गतिविधियों पर सवाल खड़े किए हैं। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को संसद में उठाया, लेकिन बीजेपी ने उनकी आवाज दबाने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अदानी मामले की जांच कराने से बच रही है और इसके लिए तमाम तरीके अपनाए जा रहे हैं।

    कार्यक्रम में बीजेपी के प्रति आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा गया कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर का अपमान खुद गृह मंत्री अमित शाह ने किया। यह दिखाता है कि बीजेपी का संविधान और लोकतंत्र के प्रति क्या रवैया है। नेताओं ने सवाल उठाया कि ऐसे व्यक्ति को गृह मंत्री बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने अमित शाह से इस्तीफे की मांग की।

    कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि 70 मिनट के भाषण के बावजूद गृह मंत्री ने अंबेडकर साहब पर किए गए अपमान का जिक्र नहीं किया। जब जवाब नहीं सूझा, तो राहुल गांधी को बदनाम करने की साजिश रची गई।

    इसके साथ ही, बीजेपी के आंतरिक रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी अस्पताल में आईसीयू में हैं, लेकिन बीजेपी का कोई बड़ा नेता उनसे मिलने नहीं गया।

    कांग्रेस नेताओं ने जोर देकर कहा कि यह लड़ाई केवल अदानी या अंबेडकर के मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान बचाने और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग तक जाएगी। उन्होंने कहा कि ‘इंडिया गठबंधन’ इस मिशन को आगे भी मजबूती से जारी रखेगा।

    आभार समागम के जरिए कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार किया और साफ कर दिया कि वह संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर मोर्चे पर लड़ने को तैयार है।

  • कांग्रेस की हार की पड़ताल: भितरघातियों पर गिरेगी गाज?

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट …………
    झारखंड में हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजे कांग्रेस के लिए संतोषजनक रहे, लेकिन 14 सीटों पर मिली हार ने पार्टी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। गठबंधन के तहत 30 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने 16 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन हार के कारणों की समीक्षा ने अंदरूनी कलह और रणनीतिक चूकों की पोल खोल दी है। 21 दिसंबर को रांची मे आयोजित बैठक मे पार्टी ने हार की समीक्षा की ।

    हार की असली वजहें:
    कांग्रेस की समीक्षा में स्पष्ट हुआ है कि कई सीटों पर पार्टी के ही नेताओं ने भितरघात कर प्रत्याशियों को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्थानीय संगठनों और उम्मीदवारों के बीच समन्वय की कमी भी हार का बड़ा कारण बनी।

    जरमुंडी विधानसभा क्षेत्र:
    यहां पूर्व मंत्री बादल को भाजपा की मजबूत रणनीति और हरिनारायण राय की भाजपा से करीबी के कारण हार का सामना करना पड़ा। लंबे समय तक मंत्री रहने के दौरान उनके खिलाफ उपजा असंतोष भी उनकी हार की वजह बना।

    जमशेदपुर पश्चिम सीट:
    तत्कालीन मंत्री बन्ना गुप्ता वायरल वीडियो से उपजे विवाद के चलते प्रचार युद्ध में टिक नहीं पाए। जदयू के सरयू राय ने उनका पराजय दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

    झरिया और धनबाद:
    इन क्षेत्रों में संगठनात्मक तालमेल की कमी और स्थानीय इकाई का असहयोग हार का कारण बना। झरिया में कांग्रेस को सिटिंग सीट पर भी हार का सामना करना पड़ा।

    जमशेदपुर पूर्वी सीट:
    यहां डॉ. अजय कुमार पार्टी के प्रत्याशी थे, लेकिन स्थानीय संगठन ने उनका साथ नहीं दिया। कई नेता अंदरूनी भितरघात में लगे रहे, जिससे पार्टी की संभावना धूमिल हो गई।

    भविष्य की राह:
    समीक्षा बैठक के बाद तैयार की गई रिपोर्ट कांग्रेस आलाकमान को भेजी जाएगी। पार्टी के वरिष्ठ नेता ने संकेत दिए हैं कि भितरघातियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

    चुनाव परिणाम:
    कांग्रेस ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और 16 पर जीत हासिल की। पार्टी का मानना है कि बेहतर रणनीतिक तालमेल और आंतरिक समन्वय से सीटों की संख्या और बढ़ाई जा सकती थी।

    संघर्ष जारी:
    कांग्रेस ने यह भी स्वीकार किया है कि कमियों को सुधारने के बाद भविष्य में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है। अब सबकी नजरें आलाकमान के फैसलों और भितरघातियों पर गिरने वाली गाज पर टिकी हैं।

  • वन नेशन-वन इलेक्शन: जेपीसी और कांग्रेस

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट………

    “एक देश-एक चुनाव”—एक ऐसा विचार जो सियासत की गहराइयों में हलचल मचा रहा है, अब संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की चौखट पर दस्तक दे चुका है। ये वो मंच होगा जहां सत्ता और विपक्ष के बीच का ‘महाभारत’ अपनी नयी गाथा लिखेगा।
    कांग्रेस ने अपने योद्धाओं की टोली तैयार कर ली है। प्रियंका गांधी, रणदीप सुरजेवाला, मनीष तिवारी और सुखदेव भगत—चारों नाम फाइनल कर स्पीकर के पास भेज दिए गए हैं। इन चारों नेताओं के कंधों पर अब कांग्रेस का पक्ष रखने का भार होगा।
    जेपीसी: एक और ‘कुश्ती का अखाड़ा’। 
    जेपीसी, यानी संयुक्त संसदीय समिति, एक ऐसा मंच जहां संसद के दोनों सदनों के सदस्य मिलकर किसी भी मुद्दे या बिल की गहन समीक्षा करते हैं। लेकिन यह सिर्फ समीक्षा नहीं, राजनीतिक तराजू पर नीतियों और विचारधाराओं को तौलने का एक मौका भी है।
    कांग्रेस के योद्धा:
    • प्रियंका गांधी: कांग्रेस का युवा और महिला चेहरा, जो इस लड़ाई को एक नई धार दे सकती हैं।
    • रणदीप सुरजेवाला और मनीष तिवारी: दोनों कानूनी दांवपेंचों में माहिर, शब्दों के योद्धा।
    • सुखदेव भगत: आदिवासी नेतृत्व का प्रतीक, जिनकी बातों में ज़मीन की गूंज सुनाई देती है।
    क्या होगा जेपीसी का दायरा?
    लोकसभा स्पीकर इस समिति का स्वरूप तय करेंगे। अमूमन लोकसभा के सदस्य राज्यसभा की तुलना में दुगुने होते हैं। यह समिति अपने अध्ययन के आधार पर सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी, जो आगे संशोधित बिल का आधार बनेगी।
    वन नेशन-वन इलेक्शन:
    यह सिर्फ एक संवैधानिक संशोधन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक समर है। इसे अमल में लाने के लिए सरकार को विशेष बहुमत चाहिए। यही वजह है कि सरकार आम सहमति बनाने के लिए जेपीसी का सहारा ले रही है।
    सवालों की परछाई में ‘आम सहमति’
    क्या कांग्रेस के ये चार नाम सत्ता पक्ष के ‘एक देश-एक चुनाव’ के सपने को चुनौती दे पाएंगे? या फिर यह समिति महज एक और औपचारिकता बनकर रह जाएगी?
    राजनीतिक पंडितों की नज़रें इस सवाल पर टिकी हैं।
    क्योंकि यह फैसला सिर्फ चुनावी प्रणाली को नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को हिला सकता है।
    अगले कुछ दिनों में देश के सियासी मंच पर यह देखना दिलचस्प होगा कि

    Deputy Speaker of Lok Sabha

    की यह गाड़ी कितनी दूर तक दौड़ती है और कौन इसे रोकने की ताकत रखता है।

  • वन नेशन-वन इलेक्शन बिल पर सियासी ड्रामा: अनुपस्थित सांसदों पर भाजपा की सख्ती

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट……

    आज चर्चा में है ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ बिल। सवाल वही पुराना—ये बिल क्या है, क्यों है, और आखिर इसे पास कराने की इतनी हड़बड़ी क्यों?”

    लोकसभा में मंगलवार को जब इस बहुचर्चित बिल पर वोटिंग होनी थी, तब भाजपा के कई सांसद नदारद थे। पार्टी ने तीन लाइन का ‘व्हिप’ जारी किया था, लेकिन फिर भी 20 से ज्यादा सांसद सदन में नहीं पहुंचे। अब इनकी गैरमौजूदगी पर भाजपा ने ‘नोटिस’ जारी करने का फैसला लिया है। पर ये सवाल क्यों नहीं उठता कि जिस पार्टी ने ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया, उसके अपने सिपाही इस ‘युद्ध’ से क्यों गायब हो गए?”

    “बिल के पक्ष में पड़े 269 वोट, विपक्ष में 198 वोट। यानी गणित बता रहा है कि सियासत में ‘पक्ष और विपक्ष’ दोनों की गिनती से लोकतंत्र की असली नब्ज टटोली जा रही है। लेकिन जब सत्ताधारी दल की ताकत ‘व्हिप’ के बावजूद पूरी नहीं दिखी, तो क्या ये संकेत है ‘अंदरूनी असहमति’ का?”

    “दो तिहाई बहुमत की बात करें तो 362 सांसद चाहिए। लोकसभा में NDA के पास 292 सीटें हैं और राज्यसभा में सिर्फ 112। संविधान बदलने के लिए जरूरी ‘मैजिक नंबर’ अभी दूर है। इसलिए जेपीसी का रास्ता अख्तियार किया गया। सरकार कहती है ‘विचार-विमर्श’ होगा, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ से लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर?”

    “क्योंकि देखिए, चुनाव सिर्फ मतदान नहीं, जनता का त्योहार है। सवाल ये है कि ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ से ‘चुनाव की आत्मा’ खत्म तो नहीं हो जाएगी? क्या जनता का ‘शोर’ कम करने की कवायद चल रही है? और भाजपा के सांसदों की गैरमौजूदगी क्या सिर्फ इत्तेफाक है या इशारा? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब सरकार के पास भले ही न हो, लेकिन वक्त जरूर मांगेगा।”

     

  • 18 दिसंबर: राजभवन मार्च करेगी कांग्रेस, केंद्र के खिलाफ प्रदर्शन

    RANCHI: कांग्रेस ने केंद्र सरकार की “जनविरोधी नीतियों” के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए 18 दिसंबर को रांची स्थित राजभवन तक मार्च का ऐलान किया है। इस विरोध प्रदर्शन में पार्टी के कार्यकर्ता, मंत्री, सांसद, विधायक, और प्रदेश के वरिष्ठ नेता शामिल होंगे।

    प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश का बयान.
    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने संगठन के पदाधिकारियों को इस मार्च को सफल बनाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार की नीतियां आम जनता के खिलाफ हैं। महंगाई, बेरोजगारी, और पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की नीतियां देश के संविधान के खिलाफ हैं। कांग्रेस पार्टी लगातार इन मुद्दों को उठा रही है, मगर केंद्र सरकार हर सवाल से बचने की कोशिश कर रही है।”

    अडाणी प्रकरण पर सरकार को घेरा। 
    कमलेश ने अडाणी मामले को लेकर केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “जब देश के बाहर अडाणी समूह के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं, तब भारत सरकार उन्हें बचाने में जुटी है। यह दिखाता है कि मौजूदा सरकार केवल पूंजीपतियों की हितैषी है, न कि जनता की।”

    कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व सक्रिय।
    कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी लगातार जन मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। कमलेश ने कहा, “हमारा संघर्ष संविधान की रक्षा और आम जनता के अधिकारों की लड़ाई है। केंद्र सरकार की चुप्पी इस बात का सबूत है कि वह देश के सवालों का सामना नहीं करना चाहती।”

    क्या है कांग्रेस का एजेंडा?
    इस राजभवन मार्च को कांग्रेस जनता से जुड़े मुद्दों पर एक बड़े संदेश के रूप में देख रही है। पार्टी ने इसे केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बताया है।

    जनता से अपील। 
    प्रदेश कांग्रेस ने झारखंड की जनता से भी इस मार्च में शामिल होने की अपील की है। पार्टी का कहना है कि यह प्रदर्शन हर उस व्यक्ति की आवाज को बुलंद करेगा, जो महंगाई और अन्याय से परेशान है।

    क्या होगा असर?
    कांग्रेस के इस प्रदर्शन से झारखंड की राजनीति में हलचल तेज होने की संभावना है। 18 दिसंबर का दिन राजनीतिक रूप से अहम हो सकता है।

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पर महाभियोग !

    NEW DELHI : इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश शेखर कुमार यादव के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव देना क्या न्यायपालिका पर सीधा हमला है, या फिर न्याय की परिभाषा पर खुद न्यायपालिका को सोचने का मौका?

    एक कार्यक्रम में न्यायमूर्ति यादव की कथित टिप्पणियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। राज्यसभा में 55 विपक्षी सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, पी चिदंबरम,  रणदीप सिंह सुरजेवाला, प्रमोद तिवारी, विवेक तन्खा, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, मनोज कुमार झा, साकेत गोखल, मुकुल वासनिक, नसीर हुसैन, राघव चड्ढा, फौजिया खान, संजय सिंह, एए रहीम, वी शिवदासन और रेणुका चौधरी  जैसे नेता इस प्रस्ताव के केंद्र में हैं। सवाल यह है कि जब न्यायाधीश से संवैधानिक दायित्वों का पालन अपेक्षित है, तो क्या यह मामला संविधान के अनुच्छेद 51ए (ई) के खिलाफ जाता है, जो सद्भाव को बढ़ावा देने की बात करता है?

    “न्याय का चेहरा और राजनीति का साया”
    विहिप के मंच पर अल्पसंख्यकों को लेकर कथित टिप्पणी क्या एक न्यायाधीश के सार्वजनिक व्यवहार के मानदंडों का उल्लंघन है? या फिर यह उस विचारधारा का हिस्सा है, जो संविधान के सेकुलर फ्रेमवर्क को चुनौती देती है?

    सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया।इलाहाबाद हाईकोर्ट से रिपोर्ट मांगी गई। पर विपक्ष ने इसी बीच राज्यसभा में नोटिस देकर यह जता दिया कि इस बार बात सिर्फ भाषण की नहीं, न्यायपालिका की गरिमा की है।

    महाभियोग और बहुसंख्यकवाद की राजनीति”
    नोटिस में आरोप है कि न्यायमूर्ति यादव की टिप्पणियां पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। क्या यह महज संयोग है कि यह टिप्पणी बहुसंख्यकवाद को प्राथमिकता देने वाली राजनीति के करीब नजर आती है? विपक्ष के नेता कहते हैं कि न्यायपालिका का कोई भी हिस्सा अगर संविधान से भटकेगा, तो उस पर सवाल उठेंगे।

    आखिर न्याय कौन करेगा?”
    महाभियोग प्रस्ताव के इस नोटिस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका कितनी स्वतंत्र है? और अगर स्वतंत्र है, तो क्या वह राजनीति से प्रभावित हो रही है?

    न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के हर शब्द की कीमत होती है। पर जब वह शब्द संविधान से टकराते हैं, तो जवाबदेही तय करना जरूरी हो जाता है।

    अब देखना यह है कि राज्यसभा के सभापति इस नोटिस को मंजूरी देते हैं या नहीं। और क्या यह मामला न्यायपालिका में सुधार की नई बहस की शुरुआत करेगा?

  • धनखड़ की कार्यशैली पर विपक्ष अब किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठेगा-डॉ सरफराज

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……..

    संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है, और इस बार जो संसद में हो रहा है, वह न केवल संसदीय राजनीति का एक ताजातरीन रूप है, बल्कि यह लोकतंत्र के साख और मंशा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। हंगामा, शोरगुल, और आरोपों-प्रतयारोपों  का दौर अब संसद के हर कोने से उठ रहा है। इन हालात में, राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ पर विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है। करीब 60 सांसदों के हस्ताक्षर से इस प्रस्ताव का समर्थन किया गया है। लेकिन सत्ता पक्ष अपने बहुमत का हवाला देते हुए कह रहा है कि यह प्रस्ताव सफल नहीं हो पाएगा।

    अब, विपक्ष ने जो आरोप लगाए हैं, वह न केवल जगदीप धनखड़ की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं, बल्कि यह भी एक सख्त संदेश देते हैं कि विपक्ष अब किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठेगा। विपक्ष का कहना है कि न तो वह झुकेंगे, न दबेंगे, न रुकेंगे। संविधान, संसदीय मर्यादाओं और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर कुर्बानी के लिए तैयार हैं। दस महत्वपूर्ण बिंदुओं में विपक्ष ने अपनी बात रखी, जिन पर गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है।राज्यसभा सांसद डॉ सरफराज अहमद ने जगदीप धनखड़ के खिलाफ लाये गए अविश्वास प्रस्ताव  का समर्थन करते हुये कहा कि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर एक साथ है । उन्होने कह कि उनके 40 साल के संसदीय जीवन मे एसी स्थिति कभी नहीं देखि है ।

    पहला बिंदु है – संसद में बात कहने का अधिकार। विपक्ष का आरोप है कि सभापति महोदय लगातार उन्हें बोलने से रोकते हैं। जबकि सत्ता पक्ष के सदस्य बेझिजक झूठ बोलते हैं, मीडिया की खबरों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी विपक्ष पर थोपते हैं।

    दूसरा गंभीर आरोप है – सभापति का दुरुपयोग। विपक्ष का कहना है कि सभापति ने अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करते हुए कई बार सदस्यों को एकतरफा निलंबित किया।

    तीसरा आरोप यह है कि सभापति सदन के बाहर भी विपक्षी नेताओं की आलोचना करते हैं और उनकी आलोचना भाजपा के पक्ष में की जाती है। यह पारंपरिक संसदीय गरिमा से काफी दूर का मामला है।

    इतिहास में इस पद को गरिमा के साथ संभालने वालों ने कभी अपनी राजनीति या पार्टी का पक्ष नहीं लिया, लेकिन धनखड़ साहब ने तो सीधे-सीधे RSS की प्रशंसा की और स्वयं को ‘RSS का एकलव्य’ घोषित कर दिया, जो संविधान की भावना से खिलवाड़ है।

    टीवी कवरेज का भी विरोध किया गया है। विपक्ष का कहना है कि संसद के अंदर होने वाले विरोध प्रदर्शन और उनकी आवाज़ को जानबूझकर मीडिया से हटा दिया जाता है। कैमरे केवल सत्ता पक्ष के सांसदों को दिखाते हैं और विपक्षी नेताओं की आवाज़ को काले पर्दे में छिपा दिया जाता है।

    रूल 267 का उल्लंघन करते हुए विपक्षी सदस्य को नोटिस भी नहीं दिए जाते, जबकि सत्ता पक्ष के सांसदों को इसे लेकर कोई प्रतिबंध नहीं होता।

    समझिए, यह कोई हल्का-फुल्का मुद्दा नहीं है। यह सीधे तौर पर हमारे संसदीय लोकतंत्र की धारा और दिशा से जुड़ा है। जहां तक सवाल विपक्ष के सवालों का है, तो इस पूरे मामले में यही कहा जा सकता है कि संसद अब सिर्फ एक मुकदमे की तरह न सिमट जाए। यह खामोशी नहीं, एक निर्णायक आवाज़ की बुनियाद है।

  • मस्जिदों या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर नए दावे दाखिल करने पर रोक – सुप्रीम कोर्ट

    By- Perwez Alam

    नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा आदेश एक बार फिर उस बहस को सामने लेकर आया है, जो भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे के मूल में छिपी है। सुप्रीम कोर्ट ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 के तहत मस्जिदों या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर नए दावे दाखिल करने पर रोक लगा दी है। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक अदालत इस कानून की वैधता पर फैसला नहीं सुना देती।
    यह अधिनियम 15 अगस्त, 1947 की स्थिति को बनाए रखने की बात करता है, और धार्मिक स्थलों के स्वरूप में किसी भी बदलाव या दावों पर रोक लगाता है। मगर सवाल यह है—क्या यह कानून सभी को समान रूप से न्याय दे पा रहा है? या यह अतीत के घावों को भरने के बजाय उन्हें और कुरेदने का कारण बन रहा है?
    फैसले का राजनीतिक और कानूनी प्रभाव
    प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक इस कानून पर सुनवाई पूरी नहीं होती, कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं होगा। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि लंबित मामलों में कोई अंतिम फैसला भी फिलहाल नहीं दिया जाएगा।
    वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद मामले से लेकर मथुरा के शाही ईदगाह विवाद तक, कई मामले इस अधिनियम की छाया में हैं। इन मुकदमों का दावा है कि इन मस्जिदों का निर्माण प्राचीन मंदिरों को तोड़कर किया गया था। लेकिन क्या इस तरह के मुकदमे एक नई न्यायिक परंपरा की मांग कर रहे हैं, या यह समाज को विखंडित करने वाली राजनीति का हिस्सा हैं?
    सवाल जो अदालत से परे हैं
    मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य राजनीतिक समूह इस कानून को देश की एकता और धर्मनिरपेक्षता के लिए आवश्यक मानते हैं। लेकिन याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह अधिनियम न्याय पाने के मूल अधिकार को छीनता है।
    राजनीति इस मामले में गहराई तक जुड़ी हुई है। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता जहां इसे हिंदू धर्म के साथ न्याय करने का अवसर मानते हैं, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे अपनी धार्मिक आजादी और सामाजिक शांति के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
    क्या वाकई शांति का मार्ग प्रशस्त होगा?
    सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से फिलहाल विवादों पर विराम लगा है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारा समाज बीते समय की गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ेगा, या इन गलतियों को दोहराकर वर्तमान को और जटिल बनाएगा?
    यह देखना दिलचस्प होगा कि जब अदालत इस कानून पर अंतिम निर्णय देगी, तो वह केवल कानूनी पहलू को ध्यान में रखेगी या सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक नतीजों का भी आकलन करेगी।
    जैसा कि एक पुरानी कहावत है—“न्याय में देरी करना, न्याय से इनकार करने के समान है।” लेकिन क्या इस न्याय की परिभाषा अब बदलनी चाहिए? यह जवाब अदालत के फैसले और समाज की प्रतिक्रिया में छिपा है।

     

  • प्रदीप यादव बने कांग्रेस विधायक दल के नेता

    By -Perwez Alam

    RANCHI: झारखंड की राजनीति में सस्पेंस खत्म हुआ! आखिरकार कांग्रेस ने विधायक दल के नेता और उपनेता के नामों पर मोहर लगा दी है। पोड़याहाट से छठी बार विधायक बने प्रदीप यादव को कांग्रेस विधायक दल नेता चुना गया है, और खिजरी से लगातार दूसरी बार विधायक बने राजेश कच्छप को उपनेता की जिम्मेदारी दी गई है।

    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने विधानसभा स्पीकर रबींद्रनाथ महतो को एक सीलबंद लिफाफे में इन नामों की सूचना दी। वहीं, दूसरी तरफ झामुमो ने भी बड़ा फैसला लेते हुए टुंडी से चार बार के विधायक मथुरा प्रसाद महतो को मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी सौंप दी है।

    प्रदीप यादव: सियासत का पुराना खिलाड़ी. 
    प्रदीप यादव की बात करें तो पोड़याहाट की जनता ने उन्हें लगातार छह बार विधानसभा पहुंचाया है। वो कभी बीजेपी का चेहरा रहे, फिर झारखंड विकास मोर्चा के टिकट पर चुनाव जीते, और अब कांग्रेस के नेता के रूप में पहचान बना रहे हैं। उनकी इस राजनीतिक यात्रा ने उन्हें एक अनुभवी और कद्दावर नेता बना दिया है।

    राजेश कच्छप: युवा और ऊर्जावान चेहरा. 
    राजेश कच्छप, जो खिजरी से लगातार दूसरी बार विधायक बने हैं, कांग्रेस के लिए एक युवा और भरोसेमंद नेता माने जाते हैं। उनकी नियुक्ति यह संकेत देती है कि कांग्रेस युवा नेताओं को आगे लाने का मन बना चुकी है।

    झामुमो का दांव: मथुरा प्रसाद महतो बने मुख्य सचेतक
    अब बात झामुमो की। टुंडी से चार बार के विधायक मथुरा प्रसाद महतो को पार्टी ने मुख्य सचेतक बना दिया है। दिलचस्प बात यह है कि मथुरा महतो का नाम पहले कैबिनेट मंत्री पद के लिए चर्चा में था, लेकिन पार्टी ने इस जिम्मेदारी के लिए गोमिया के विधायक योगेंद्र महतो को चुना। योगेंद्र महतो को पेयजल और मध निषेध विभाग सौंपा गया है।

    सियासत का गणित और गठबंधन का संतुलन
    झारखंड की राजनीति में कांग्रेस और झामुमो गठबंधन का संतुलन बनाना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन इन नियुक्तियों से दोनों दलों ने अपने-अपने पत्ते खोल दिए हैं। प्रदीप यादव का अनुभव, राजेश कच्छप की ऊर्जा और मथुरा महतो की लोकप्रियता, सब कुछ अगले चुनाव की रणनीति का हिस्सा है

    झारखंड की सियासत गर्म है और यह तो तय है कि आने वाले दिन और भी दिलचस्प होंगे।

  • कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंत्री सुदिव्य सोनू का किया भव्य स्वागत

    परवेज़ आलम की कलम से …..
    गिरिडीह: रविवार को झारखंड सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह कांग्रेस भवन में पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। इस अवसर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंत्री का फूलों के बुके और शॉल देकर भव्य स्वागत किया। जिला कांग्रेस अध्यक्ष धनंजय सिंह ने मंत्री को सम्मानित करते हुए कहा कि उनका पार्टी कार्यालय में आना कार्यकर्ताओं के प्रति उनके सम्मान और प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

    मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने इस मौके पर कहा, “कांग्रेस मेरा परिवार है, और मैं हमेशा आपके लिए उपलब्ध रहूंगा। कांग्रेस कार्यालय आकर मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। कार्यकर्ताओं की मेहनत और सम्मान को बनाए रखना मेरी प्राथमिकता है।”

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी एक पार्टी के नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और महागठबंधन के मंत्री हैं। “मेरी जिम्मेदारी है कि मैं हर कार्यकर्ता की भावनाओं का सम्मान करूं और किसी को निराश न होने दूं। गिरिडीह और झारखंड के विकास के लिए मैं पूरी तरह प्रतिबद्ध हूं,” उन्होंने कहा।

    जिला अध्यक्ष धनंजय सिंह ने मंत्री की प्रशंसा करते हुए कहा, “मंत्री बनने के तुरंत बाद कांग्रेस कार्यालय आना यह दर्शाता है कि सोनू जी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशील हैं। उनकी मेहनत और सहयोग से ही गठबंधन सरकार बनी है, और हमें विश्वास है कि वे इसे ध्यान में रखेंगे।”

    प्रदेश सचिव अजय सिन्हा मंटू ने मंत्री सोनू की मिलनसार प्रवृत्ति की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान किया है। उनके मंत्री बनने से गिरिडीह की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है।

    इस कार्यक्रम में कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता उपस्थित रहे, जिनमें कार्यकारी अध्यक्ष सतीश केडिया, मदन लाल विश्वकर्मा, जेएमएम नेता मो. हसनैन अली, शाहनवाज़ अंसारी, प्रो. कमाल नयन, और प्रो. मंजूर अंसारी जैसे प्रमुख नाम शामिल थे।

    कार्यक्रम का माहौल उत्साह और एकजुटता से भरा हुआ था, जो दर्शाता है कि झारखंड कांग्रेस का यह गठबंधन मजबूती से आगे बढ़ने के लिए तैयार है।