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  • गिरिडीह: ‘मन की बात’ की 123वीं कड़ी का आयोजन, जनभागीदारी और राष्ट्र भावना का दिखा उत्साह

    By The News Post4u

    गिरिडीह: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रेरणास्पद मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात’  की 123वीं कड़ी का सीधा प्रसारण रविवार को गिरिडीह में बेहद उत्साह, गरिमा और राष्ट्र भावना के साथ आयोजित किया गया।

    कार्यक्रम में जिले के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों, महिला स्वयं सहायता समूहों, युवा कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया। कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और गर्व का क्षण तब आया जब गिरिडीह सीधे पूरे देश के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ा। यह गिरिडीहवासियों के लिए न सिर्फ एक विशेष अवसर था, बल्कि यह क्षण उन्हें राष्ट्र के साथ जुड़ने का गौरव भी प्रदान कर गया।  इस अवसर ने गिरिडीह में लोकतांत्रिक सहभागिता और राष्ट्र निर्माण के प्रति जनजागरूकता को नई ऊर्जा दी। आयोजन सिर्फ एक रेडियो प्रसारण भर नहीं था, बल्कि यह एक प्रेरणादायक सामाजिक मिलन बन गया जिसमें सभी ने एक साथ बैठकर प्रधानमंत्री के विचारों को सुना और आत्मसात किया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद प्रतिनिधि दिनेश यादव, बिनय सिंह, भाजपा जिला अध्यक्ष महादेव दुबे, उद्योगपति अमरजीत सिंह सलूजा,चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निर्मल झुनझुनवाला, मुकेश जालान, विकास खेतान,निर्मल स्लामपुरिया,संजीव कुमार व साहिल शर्मा उपस्थित थे ।

  • जातीय जनगणना: कांग्रेस का हथियार अब बीजेपी की रणनीति?

      परवेज़ आलम .

    देश की राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ उस वक्त आया जब मोदी सरकार ने 2026 में होने वाली जनगणना के साथ-साथ जातीय जनगणना (Caste Census) करवाने का ऐलान कर दिया। यह वही मांग थी जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले कई सालों  से अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर पेश कर रहे थे। ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे नारों के जरिए कांग्रेस सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना चुकी थी। लेकिन अब यही मुद्दा, सत्ता पक्ष की रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है। बुधवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट मीटिंग के बाद यह स्पष्ट किया कि सरकार अब जाति आधारित आंकड़ों को भी आधिकारिक रूप से एकत्र करेगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति में रही है और कभी भी ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे लागू नहीं किया। वैष्णव ने कहा कि मोदी सरकार ने समाज के हर वर्ग के हित में फैसले लिए हैं और यह निर्णय भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

     क्यों जातीय जनगणना का फैसला कांग्रेस के लिए झटका है?

    जातीय जनगणना की मांग पर सबसे मुखर रहे राहुल गांधी को यह उम्मीद थी कि यह मुद्दा बीजेपी के ओबीसी और दलित वोट बैंक में सेंध लगाएगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में इस मुद्दे ने विपक्ष को फायदा भी पहुंचाया। लेकिन अब जब मोदी सरकार ने खुद इसे स्वीकार कर लिया है, तो कांग्रेस की बढ़त पर पानी फिरता दिख रहा है। सरकार के इस फैसले ने राहुल गांधी के उस नैरेटिव को कमजोर कर दिया है, जिसमें वे बीजेपी को सामाजिक न्याय विरोधी बताकर घेरते थे।

    पहला असर: बिहार और बंगाल में बीजेपी को लाभ की उम्मीद.

    बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। जातीय जनगणना का मुद्दा यहां सबसे अधिक प्रभावी साबित हो सकता है, क्योंकि राज्य की राजनीति पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आधारित है। हालांकि नीतीश कुमार की सरकार ने पहले ही जातिगत सर्वे कराया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र की ओर से इसे करवाना, ओबीसी मतदाताओं को यह संकेत देगा कि नरेंद्र मोदी सरकार उनकी गिनती और हक़ को लेकर गंभीर है। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगियों, खासकर आरजेडी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

     

     उत्तर प्रदेश में समाजवादी समीकरण पर असर.

    2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण के सहारे बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में हैं। जातीय जनगणना, जिसे अब केंद्र सरकार लागू करेगी, इस समीकरण को भी प्रभावित कर सकती है। बीजेपी की कोशिश होगी कि वह ओबीसी वर्ग को यह भरोसा दिलाए कि पार्टी अब उनकी गिनती और हिस्सेदारी दोनों सुनिश्चित करने जा रही है। इस तरह से विपक्ष के लिए ‘सामाजिक न्याय’ का नैरेटिव खड़ा करना और कठिन हो जाएगा।

    राजनीतिक बढ़त से सामाजिक प्रभाव तक.

    1931 के बाद देश में जातियों की कोई आधिकारिक जनगणना नहीं हुई। आज़ाद भारत में यह पहली बार होगा जब केंद्र सरकार पूरे देश में जातीय आंकड़े जुटाएगी। यह कदम न केवल राजनीतिक असर डालेगा, बल्कि नौकरियों, शिक्षा, कल्याण योजनाओं और संसाधनों के वितरण में भी नए बदलाव की नींव रख सकता है। मोदी सरकार इसे ‘सामाजिक समावेश’ और ‘डाटा आधारित नीति निर्माण’ के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, जो कि कांग्रेस के पुराने वादों को अप्रासंगिक बना देगा।

    कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती.

    राहुल गांधी अब तक इस मुद्दे के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। उन्होंने न केवल केंद्र को घेरा, बल्कि कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस शासित सरकारों से जातीय आंकड़े जारी करने की मांग भी की। अब जबकि बीजेपी खुद यह पहल कर रही है, कांग्रेस के पास या तो इसका स्वागत करने का विकल्प है—जो उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर दिखा सकता है, या विरोध करने का विकल्प—जिससे वे विरोधाभासी नजर आएंगे। इस दोहरे संकट में कांग्रेस को अपनी रणनीति फिर से गढ़नी होगी।

    सत्ता की बाज़ी कैसे पलटी ?

    जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में मुद्दे स्थायी नहीं होते, बल्कि उनका उपयोग और नियंत्रण ही असली खेल है। कांग्रेस ने जिस सामाजिक न्याय के एजेंडे को खड़ा किया, अब उसी को अपनाकर बीजेपी उसे उलझाने की तैयारी में है। 2026 की जनगणना के साथ जातीय गणना का प्रस्ताव, न केवल राहुल गांधी के एजेंडे को कमजोर करता है, बल्कि 2027 तक बीजेपी को ओबीसी समाज में फिर से अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर भी देता है।

     

  • झारखंड की राजनीति में बड़ा उलटफेर: बाबूलाल मरांडी बने नेता प्रतिपक्ष

    -परवेज़ आलम

    ………आखिरकार  इंतजार खत्म हुआ। चार महीने की राजनीतिक उथल-पुथल, अटकलों का बाजार, गुप्त बैठकों और सियासी कयासों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में बड़ा फैसला ले लिया है। पार्टी ने अनुभवी नेता और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को विधायक दल का नेता चुन लिया है। यानी अब वह झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाएंगे।

    चार महीने की देरी: भाजपा की रणनीति या आंतरिक असमंजस?

    झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही भाजपा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी। इस पद के लिए कई दिग्गज नेताओं के नाम सामने आए, जिनमें नवीन जायसवाल, नीरा यादव, और सीपी सिंह  का नाम प्रमुख था। लेकिन आखिरकार बाजी बाबूलाल मरांडी के हाथ लगी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इस निर्णय पर मुहर लगा दी। पर्यवेक्षक भूपेंद्र यादव ने विधायकों से चर्चा की । पर्यवेक्षक भूपेन्द्र यादव ने कहा कि विधायकों ने सर्वसम्मति से बाबूलाल मरांडी को नेता चुना है। नवीन जायसवाल,नीरा यादव, राज सिन्हा ने इसके लिए प्रस्ताव रखा। इसे सभी विधायकों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।और सर्वसम्मति से मरांडी को नेता चुने जाने की घोषणा की।

    लेकिन सवाल यह उठता है कि यह फैसला आने में चार महीने क्यों लगे? क्या भाजपा के भीतर मतभेद थे, या फिर यह किसी रणनीति का हिस्सा था? पार्टी सूत्रों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व शुरू से ही मरांडी को लेकर स्पष्ट था, लेकिन सत्ता संतुलन साधने के लिए समय लिया गया और जब आखिरी फैसला हुआ, तो अनुभव और कद को ध्यान में रखते हुए बाबूलाल मरांडी के नाम पर मुहर लगी।

     

     

    बता दें कि छठी विधानसभा के गठन के बाद से भाजपा विधायक दल के पास नेता नहीं था। भाजपा विधायक दल के नेता ही नेता प्रतिपक्ष होंगे। इस तरह से बाबूलाल मरांडी झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होंगे। वे अभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं।

    मरांडी की प्रतिक्रिया: पीएम मोदी के सपने को साकार करने की प्रतिबद्धता

    नेता प्रतिपक्ष चुने जाने के बाद बाबूलाल मरांडी ने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत का जो संकल्प लिया है, उसे पूरा करने में हम भी अपना योगदान देंगे। झारखंड के लोगों की सेवा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हम पूरी ताकत से काम करेंगे।”

    भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद से जल्द देंगे इस्तीफा

    बाबूलाल मरांडी इस समय झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। अब जब वे नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, तो जल्द ही प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर संगठन में नए अध्यक्ष की नियुक्ति का रास्ता साफ करेंगे। भाजपा नेतृत्व अब इस पर फैसला करेगा कि झारखंड में संगठन की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए।

    बाबू लाल मरंडी की झारखंड की  राजनीति मे वापसी 

    बाबूलाल मरांडी की राजनीति कभी भाजपा तो कभी अलग राह पकड़ती रही। लेकिन यह भी सच है कि वह एक मजबूत जननेता के रूप में उभरे हैं। 2006 में उन्होंने भाजपा से अलग होकर झारखंड विकास मोर्चा बनाया, लेकिन 2020 में दोबारा भाजपा में वापसी कर ली।

    उनका सियासी कद केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहा। वाजपेयी सरकार में उन्होंने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में राज्य मंत्री की भूमिका भी निभाई।

    बाबूलाल मरांडी: झारखंड की राजनीति का बड़ा नाम

    बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं और झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे हैं। उन्होंने हमेशा से प्रदेश की राजनीति में एक अहम भूमिका निभाई है। आइए, उनके राजनीतिक सफर पर एक नजर डालते हैं:

    • जन्म और शिक्षा: 11 जनवरी 1958 को गिरिडीह जिले के कोदईबांक गांव में जन्मे बाबूलाल मरांडी ने रांची विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर किया है।
    • संघ से जुड़ाव: पढ़ाई के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए और बाद में झारखंड क्षेत्र के विश्व हिंदू परिषद (VHP) का संगठन सचिव बने।
    • मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल: 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन के बाद वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने और 17 मार्च 2003 तक इस पद पर रहे।
    • झारखंड विकास मोर्चा की स्थापना: 2006 में भाजपा से अलग होकर उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) की स्थापना की। हालांकि, 2020 में उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया।
    • लोकसभा में भूमिका: वे 12वीं, 13वीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा में सांसद रह चुके हैं। 1998 से 2000 के बीच एनडीए सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय) भी रहे।
    • विधानसभा में वापसी: 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने धनवार सीट से जीत दर्ज की और फिर से झारखंड विधानसभा में सक्रिय हो गए।

    नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारी

    अब जब बाबूलाल मरांडी झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। आइए, जानते हैं कि विपक्ष के नेता के रूप में उनकी प्रमुख भूमिकाएं क्या होंगी:

    1. विपक्ष का नेतृत्व: सभी विपक्षी दलों को एकजुट करना और उनकी आवाज को विधानसभा में मजबूती से उठाना।
    2. सरकार की नीतियों पर नजर: सरकार के फैसलों की समीक्षा करना और जनता के हितों के खिलाफ नीतियों का विरोध करना।
    3. विधानसभा में प्रभावी बहस: सदन में सरकार को जवाबदेह ठहराना और बहस के दौरान ठोस तर्क प्रस्तुत करना।
    4. जनता की समस्याओं पर ध्यान: जनता की समस्याओं को विधानसभा में उठाना और सरकार से समाधान की मांग करना।
    5. सरकार की जवाबदेही तय करना: किसी भी गलत फैसले या नीतिगत चूक पर सरकार से सवाल पूछना और उसे जवाबदेह ठहराना।

    भाजपा की आगे की रणनीति?

    अब जब भाजपा ने झारखंड में नेता प्रतिपक्ष का चयन कर लिया है, तो पार्टी की अगली रणनीति सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्ष खड़ा करने की होगी। झारखंड में भाजपा अब आगामी चुनावों के लिए जमीन तैयार करेगी और हेमंत सोरेन सरकार को घेरने की योजना बनाएगी।

    बाबूलाल मरांडी का झारखंड की राजनीति में कद काफी बड़ा है। उन्होंने मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और प्रदेश अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर काम किया है। अब नेता प्रतिपक्ष के रूप में वे झारखंड में भाजपा के लिए एक मजबूत चेहरा होंगे। भाजपा की रणनीति, झारखंड की राजनीति और विधानसभा में उनकी भूमिका पर सभी की नजरें टिकी होंगी। देखना दिलचस्प होगा कि वे विपक्ष की भूमिका को कितनी मजबूती से निभाते हैं और सरकार को कितनी कड़ी चुनौती देते हैं।

     

  • अजमेर शरीफ: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर पीएम मोदी चढ़ाएंगे चादर

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट …………..

    एक बार फिर अजमेर शरीफ से जुड़ी खबर सुर्खियों मे है । इस बार खबर के केंद्र मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है । मोदी जी इस बार भी ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाएंगे। ये उनकी 11वीं चादर होगी।

    पीएम मोदी की चादर और संदेश

    हर साल की तरह पीएम मोदी ने इस बार भी अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू और बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी को चादर सौंप दी है। शाम 6 बजे की औपचारिकता के बाद यह चादर अजमेर शरीफ भेजी जाएगी। मोदी जी ने एक्स पर तस्वीरें पोस्ट कीं और लिखा:
    मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर पवित्र चादर पेश की। यह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स के दौरान प्रतिष्ठित अजमेर शरीफ दरगाह पर रखी जाएगी।”

    यह परंपरा मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू हुई और अब तक जारी है।

    उर्स के रंग: बॉलीवुड से लेकर राजनीति तक। 

    दरगाह में चादर पेश करने वालों की लंबी फेहरिस्त है। इस बार केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के संरक्षक इंद्रेश कुमार के साथ बॉलीवुड के कुछ सितारे भी अपनी चादरें लेकर पहुंचे। हर कोई देश में शांति और भाईचारे की दुआ मांग रहा है।

    विरोध की सियासत। 

    अब कहानी में ट्विस्ट लाने का काम किया हिंदू सेना ने। संगठन के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दावा किया कि दरगाह दरअसल एक प्राचीन संकट मोचन महादेव मंदिर है। उन्होंने पीएमओ को खत लिखकर अपील की है कि जब तक मामला अदालत में लंबित है, तब तक पीएम की ओर से चादर चढ़ाने का कार्यक्रम रोक दिया जाए।

    दरगाह या मंदिर: क्या कहती है अदालत?

    गुप्ता जी का दावा है कि चौहान वंश ने इस मंदिर का निर्माण कराया था और उन्होंने कोर्ट में इसके वैज्ञानिक सर्वे की मांग की है। 24 जनवरी को इस मामले की सुनवाई होनी है।

    राजनीति का नया अध्याय?

    एक तरफ पीएम मोदी का चादर भेजना अल्पसंख्यक समुदाय के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ हिंदू सेना इसे धर्म और इतिहास का मामला बता रही है।

    आखिर क्या है अजमेर शरीफ की खासियत?

    ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। पीएम की चादर एक संदेश है कि आस्था और भाईचारा राजनीति से ऊपर है।

    अब देखना ये है कि 4 जनवरी को जब किरेन रिजिजू चादर लेकर दरगाह पहुंचेंगे, तब यह मामला सुलह का रास्ता अपनाता है या और बड़ा विवाद बनता है।

     

     

  • झारखंड : बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर चौंकाने वाला खुलासा!

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ………….

    बंगला देशी घुसपैठ के मुद्दे पर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है । केंद्रीय गृह मंत्रालय  ने एक RTI  के जबाब में  साफ कहा कि उनके पास अवैध रूप से रह रहे बंगला  नागरिकों का कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है। ये जानकारी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों या ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन के पास हो सकती है।

    सवालों की फेहरिस्त और मंत्रालय का जवाब। 
    झारखंड जनाधिकार महासभा से जुड़े सिरज दत्ता ने आरटीआई के जरिए गृह मंत्रालय से कई सवाल पूछे थे। इनमें हर राज्य में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की संख्या, ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ जैसे मामलों की जानकारी, और इन पर उठाए गए प्रशासनिक कदमों के बारे में पूछा गया था। जवाब में मंत्रालय ने कहा कि विदेशी अधिनियम 1939 और नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत यह मामला आता है। लेकिन इस पर कोई केंद्रीय डाटा मौजूद नहीं है।

    राजनीतिक गलियारे में भूचाल। 
    इस खुलासे के बाद झारखंड की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठ को जोरदार तरीके से उठाया था। पार्टी ने राज्य सरकार पर इसे रोकने में नाकाम रहने का आरोप लगाया, जबकि झामुमो और उसके सहयोगियों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। अब भाजपा ने इस मुद्दे पर आंदोलन की धमकी दी है, जबकि झामुमो ने इसे समाज में नफरत फैलाने की साजिश बताया।

    हाईकोर्ट का आदेश और सरकार का रुख। 
    झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इस मामले में फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाने का आदेश दिया था। लेकिन राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि झारखंड सीमावर्ती राज्य नहीं है और हाईकोर्ट का आदेश राज्य सरकार की स्वायत्तता में दखल है।

    राजनीतिक बयानबाजी या सुलझती गुत्थी?
    दानियल दानिश की जनहित याचिका से शुरू हुए इस विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। गृह मंत्रालय के जवाब ने बांग्लादेशी घुसपैठ के दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अब देखना होगा कि यह मामला राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या सच्चाई सामने लाने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।

    नफरत की राजनीति और आंकड़ों की चुप्पी।
    क्या बांग्लादेशी घुसपैठ वाकई एक बड़ी समस्या है या सिर्फ चुनावी भाषणों का मसाला? आंकड़ों की गैर-मौजूदगी और मंत्रालय का जवाब एक बार फिर इस मुद्दे पर राजनीतिक एजेंडे की परतें खोलता है। लेकिन जवाबदेही किसकी है? आने वाले समय में यह सवाल झारखंड और देश की राजनीति के केंद्र में रहेगा।

  • रघुवर दास की नई पारी: लौटेंगे सक्रिय राजनीति में

    झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास, अब सक्रिय राजनीति में नई भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। गुरुवार को दोपहर 3 बजे वे विशेष विमान से रांची पहुंचेंगे।  राज्यपाल पद से इस्तीफा देने के बाद वे पहली बार झारखंड आ रहे हैं ।

    शुक्रवार को रघुवर दास भारतीय जनता पार्टी  की सदस्यता ले सकते हैं। इसके बाद वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मिलने  दिल्ली रवाना होंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें संगठन में एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकता है।

    18 अक्टूबर 2023 को बने थे ओडिशा के राज्यपाल। 
    रघुवर दास ने 18 अक्टूबर 2023 को ओडिशा के राज्यपाल का पदभार संभाला था। मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मिजोरम के राज्यपाल हरि बाबू कंभमपति को ओडिशा का नया राज्यपाल नियुक्त किया और रघुवर दास का इस्तीफा स्वीकार कर लिया।

    “भविष्य की भूमिका पार्टी तय करेगी”
    बुधवार को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद रघुवर दास ने कहा, “मैंने भाजपा में बूथ अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक की यात्रा तय की है। पार्टी भविष्य में मेरी भूमिका पर फैसला करेगी। ओडिशा में मेरा अनुभव यादगार रहा। यहां के लोगों का जुनून मुझे हमेशा याद रहेगा।”

    44 वर्षों में दूसरी बार लेंगे सदस्यता।
    1980 में भाजपा की सदस्यता लेकर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले रघुवर दास 44 वर्षों में दूसरी बार पार्टी की सदस्यता लेने जा रहे हैं। उन्होंने कभी पार्टी से अलग राह नहीं पकड़ी। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे पदों पर अपनी जिम्मेदारी निभाने के बाद राज्यपाल बनने के दौरान 14 महीने तक राजनीति से दूर रहे।

    ओडिशा के लिए डबल इंजन सरकार की तारीफ।
    रघुवर दास ने ओडिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली डबल इंजन सरकार की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह सरकार गरीबों के विकास के लिए काम कर रही है और 2036 में ओडिशा के 100वें स्थापना वर्ष तक इसे विकसित राज्य के रूप में देखने की उम्मीद है।

    झारखंड और देश की राजनीति में रघुवर दास की यह वापसी कितनी असरदार होगी, यह समय ही बताएगा।

  • रघुवर दास ने ओडिशा के राज्यपाल पद से दिया इस्तीफा, फिर लौटेंगे बीजेपी में!

    RANCHI: झारखंड की राजनीति के दिग्गज और बीजेपी के वरिष्ठ नेता रघुवर दास एक बार फिर सक्रिय राजनीति में लौट रहे हैं। ओडिशा के राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर उन्होंने अपनी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, में वापसी के संकेत दे दिए हैं। रघुवर दास ने ओडिशा के राज्यपाल पद से इस्तीफा दिया, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वीकार कर लिया है। उनके इस्तीफे के बाद, मिजोरम के राज्यपाल हरी बाबू कांभांपती को ओडिशा का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है।

    रघुवर दास का सफरनामा:
    झारखंड के मुख्यमंत्री (2014-2019)
    पांच बार जमशेदपुर ईस्ट से विधायक
    बीजेपी के संस्थापक सदस्य
    रघुवर दास का नाम झारखंड की राजनीति में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। वह 1977 में जनता पार्टी से जुड़े और 1980 में बीजेपी के संस्थापक सदस्य बने। पार्टी के विभिन्न पदों पर काम करने के अलावा, उन्होंने 1995 से जमशेदपुर ईस्ट सीट का प्रतिनिधित्व किया।

    साल 2023 में उन्हें ओडिशा का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। 31 अक्टूबर को भुवनेश्वर में आयोजित एक समारोह में उन्होंने शपथ ली थी। लेकिन अब, अपने इस्तीफे के साथ, वह एक बार फिर सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन सकते हैं। रघुवर दास ने बीजेपी के लिए कई महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं। उनके वापस पार्टी में शामिल होने से संगठन को मजबूती मिलेगी। (बीजेपी के वरिष्ठ नेता का बयान)

    सिर्फ यही नहीं, रघुवर दास के परिवार ने भी इस बार चुनावी मैदान में सफलता हासिल की। उनकी बहू पूर्णिमा साहू ने 2024 के विधानसभा चुनाव में जमशेदपुर ईस्ट से जीत दर्ज की, जो उनकी परंपरागत सीट रही है। अब जब रघुवर दास फिर बीजेपी में लौटने को तैयार हैं, देखना होगा कि पार्टी में उनका क्या नया रोल होता है और वह झारखंड की राजनीति में क्या नया योगदान देंगे।

  • अंबेडकर पर टिप्पणी से भड़की बसपा, मायावती का अमित शाह पर तीखा हमला

    नई दिल्ली: बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर पर की गई टिप्पणी को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में आक्रोश उभर आया है। पार्टी प्रमुख मायावती ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने अमित शाह के बयान को दलितों और वंचित वर्गों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाने वाला करार दिया।

    मायावती ने अपने बयान में कहा, “बीजेपी के अमित शाह ने संसद में बाबा साहेब अंबेडकर के लिए जिन शब्दों का उपयोग किया, वह अस्वीकार्य हैं। इससे दलितों और वंचित वर्गों की भावनाएं आहत हुई हैं। अमित शाह को न केवल उन शब्दों को वापस लेना चाहिए, बल्कि अपने बयान पर माफी भी मांगनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो बसपा 24 दिसंबर को देशभर में विरोध प्रदर्शन करेगी।”

    मायावती ने सत्ता और विपक्ष दोनों पर निशाना साधते हुए कहा कि ये पार्टियां केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए बाबा साहेब के प्रति सम्मान दिखाती हैं। उन्होंने कहा, “बाबा साहेब के अनुयायियों के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ इन पार्टियों का रवैया एक ही है। संविधान को जगह-जगह लहराना और नीला रंग पहनना महज दिखावे की सस्ती राजनीति है। इन पार्टियों को जातिवाद और संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सच्चे दिल से इन वर्गों के अधिकारों के लिए काम करना होगा।”

    बसपा प्रमुख ने स्पष्ट किया कि जब तक अमित शाह माफी नहीं मांगते, तब तक बसपा का संघर्ष जारी रहेगा।

  • वन नेशन-वन इलेक्शन: जेपीसी और कांग्रेस

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट………

    “एक देश-एक चुनाव”—एक ऐसा विचार जो सियासत की गहराइयों में हलचल मचा रहा है, अब संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की चौखट पर दस्तक दे चुका है। ये वो मंच होगा जहां सत्ता और विपक्ष के बीच का ‘महाभारत’ अपनी नयी गाथा लिखेगा।
    कांग्रेस ने अपने योद्धाओं की टोली तैयार कर ली है। प्रियंका गांधी, रणदीप सुरजेवाला, मनीष तिवारी और सुखदेव भगत—चारों नाम फाइनल कर स्पीकर के पास भेज दिए गए हैं। इन चारों नेताओं के कंधों पर अब कांग्रेस का पक्ष रखने का भार होगा।
    जेपीसी: एक और ‘कुश्ती का अखाड़ा’। 
    जेपीसी, यानी संयुक्त संसदीय समिति, एक ऐसा मंच जहां संसद के दोनों सदनों के सदस्य मिलकर किसी भी मुद्दे या बिल की गहन समीक्षा करते हैं। लेकिन यह सिर्फ समीक्षा नहीं, राजनीतिक तराजू पर नीतियों और विचारधाराओं को तौलने का एक मौका भी है।
    कांग्रेस के योद्धा:
    • प्रियंका गांधी: कांग्रेस का युवा और महिला चेहरा, जो इस लड़ाई को एक नई धार दे सकती हैं।
    • रणदीप सुरजेवाला और मनीष तिवारी: दोनों कानूनी दांवपेंचों में माहिर, शब्दों के योद्धा।
    • सुखदेव भगत: आदिवासी नेतृत्व का प्रतीक, जिनकी बातों में ज़मीन की गूंज सुनाई देती है।
    क्या होगा जेपीसी का दायरा?
    लोकसभा स्पीकर इस समिति का स्वरूप तय करेंगे। अमूमन लोकसभा के सदस्य राज्यसभा की तुलना में दुगुने होते हैं। यह समिति अपने अध्ययन के आधार पर सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी, जो आगे संशोधित बिल का आधार बनेगी।
    वन नेशन-वन इलेक्शन:
    यह सिर्फ एक संवैधानिक संशोधन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक समर है। इसे अमल में लाने के लिए सरकार को विशेष बहुमत चाहिए। यही वजह है कि सरकार आम सहमति बनाने के लिए जेपीसी का सहारा ले रही है।
    सवालों की परछाई में ‘आम सहमति’
    क्या कांग्रेस के ये चार नाम सत्ता पक्ष के ‘एक देश-एक चुनाव’ के सपने को चुनौती दे पाएंगे? या फिर यह समिति महज एक और औपचारिकता बनकर रह जाएगी?
    राजनीतिक पंडितों की नज़रें इस सवाल पर टिकी हैं।
    क्योंकि यह फैसला सिर्फ चुनावी प्रणाली को नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को हिला सकता है।
    अगले कुछ दिनों में देश के सियासी मंच पर यह देखना दिलचस्प होगा कि

    Deputy Speaker of Lok Sabha

    की यह गाड़ी कितनी दूर तक दौड़ती है और कौन इसे रोकने की ताकत रखता है।

  • वन नेशन-वन इलेक्शन बिल पर सियासी ड्रामा: अनुपस्थित सांसदों पर भाजपा की सख्ती

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट……

    आज चर्चा में है ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ बिल। सवाल वही पुराना—ये बिल क्या है, क्यों है, और आखिर इसे पास कराने की इतनी हड़बड़ी क्यों?”

    लोकसभा में मंगलवार को जब इस बहुचर्चित बिल पर वोटिंग होनी थी, तब भाजपा के कई सांसद नदारद थे। पार्टी ने तीन लाइन का ‘व्हिप’ जारी किया था, लेकिन फिर भी 20 से ज्यादा सांसद सदन में नहीं पहुंचे। अब इनकी गैरमौजूदगी पर भाजपा ने ‘नोटिस’ जारी करने का फैसला लिया है। पर ये सवाल क्यों नहीं उठता कि जिस पार्टी ने ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया, उसके अपने सिपाही इस ‘युद्ध’ से क्यों गायब हो गए?”

    “बिल के पक्ष में पड़े 269 वोट, विपक्ष में 198 वोट। यानी गणित बता रहा है कि सियासत में ‘पक्ष और विपक्ष’ दोनों की गिनती से लोकतंत्र की असली नब्ज टटोली जा रही है। लेकिन जब सत्ताधारी दल की ताकत ‘व्हिप’ के बावजूद पूरी नहीं दिखी, तो क्या ये संकेत है ‘अंदरूनी असहमति’ का?”

    “दो तिहाई बहुमत की बात करें तो 362 सांसद चाहिए। लोकसभा में NDA के पास 292 सीटें हैं और राज्यसभा में सिर्फ 112। संविधान बदलने के लिए जरूरी ‘मैजिक नंबर’ अभी दूर है। इसलिए जेपीसी का रास्ता अख्तियार किया गया। सरकार कहती है ‘विचार-विमर्श’ होगा, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ से लोकतंत्र मजबूत होगा या कमजोर?”

    “क्योंकि देखिए, चुनाव सिर्फ मतदान नहीं, जनता का त्योहार है। सवाल ये है कि ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ से ‘चुनाव की आत्मा’ खत्म तो नहीं हो जाएगी? क्या जनता का ‘शोर’ कम करने की कवायद चल रही है? और भाजपा के सांसदों की गैरमौजूदगी क्या सिर्फ इत्तेफाक है या इशारा? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब सरकार के पास भले ही न हो, लेकिन वक्त जरूर मांगेगा।”