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  • तरुण गुप्ता की भाजपा में वापसी: संथाल में संगठन को मजबूती देने का संकल्प

    By The News Post4u.

    गिरिडीह, झारखंड: जामताड़ा विधानसभा से चुनाव लड़ चुके एवं वर्तमान में बीस सूत्री कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति के उपाध्यक्ष तरुण गुप्ता ने गुरुवार को एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। उन्होंने अपने कई समर्थकों के साथ गिरिडीह में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।

    बरगंडा में हुआ सदस्यता समारोह.

    यह कार्यक्रम गिरिडीह के बरगंडा पावर हाउस स्थित बाबूलाल मरांडी के आवास पर संपन्न हुआ। मौके पर जामताड़ा जिला भाजपा अध्यक्ष सुमित शरण समेत पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता उपस्थित रहे। पार्टी में पुनः शामिल होते हुए तरुण गुप्ता ने स्पष्ट किया कि वे भाजपा की नीतियों और सिद्धांतों से प्रभावित होकर ही फिर से पार्टी में लौटे हैं।

    मरांडी बोले – तरुण की वापसी से पार्टी को मिलेगा नया जोश.

    भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस मौके पर कहा –

    “तरुण गुप्ता जैसे कर्मठ, जुझारू और सामाजिक सरोकारों से जुड़े नेता की वापसी न केवल जामताड़ा बल्कि पूरे संथाल परगना और झारखंड में संगठन को नई ऊर्जा देगी। वे हमेशा से गरीबों, वंचितों और ज़रूरतमंदों की आवाज़ बनते रहे हैं।”

    मरांडी ने यह भी विश्वास जताया कि आने वाले समय में तरुण गुप्ता पार्टी की मजबूती में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

    तरुण गुप्ता का संकल्प – संथाल को बनाएंगे भाजपा का गढ़.

    पार्टी में शामिल होने के बाद तरुण गुप्ता ने कहा:

    “मैं भाजपा की विचारधारा, राष्ट्रवाद और विकास के प्रति प्रतिबद्धता से प्रेरित होकर पार्टी में लौटा हूं। अब मेरा लक्ष्य जामताड़ा ही नहीं, बल्कि पूरे संथाल परगना क्षेत्र में पार्टी को नई मजबूती देना है।”

    उन्होंने यह भी कहा कि वे ज़मीनी स्तर पर जनता से जुड़कर संगठन को मजबूत करेंगे और आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को निर्णायक सफलता दिलाने के लिए काम करेंगे।

    पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह, वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी.

    इस मौके पर कई भाजपा नेता उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से बिनय सिंह ,महादेव दुबे, अशोक उपाध्याय, महेंद्र वर्मा, सुभाष सिन्हा, नवीन सिन्हा, मनोज संघई, रंजीत रॉय और कुमार गौरव शामिल थे। सभी नेताओं ने एक स्वर में तरुण गुप्ता का स्वागत करते हुए उन्हें पूर्ण समर्थन का भरोसा दिलाया।

    राजनीतिक मायने.

    तरुण गुप्ता की भाजपा में वापसी को संथाल क्षेत्र में पार्टी के विस्तार की रणनीति के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। जामताड़ा जैसे क्षेत्र जहां भाजपा अब तक अपेक्षाकृत कमजोर रही है, वहां उनके जैसे लोकप्रिय चेहरे की सक्रियता पार्टी को बड़ा राजनीतिक फायदा दिला सकती है।

     

  • गिरिडीह: ‘मन की बात’ की 123वीं कड़ी का आयोजन, जनभागीदारी और राष्ट्र भावना का दिखा उत्साह

    By The News Post4u

    गिरिडीह: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रेरणास्पद मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात’  की 123वीं कड़ी का सीधा प्रसारण रविवार को गिरिडीह में बेहद उत्साह, गरिमा और राष्ट्र भावना के साथ आयोजित किया गया।

    कार्यक्रम में जिले के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों, महिला स्वयं सहायता समूहों, युवा कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया। कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और गर्व का क्षण तब आया जब गिरिडीह सीधे पूरे देश के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ा। यह गिरिडीहवासियों के लिए न सिर्फ एक विशेष अवसर था, बल्कि यह क्षण उन्हें राष्ट्र के साथ जुड़ने का गौरव भी प्रदान कर गया।  इस अवसर ने गिरिडीह में लोकतांत्रिक सहभागिता और राष्ट्र निर्माण के प्रति जनजागरूकता को नई ऊर्जा दी। आयोजन सिर्फ एक रेडियो प्रसारण भर नहीं था, बल्कि यह एक प्रेरणादायक सामाजिक मिलन बन गया जिसमें सभी ने एक साथ बैठकर प्रधानमंत्री के विचारों को सुना और आत्मसात किया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद प्रतिनिधि दिनेश यादव, बिनय सिंह, भाजपा जिला अध्यक्ष महादेव दुबे, उद्योगपति अमरजीत सिंह सलूजा,चैम्बर ऑफ कॉमर्स के निर्मल झुनझुनवाला, मुकेश जालान, विकास खेतान,निर्मल स्लामपुरिया,संजीव कुमार व साहिल शर्मा उपस्थित थे ।

  • मानहानि की जंग में सियासी तकरार: लालू यादव के साले साधु यादव ने भेजा ₹5 करोड़ का कानूनी नोटिस

    ‘Broken Promises’ किताब बनी विवाद की जड़

    परवेज़ आलम for The News Post4u.

    राजनीति और लेखनी के टकराव में अब कानूनी लड़ाई की आहट सुनाई देने लगी है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के साले और चर्चित राजनीतिक शख्सियत अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव ने झारखंड भाजपा के चुनाव प्रबंधन प्रमुख मृत्युंजय शर्मा को ₹5 करोड़ का मानहानि नोटिस भेजा है। यह नोटिस शर्मा द्वारा लिखी गई किताब ‘Broken Promises: Caste, Crime and Politics in Bihar’ और हाल ही में एक पॉडकास्ट में दिए गए बयान के संबंध में भेजा गया है।

    क्या है विवाद?

    20 जून 2024 को एक पॉडकास्ट में मृत्युंजय शर्मा ने साधु यादव से जुड़ी कुछ घटनाओं का जिक्र किया था, जिन्हें साधु यादव ने “गंभीर, आधारहीन और उनकी छवि को धूमिल करने वाला” बताया है। नोटिस में तीन प्रमुख आरोपों को गलत, बेबुनियाद और अपमानजनक बताते हुए माफी की मांग की गई है।

    ये हैं वे तीन विवादित आरोप:

    1. गौतम-शिल्पी हत्याकांड में साधु यादव की कथित संलिप्तता, जबकि उनका कहना है कि इस मामले में CBI और न्यायालय दोनों ने उन्हें क्लीन चिट दी है।
    2. छात्र नेता चंद्रशेखर की हत्या के विरोध में JNU छात्रों द्वारा दिल्ली स्थित बिहार भवन पर किए गए प्रदर्शन के दौरान, गोली चलवाने का आदेश देने का आरोप। साधु यादव ने इसे भी  पूरी तरह मनगढ़ंत बताया है।
    3. रोहिणी आचार्य की शादी के समय एक शो-रूम से कार, गहने और फर्नीचर जबरन उठवाने का दावा, जिसे भी वे झूठा और अपमानजनक करार देते हैं।

    साधु यादव की मांगें.

    मानहानि नोटिस के तहत साधु यादव ने मृत्युंजय शर्मा से बिना शर्त माफी मांगने की बात कही है। साथ ही चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो वे कानूनी कार्रवाई के लिए बाध्य होंगे।

     

    मृत्युंजय शर्मा का पलटवार.

    इधर, मृत्युंजय शर्मा ने किसी भी प्रकार की माफी मांगने से साफ इनकार करते हुए कहा,

    “जो किताब मैंने लिखी है, वह तथ्यात्मक शोध और ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित है। साधु यादव जैसे व्यक्ति किस प्रतिष्ठा की बात कर रहे हैं, यह पूरा बिहार जानता है।” मृत्युंजय शर्मा का कहना है कि लालू यादव के साले साधु यादव ने जिन तीन मामलों का जिक्र कर मानहानि का नोटिस भेजा है, उससे हर बिहारी वाकिफ है. इनके पास कौन सी प्रतिष्ठा है जिसको ठेस पहुंची है. यही तो वह संस्कृति है- गुंडागर्दी, डर और परिवारवाद की, जिसने लालू यादव के राज में बिहार को बर्बाद किया था और अब सच बोलने वालों को डराने के लिए कानूनी नोटिस भेजा जा रहा है.

    शर्मा का यह भी आरोप है कि साधु यादव ने उन्हें फोन कर दबाव डालने की कोशिश की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि “यदि मुझे या मेरे परिवार को कोई नुकसान पहुंचता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी साधु यादव की होगी।”

    किताब, चुनाव और राजनीति.

    11 मार्च 2024 को प्रकाशित हुई यह पुस्तक उस समय सामने आई थी जब देश में लोकसभा चुनावों का माहौल गर्म था। अब जबकि बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, साधु यादव द्वारा भेजा गया यह नोटिस राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर रहा है।

    मृत्युंजय शर्मा का दावा है कि वे सच के पक्ष में खड़े हैं और उनके लेखन का उद्देश्य बिहार की जातीय राजनीति, अपराध और सत्ता के समीकरणों को उजागर करना है। उन्होंने कहा,

    “डराने, धमकाने और मानहानि के नोटिस भेजने से सच्चाई नहीं रुकती।”

    कौन हैं मृत्युंजय शर्मा ?

    • झारखंड भाजपा के इलेक्शन मैनेजमेंट प्रमुख हैं।
    • बीआईटी मेसरा और एक्सएलआरआई, जमशेदपुर से पढ़ाई की है।
    • पूर्व में एशियन पेंट्स में काम कर चुके हैं और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के साथ भाजपा संगठन में कार्यरत रहे हैं।
    • ‘Broken Promises’ किताब के ज़रिए उन्होंने बिहार की राजनीति की कथित काली परतों को सामने लाने की कोशिश की है।

    यह मामला केवल एक मानहानि नोटिस का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा, इतिहास के पुनर्पाठ और सियासी समीकरणों के टकराव का प्रतीक बन चुका है। अब देखना यह है कि यह विवाद अदालत की चौखट तक पहुंचता है या सियासत की गलियों में और गहराता है।

     

  • रांची में ‘संविधान बचाओ रैली’ को संबोधित करेंगे मल्लिकार्जुन खरगे, भाजपा ने साधा तीखा निशाना

    By the news post4u

    रांची: कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 6 मई को एक दिवसीय दौरे पर विशेष विमान से रांची पहुंचेंगे। इस दौरे के दौरान वे रांची के ऐतिहासिक पुराने विधानसभा मैदान में आयोजित ‘संविधान बचाओ’ रैली को संबोधित करेंगे। यह रैली देश के मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की अवधारणा को बचाने के उद्देश्य से आयोजित की जा रही है।

    कांग्रेस के झारखंड प्रदेश मुख्य प्रवक्ता लाल किशोर नाथ शाहदेव ने बताया कि खरगे पहली बार झारखंड प्रदेश कांग्रेस की पोलिटिकल अफेयर कमेटी और विस्तारित कार्यसमिति की बैठक में भाग लेंगे। साथ ही रैली के बाद होटल बीएनआर चाणक्य में पार्टी के जिला अध्यक्षों की बैठक को भी संबोधित करेंगे, जहां संगठनात्मक मुद्दों पर रणनीतिक चर्चा होगी।

    रैली की व्यापक तैयारी.

    ‘संविधान बचाओ’ रैली को सफल बनाने के लिए कांग्रेस के विधायक, सांसद, मंत्री और जिला स्तर के पदाधिकारी घर-घर जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। भीषण गर्मी और बारिश की आशंका को ध्यान में रखते हुए आयोजन स्थल पर विशेष जर्मन हैंगर और दो अतिरिक्त पंडाल लगाए जा रहे हैं ताकि राज्य भर से आने वाले कार्यकर्ताओं और आम लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

    शाहदेव ने बताया कि इस रैली में जातिगत जनगणना की दिशा में मिली प्रारंभिक सफलता की जानकारी साझा की जाएगी और अनुच्छेद 15(5) के शीघ्र क्रियान्वयन की मांग को प्रमुखता दी जाएगी। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने हाल ही में एक पत्र भेजा है जिसमें राज्य स्तर पर नियंत्रण कक्ष और नोडल पदाधिकारी की नियुक्ति कर गतिविधियों की निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही 30 मई तक चलने वाले घर-घर अभियान और चौपालों के आयोजन की योजना भी बनाई गई है।

    भाजपा का तीखा हमला: “बिल्ली हज को चली”

    कांग्रेस की इस पहल पर झारखंड भाजपा ने कड़ा हमला बोला है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस की ‘संविधान बचाओ’ रैली को “70 चूहे खाकर बिल्ली हज को चली” जैसी कहावत से जोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने लंबे शासनकाल में संविधान की सबसे ज्यादा अवहेलना की है, और अब वही पार्टी खुद को संविधान का रक्षक बताने का नाटक कर रही है।

    मरांडी ने कहा कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए निजी हितों के लिए संविधान में 80 बार संशोधन किए। 1951 में ही नेहरू ने पहला संशोधन किया, और आपातकाल के दौरान तो संविधान को कुचल ही दिया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं के लिए संविधान अब “जेबी किताब” बन चुका है।

    भाजपा नेता ने मल्लिकार्जुन खरगे से मांग की कि रांची की रैली से पहले उन्हें मंच पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या कांग्रेस उस मंत्री के बयान से सहमत है, जो कहता है कि “मेरे लिए शरीयत ऊपर है और संविधान नीचे।”

    मरांडी ने यह भी कहा कि अगर कांग्रेस को वास्तव में संविधान पर विश्वास है तो नेशनल हेराल्ड मामले में राहुल गांधी से पूछताछ पर उसके नेता सड़कों पर क्यों उतर आते हैं। उन्होंने कांग्रेस पर संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर राज्य सरकारों को गिराने का भी आरोप लगाया।
    6 मई को होने जा रही ‘संविधान बचाओ’ रैली सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश में सामाजिक न्याय और संविधान की व्याख्या को लेकर छिड़ी बहस का केंद्र बन चुकी है। जहां कांग्रेस इसे लोकतंत्र और अधिकारों की लड़ाई बता रही है, वहीं भाजपा इसे ढोंग और पाखंड करार दे रही है। देखना होगा कि इस रैली के जरिए कांग्रेस क्या संदेश देने में सफल होती है, और भाजपा इसका किस तरह से जवाब देती है।

  • झारखंड की सियासत में बड़ा उलटफेर,ताला मरांडी ने छोड़ी भाजपा,जेएमएम मे शामिल

    परवेज़ आलम. 

    झारखंड की सियासत में शुक्रवार को बड़ा उलटफेर देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और 44 वर्षों बाद एक बार फिर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) में वापसी की।

    ताला मरांडी ने अपना इस्तीफा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी को भेजा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि मैं भाजपा का एक समर्पित सदस्य रहा हूं, पार्टी द्वारा दिए गए सभी अवसरों के लिए आभार प्रकट करता हूं। किंतु वर्तमान परिस्थितियों, व्यक्तिगत कारणों और वैचारिक मतभेदों के कारण मैंने यह निर्णय गहन विचार के बाद लिया है। इसमें किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं है।”

    हेमंत सोरेन की मौजूदगी में हुए शामिल। 

    भाजपा से इस्तीफा देने के कुछ ही घंटों बाद ताला मरांडी ने भोगनाडीह में आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की उपस्थिति में झामुमो की सदस्यता ग्रहण की। हेमंत सोरेन ने उन्हें पार्टी का पारंपरिक पट्टा पहनाकर स्वागत किया। कार्यक्रम में झामुमो के केंद्रीय सचिव पंकज मिश्रा, विधायक कल्पना सोरेन, हेमलाल मुर्मू, धनंजय सोरेन और मोहम्मद ताजुद्दीन जैसे कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।

    राजनीतिक सफर: झामुमो से शुरू, कांग्रेस और भाजपा के रास्तों से फिर लौटे घर.

    करीब 63 वर्षीय ताला मरांडी की राजनीतिक यात्रा काफी लंबी रही है। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1989-90 में एक झामुमो कार्यकर्ता के रूप में की थी। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हुए और 1995 2000 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके।

    साल 2003 में भाजपा में शामिल होने के बाद 2005 में पहली बार बोरियो विधानसभा सीट से विधायक बने। उन्होंने झामुमो के कद्दावर नेता लोबिन हेम्ब्रम को हराया। 2014 में उन्होंने एक बार फिर लोबिन को हराकर सीट पर कब्जा जमाया और पार्टी ने उन्हें 2016 में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। हालांकि, कुछ महीनों बाद ही उन्हें पद से हटा दिया गया।

    2019 में भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने आजसू पार्टी का दामन थामा, लेकिन बोरियो से चुनाव हार गए। 2020 के बाद पुनः भाजपा में लौटे और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें राजमहल सीट से टिकट दिया, लेकिन वे विजय हांसदा से 1.5 लाख से अधिक मतों से हार गए।

    राजनीतिक पृष्ठभूमि में बढ़ रही थी नाराजगी. 

    ताला मरांडी की नाराजगी की झलक 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले ही दिखाई देने लगी थी। पार्टी ने बोरियो सीट से एक बार फिर लोबिन हेम्ब्रम को टिकट दे दिया, जिससे वे बेहद असंतुष्ट थे। वहीं उनके बेटों ने पहले ही झामुमो की सदस्यता ले ली थी, जिससे यह संकेत मिल गया था कि परिवार का झुकाव अब झामुमो की ओर है। भाजपा से मोहभंग और लगातार उपेक्षा के चलते अब ताला मरांडी ने झामुमो की ओर वापसी कर ली है, जिसे वह “घर वापसी” कह रहे हैं।

    राजनीति में नई करवट या पुरानी राह की वापसी?

    ताला मरांडी की झामुमो में वापसी महज एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीति में एक सांकेतिक बदलाव की शुरुआत भी हो सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी यह घर वापसी झामुमो के लिए कोई बड़ा सियासी लाभ लेकर आएगी या फिर यह सिर्फ एक व्यक्तिगत यात्रा की पूर्णता भर है।

     

  • झारखंड : बजट सत्र 24 फरवरी से, सरकार की परीक्षा !

    रिपोर्ट- परवेज़ आलम

    झारखंड विधानसभा का बहुप्रतीक्षित बजट सत्र 24 फरवरी से शुरू हो रहा है। इस सत्र में सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा सामने आएगा और विपक्ष पूरी तैयारी के साथ सरकार को घेरने के लिए मैदान में उतरेगा, भाजपा मुख्य विपक्षी दल है पर पार्टी  अपने विधायक दल के नेता का नाम घोषित नहीं कर पाई है । ऐसे मे सत्ता पक्ष भाजपापर तंज़ कसने से नहीं चूकेगी ।

    राज्यपाल के अभिभाषण से होगी शुरुआत

    24 फरवरी को राज्यपाल के अभिभाषण के साथ ही बजट सत्र का बिगुल बज जाएगा। 25 फरवरी को पहली पारी में प्रश्नकाल और दूसरी पारी में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा होगी। वहीं, 26 फरवरी को महाशिवरात्रि की छुट्टी रहेगी।

    बजट से पहले अनुपूरक बजट पर नजर

    27 फरवरी को सरकार 2024-25 का तृतीय अनुपूरक बजट पेश करेगी। इसके बाद दूसरी पारी में राज्यपाल के अभिभाषण पर वाद-विवाद और सरकार की प्रतिक्रिया के साथ मतदान होगा। 28 फरवरी को अनुपूरक बजट पर चर्चा कर विनियोग विधेयक पारित होगा।

    3 मार्च को होगा ‘बड़े बजट’ का ऐलान

    1 और 2 मार्च को अवकाश रहेगा, लेकिन 3 मार्च को वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर वित्तीय वर्ष 2025-26 का बजट पेश करेंगे। 4 मार्च से बजट पर बहस शुरू होगी, जिसमें पक्ष और विपक्ष खुलकर अपनी बात रखेंगे। 5 से 7 मार्च तक विभिन्न विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा होगी।

    होली के बाद विधेयकों की बरसात

    8 और 9 मार्च को फिर से अवकाश रहेगा, और 10 व 11 मार्च को अनुदान मांगों पर बहस होगी। 12 से 16 मार्च तक होली और अन्य त्योहारों के चलते विधानसभा में सन्नाटा रहेगा। फिर 17 से 21 मार्च तक विभिन्न विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा जारी रहेगी।

    22 और 23 मार्च को शनिवार-रविवार के चलते बैठक नहीं होगी। 24 मार्च को अनुदान मांगों पर बहस होगी, जबकि 25 और 26 मार्च को कई अहम विधेयक पेश किए जाएंगे। 27 मार्च को सत्र का समापन होगा, जहां कुछ और विधेयकों और गैर-सरकारी संकल्पों पर चर्चा होगी।

    बजट सत्र में क्या होगा खास?

    इस बार का बजट सत्र कई मायनों में दिलचस्प होने वाला है। महंगाई, बेरोजगारी और विकास कार्यों की सुस्त रफ्तार पर विपक्ष सरकार को घेर सकता है, तो सरकार भी अपने कामकाज का बखान करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी। देखना होगा कि ये सत्र जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है!

     

  • भाजपा मे इतना सन्नाटा क्यूँ है भाई !

    परवेज़ आलम की खास रिपोर्ट ………..

    झारखंड में भाजपा की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है जैसे कोईपहलवान दो मुकाबलों में लगातार पटखनी खाकर चारों खाने चित हो गया हो। विधानसभा चुनाव में दूसरी बार हार का स्वाद चखने के बाद पार्टी की सक्रियता पर मानो विराम लग गया है। जो नेता चुनावी मौसम में चौबीसों घंटे दौरे कर रहे थे, वे अब अपने-अपने पुराने कामों में लौट गए हैं। आलम यह है कि संगठन का काम ठप पड़ा है और नेता प्रतिपक्ष का चयन भी अब तक नहीं हो पाया है।

    रघुवर दास की ‘घर वापसी’ पर सवाल.
    भाजपा की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ओडिशा के राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर झारखंड लौटे रघुवर दास भी पार्टी में किसी जिम्मेदारी के इंतजार में हैं। चर्चाएं थीं कि उन्हें संगठन में बड़ा पद दिया जाएगा, लेकिन फिलहाल उनकी भूमिका सिर्फ प्राथमिक सदस्यता तक ही सीमित रह गई है। पार्टी के अंदरखाने में यह कयास भी लगाए जा रहे थे कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं बढ़ा है। जिस जोश और उमंग के साथ उन्होंने भाजपा में दोबारा कदम रखा था, वह अब ठंडा पड़ता दिख रहा है।

    नेता प्रतिपक्ष का पेंच फंसा.
    विधानसभा का दूसरा सत्र 24 फरवरी से शुरू होने वाला है और भाजपा अब तक नेता प्रतिपक्ष के नाम की घोषणा नहीं कर पाई है। सूत्रों की मानें तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद इस पर निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ही इस दौड़ में सबसे आगे दिख रहे हैं। अगर पार्टी उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखती है, तो रांची से सातवीं बार विधायक चुने गए चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह (सीपी सिंह) को यह जिम्मेदारी मिल सकती है।

    आयोगों की नियुक्तियां अटकीं, कोर्ट सख्त.
    भाजपा की निष्क्रियता का असर सरकार के कामकाज पर भी पड़ रहा है। सूचना आयोग समेत कई महत्वपूर्ण आयोगों में नियुक्तियां अब तक लटकी हुई हैं, क्योंकि इसके लिए नेता प्रतिपक्ष की सहमति जरूरी होती है। हाई कोर्ट ने कई बार सरकार को फटकार लगाई है कि अगर नेता प्रतिपक्ष का चयन नहीं हो पा रहा है तो विपक्ष अपने किसी सदस्य को नामित करे, लेकिन अदालत की बात भी अनसुनी ही रह गई है। सूचना आयोग में वर्षों से मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के पद खाली हैं, लेकिन नियुक्तियों को लेकर कोई ठोस पहल नहीं दिख रही।

    सोशल मीडिया पर सक्रियता, जमीनी स्तर पर सन्नाटा.
    झारखंड भाजपा की मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो लगता है कि पार्टी अभी तक हार के ग़म से उबर नहीं पाई है। चुनावी साल में जो उर्जा और सक्रियता भाजपा में देखने को मिल रही थी, वह अब लगभग गायब हो गई है। पार्टी के नेता सिर्फ सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते नजर आ रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बड़ा आंदोलन या अभियान नहीं दिख रहा। ऐसा लगता है कि भाजपा अब अगली बार चुनावी बिगुल बजने तक ‘मौन व्रत’ में ही रहने वाली है।

     

  • कौन बनेगा बीजेपी विधायक दल का नेता ? मरांडी, सीपी सिंह और नीरा यादव !

    परवेज़ आलम की खास रिपोर्ट ………

    झारखंड की राजनीति में इन दिनों बीजेपी की खामोशी ने सत्ता पक्ष  को हमलावर होने का पूरा मौका दे दिया है। विधानसभा चुनाव खत्म हुए चार महीने हो गए, लेकिन अब तक बीजेपी अपने विधायक दल के नेता का चयन नहीं कर पाई है। संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां अटकी हुई हैं, और सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि दो सप्ताह के भीतर नेता प्रतिपक्ष का चयन किया जाए।

    मरांडी, सीपी सिंह और नीरा यादव!

    पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी इस दौड़ में सबसे आगे हैं। उनके साथ सीपी सिंह और डॉ. नीरा यादव के नामों पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है। लेकिन बीजेपी की इस देरी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। सत्ता पक्ष  का कहना है कि चुनावी हार के बाद पार्टी नेतृत्व में गहरी निराशा है।

    झामुमो और कांग्रेस के तीखे वार।

    सत्तारूढ़ झामुमो ने इस मुद्दे पर भाजपा को जमकर घेरा है। झामुमो महासचिव विनोद पांडेय ने तंज कसते हुए कहा, “चुनावी हार के बाद भाजपा इतनी निराश हो चुकी है कि विधायक दल का नेता तक नहीं चुन पा रही। राज्य की जनता ने इन्हें नकार दिया है, और अब इनकी सियासत दिशाहीन हो गई है।”

    कांग्रेस ने भी भाजपा पर संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान न करने का आरोप लगाया। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने कहा, “भाजपा को नफरत और झूठ फैलाने के अलावा कुछ नहीं आता। इनकी मंशा संविधान को कमजोर करने की है।”

    मामला उल्टा पड़ गया।

    गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा पहले संवैधानिक पदों पर नियुक्ति न होने को लेकर राज्य सरकार पर हमलावर रहती थी। लेकिन अब यही मुद्दा पार्टी के गले की फांस बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद विपक्ष को हमले का नया हथियार मिल गया है।

    शीघ्र होगा निर्णय?

    ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा केंद्रीय नेतृत्व की निगरानी में जल्द ही विधायक दल के नेता का चयन करेगी। पर्यवेक्षक नियुक्त किए जाने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश पार्टी पर दबाव बढ़ा रहा है, और फैसला जल्द लिए जाने की उम्मीद की जा रही है।

    क्या मरांडी बन पाएंगे विधायक दल के नेता, या सीपी सिंह और डॉ. नीरा यादव बाज़ी मारेंगे?

  • रघुवर दास आज प्रदेश कार्यालय में भाजपा की सदस्यता ग्रहण किया

    रांची:

    पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास आज, 10 जनवरी को भाजपा की सदस्यता ग्रहण किया  इस अवसर पर प्रदेश कार्यालय में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया कार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. रविंद्र कुमार राय, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री नागेंद्र त्रिपाठी, प्रदेश संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह, और प्रदेश सदस्यता प्रभारी राकेश प्रसाद भी मौजूद रहें।

  • झारखंड: मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

    रांची: सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के रिक्त पदों को भरने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड विधानसभा की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को निर्देश दिया है कि वह अपने किसी निर्वाचित सदस्य को इस चयन कमेटी के लिए नेता प्रतिपक्ष के रूप में नामित करे। यह प्रक्रिया दो सप्ताह में पूरी करने का आदेश दिया गया है।

    सुप्रीम कोर्ट का आदेश: नियुक्ति प्रक्रिया तेज करें.

    मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने झारखंड में सूचना आयोग की नियुक्ति से संबंधित याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार तुरंत इस मामले में कदम उठाए और दो सप्ताह के भीतर नेता प्रतिपक्ष की नामित प्रक्रिया पूरी करे। इसके बाद चयन समिति मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करेगी।

    नेता प्रतिपक्ष की गैरमौजूदगी बनी समस्या.

    राज्य सरकार ने सुनवाई के दौरान बताया कि झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद फिलहाल खाली है। नेता प्रतिपक्ष चयन समिति का अहम हिस्सा होते हैं। इसी वजह से सूचना आयोग की नियुक्तियों में देरी हो रही है।

    सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि इस निर्देश का अनुपालन सुनिश्चित करें और इस पर शपथ पत्र दाखिल करें।

    2020 से निष्क्रिय है सूचना आयोग.

    याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि झारखंड में वर्ष 2020 से राज्य सूचना आयोग पूरी तरह से निष्क्रिय है। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों सहित कई पद खाली हैं, जिसके कारण सूचना के अधिकार से संबंधित हजारों मामले लंबित हैं।

    विज्ञापन के बावजूद नियुक्ति क्यों रुकी?

    राज्य सरकार के मुताबिक, जून 2024 में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। लेकिन झारखंड विधानसभा चुनाव के बाद नेता प्रतिपक्ष की घोषणा नहीं हो पाई। इस कारण चयन समिति की बैठक नहीं हो सकी।

    पूर्व में क्या हुआ था?

    इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया था कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति चार सप्ताह में पूरी की जाए। अदालत ने मुख्य सचिव से इस मामले में प्रगति रिपोर्ट के लिए शपथ पत्र मांगा था।

    सूचना का अधिकार अधर में.

    जानकारों का मानना है कि सूचना आयोग में नियुक्तियों में देरी से राज्य में सूचना के अधिकार का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को गति देगा, बल्कि जनता के अधिकारों को बहाल करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा।