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  • झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने लालू प्रसाद यादव से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर की चर्चा

    द न्यूज़ पोस्ट4यू डेस्क.

    पटना: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सोमवार को बिहार की राजधानी पटना पहुंचे। यहाँ उन्होंने राबड़ी देवी के सरकारी आवास पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के संस्थापक और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से शिष्टाचार मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने लालू प्रसाद यादव के स्वास्थ्य की जानकारी ली और उनके हालचाल पूछे।

    मुलाकात के दौरान हेमंत सोरेन और लालू प्रसाद यादव के बीच देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति, सामाजिक न्याय की चुनौतियों और आर्थिक स्थिति पर गंभीर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर भी विचार साझा किए। इस दौरान राबड़ी देवी समेत परिवार के अन्य सदस्य और राजद के कई वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहे।

    लालू यादव को बताया संघर्ष और न्याय की राजनीति का प्रतीक.

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मुलाकात के बाद कहा कि लालू प्रसाद यादव भारतीय राजनीति में संघर्ष और न्याय की राजनीति के सशक्त प्रतीक हैं। उन्होंने हमेशा गरीबों, पिछड़ों और वंचितों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है। सोरेन ने कहा कि लालू यादव जैसे नेताओं के अनुभव और मार्गदर्शन से लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की मजबूती होती है।
    उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड और बिहार के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से गहरे हैं। दोनों राज्य मिलकर काम करेंगे, तो विकास की गति और भी तेज होगी।

    वोटर अधिकार यात्रा में बोले सोरेन – “यह चुनाव देश का संकल्प होगा”

    इससे पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पटना में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के समापन अवसर पर जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि बिहार में होने वाला आगामी विधानसभा चुनाव सिर्फ राज्य की दिशा तय नहीं करेगा, बल्कि यह देश की दशा और दिशा का भी निर्धारण करेगा।
    उन्होंने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि भाजपा धनबल और बाहुबल के सहारे सत्ता में आने की कोशिश करती है। केंद्रीय एजेंसियों – सीबीआई और ईडी – का दुरुपयोग कर विपक्षी नेताओं को डराया-धमकाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे भी झूठे मामलों में जेल भेजा गया, लेकिन जेल जाने के बावजूद हमने झारखंड की जनता का हौसला टूटने नहीं दिया। अगर हम जेल में नहीं होते, तो झारखंड में लोकसभा चुनाव में भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पाती।

    भाजपा पर वोट चोरीका आरोप.

    हेमंत सोरेन ने भाजपा पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि आज भाजपा सत्ता में ‘वोट चोरी’ के सहारे बनी हुई है। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि वर्षों से भाजपा इस गोरखधंधे का सहारा लेती रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज इस खेल का पर्दाफाश सबके सामने हो गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा का मुकाबला तभी संभव है जब विपक्ष और जनता एकजुट होकर इसका सामना करें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा – “जब हम सब मिलकर खड़े होंगे, तो कोई ताकत हमें रोक नहीं पाएगी।”

    वोटर सूची पुनरीक्षण पर उठाए सवाल.

    बिहार की ऐतिहासिक धरती का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विशेष और गहन पुनरीक्षण को एक साथ जोड़कर जो प्रक्रिया अपनाई गई है, वह गलत है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

     

  • लालू यादव फिर चुने गए RJD  के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कब्जा, 13वीं बार निर्विरोध चुनाव

    परवेज़ आलम. By The News Post4u.

    राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में नेतृत्व को लेकर चल रही प्रक्रिया एक बार फिर उसी बिंदु पर पहुंची, जहां से पार्टी की पहचान शुरू होती है। पार्टी संस्थापक लालू प्रसाद यादव को लगातार 13वीं बार राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध चुन लिया गया है। यह घोषणा पार्टी के निर्वाचन पदाधिकारी रामचंद्र पूर्वे ने अधिसूचना जारी कर की।

    सोमवार, 23 जून को लालू यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। मंगलवार, 24 जून को दोपहर 2 बजे नामांकन पत्रों की जांच की गई और दोपहर 3 बजे तक नाम वापस लेने की समयसीमा तय थी। लेकिन जब किसी अन्य उम्मीदवार ने न तो नामांकन दाखिल किया और न ही लालू यादव ने अपना नाम वापस लिया, तो उन्हें निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया।

    कब सौंपा जाएगा प्रमाण पत्र?

    निर्वाचन पदाधिकारी रामचंद्र पूर्वे ने बताया कि लालू यादव को निर्वाचन का आधिकारिक प्रमाण पत्र 5 जुलाई 2025 को आयोजित होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में सौंपा जाएगा। इसी बैठक में उनका आधिकारिक रूप से कार्यभार भी घोषित किया जाएगा।

    इसका राजनीतिक महत्व क्या है?

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लालू प्रसाद यादव का एक बार फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना यह दर्शाता है कि पार्टी अब भी पूरी तरह उनके नेतृत्व में विश्वास रखती है। हालांकि लालू यादव सक्रिय राजनीति से स्वास्थ्य कारणों से थोड़ा पीछे रहे हैं, फिर भी उनका करिश्माई प्रभाव, संगठन पर पकड़ और सामाजिक न्याय की राजनीति में उनकी गूंज अब भी बनी हुई है।

     RJD के अंदरूनी समीकरण.

    राजद में लंबे समय से यह अटकलें थीं कि अब पार्टी की कमान तेजस्वी यादव को सौंप दी जाएगी, लेकिन इस बार फिर से लालू यादव की ताजपोशी यह संकेत देती है कि वह अभी भी पार्टी का चेहरा बने रहेंगे और संगठन को अपनी निगरानी में आगे बढ़ाएंगे। संभवतः पार्टी की रणनीति यह है कि वरिष्ठता का नेतृत्व और युवाओं का संचालन साथ-साथ चले।
    लालू प्रसाद यादव का निर्विरोध निर्वाचन न केवल राजद की एकजुटता को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि पार्टी अभी भी अपने संस्थापक के अनुभव और रणनीतिक कौशल पर भरोसा करती है। आने वाले समय में राजद किस तरह से अपनी राजनीति को आगे बढ़ाएगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

  • झारखंड के बाहर पांव पसारने की तैयारी में JMM, बिहार और बंगाल  की  सीटों पर नजर

    परवेज़ आलम.  

    झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति पर काम कर रही है। हाल ही में रांची के खेलगांव में संपन्न हुए 13वें महाधिवेशन में यह स्पष्ट संकेत मिला कि JMM अब राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के विस्तार को लेकर गंभीर है। इसका सीधा असर बिहार और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ सकता है ।

    बिहार में JMM की दबाव की राजनीति‘?

    बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और झामुमो ने यहां कम से कम 12 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और अन्य संभावित सहयोगी दलों के साथ तालमेल के पक्ष में है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है।

    गौरतलब है कि झारखंड में राजद और JMM के बीच गठबंधन पहले से है और राजद को हेमंत सरकार में प्रतिनिधित्व भी मिला हुआ है। ऐसे में बिहार में गठबंधन की संभावना तो बनी हुई है, लेकिन JMM अब “बराबरी के साझेदार” के रूप में बात करना चाहता है — और यहीं से तेजस्वी यादव की राजनीतिक गणित गड़बड़ा सकती है।

    JMM जिन 12 सीटों पर नजर बनाए हुए है, वे सभी झारखंड से सटे सीमावर्ती जिले हैं — जमुई, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर और बांका जैसे क्षेत्र, जहां आदिवासी और झारखंडी मूल के लोगों की आबादी भी कम नहीं है। यहां पार्टी के संगठन को पहले से ही सक्रिय करने के निर्देश दिए जा चुके हैं।

    पश्चिम बंगाल में भी रणनीतिक एंट्री

    JMM की रणनीति सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। पार्टी की नजर पश्चिम बंगाल की उन सीमावर्ती आदिवासी बहुल सीटों पर भी है, जहां वह पहले भी उम्मीदवार खड़ा कर चुकी है — जैसे झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा, अलीपुरद्वार, पश्चिम वर्धमान और बीरभूम। पिछली बार भले ही JMM ने आखिरी समय में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दे दिया था, JMM तृणमूल कांग्रेस से तालमेल कर चुनाव मे आना चाहती है । पर क्या ममता बनर्जी जेएमएम को मनमाफिक सीटें देंगी इस पर सवाल है । बता दें कि इन जिलों में आदिवासी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है और JMM इस आधार पर ममता बनर्जी से सीटें मांग सकता है।

    भाजपा शासित राज्यों पर भी नजर

    JMM की राजनीतिक दृष्टि सिर्फ पड़ोसी गैर-भाजपा राज्यों तक सीमित नहीं है। पार्टी ने ओडिशा और असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में भी अपने संगठन को मजबूत करने की योजना बनाई है। ओडिशा के मयूरभंज, क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों में पार्टी पहले से संगठनात्मक सक्रियता बढ़ा रही है। साथ ही, असम में भी आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान और जनजातीय पहचान की मांग को लेकर आंदोलन शुरू करने की घोषणा की गई है। गौर तलब है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने झारखंड चुनाव के दौरान भाजपा के लिए सक्रिय प्रचार किया था। ऐसे में JMM का यह कदम भाजपा के लिए भी चुनौती बन सकता है।

    राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर झामुमो का कदम

    पार्टी के महाधिवेशन में पारित प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा गया है कि JMM अब केवल झारखंड की पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका निभाने की दिशा में बढ़ेगी। हेमंत सोरेन की यह महत्वाकांक्षा न केवल राज्य की सीमाओं को चुनौती देती है, बल्कि पुराने क्षेत्रीय समीकरणों को भी नया रूप देने की संभावना पैदा करती है।

    राजनीतिक संकेत क्या हैं?

    JMM की इस रणनीति का संदेश साफ है — वह अब ‘सहायक पार्टी’ की भूमिका से आगे बढ़कर खुद को निर्णायक ताकत के रूप में देखना चाहता है। यह तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी जैसे सहयोगियों को असहज कर सकता है, जो अब तक इन इलाकों में अपनी मजबूत पकड़ मानते रहे हैं।

    आने वाले विधानसभा चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि JMM की यह नई रणनीति उसे कितनी सफलता दिला पाती है, और विपक्षी एकता के नाम पर बनते-बिगड़ते रिश्तों पर इसका क्या असर होता है।

  • झारखंड 2024: सीएम को हुई जेल और भाजपा हुई फ़ेल!

    परवेज़ आलम की खास रपट ……………..

    2024  झारखंड के लिए केवल एक चुनावी साल नहीं था, बल्कि सियासत का ऐसा रंगमंच था, जहां हर दिन एक नया ट्विस्ट देखने को मिला। जनवरी से शुरू हुई उथल-पुथल नवंबर में जाकर शांत हुई, लेकिन इस दौरान झारखंड ने इतिहास भी बनाया और राजनीति के सबसे दिलचस्प पल भी देखे।

    हेमंत सोरेनकी गिरफ्तारी ।

    31 जनवरी 2024, झारखंड की राजनीति और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज हो गया। पहली बार किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को केंद्रीय जांच एजेंसी ने गिरफ्तार किया। ईडी के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से उनके आवास पर सात घंटे पूछताछ की और फिर रात में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले 29 जनवरी को ईडी ने दिल्ली में शांति निकेतन स्थित उनके आवास, झारखंड भवन और उनके पिता शिबू सोरेन के घर पर छापेमारी की थी। लेकिन हेमंत सोरेन को ढूंढ नहीं पाई । 30 जनवरी को वे अचानक इंडिया गठबंधन के विधायकों के साथ रांची में बैठक करते दिखे।

    चंपाई सोरेन का मुख्यमंत्री बनना।

    31 जनवरी की रात हेमंत सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा। उनकी गिरफ्तारी के बाद गठबंधन ने चंपाई सोरेन को मुख्यमंत्री चुना। पांच महीने तक राज्य की कमान चंपाई सोरेन के हाथ में रही

    5 महीने बाद जेल रिहाई और हेमंत की वापसी।

    28 जून 2024 को झारखंड हाई कोर्ट से हेमंत सोरेन को जमानत मिली। जेल से बाहर आते ही उन्होंने अपने नए लुक से सबको चौंका दिया। लंबे बाल और दाढ़ी में वे अपने पिता शिबू सोरेन की झलक दे रहे थे। उनकी रिहाई के साथ ही गठबंधन में सत्ता परिवर्तन की अटकलें तेज हो गईं। और आखिरकार, 4 जुलाई को हेमंत सोरेन ने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली ।

    चुनाव और गठबंधन की जीत।

    2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। जेएमएम-कांग्रेस-आरजेडी और सीपीआई-एमएल के साथ मिलकर गठबंधन ने 81 में से 56 सीटों पर जीत दर्ज की। 28 नवंबर को हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

    बीजेपी के लिए निराशाजनक रहा साल।

    2024 बीजेपी की हार का साल भी साबित हुआ। लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को झटका लगा, और विधानसभा चुनाव में उनकी हार ने झारखंड में उनकी स्थिति और कमजोर कर दी।

    झारखंड की राजनीति में 2024 का साल दिखाता है कि लोकतंत्र में एक दिन भी कितना निर्णायक हो सकता है। हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी से लेकर उनकी वापसी तक, सत्ता के हर पहलू में सस्पेंस, ड्रामा और नई उम्मीदें देखने को मिलीं।

    झारखंड की राजनीति को समझने के लिए इस साल को हमेशा याद किया जाएगा।
    तो दोस्तों, कैसी लगी ये कहानी ? कमेंट में अपनी राय जरूर दीजिएगा।

  • बिहार चुनाव 2025: झामुमो की राजनीतिक बिसात, 12 सीटों पर दावा!

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट……………..

    झारखंड की सियासी सरगर्मी अब बिहार की ओर बढ़ रही है। साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक बिसात बिछने लगी है। इस बार झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरने को तैयार है। पार्टी ने 12 विधानसभा सीटों पर दावा ठोक दिया है, और यह मांग सीधे  महागठबंधन (राजद-कांग्रेस) से की गई है।

    झामुमो का तर्क: सीमावर्ती जिलों में मजबूत पकड़। 
    सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, झामुमो ने अपनी दावेदारी पर बड़ा तर्क दिया है—बिहार के सीमावर्ती जिलों में उनका मजबूत जनाधार है। पहले भी पार्टी के विधायक इन इलाकों से चुने जा चुके हैं। जिन सीटों पर झामुमो की नजर है, उनमें शामिल हैं:

    • तारापुर, कटोरिया, मनिहारी, झाझा, बांका, ठाकुरगंज
    • रूपौली, रामपुर, बनमनखी, जमालपुर, पीरपैंती, चकाई

    झामुमो का मास्टरप्लान।
    पार्टी के नेताओं का कहना है कि इन 12 सीटों पर उनके पास न सिर्फ मजबूत कार्यकर्ता आधार है, बल्कि जीतने वाले प्रत्याशी भी तैयार हैं। जल्द ही झामुमो, राजद, और कांग्रेस की महागठबंधन बैठक में यह मांग रखने की तैयारी है।

    2020 का सबक और 2025 की उम्मीद। 
    गौरतलब है कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में झामुमो ने अकेले चुनाव लड़ने का दांव खेला था। लेकिन यह कदम कामयाब नहीं हो सका। इस बार झामुमो को उम्मीद है कि झारखंड की तरह बिहार में भी महागठबंधन सीटों का बंटवारा उसी अंदाज में करेगा।

    क्या कहती है राजनीति?
    बिहार में झामुमो का दांव क्या रंग लाएगा?

    • राजद और कांग्रेस को सीट बंटवारे में झामुमो की मांग माननी होगी या सियासी घमासान बढ़ेगा?
    • सीमावर्ती जिलों में झामुमो के दावे को कितना समर्थन मिलेगा?

    , बिहार की सियासत एक बार फिर गरमाने को तैयार है। झारखंड का झामुमो बिहार में कितनी जगह बना पाएगा, यह देखने वाली बात होगी। लेकिन राजनीति का एक नियम तो तय है—जितनी बड़ी रणनीति, उतना बड़ा खेल!

  • पटना: BPSC परीक्षा विवाद पर राजनीति और प्रदर्शन का संग्राम

    परवेज़ आलम की  विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ………..
    पटना की सड़कों पर गूंजते नारों और गांधी मैदान की दीवारों पर गिरी बैरिकेडिंग ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है: क्या छात्रों की आवाज़ें राजनीति के गलियारों में गुम हो जाएंगी?

    प्रदर्शन के पीछे की कहानी। 
    13 दिसंबर 2024 को हुई 70वीं बीपीएससी प्रीलिम्स परीक्षा से उपजा विवाद अब सड़कों पर उतर आया है। बापू केंद्र पर पेपर देरी से मिलने के आरोपों ने अभ्यर्थियों को आक्रोशित कर दिया। बीपीएससी ने परीक्षा को आंशिक रूप से रद्द करते हुए 4 जनवरी को फिर से परीक्षा कराने का आदेश दिया। लेकिन छात्रों की मांग है कि परीक्षा को पूरी तरह रद्द किया जाए।

    गांधी मैदान बना ‘संघर्ष का मंच’। 
    रविवार को अभ्यर्थियों ने गांधी मैदान में प्रदर्शन किया। इस मार्च ने प्रशासन के पसीने छुड़ा दिए। बिना अनुमति प्रदर्शन करने पर प्रशासन ने सख्ती दिखाई। बैरिकेडिंग तोड़कर अभ्यर्थी मैदान में घुस गए, जिससे स्थिति बेकाबू हो गई। गांधी मैदान में प्रदर्शन के खिलाफ प्रशांत किशोर समेत 700 लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गयी है। बीपीएससी अभ्यर्थियों का प्रदर्शन को लेकर पटना डीएम डॉ चंद्रशेखर सिंह ने मीडिया को बताया कि “गांधी मैदान में प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गयी थी। इसके बावजूद अभ्यर्थी गांधी मैदान में जमाहुए थे।”

    लाठीचार्ज और नाराजगी। 
    प्रदर्शनकारियों की भीड़ जब सीएम हाउस की ओर बढ़ी, तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया। लेकिन बवाल तब और बढ़ गया जब पुलिस ने माइक पर ऐलान किया, “आपके नेता (प्रशांत किशोर) लौट चुके हैं। अब आप भी लौट जाइए।” प्रदर्शनकारी उग्र हो गए और प्रशांत किशोर पर राजनीतिक लाभ के लिए छात्रों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

    प्रशांत किशोर के पांच सवाल
    प्रशांत किशोर ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार के खिलाफ पांच मांगें रखीं:

    1. बीपीएससी पीटी परीक्षा को रद्द कर फिर से आयोजित किया जाए।
    2. अनियमितताओं की न्यायिक जांच हो।
    3. छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं।
    4. लाठीचार्ज के आदेश देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
    5. आत्महत्या करने वाले छात्र सोनू यादव के परिजनों को न्याय मिले।

    उन्होंने कहा, “अगर सरकार बात नहीं मानेगी, तो 2 जनवरी से अनिश्चितकालीन अनशन शुरू करूंगा।”

    सियासी बयानबाजी और सवाल। 
    प्रदर्शन के बीच प्रशांत किशोर का छात्रों के साथ मुलाकात का वीडियो वायरल हुआ। जहां पप्पू यादव ने उन पर राजनीति करने का आरोप लगाया, वहीं तेजस्वी यादव ने कहा, “प्रशांत किशोर छात्रों के आंदोलन को भटका रहे हैं।”

    छात्रों की परीक्षा या राजनीति की परीक्षा?
    पटना की सड़कों पर निकला यह मार्च केवल छात्रों के भविष्य का सवाल नहीं है। यह उस राजनीतिक सर्कस का हिस्सा बनता जा रहा है, जहां मुद्दे गुम हो जाते हैं और मंच नेताओं का हो जाता है।

    क्या सरकार और प्रशासन छात्रों की आवाज सुन पाएंगे? या यह प्रदर्शन भी सिर्फ राजनीति की गूंज बनकर रह जाएगा?

  • पटना मे छात्रों पर लाठी चार्ज : BPSC परीक्षा में गड़बडी के खिलाफ कर रहे थे प्रदर्शन

    पटना: बिहार की राजधानी पटना मे 70वीं बीपीएससी परीक्षा दोबारा कराने की मांग को लेकर रविवार को पटना के गांधी मैदान में छात्र संसद हुई। जिसमें जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भी शामिल हुए। जिसके बाद मार्च निकालने की सहमति बनी। गांधी मैदान से सीएम आवास तक मार्च निकलना था। जिसमें पीके भी शामिल थे। लेकिन जेपी गोलंबर के पास मार्च को रोक लिया गया है। भीड़ को तितर वितर करने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग भी किया  छात्रों की मांग है कि दोबारा परीक्षा आयोजित कराई जाए। बीते कई दिनों से छात्र पटना के गर्दनीबाग में धरना प्रदर्शन कर रहे थे।के गांधी मैदान में बीते 15 दिनों से छात्र इकट्ठा हो रहे हैं। हाथों में तख्तियां, होठों पर नारे, और दिल में उम्मीद लिए। बीपीएससी की 70वीं परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्रों की मांग है – “परीक्षा दोबारा होनी चाहिए।”

    नीतीश कुमार का ‘शाम 4 बजे का’ लोकतंत्र.
    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली में हैं। पत्रकारों के सवाल पर उन्होंने जवाब दिया, “शाम 4 बजे के बाद बात करते हैं।” आप सोच रहे होंगे, 4 बजे का क्या है? क्या लोकतंत्र में जवाब का कोई टाइम टेबल होता है? या फिर यह सिर्फ वक़्त को टालने की राजनीति है?

    गांधी मैदान की छात्र संसद. 
    वहीं पटना में गांधी मैदान का माहौल बिल्कुल अलग है। यहां छात्र संसद हो रही है। हजारों की संख्या में जुटे अभ्यर्थी अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस संसद का नेतृत्व खुद छात्रों के हाथ में है। इस बार कोई बड़ा नेता मंच पर नहीं, बल्कि मंच के नीचे छात्रों के बीच खड़ा है।

    प्रशांत किशोर, जिन्हें आमतौर पर रणनीतिकार के रूप में देखा जाता है, यहां समर्थन में मौजूद हैं। वह कहते हैं, “यह आंदोलन छात्रों का है, इसका नेतृत्व भी छात्रों को ही करना चाहिए। हम तो बस उनके साथ खड़े हैं।”

    बिहार की राजनीति: एक नया मोड़. 
    इस पूरे प्रकरण पर विपक्ष ने सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी, लेकिन चिट्ठी का जवाब अभी बाकी है। दूसरी ओर डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी कहते हैं, “अगर परीक्षा में गड़बड़ी का कोई सबूत लाकर दिखा दे, तो 2 मिनट में फैसला होगा।” लेकिन सवाल यह है – क्या गड़बड़ी के सबूत देने की जिम्मेदारी सिर्फ छात्रों की है?

    दिल्ली में नीतीश, पटना में छात्र, और सियासत बीच में अटकी. 
    नीतीश कुमार दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के परिवार से मिलने जा सकते हैं। गांधी मैदान में छात्र अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। पटना और दिल्ली की इस दूरी में, सवाल यह उठता है कि छात्रों के सपनों की यह लड़ाई कब तक सियासत के गलियारों में भटकेगी?

    “गांधी मैदान का कोना-कोना गवाह है कि यहां लड़ाई किसी नौकरी की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जिसने छात्रों को सिर्फ प्रदर्शनकारी बना दिया है। सवाल सिर्फ 70वीं बीपीएससी की परीक्षा का नहीं है, सवाल यह है कि क्या वाकई इस देश का युवा खुद को अपनी सरकार के सामने सुना सकता है? या फिर लोकतंत्र में सवाल करने का टाइम टेबल भी ‘शाम 4 बजे के बाद’ तक सीमित है।”

  • BPSC अभ्यर्थियों का ‘शिक्षा सत्याग्रह’: परीक्षा पारदर्शिता पर उठे सवाल

    70वीं बीपीएससी परीक्षा के अभ्यर्थियों ने बुधवार शाम भागलपुर  सैंडिस कंपाउंड में कैंडल मार्च निकालकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। इस मार्च को ‘शिक्षा सत्याग्रह’ का नाम दिया गया, जिसमें अभ्यर्थियों ने “प्रोटेस्ट नहीं – रिक्वेस्ट, विवाद नहीं – संवाद, व्यवधान नहीं – समाधान” के नारों के साथ अपनी मांगें रखीं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी रही।

    परीक्षा में अनियमितताओं का आरोप। 
    अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि BPSC ने कदाचार मुक्त और धांधली मुक्त परीक्षा का दावा किया था, लेकिन इसके विपरीत कई जिलों से गड़बड़ियों की खबरें सामने आईं। बापू सभागार में आयोजित परीक्षा के दौरान अनियमितताओं की पुष्टि हुई, जिससे 12,000 परीक्षार्थियों की परीक्षा स्थगित करनी पड़ी। अभ्यर्थियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में परीक्षा स्थगन से पूरे रिजल्ट पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

    फिर से परीक्षा कराने की मांग। 
    अभ्यर्थियों ने BPSC से परीक्षा दोबारा कराने की मांग की। उनका कहना है कि सभी छात्रों को समान अवसर और पारदर्शी प्रक्रिया का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई छात्रों को 200-300 किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र आवंटित किए गए, जिससे उनकी तैयारी और प्रदर्शन प्रभावित हुआ। इस दूरी का औचित्य समझ से परे है।

    आंदोलन की अगली रणनीति।
    कैंडल मार्च के बाद अभ्यर्थियों ने बैठकर अपनी आगे की रणनीति बनाई। उनका कहना है कि अगर जरूरत पड़ी, तो वे पटना जाकर अपनी बात रखेंगे।

    अभ्यर्थियों की अपील।
    BPSC अभ्यर्थियों ने इस प्रदर्शन को प्रोटेस्ट नहीं, बल्कि एक शांतिपूर्ण अपील के रूप में रखा है। उनका कहना है कि यह आंदोलन विवाद से ज्यादा समाधान की ओर ध्यान केंद्रित करता है। उनकी एकमात्र मांग है कि सभी छात्रों के साथ समान और पारदर्शी व्यवहार हो।

    इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने एक बार फिर परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता की जरूरत को रेखांकित किया है।

  • झारखंड के मंत्री संजय यादव को लालू यादव ने क्या दिया टिप्स !

    पटना: झारखंड के नव-नियुक्त श्रम मंत्री संजय प्रसाद यादव ने पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव से मुलाकात की। इस खास मुलाकात में लालू यादव ने मंत्री संजय प्रसाद यादव को गरीबों के हक और अधिकार के लिए काम करने का आशीर्वाद दिया।

    गरीबों की तकदीर बदलने का निर्देश। 
    लालू प्रसाद यादव ने कहा, “गरीबों की तकदीर बदलना हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।” उन्होंने संजय यादव को झारखंड के गांव-गांव जाकर गरीबों के दुख-दर्द समझने और उनकी समस्याओं का समाधान करने की सलाह दी। लालू यादव ने कहा कि विरोधियों को जवाब देने का सबसे अच्छा तरीका है विकास कार्य। उन्होंने जोर देकर कहा, “ईमानदारी और निष्ठा से जनता की सेवा करें, यही असली राजनीति है।”

    लालू-राबड़ी से आशीर्वाद लेकर दिखाया समर्पण । 
    पदभार संभालने के बाद मंत्री संजय प्रसाद यादव ने पटना जाकर अपने राजनीतिक गुरु लालू प्रसाद यादव से आशीर्वाद लिया। इस मौके पर राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव भी मौजूद रहे। आरजेडी के झारखंड प्रदेश प्रवक्ता डॉ. मनोज कुमार ने बताया कि मंत्री ने पार्टी नेतृत्व के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए गरीबों और मजदूरों के लिए समर्पित भाव से काम करने का वादा किया।

    झारखंड में श्रम विभाग की नई उम्मीदें । 
    संजय प्रसाद यादव ने लालू यादव से मुलाकात के दौरान राज्य में श्रम विभाग को नई दिशा देने का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा कि झारखंड में श्रमिकों और बेरोजगारों के लिए कौशल विकास और रोजगार के नए अवसर लाने का काम प्राथमिकता पर रहेगा।

    राजनीतिक संदेश और सादगी का मेल । 
    लालू यादव के साथ इस मुलाकात को राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। मंत्री ने न केवल पार्टी नेतृत्व से आशीर्वाद लिया, बल्कि इस दौरान राजद की विचारधारा और गरीबों के लिए समर्पण को केंद्र में रखते हुए अपनी जिम्मेदारी को और अधिक गंभीरता से निभाने का संकेत दिया। झारखंड के श्रम मंत्री संजय प्रसाद यादव अब लालू यादव की सलाह और आशीर्वाद को अमल में लाते हुए झारखंड के श्रमिकों और गरीबों की आवाज बनने की तैयारी में हैं। जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने और विकास कार्यों के जरिए विरोधियों को जवाब देने की इस यात्रा में उनके लिए चुनौतियां और अवसर दोनों हैं।

  • पांच दिसंबर को हेमंत कैबिनेट का विस्तार

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट…….
    हेमंत सोरेन सरकार ने कैबिनेट विस्तार की तारीख तय कर दी है। पांच दिसंबर, समय दोपहर 12:30 बजे, स्थान राजभवन का बिरसा मंडप। झारखंड की राजनीतिक फिज़ाओं में उठते सवालों और अटकलों का दौर अब खत्म होता दिख रहा है। 28 नवंबर को जब हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो मोरहाबादी मैदान का मंच राष्ट्रीय नेताओं से गुलजार था। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, भगवत मान सिंह , अरविंद केजरीवाल, सांसद पप्पू यादव व विधायक कल्पना मुर्मू  सोरेन   समेत तमाम नेता इसके गवाह बने। लेकिन तब से एक सवाल बना हुआ था—मंत्रिमंडल में कौन होगा शामिल?

    राजनीतिक हलकों में चर्चा और उम्मीदें
    झारखंड कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राजेश ठाकुर के मुताबिक जब कोई बड़ा फैसला होता है, तो मंथन जरूरी है। सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। पांच दिसंबर को पूरे मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण होगा। नेतृत्व का फैसला सर्वमान्य होगा।”

    पांच दिसंबर का इंतजार कीजिए।
    राजभवन के बिरसा मंडप में सिर्फ शपथ नहीं होगी, बल्कि झारखंड की राजनीतिक तस्वीर में नए रंग भरने की शुरुआत होगी।