100 साल पहले आज ही के दिन गिरिडीह आए थे बापू

गांधी आगमन शताब्दी समारोह में फिर गूंजा वही संदेश : आत्मनिर्भरता, खादी और एकता का मंत्र

परवेज़ आलम.

The News Post4u.

गिरिडीह : आज से ठीक 100 साल पहले, 7 अक्टूबर 1925 को, गिरिडीह की धरती ने एक ऐतिहासिक पल देखा था।
यह केवल किसी व्यक्ति का आगमन नहीं था, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक चेतना का प्रवेश था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी  यहां आए थे।
चौधरानी कुसुम कुमारी देवी के आमंत्रण पर जब बापू यहाँ पहुँचे, तो गिरिडीह की मिट्टी ने आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और स्त्री-जागरण का पाठ सीखा। उन्होंने यहाँ की जनता को यह सिखाया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और आत्मिक जिम्मेदारी भी है।
गांधी जी का गिरिडीह आगमन हमें याद दिलाता है कि परिवर्तन किसी बड़े नारे से नहीं, बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन से शुरू होता है। पचंबा के गोल बंगला में उनका ठिकाना बना थाऔर गिरिडीह की जनता ने पूरे जोश और श्रद्धा से उनका स्वागत किया।

उस दौर में जब देश आज़ादी की जंग लड़ रहा था, बापू ने गिरिडीह की जनता से कहा था —

“स्वयं के लिए नहीं, देश के लिए हर दिन आधा घंटा सूत जरूर काटें।”

यह सिर्फ एक अपील नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की नींव रखने वाला संदेश था।

बापू की यात्रा का शताब्दी समारोह – आज फिर जाग उठा वो जज़्बा

गिरिडीह में शुरू हुए गांधी आगमन शताब्दी समारोह में बापू की वही प्रेरणा फिर जीवंत हो उठी। जगह-जगह सभाएं, पदयात्राएं और खादी के प्रति जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।
उस दौर में गांधी जी ने अपने प्रवास के दौरान कई प्रतिनिधियों से मुलाकात की, दो बड़ी सभाएं कीं और खरगडीहा गौशाला जाकर स्वतंत्रता सेनानियों से मिले, उनका हौसला बढ़ाया।

गिरिडीह की धरती पर जन्मी थी सेवा और बलिदान की मिसाल

गांधी जी के आगमन का असर इतना गहरा था कि उसी सभा में महिलाओं ने अपने सोने-चांदी के गहने उतारकर बापू के चरणों में समर्पित कर दिये।
यह दान किसी दिखावे के लिए नहीं था — यह था देशबंधु चित्तरंजन दास के सम्मान में बनाए गए देशबंधु स्मारक कोष’ के लिए।
उस दौर में आंदोलन आर्थिक तंगी से जूझ रहा था, और गांधी जी ने लोगों से सहयोग की अपील की थी।

गिरिडीह की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया
पार्वती देवी, जो स्वतंत्रता सेनानी बजरंग सहाय की पत्नी थीं, ने सभा में ही अपने कंगन, बाली और हार खोलकर दान कर दिए।
उनकी इस प्रेरणा से सैकड़ों महिलाओं ने भी कोष में योगदान दिया।
स्थानीय उद्योगपति, सामाजिक संगठन और खासकर माहुरी समाज ने भी गहने, जेवर और नकद दान देकर गिरिडीह को राष्ट्रीय योगदान की मिसाल बना दिया।

 100 वर्ष बाद भी वही संदेश आज भी प्रासंगिक

आज जब देश फिर आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रहा है, तब गांधी जी का गिरिडीह से दिया गया वह संदेश पहले से कहीं ज़्यादा मायने रखता है —
देशहित में हर दिन कुछ न कुछ अपने हाथों से करें, ताकि आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार हो।”

गिरिडीह की मिट्टी ने 100 साल पहले जिस त्याग, सेवा और एकता की कहानी लिखी थी, वह आज भी उतनी ही प्रेरक है।
शताब्दी समारोह के बहाने एक बार फिर वही आवाज़ गूंज रही है —

“चरखा ही नहीं, हर हाथ देश की ताकत बने।”

 

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