Blog

  • कैसे बदलेगी झारखंड की तस्वीर, हेमंत सोरेन ने बताया ?

    रांची :झारखंड में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी नई टीम के साथ शुक्रवार को पहली बैठक की। ये बैठक केवल रस्म अदायगी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा कदम था जो यह बताने की कोशिश कर रहा था कि राज्य की राजनीति अब केवल बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहेगी।

    15 से 16 बिंदुओं की रूपरेखा तैयार की गई है, जिसमें मंत्री अपने विभागों का हाल-चाल लेंगे, योजनाओं की समीक्षा करेंगे, और समस्याओं का जल्द समाधान निकालने का रोडमैप बनाएंगे। मुख्यमंत्री ने मीडिया के सामने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह केवल मीटिंग नहीं, एक्शन का ऐलान है।”

    हर जिले का दौरा, हर समस्या का समाधान
    हेमंत सोरेन ने अपने मंत्रियों को सख्त निर्देश दिए हैं: दो महीने के भीतर सभी जिलों का दौरा करें। जनता के बीच जाएं, उनकी समस्याएं समझें, और फीडबैक मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचाएं। इसके साथ ही विभागीय योजनाओं और कर्मियों के प्रमोशन पर भी नजर रखने को कहा गया है।

    मुख्यमंत्री का कहना है, “झारखंड को बेहतर दिशा में ले जाने के लिए ज़मीन से जुड़े फैसले लेने होंगे।”

    कैबिनेट की बैठक से निकली बड़ी बातें
    समीक्षा और सुधार: सभी मंत्री योजनाओं की गहन समीक्षा करेंगे।
    अछूते क्षेत्र: जनजातीय और पहाड़ी इलाकों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने पर जोर।
    लंबित योजनाओं का निष्पादन: अटकी योजनाओं को पूरा करने के लिए ठोस कदम।
    राजस्व वृद्धि: राजस्व बढ़ाने के लिए नए प्रस्ताव।
    भवन निर्माण की समीक्षा: उपयोग सुनिश्चित करने और फिजूलखर्ची रोकने के निर्देश।
    कर्मचारियों की पदोन्नति: प्रमोशन और पदस्थापना में पारदर्शिता लाने की कवायद।
    जनता से सीधा संवाद: हर मंत्री को अपने विधानसभा क्षेत्र के साथ अन्य जिलों में जनता से संवाद करना होगा।
    क्या ये बदलाव जमीन पर दिखेंगे?
    प्रशासनिक सुधार की यह कवायद कितनी असरदार होगी, यह देखना बाकी है। पर हेमंत सोरेन का ये अंदाज कुछ अलग है।

    क्या वाकई ये बैठक झारखंड की राजनीति को नई दिशा दे पाएगी? क्या ये घोषणाएं सिर्फ सरकारी कागजों पर रह जाएंगी, या सच में झारखंड की तस्वीर और तकदीर बदलेगी?

     

  • पुण्यतिथि पर बाबा साहेब डॉ.अंबेडकर को नमन

    गिरिडीह: बाबा साहेबकी 69वीं पुण्यतिथि पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एकता मंच के द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। शहर के ऑफिसर्स कॉलोनी स्थित डॉ. अंबेडकर भवन सह पुस्तकालय में मंच के सदस्यों ने माल्यार्पण कर बाबा साहेब को नमन किया।

    कार्यक्रम में मंच के जिलाध्यक्ष और प्रख्यात रेडियोलॉजिस्ट डॉ. शैलेंद्र कुमार चौधरी के साथ कमल दास, गुलाब दास, मधु राव, ललन नागवंशी समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे। सभी ने एक स्वर में बाबा साहेब के बताए मार्ग पर चलने की प्रतिबद्धता जताई।

    लेकिन सवाल उठता है कि क्या बाबा साहेब की विरासत का सही अर्थों में सम्मान हो रहा है? डॉ. चौधरी ने कहा, “मंच का उद्देश्य अनुसूचित जातियों को एकजुट करना है। आज समाज के लोग बंटे हुए हैं, लेकिन मंच के माध्यम से सभी को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया जाएगा।”

    यह कहना आसान है कि हम अंबेडकर के आदर्शों को मानते हैं, लेकिन हकीकत में उनकी राह पर चलना कितना मुश्किल है? सामाजिक एकता के लिए मंच की यह पहल स्वागत योग्य है, लेकिन क्या यह महज़ एक औपचारिकता भर है या वाकई उनके सपनों को सच करने की एक गंभीर कोशिश?

    बाबा साहेब का भारत एक ऐसा भारत था, जहाँ समानता और न्याय हर नागरिक का हक़ हो। इस पुण्यतिथि पर माल्यार्पण के साथ यह सोचने की ज़रूरत है कि क्या हमने उनके सपनों का भारत बनाने की दिशा में सही कदम उठाए हैं, या उनके विचार महज़ एक भाषण का हिस्सा बनकर रह गए हैं?

    समाज को बदलने के लिए मंच की यह कोशिश कितना असर डाल पाएगी, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन गिरिडीह की इस पहल ने एक सवाल हर मन में ज़रूर छोड़ा है—क्या बाबा साहेब का भारत हमारे प्रयासों का हिस्सा है?

  • आदिवासी युवा महोत्सव 2024:ब्रांड एंबेसडर शिल्पी नेहा तिर्की

     

    रांची में इस दिसंबर, झारखंड की मिट्टी से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं की गूंज हर कोने में सुनाई देगी। “आदिवासी युवा महोत्सव 2024” का आयोजन राजधानी के रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में 14 और 15 दिसंबर को होने जा रहा है। इस महोत्सव की ब्रांड एंबेसडर मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की होंगी, जो आदिवासी युवाओं की पहचान और नेतृत्व का चेहरा बनकर सामने आई हैं।

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। यह आयोजन न केवल झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति का उत्सव है, बल्कि युवाओं के लिए अपनी जड़ों को पहचानने और अपनी भाषा, जीवनशैली, और प्रकृति प्रेम के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी प्रयास है।

    मंच पर आदिवासी गौरव और आधुनिकता का संगम

    33 आदिवासी समुदायइस महोत्सव में भाग ले रहे हैं। पारंपरिक नृत्य, गीत, और स्वादिष्ट आदिवासी व्यंजनों से लेकर फैशन शो और रॉक बैंड प्रदर्शन तक, यह आयोजन आधुनिकता और परंपरा का संगम होगा।

    कार्यक्रम में सामाजिक मुद्दों पर आधारित नाटक, आदिवासी उद्यमियों का मेला, पैनल चर्चा, और नेतृत्व विकास कार्यशालाएं भी होंगी। इन गतिविधियों के जरिए युवा अपनी सांस्कृतिक धरोहर को समझने के साथ-साथ करियर के नए रास्तों की तलाश भी कर सकेंगे।

    नेतृत्व में युवाओं की भूमिका

    महोत्सव का नेतृत्व युवा समाजसेवी और आयोजन समिति के अध्यक्ष बिपिन टोप्पो और कार्यकारी अध्यक्ष शशि पन्ना कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह महोत्सव आदिवासी युवाओं को मंच देने का एक अवसर है, जहां वे अपनी सांस्कृतिक विरासत और समाज में अपनी भूमिका को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सकें।

    झारखंड का संदेश: अपनी जड़ों से जुड़ो

    यह महोत्सव सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक संदेश है। झारखंड के युवाओं के लिए यह मंच उनकी पहचान, उनकी संस्कृति और उनके गौरव को समझने और आगे बढ़ाने का माध्यम बनेगा।

    “आदिवासी युवा महोत्सव 2024” झारखंड की आत्मा को फिर से जगाने का प्रयास है। यह महोत्सव बताता है कि परंपराओं का सम्मान ही विकास का पहला कदम है। जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, तो वे न केवल अपने भविष्य को रोशन करते हैं, बल्कि अपनी विरासत को भी दुनिया के सामने गर्व से रखते हैं।

  • आलू पर रोक: झारखंड में महंगाई की मार

    RANCHI: झारखंड में आलू की थाल से बंगाल का स्वाद गायब है। आठ दिनों से पश्चिम बंगाल से आलू की सप्लाई ठप है, और झारखंड के बाजारों में महंगाई की कड़वाहट घुल रही है। झारखंड की मंडियों में उत्तर प्रदेश से आलू की खेप पहुंचने से थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन खुदरा बाजार में दाम अभी भी 50  रुपये प्रति किलो पर अटके हुए हैं।

    बंगाल की सियासी रोक और झारखंड की मजबूरी
    पश्चिम बंगाल सरकार ने झारखंड सहित अन्य राज्यों को आलू भेजने पर रोक लगा दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कदम अपनी राज्य की कीमतें काबू में रखने के लिए उठाया है। झारखंड की सीमा पर डीबूडीह चेकपोस्ट पर आलू लदे ट्रकों को रोका जा रहा है और वापस भेजा जा रहा है।

    यह प्रतिबंध सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि सियासी संदेश भी लगता है। झारखंड की जनता, जो बंगाल के आलू को स्वाद और गुणवत्ता में बेहतर मानती है, अब उत्तर प्रदेश के आलू पर निर्भर है। फर्रुखाबाद से आया आलू राहत जरूर दे रहा है, लेकिन स्वाद और दाम दोनों पर समझौता करना पड़ रहा है।

    बाजार में सियासत की आहट
    यह रोक झारखंड के बाजारों में उथल-पुथल और उपभोक्ताओं के गुस्से का कारण बन गई है। गिरिडीह  के  व्यापारी बताते हैं कि बंगाल के आलू की अनुपस्थिति से स्थिति पूरी तरह बिगड़ी तो नहीं, लेकिन कीमतें जरूर 2-5 रुपये तक ऊपर चली गई हैं।

    आगे क्या?
    सवाल है कि यह प्रतिबंध कब तक जारी रहेगा?

    क्या यह महज बंगाल सरकार का कीमतों को काबू में रखने का कदम है?
    या झारखंड और बंगाल के बीच बढ़ते सियासी टकराव का संकेत?

  • राज्यसभा की सीट नंबर 222 और नोटों की गड्डी: सियासी गरिमा पर सवाल ?

    NEW DELHI : संसद के शीतकालीन सत्र में हंगामे की गूंज पहले ही तेज थी, लेकिन गुरुवार को राज्यसभा में ऐसा वाकया हुआ जिसने सदन की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए। सभापति जगदीप धनखड़ ने जानकारी दी कि राज्यसभा की सीट नंबर 222 से 500 रुपये के नोटों की गड्डी बरामद हुई है। सीट, जो वर्तमान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी को आवंटित है, अब सियासत के तूफान के केंद्र में है।

    कैसे हुआ खुलासा?

    सभापति धनखड़ ने सदन को बताया, “सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद सुरक्षा जांच में सीट संख्या 222 पर नोटों की एक गड्डी पाई गई। गड्डी में 500 रुपये के 100 नोट थे। फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि नोट असली हैं या नकली।”

    इस खुलासे के बाद सदन में हंगामा शुरू हो गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस मुद्दे पर आमने-सामने आ गए। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने इसे “सदन की गरिमा पर चोट” बताते हुए तुरंत जांच की मांग की।

    सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर

    भाजपा के अन्य नेताओं जैसे कि किरेन रिजिजू और पीयूष गोयल ने भी इस मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता बताई। वहीं, विपक्ष इसे सत्ता पक्ष की सुनियोजित चाल करार दे रहा है।
    अभिषेक मनु सिंघवी ने अब तक इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है, लेकिन कांग्रेस इसे “राजनीतिक साजिश” मान रही है।

    नोट असली हैं या नकली? जांच जारी

    यह सवाल हर किसी के दिमाग में है कि सदन जैसी संवेदनशील जगह पर नोटों की गड्डी कैसे पहुंची? अगर ये असली हैं, तो क्यों और अगर नकली हैं, तो किस मकसद से?

    सभापति धनखड़ ने कहा है कि मामले की जांच जारी है और सभी तथ्यों की गहराई से पड़ताल की जाएगी। उन्होंने सदन के सदस्यों को इस मामले पर संयम बरतने की भी अपील की।

    संसद की गरिमा पर चोट या नई राजनीतिक रणनीति?

    सदन में नोटों की गड्डी का पाया जाना सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के मंदिर में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।

    • क्या यह वाकई सदन की गरिमा पर चोट है?
    • या फिर यह सत्ता और विपक्ष के बीच जारी सियासी खेल का हिस्सा है?

    संसद के इस सत्र में यह घटना आने वाले दिनों में हंगामे का कारण बनेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस जांच के नतीजे सदन के भीतर की राजनीति के धुंधलके को साफ कर पाएंगे, या फिर यह मामला भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में दब जाएगा?

  • झारखंड विधानसभा: कुर्सी नंबर 82 और एक खत्म होती परंपरा की कहानी !

    परवेज़ आलम की कलम से……
    झारखंड विधानसभा की कुर्सी नंबर 82 अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है। एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित यह सीट, जो वर्षों तक अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की गवाह रही, अब खाली रहेगी। यह कुर्सी झारखंड के गठन के बाद से ग्लेन जोसेफ गालस्टेन जैसे प्रतिनिधियों का आसन बनी रही, लेकिन संविधान के 104वें संशोधन के बाद यह परंपरा खत्म हो गई।

    एक युग का अंत: ग्लेन गालस्टेन की विरासत
    ग्लेन जोसेफ गालस्टेन भारतीय संसदीय प्रणाली के अंतिम एंग्लो-इंडियन विधायक साबित हुए। 2020 में केंद्र सरकार द्वारा इस व्यवस्था को खत्म करने से पहले, उन्होंने 24 जनवरी 2020 को झारखंड विधानसभा में शपथ ली। यह फैसला हड़बड़ी में हुआ, क्योंकि 25 जनवरी से संविधान संशोधन लागू होने वाला था।

    गालस्टेन मानते हैं कि उनके समुदाय को लेकर देश में गलत धारणाएं फैलाई गईं। वे कहते हैं, “लोगों ने हमें भाजपा विरोधी बताया, जबकि एंग्लो-इंडियन लोग सभी दलों में सक्रिय हैं। कुछ लोगों ने हमारी आवाज दबाने के लिए यह व्यवस्था खत्म कराई।”

    एक ऐतिहासिक व्यवस्था की विदाई
    1952 से 2020 तक, एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में सीटें आरक्षित रहीं। झारखंड में यह सीट राज्य के गठन के बाद से बनी रही, लेकिन 2020 के संशोधन ने इसे खत्म कर दिया।

    गालस्टेन के मुताबिक, भारत सरकार ने जनगणना के आधार पर एंग्लो-इंडियन समुदाय की संख्या शून्य दिखाई, जबकि वे दावा करते हैं कि इस समुदाय की संख्या देशभर में तीन लाख के करीब है।

    क्या यह अंत है या नए अध्याय की शुरुआत?
    गालस्टेन का मानना है कि केंद्र सरकार चाहे तो इस समुदाय के लिए फिर से संसद और विधानसभाओं के दरवाजे खोल सकती है। वे कहते हैं, “हमें विश्वास में लेकर सही आंकड़े प्रस्तुत किए जाएं, तो स्थिति बदल सकती है।”

    गालस्टेन ने झारखंड में 15 वर्षों तक सेवा दी और अब एक नया सपना देख रहे हैं – जरूरतमंद बच्चों के लिए स्कूल खोलने का। वे 2026 में परिसीमन की संभावना को लेकर भी आशान्वित हैं।

    कुर्सी नंबर 82: अब इतिहास का हिस्सा
    झारखंड विधानसभा में यह कुर्सी अब खाली रहेगी, लेकिन यह केवल एक सीट नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय की उस आवाज का प्रतीक थी, जिसने दशकों तक भारतीय लोकतंत्र में अपनी पहचान बनाए रखी।

     

  • झारखंड की सियासत में सत्ता के नए समीकरण !

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रपट ……..

    झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने मंत्रिपरिषद का विभागीय बंटवारा कर दिया है। ये सिर्फ विभागों का आवंटन नहीं, बल्कि सियासी बिसात पर बिछाई गई पहली चाल है। अहम विभागों को खुद के पास रखकर सोरेन ने अपनी पकड़ मजबूत दिखाई, लेकिन सवर्ण और महिला प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल भी खड़े हो गए हैं।

    जब मईया सम्मान योजना के तहत महिलाओं को केंद्र में रखकर फैसले हुए थे, तो लगा था कि सोरेन महिलाओं को सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी देंगे। लेकिन इस बार उनकी झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के कोटे से शपथ लेने वाले छह मंत्रियों में एक भी महिला नहीं हैं। यह वही राज्य है, जहां इस बार विधानसभा में कुल 12 महिला विधायक पहुंची हैं। कांग्रेस ने अपने हिस्से से दो महिलाओं – दीपिका पांडेय सिंह और शिल्पी नेहा तिर्की – को मंत्रिमंडल में जगह दी, जबकि जेएमएम ने इस पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

    सवाल यह भी उठता है कि सोरेन ने अपने मंत्रिमंडल से सवर्णों को बाहर क्यों रखा? 2005 से भाजपा के कद्दावर नेता भानु प्रताप शाही को हराकर पहुंचे अनंत प्रताप देव मंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे। लेकिन सवर्णों को किनारे करने की रणनीति ने झारखंड की सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सोरेन का यह कदम झारखंड की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ रहा है, जहां बहसें सिर्फ पावर के बंटवारे पर नहीं, बल्कि जातीय समीकरणों पर भी केंद्रित हो गई हैं।

    अहम विभागों की बंटवारे की तस्वीर
    हेमंत सोरेन ने कार्मिक, गृह, पथ निर्माण और भवन निर्माण जैसे संवेदनशील विभाग खुद के पास रखे।
    राधा कृष्ण किशोर को वित्त, वाणिज्य कर और संसदीय कार्य सौंपा गया।
    इरफान अंसारी स्वास्थ्य, खाद्य आपूर्ति और आपदा प्रबंधन संभालेंगे।
    रामदास सोरेन के जिम्मे स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग आए।
    दीपिका पांडेय सिंह को ग्रामीण विकास जैसे अहम क्षेत्रीय विभाग मिले।
    शिल्पी नेहा तिर्की को कृषि, पशुपालन और सहकारिता विभाग की जिम्मेदारी दी गई।

    राजनीतिक संकेत और संभावनाएं
    झारखंड के इस नए समीकरण में सवाल यह है कि सोरेन सरकार विपक्ष के सवालों का कैसे जवाब देगी? क्या महिला और सवर्ण प्रतिनिधित्व का यह अभाव उनकी छवि पर असर डालेगा? या फिर यह उनके जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का नतीजा है?

    बहरहाल, नौ नवंबर को विधानसभा का विशेष सत्र इन बहसों को और तेज कर देगा।

  • हेमंत सोरेन की कैबिनेट: 11 मंत्री करोड़पति

    RANCHI:  झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार के मंत्रिमंडल का नया अध्याय खुल चुका है, और इसमें हर चेहरा अपने आप में एक कहानी कहता है।  मंत्रिमंडल के सभी 11 मंत्री करोड़पति हैं। वहीं, राजद कोटे से मंत्री संजय प्रसाद यादव अपनी 29 करोड़ रुपये की संपत्ति और 6 आपराधिक मामलों के साथ सबसे चर्चित नाम बन गए हैं।

    सबसे युवा, सबसे वरिष्ठ और संपत्ति 
    अगर उम्र की बात करें, तो कांग्रेस की मांडर से विधायक शिल्पी नेहा तिर्की केवल 31 साल की हैं, जो मंत्रिमंडल की सबसे युवा सदस्य हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के छतरपुर से विधायक राधाकृष्ण किशोर, 66 साल की उम्र में सबसे वरिष्ठ हैं।

    कौन कितना अमीर और कितने केस दर्ज?
    संजय प्रसाद यादव (राजद): 29 करोड़ की संपत्ति, 6 केस।
    दीपिका पांडे सिंह (कांग्रेस): 6 करोड़ की संपत्ति, 1 केस।
    सुदीव्य कुमार (झामुमो): 1.5 करोड़ की संपत्ति।
    योगेंद्र प्रसाद (झामुमो): 1 करोड़ की संपत्ति।
    शिल्पी नेहा तिर्की (कांग्रेस): 1 करोड़ की संपत्ति।
    राधाकृष्ण किशोर (कांग्रेस): 3 करोड़ की संपत्ति।
    दीपक बिरुआ (झामुमो): 3 करोड़ की संपत्ति।
    चमरा लिंडा (झामुमो): 2 करोड़ की संपत्ति, 1 केस।
    रामदास सोरेन (झामुमो): 10 करोड़ की संपत्ति, 2 केस।
    डॉ. इरफान अंसारी (कांग्रेस): 3 करोड़ की संपत्ति।
    हफीजुल हसन (झामुमो): 1 करोड़ की संपत्ति।

  • हेमंत कैबिनेट की अहम बैठक कल, नीतिगत फैसलों पर हो सकती है चर्चा

    RANCHI: झारखंड में मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद शुक्रवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कैबिनेट पहली बार एकत्र होगी। यह बैठक 6 दिसंबर को दोपहर 3 बजे प्रोजेक्ट भवन स्थित मंत्रिपरिषद कक्ष में आयोजित होगी। बैठक में सरकार के सामने मौजूद कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

    कैबिनेट सचिवालय एवं निगरानी विभाग ने इसकी जानकारी साझा की।
    गुरुवार को राज्यपाल ने इंडिया गठबंधन के 11 मंत्रियों को शपथ दिलाई थी। इस नए मंत्रिमंडल में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से 6, कांग्रेस से 4 और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से 1 मंत्री शामिल हैं।

    यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि नई कैबिनेट को जनता से जुड़े कई नीतिगत फैसलों पर मंथन करना होगा। अब देखना यह है कि इस बैठक में किन मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है।

  • ‘मांझी थान और जाहेर थान सिर्फ पूजा स्थल नहीं हैं, यह पहचान हैं-मराण्डी

    गिरिडीह : झारखंड की मिट्टी में बसे एक ऐसे सांस्कृतिक विरासत की बात बताते हैं , जो सिर्फ पूजा स्थल नहीं, बल्कि एक पूरे समाज की पहचान है। संथाल समाज की आत्मा, उनकी परंपरा, और उनकी जड़ों का प्रतीक—मांझी थान और जाहेर थान।  और इस चर्चा के केंद्र में हैं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी।”

    आज बाबूलाल मरांडी अपने गांव कोदईबांक में पहुंचे। गांव के मुहाने पर मांझीथान के निर्माण के लिए भूमि पूजन किया। यह महज एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उस समाज के प्रति एक संवेदनशील दृष्टिकोण था, जो अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए संघर्षरत है।

    “बाबूलाल मरांडी ने कहा,। अगर ये समाप्त हो गए, तो समझिए, हमारी पहचान भी समाप्त हो जाएगी।’”

    संथाल समाज की परंपरा में मांझी थान और जाहेर थान का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं है। यह उनके इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। मांझी थान उस धरती से जुड़ाव का प्रतीक है, जहां यह समाज अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ बसता है।

    “बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट कहा, ‘हम तभी तक संथाल हैं, जब तक जाहेर थान और मांझी थान की पूजा करते हैं। यह हमारी पहचान है, हमारी जड़ें हैं।’”

    बाबूलाल मरांडी ने अपने इस कदम से एक बड़ी बात कही। यह केवल आस्था का सवाल नहीं, बल्कि एक समुदाय की सांस्कृतिक आत्मा को बचाने की पहल है।