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  • स्वीडन में मुख्यमंत्री सोरेन का वोल्वो संयंत्र का दौरा, झारखंड में ट्रक फैक्ट्री खोलने पर मंथन

    स्पेशल कोरेस्पोंडेंट.

    रांची/गोटेनबर्ग — झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने स्वीडन दौरे के दौरान गोटेनबर्ग शहर में स्थित वोल्वो ट्रक निर्माण संयंत्र का दौरा किया। उनके साथ राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद था। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य झारखंड में औद्योगिक विकास के नए रास्ते तलाशना और राज्य में ट्रक निर्माण इकाई स्थापित करने की संभावनाओं पर बातचीत करना था।

    मुख्यमंत्री ने वोल्वो कंपनी के शीर्ष अधिकारियों के साथ गहन बातचीत की। उन्होंने बताया कि झारखंड में खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भारी संख्या में ट्रकों और डंपरों की जरूरत है। इस जरूरत को देखते हुए मुख्यमंत्री ने वोल्वो को झारखंड में एक ट्रक निर्माण संयंत्र लगाने का प्रस्ताव दिया। वोल्वो के अधिकारियों ने भी इस विचार में रुचि दिखाई और झारखंड की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ट्रक मॉडल विकसित करने की इच्छा जताई।

    वोल्वो की अत्याधुनिक तकनीकों का अनुभव.

    मुख्यमंत्री और उनके दल ने वोल्वो के ‘ट्रक एक्सपीरियंस सेंटर’ का भी दौरा किया। यहां उन्होंने कंपनी की नई-नई तकनीकों को करीब से देखा। इनमें मिरर-लेस कैमरा वाली ट्रक कैब, ट्रिपल पॉइंट सस्पेंशन सिस्टम और 440 किलोवाट मोटर से चलने वाले इलेक्ट्रिक ट्रक शामिल थे। मुख्यमंत्री ने वोल्वो की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में किए गए नवाचारों की तारीफ की। उन्होंने यह भी जाना कि ये इलेक्ट्रिक ट्रक ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर किस तरह बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

    झारखंड में फैक्ट्री बनने से रोजगार और विकास के नए अवसर.

    सूत्रों के मुताबिक, अगर बातचीत सफल रहती है, तो वोल्वो निकट भविष्य में झारखंड में ट्रक निर्माण संयंत्र लगा सकती है। इससे न केवल राज्य के औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

    स्वीडन में निवेशक संवाद कार्यक्रम में भी झारखंड की मजबूत मौजूदगी.

    अपने दौरे के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भारतीय दूतावास और झारखंड सरकार के संयुक्त प्रयास से गोटेनबर्ग में आयोजित निवेशक संवाद कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में स्वीडन की बड़ी कंपनियों के अधिकारी, निवेशक और भारतीय समुदाय के सदस्य मौजूद थे।

    कार्यक्रम में भारत के कार्यवाहक राजदूत राकेश तिवारी ने भारत और स्वीडन के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों और झारखंड में मौजूद निवेश अवसरों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी स्वीडिश कंपनियों को झारखंड में निवेश करने का खुला निमंत्रण दिया।

    चार प्रमुख क्षेत्रों में निवेश का विशेष निमंत्रण.

    मुख्यमंत्री ने खासतौर पर चार क्षेत्रों में निवेश के लिए स्वीडन की कंपनियों को आमंत्रित किया —

    1. खनिज अन्वेषण,
    2. खाद्य प्रसंस्करण,
    3. हरित (सस्टेनेबल) ऊर्जा,
    4. इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र।

    राज्य सरकार के अधिकारियों ने बताया कि झारखंड में खनन उपकरणों के निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी अपार संभावनाएं हैं। ड्रिलिंग रिग्स, बुलडोजर, हॉल ट्रक, मोटर ग्रेडर और एक्सकेवेटर जैसे भारी मशीनों के निर्माण में निवेश के बेहतरीन मौके हैं। इसके साथ ही, खनिज शोधन संयंत्र और ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट जैसे बेल्ट कन्वेयर और मोटर स्क्रैपर के निर्माण में भी बड़े अवसर हैं।


    खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड: निवेशकों के लिए स्वर्णिम अवसर.

    झारखंड देश के कुल खनिज भंडार का लगभग 40% हिस्सा रखता है। कोयला, लोहा, तांबा, बॉक्साइट, चूना पत्थर, मैंगनीज जैसे कई कीमती खनिज यहां बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। झारखंड को देश में कोकिंग कोल का एकमात्र उत्पादक राज्य होने का गौरव प्राप्त है। इसके अलावा, यह कोयला उत्पादन में दूसरा, लौह अयस्क में दूसरा, तांबा अयस्क में तीसरा और बॉक्साइट भंडार में सातवां स्थान रखता है।

    इन प्राकृतिक संपदाओं के चलते झारखंड निवेशकों के लिए बेहद आकर्षक राज्य बन गया है। राज्य सरकार खनिज ब्लॉकों की नीलामी और खनिज अन्वेषण परियोजनाओं के जरिए निजी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है।

    झारखंड सरकार का सतत और समावेशी विकास पर जोर.

    कार्यक्रम में झारखंड सरकार के प्रतिनिधियों ने राज्य की निवेश के अनुकूल नीतियों, उद्योगों के लिए बेहतर अवसंरचना, और सतत व समावेशी विकास के प्रयासों पर भी विस्तार से प्रस्तुति दी। स्वीडन की हरित तकनीकों में विशेषज्ञता और झारखंड के हरित औद्योगीकरण के लक्ष्य के बीच सहयोग की बड़ी संभावनाएं दिखाई दीं।

    इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सरकार से व्यवसाय (G2B) और सरकार से सरकार (G2G) के स्तर पर संवाद को मजबूत करना और भारत-स्वीडन के आर्थिक संबंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जाना था।

     

  • झारखंड सरकार का यूरोपीय दौरा: प्रवासी भारतीयों से संवाद

    विशेष संवाददाता.

    झारखंड में निवेश को लेकर एक नई सुबह दस्तक दे रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड सरकार का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल इन दिनों यूरोप के दो प्रमुख देशों——के दौरे पर है। इस कूटनीतिक और आर्थिक यात्रा का मकसद है: झारखंड को वैश्विक निवेश का गंतव्य बनाना।

    इस यात्रा के दौरान न केवल राज्य की संभावनाओं को प्रस्तुत किया गया, बल्कि कुछ अहम समझौते और प्रस्तावों की नींव भी रखी गई।

    खेल के क्षेत्र में ऐतिहासिक पहल: फुटबॉल कोचिंग के लिए RCD Espanyol का प्रस्ताव.

    स्पेन के बार्सिलोना में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान, विश्वप्रसिद्ध RCD Espanyol फुटबॉल क्लब ने झारखंड सरकार को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया। क्लब ने झारखंड में खेल—विशेषकर फुटबॉल—के विकास के लिए सहयोग की इच्छा जताई है। इसमें खासकर फुटबॉल कोचों के प्रशिक्षण के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) की पेशकश की गई है।

    यह प्रस्ताव बार्सिलोना के विकसित खेल पारिस्थितिकी तंत्र और झारखंड में युवाओं की खेल प्रतिभा को जोड़ने का सेतु बन सकता है। आने वाले समय में यह साझेदारी झारखंड को भारतीय खेल मानचित्र पर और मजबूत स्थान दिला सकती है।

    व्यापक क्षेत्रों में चर्चा: स्टार्टअप, क्लीन एनर्जी, बायो-फार्मा और अधिक.

    सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, झारखंड प्रतिनिधिमंडल की इस यात्रा में कई विविध क्षेत्रों पर संवाद हुआ। इसमें स्टार्टअप मेंटरशिप, क्लीन एनर्जी, पर्यावरणीय स्थिरता, सप्लाई चेन, बायो-फार्मास्यूटिकल्स, खेल विपणन, क्रिकेट टीम ओनरशिप, डीप-टेक बी2बी मार्केटिंग, लीगल, डेंटल साइंस और मेडटेक जैसे क्षेत्र प्रमुख रहे।

    प्रतिनिधिमंडल ने झारखंड में नवाचार आधारित एक जीवंत स्टार्टअप इकोसिस्टम तैयार करने हेतु वैश्विक विशेषज्ञों और कंपनियों से मार्गदर्शन और निवेश का अनुरोध किया ।

    झारखंड में गीगा फैक्ट्री? टेसला ग्रुप A.S. से CM की महत्वपूर्ण बैठक.

    इस यूरोपीय दौरे का सबसे आकर्षक पड़ाव रहा टेसला ग्रुप A.S. (चेकोस्लोवाकिया) के CEO और सह-संस्थापक डुशान लिचार्डस के साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मुलाकात। बातचीत के दौरान टेसला ग्रुप ने झारखंड में एक गीगा फैक्ट्री स्थापित करने की इच्छा जताई, जो मुख्य रूप से वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोग के लिए बैटरी भंडारण उत्पादों के असेंबली पर केंद्रित होगी।

    यह प्रस्ताव न केवल झारखंड को नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी बना सकता है, बल्कि इससे राज्य के तकनीकी और औद्योगिक बुनियादी ढांचे को भी नई दिशा मिलेगी।

    प्रवासी भारतीयों से संवाद: संभावनाओं को जोड़ने का प्रयास.

    यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने बार्सिलोना में बसे प्रवासी भारतीय व्यवसायियों और विशेषज्ञों से भी मुलाकात की। इस संवाद का उद्देश्य था—झारखंड की विकास गाथा से उन्हें जोड़ना और विदेशी धरती पर बसे भारतीय मस्तिष्क को अपनी धरती से जोड़ना।

    मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि स्पेनिश कंपनियों और निवेशकों के साथ सतत संवाद और सहयोग सुनिश्चित किया जाएगा। इस कड़ी में भविष्य में और बैठकें तथा कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई में झारखंड सरकार की यह यात्रा केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि निवेश और विकास की ओर बढ़ते भरोसे का संकेत है। यूरोपीय धरती पर झारखंड की आवाज़ अब सुनाई देने लगी है—चाहे वह खेल हो, तकनीक हो, या उद्योग। आने वाला समय बताएगा कि इन बैठकों का परिणाम धरातल पर किस तरह उतरता है, लेकिन शुरुआत आशाजनक है।

     

  • पूर्व सांसद व काँग्रेस नेता तिलकधारी सिंह नहीं रहे

    शिक्षक से सांसद तक का प्रेरणादायक सफर थमा.

    गिरिडीह: झारखंड की राजनीति ने एक अनुभवी और सज्जन नेता को खो दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और दो बार कोडरमा से लोकसभा सांसद रहे तिलकधारी सिंह का सोमवार को निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे और पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। गिरिडीह के नवजीवन अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

    तिलकधारी सिंह की तबीयत 8 अप्रैल से लगातार खराब चल रही थी। 19 अप्रैल को  राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और नगर विकास मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने अस्पताल जाकर उनका हालचाल लिया था । इससे पहले पूर्व सीएम रघुवर दास, बाबू लाल मरंडी और केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने भी  अस्पताल जाकर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी । सोमवार की दोपहर टीडी सिंह के  जीवन का आखिरी पन्ना बंद हो गया। निधन की जानकारी उनके पुत्र किशोर सिंह ने दी।

    गांव से दिल्ली तक: शिक्षक से सांसद बनने की यात्रा.

    तिलकधारी सिंह का जन्म 8 जनवरी 1938 को गिरिडीह जिले के देवरी प्रखंड अंतर्गत चतरो गांव में हुआ था। शिक्षा के प्रति गहरी रुचि रखने वाले सिंह ने बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1962 में शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया। चकाई हाई स्कूल में वर्षों तक सेवा देने के बाद उन्होंने सामाजिक जीवन की ओर रुख किया।

    1968 में उन्होंने मुखिया पद का चुनाव लड़ा और जीतकर ग्रामीण राजनीति में प्रवेश किया। इसके बाद वे जिला परिषद के अध्यक्ष भी बने। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है – उन्होंने जिले में कई सरकारी स्कूलों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी।

    राजनीति में कांग्रेस का मजबूत चेहरा.

    1977 में वे कांग्रेस के गिरिडीह जिला अध्यक्ष बने। इसके बाद 1980 में धनवार विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए। फिर 1984 में कांग्रेस ने उन्हें कोडरमा लोकसभा सीट से टिकट दिया, और उन्होंने जीत दर्ज कर संसद में प्रवेश किया। इस चुनाव में उन्होंने बीजेपी के रीतलाल प्रसाद वर्मा को हराया था और 208731 वोट हासिल किए थे – जो कुल मतों का 58.8 प्रतिशत था।

    1999 में उन्होंने दूसरी बार कोडरमा से जीत दर्ज की और संसद पहुंचे। अपने राजनीतिक जीवन में वे सांसद के साथ-साथ विधायक, जिला परिषद अध्यक्ष, और कांग्रेस संगठन के अहम पदों पर रहे।

    राजनीतिक विरासत और परिवार.

    राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहते हुए, वृद्धावस्था में उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र धनंजय सिंह को सौंपी। वर्तमान में धनंजय सिंह कांग्रेस के गिरिडीह जिला अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं।

    सरल स्वभाव के कारण लोकप्रिय नेता.

    तिलकधारी सिंह को उनके सादे जीवन और सरल स्वभाव के लिए जाना जाता था। आम जनता से लेकर बड़े नेताओं तक, सभी को उनके बोलचाल की शैली और व्यवहार में विनम्रता आकर्षित करती थी। वे ज़िले मे भूमिहार समाज के बड़े नेता थे ।

    श्रद्धांजलियाँ और राजनीतिक शोक

    पूर्व सांसद के निधन पर पूरे गिरिडीह जिले में शोक की लहर दौड़ गई है। मंत्री सुदिव्य कुमार ने उन्हें गिरिडीह की राजनीति का ‘पितामह’ बताते हुए कहा, “उनकी कमी गिरिडीह की राजनीतिक धरातल पर हमेशा महसूस की जाएगी। उनका योगदान अमिट है ।

    शोक व्यक्त करने वालों में सासंद डॉ सरफराज अहमद ,बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रकाश सहाय, कांग्रेस नेता अजय सिन्हा, कार्यकारी अध्यक्ष सतीश केडिया, पूर्व विधायक निर्भय शाहबादी,अभय शाहबादी , लोजपा नेता राज कुमार राज सहित अनेक बुद्धिजीवी और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं।

  • कांग्रेस ने सीपी सिंह की सदस्यता रद्द करने की मांग की, कहा- “मानसिक कुंठा के शिकार हैं विधायक”

    रांची ब्यूरो।
    भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक सीपी सिंह के मुसलमानों को लेकर दिए गए विवादित बयान ने झारखंड की सियासत में तूफान ला दिया है। कांग्रेस ने इस बयान की तीखी आलोचना करते हुए इसे न केवल समाज को बांटने वाला बल्कि राज्य की सांप्रदायिक सौहार्द के लिए गंभीर खतरा बताया है। पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष से मांग की है कि सीपी सिंह की विधान सभा की सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द की जाए।

    प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष शहजादा अनवर ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा विधायक पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “सीपी सिंह मानसिक कुंठा के शिकार हो गए हैं। भाजपा में वे न तो प्रदेश अध्यक्ष बन पाए, न ही विधायक दल के नेता। यही कारण है कि वे निराशा में ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं जो समाज को गहरे तक बांट सकती है।”

    शहजादा अनवर ने भाजपा नेतृत्व और केंद्र सरकार से तीखे सवाल भी पूछे। उन्होंने कहा, “क्या भाजपा अपने वरिष्ठ मुस्लिम नेताओं जैसे शहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी, जफर इस्लाम और यहां तक कि बिहार के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान को भी ‘जिहादी’ समझती है? जो मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आज़ादी के लिए जान की बाज़ी लगाई, क्या वे भी भाजपा की नजर में जिहादी थे?”

    इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रदेश मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा, मीडिया चेयरमैन सतीश पाल मुजनी, प्रवक्ता सोन शांति, अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य एम तौसीफ और गजेंद्र सिंह समेत कई नेता मौजूद थे। सभी ने एक सुर में कहा कि ऐसे बयानों को किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    इस बीच कांग्रेस नेता शमशेर आलम ने विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो को पत्र लिखकर सीपी सिंह के बयान की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि जांच में यह बयान सत्य पाए जाते हैं, तो विधानसभा से उनकी सदस्यता रद्द की जाए। शमशेर आलम ने कहा, “एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि होकर सीपी सिंह ने समाज को उस दिशा में धकेलने का काम किया है, जहां न केवल सामाजिक तानेबाने को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि पूरे देश की एकता भी खतरे में पड़ सकती है।”

    कांग्रेस का कहना है कि झारखंड जैसे संवेदनशील राज्य में शांति बनाए रखने के लिए ऐसे बयानों पर तत्काल प्रभाव से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि समाज में नफरत फैलाने की कोशिश करने वालों को सख्त संदेश दिया जा सके।

  • मंत्री हफीजुल हसन ने दी सफाई , भाजपा बर्खास्तगी की मांग पर अड़ी  

    झारखंड की सियासी फिजा इन दिनों एक बयान से राजनीति गरमाई हुई है। राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीजुल हसन का एक कथित बयान— “शरीयत संविधान से ऊपर है” — राजनीतिक हलकों में बीते चार दिनों से हलचल मचा रखा  है। विपक्षी दल भाजपा ने इस बयान को लेकर मंत्री पर सीधा हमला बोला है और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से उनकी तत्काल बर्खास्तगी की मांग की है।

    लेकिन क्या मंत्री ने सचमुच ऐसा कहा था? या फिर बयान को संदर्भ से काट कर, अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुसार परोसा गया? राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप नई बात नहीं, लेकिन जब बात संविधान और धार्मिक मूल्यों की हो, तो सावधानी और संवेदनशीलता दोनों की जरूरत होती है।

    भाजपा का हमला: ‘संविधान से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं’

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस कथन को भारतीय संविधान का अपमान बताते हुए तीखा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि हसन का यह बयान सामाजिक सौहार्द्र के लिए खतरा है और झारखंड जैसे विविधता वाले राज्य में इस तरह की सोच की कोई जगह नहीं हो सकती। मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से साफ शब्दों में मांग की कि हसन को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया जाए।

    मंत्री की सफाई: ‘बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया’

    इस पूरे विवाद के बीच मंत्री हफीजुल हसन ने मीडिया के सामने आकर सफाई दी और कहा कि उनका बयान गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा, “मैं बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बनाए संविधान को सर्वोपरि मानता हूं। मेरी राजनीति हमेशा सामाजिक न्याय, समावेशिता और बराबरी के सिद्धांतों पर आधारित रही है। मैं ऐसे किसी भी बयान का समर्थन नहीं करता जो देश के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध हो।”

    हसन ने आगे जोड़ा, “संविधान ही हमें धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। मेरा विश्वास उसी संविधान पर है, जिसने हमें यह आजादी और अधिकार दिए हैं।”

    भाजपा नेताओं पर पलटवार: ‘नफरत की राजनीति बंद हो’

    हसन ने अपनी सफाई में भाजपा नेताओं पर भी पलटवार किया। उन्होंने कहा, “देश के कई केंद्रीय मंत्री मंच से अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ बातें करते आए हैं— किसी ने ‘गोली मारो’ के नारे लगवाए, तो किसी ने देश छोड़ने की धमकी दी। क्या वह संविधान की रक्षा है या संविधान से खिलवाड़?”

    उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म को लेकर प्रेम होना स्वाभाविक है, लेकिन यह प्रेम दूसरे धर्म के प्रति नफरत नहीं बन जाना चाहिए। “हम सबको अपने-अपने धर्म से लगाव हो सकता है, लेकिन उस लगाव में दूसरों के धर्म का अपमान न हो, यही संविधान की आत्मा है,” उन्होंने कहा।

    “संवैधानिक मूल्यों से नहीं हटूंगा”: हसन का संकल्प.

    बयान के अंत में हसन ने यह स्पष्ट किया कि वे अपने संवैधानिक कर्तव्यों से कभी पीछे नहीं हटेंगे। “मैं झारखंड के हर समुदाय के लिए न्याय, समानता और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हूं। संविधान मेरी राजनीति की धुरी है और वही मेरी सोच की दिशा तय करता है।”

    यह विवाद केवल एक बयान का नहीं है। यह एक बड़े विमर्श का हिस्सा है—धर्म और संविधान के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती का। जब राजनीतिक दल इस संतुलन को अपने-अपने नजरिए से तोड़ते-मरोड़ते हैं, तो सवाल उठता है: क्या वाकई चिंता संविधान की है या उसका इस्तेमाल सियासी लाभ के लिए हो रहा है?

     

  • हेमंत सोरेन का स्पेन-स्वीडन दौरा: झारखंड में निवेश लाने की तैयारी

    रांची: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन 18 अप्रैल से 27 अप्रैल तक एक 11 सदस्यीय उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ स्पेन और स्वीडन के दौरे पर रवाना होंगे। इस विदेश यात्रा का मकसद स्पष्ट है — वैश्विक निवेशकों को झारखंड में निवेश के लिए आमंत्रित करना और राज्य को एक उभरते औद्योगिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत करना। इस यात्रा के लिए मुख्यमंत्री को केंद्र सरकार से राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है।

    निवेश बढ़ाने की रणनीति के तहत दौरा.

    मुख्यमंत्री की यह यात्रा राज्य के उद्योग विभाग के नेतृत्व में की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, यह दौरा “झारखंड में औद्योगिक निवेश के नए रास्ते खोलने” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल स्पेन के मैड्रिड, बार्सिलोना और स्वीडन के गोथेनबर्ग जैसे प्रमुख शहरों में उद्यमियों और कॉर्पोरेट प्रतिनिधियों से मिलेगा।

    मुख्य ठिकाने और कार्यक्रम:

    • 19 अप्रैल: प्रतिनिधिमंडल मैड्रिड पहुंचेगा
    • 21 अप्रैल: प्रमुख कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात
    • 22 अप्रैल:
      • मैड्रिड में खनन और इस्पात क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के साथ बैठक
      • बार्सिलोना में कृषि मंत्रालय के अधिकारियों से संवाद
    • 25 अप्रैल: गोथेनबर्ग (स्वीडन) में क्लीन एनर्जी कंपनियों से मुलाकात
    • 26 अप्रैल: वन-टू-वन बैठकें, संभावित निवेशकों से सीधी बातचीत
    • 27 अप्रैल: भारत वापसी

    दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल नेशनल रिन्यूएबल एनर्जी सेंटर (Spain) भी जाएगा, जो सौर ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी रिसर्च केंद्र है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड की पहचान बनाने की कोशिश.

    मुख्यमंत्री के इस दौरे का एक बड़ा उद्देश्य झारखंड की ब्रांडिंग भी है। राज्य सरकार “हरित ऊर्जा, स्मार्ट सिटी, तकनीकी नवाचार और औद्योगिक विकास” को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक मंचों पर झारखंड की छवि को उभारना चाहती है। इस दौरे से निवेशकों के साथ प्रत्यक्ष संवाद का अवसर मिलेगा, जिससे आगामी परियोजनाओं में साझेदारी की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।

    प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन होंगे शामिल?

    मुख्यमंत्री के साथ जो टीम विदेश यात्रा पर जा रही है, उसमें प्रशासनिक, तकनीकी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन दिखता है। टीम में शामिल हैं:

    • कल्पना सोरेन (विधायक)
    • अलका तिवारी (मुख्य सचिव)
    • अविनाश कुमार (सीएम के अपर मुख्य सचिव)
    • ए.के. रस्तोगी (सेवानिवृत्त आईएफएस)
    • अरवा राजकमल (उद्योग सचिव)
    • राहुल कुमार सिन्हा (एमडी, जेएसएमडीसी)
    • सुशांत गौरव (उद्योग निदेशक)
    • वरुण रंजन (एमडी, जेआईआईडीसीओ)
    • प्रणव कुमार पाल (संयुक्त निदेशक, उद्योग)
    • अजय कुमार सिंह (सीएम के निजी सुरक्षा अधिकारी)

    क्या कहती है यह यात्रा झारखंड की दिशा के बारे में?

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह दौरा उस बदले हुए दृष्टिकोण का संकेत है जिसमें राज्य सरकार सिर्फ खनन पर निर्भरता छोड़कर हरित ऊर्जा, स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी नवाचार की ओर कदम बढ़ा रही है। यह यात्रा न केवल आर्थिक निवेश की राह खोलेगी, बल्कि झारखंड को वैश्विक मंचों पर एक प्रगतिशील और निवेश-मैत्रीपूर्ण राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में अहम साबित हो सकती है।

     

  • झारखंड के बाहर पांव पसारने की तैयारी में JMM, बिहार और बंगाल  की  सीटों पर नजर

    परवेज़ आलम.  

    झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति पर काम कर रही है। हाल ही में रांची के खेलगांव में संपन्न हुए 13वें महाधिवेशन में यह स्पष्ट संकेत मिला कि JMM अब राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के विस्तार को लेकर गंभीर है। इसका सीधा असर बिहार और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ सकता है ।

    बिहार में JMM की ‘दबाव की राजनीति‘?

    बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और झामुमो ने यहां कम से कम 12 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और अन्य संभावित सहयोगी दलों के साथ तालमेल के पक्ष में है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है।

    गौरतलब है कि झारखंड में राजद और JMM के बीच गठबंधन पहले से है और राजद को हेमंत सरकार में प्रतिनिधित्व भी मिला हुआ है। ऐसे में बिहार में गठबंधन की संभावना तो बनी हुई है, लेकिन JMM अब “बराबरी के साझेदार” के रूप में बात करना चाहता है — और यहीं से तेजस्वी यादव की राजनीतिक गणित गड़बड़ा सकती है।

    JMM जिन 12 सीटों पर नजर बनाए हुए है, वे सभी झारखंड से सटे सीमावर्ती जिले हैं — जमुई, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर और बांका जैसे क्षेत्र, जहां आदिवासी और झारखंडी मूल के लोगों की आबादी भी कम नहीं है। यहां पार्टी के संगठन को पहले से ही सक्रिय करने के निर्देश दिए जा चुके हैं।

    पश्चिम बंगाल में भी रणनीतिक एंट्री

    JMM की रणनीति सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। पार्टी की नजर पश्चिम बंगाल की उन सीमावर्ती आदिवासी बहुल सीटों पर भी है, जहां वह पहले भी उम्मीदवार खड़ा कर चुकी है — जैसे झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा, अलीपुरद्वार, पश्चिम वर्धमान और बीरभूम। पिछली बार भले ही JMM ने आखिरी समय में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दे दिया था, JMM तृणमूल कांग्रेस से तालमेल कर चुनाव मे आना चाहती है । पर क्या ममता बनर्जी जेएमएम को मनमाफिक सीटें देंगी इस पर सवाल है । बता दें कि इन जिलों में आदिवासी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है और JMM इस आधार पर ममता बनर्जी से सीटें मांग सकता है।

    भाजपा शासित राज्यों पर भी नजर

    JMM की राजनीतिक दृष्टि सिर्फ पड़ोसी गैर-भाजपा राज्यों तक सीमित नहीं है। पार्टी ने ओडिशा और असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में भी अपने संगठन को मजबूत करने की योजना बनाई है। ओडिशा के मयूरभंज, क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों में पार्टी पहले से संगठनात्मक सक्रियता बढ़ा रही है। साथ ही, असम में भी आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान और जनजातीय पहचान की मांग को लेकर आंदोलन शुरू करने की घोषणा की गई है। गौर तलब है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने झारखंड चुनाव के दौरान भाजपा के लिए सक्रिय प्रचार किया था। ऐसे में JMM का यह कदम भाजपा के लिए भी चुनौती बन सकता है।

    राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर झामुमो का कदम

    पार्टी के महाधिवेशन में पारित प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा गया है कि JMM अब केवल झारखंड की पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका निभाने की दिशा में बढ़ेगी। हेमंत सोरेन की यह महत्वाकांक्षा न केवल राज्य की सीमाओं को चुनौती देती है, बल्कि पुराने क्षेत्रीय समीकरणों को भी नया रूप देने की संभावना पैदा करती है।

    राजनीतिक संकेत क्या हैं?

    JMM की इस रणनीति का संदेश साफ है — वह अब ‘सहायक पार्टी’ की भूमिका से आगे बढ़कर खुद को निर्णायक ताकत के रूप में देखना चाहता है। यह तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी जैसे सहयोगियों को असहज कर सकता है, जो अब तक इन इलाकों में अपनी मजबूत पकड़ मानते रहे हैं।

    आने वाले विधानसभा चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि JMM की यह नई रणनीति उसे कितनी सफलता दिला पाती है, और विपक्षी एकता के नाम पर बनते-बिगड़ते रिश्तों पर इसका क्या असर होता है।

  • जेल की सलाख़ें से निकल कर हेमंत सोरेन मज़बूत नेता बन कर उभरे

    हेमंत सोरेन के जीवन पर एक नज़र.

    परवेज़ आलम

    रांची, झारखंड : “क्या एक नेता का जेल जाना, उसकी छवि को तोड़ता है या निखारता है? क्या संघर्ष की आग में तपकर ही असली नेता बनता है? और क्या झारखंड अब एक नए नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, या पुराने नामों का ही नया संस्करण देख रहा है?”

    ये सवाल तब ज़्यादा ज़रूरी हो जाते हैं, जब एक नेता जेल से बाहर आते ही न सिर्फ़ फिर से मुख्यमंत्री बनता है, बल्कि अब पूरे संगठन की कमान भी संभाल लेता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हेमंत सोरेन की, जो अब झारखंड मुक्ति मोर्चा के नए केंद्रीय अध्यक्ष हैं। एक दौर में छात्र मोर्चा से राजनीति की शुरुआत करने वाला नौजवान, आज पार्टी का सर्वोच्च चेहरा बन चुका है।

    “हेमंत नहीं रुके, थमे नहीं, झुके नहीं…”

    जेल गए, लेकिन लड़ाई नहीं छोड़ी। 5 महीने के राजनीतिक वनवास के बाद जब हेमंत बाहर आए, तो सिर्फ़ एक नेता नहीं, एक प्रतीक बनकर उभरे — सत्ता के दमन के ख़िलाफ़, अपने अधिकारों के लिए लड़ते झारखंडी स्वाभिमान के प्रतीक।

    हेमंत सोरेन की कहानी कोई सामान्य राजनीतिक यात्रा नहीं है। यह कहानी है नेमरा के एक किसान परिवार से उठे उस बेटे की, जिसने राजनीतिक विरोधियों से लेकर सत्ता तक, सबका सामना किया।

    और अब, 2025 की गर्मियों में — शिबू सोरेन के 38 साल लंबे अध्यक्षीय कार्यकाल का अंत कर, बेटे हेमंत ने वह कुर्सी संभाल ली है, जो कभी उनके पिता के लिए भी संघर्षों की तपिश में गढ़ी गई थी।

    जनता का सवाल — “जेल से नेतृत्व तक, क्या यही लोकतंत्र की परिभाषा है?”

    झारखंड की जनता जानना चाहती है — क्या खनन घोटाले में जेल जाना, राजनीतिक साज़िश थी या सच्चाई?

    लेकिन सच्चाई ये है कि हेमंत जब जेल से बाहर आए, तो पार्टी और ज़्यादा संगठित दिखी। कल्पना सोरेन, उनकी पत्नी, सामने आईं — एक नेता के रूप में, एक रणनीतिकार के रूप में। ये कोई साधारण वापसी नहीं थी, ये एक जोड़ी की ताक़त थी — जिसने सत्ता को फिर से अपनी मुट्ठी में किया।

    संघर्ष की जड़ें — नेमरा से बरहेट तक का रास्ता आसान नहीं था

    नेमरा गांव का एक बच्चा, जो सरकारी स्कूल में पढ़ा, पटना में इंटर तक पहुंचा, और बीआईटी मेसरा जैसे संस्थान में दाखिला लेकर भी राजनीति की पुकार पर पढ़ाई छोड़ दी — आज उसी का नाम झारखंड की हर पंचायत में गूंज रहा है।

    2005 में जब पहली बार चुनाव लड़े, तो हार मिली। खुद के ही दल के सीनियर नेता ने हराया। लेकिन यही वो समय था जब हेमंत ने सीखा — राजनीति में सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है? धैर्य।

    2009 में भाई दुर्गा सोरेन की मौत ने हेमंत को परिवार और राजनीति — दोनों का उत्तराधिकारी बना दिया।

    सियासत का सवाल — “क्या JMM अब हेमंत की पार्टी है?”

    जब दिशोम गुरु यानी शिबू सोरेन ने हेमंत के नाम का प्रस्ताव रखा, तो हज़ारों कार्यकर्ताओं ने नारा लगाया — “हेमंत ही भविष्य है!”

    JMM की केंद्रीय समिति में अब 289 सदस्य हैं। लेकिन सवाल ये भी है — क्या ये सिर्फ़ एक खानदान की विरासत है, या जनआंदोलन की नई शक्ल?

    झारखंड की जनता का सवाल — “कितना बदलेगा हेमंत का झारखंड?”

    2019 में उन्होंने भाजपा को सत्ता से बेदखल किया, 2024 में जेल से आकर फिर मुख्यमंत्री बने। अब पार्टी की कमान भी उन्हीं के हाथ में है। लेकिन क्या इससे झारखंड की ज़मीन पर बदलाव आएगा?

    क्या आदिवासियों की ज़मीन बचेगी? क्या युवाओं को रोज़गार मिलेगा? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर नई नीति बनेगी?

    या फिर, ये भी वही राजनीति निकलेगी — चेहरे बदलते रहेंगे, हालात वही रहेंगे?

     

  • हेमंत सोरेन बने झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष, शिबू सोरेन ने सौंपी विरासत

    परवेज़ आलम.

    झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। 2025 में हुए पार्टी के 13वें महाधिवेशन में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सर्वसम्मति से झामुमो का केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया। यह निर्णय पार्टी के लिए एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है, जहां 38 वर्षों तक अध्यक्ष रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने पुत्र को पार्टी की बागडोर सौंपी।

    महाधिवेशन का आयोजन रांची के खेलगांव में हुआ, जहां हजारों की संख्या में कार्यकर्ता और प्रतिनिधि मौजूद थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता नलिन सोरेन ने शिबू सोरेन को संस्थापक संरक्षक के रूप में प्रस्तावित किया, जिसका समर्थन मथुरा महतो ने किया। इसके बाद शिबू सोरेन ने मंच से हेमंत सोरेन को पार्टी का केंद्रीय अध्यक्ष घोषित किया। घोषणा के तुरंत बाद, मंच पर मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तालियों और नारों से नए अध्यक्ष का जोरदार स्वागत किया।

    पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की घोषणा. 

    महाधिवेशन में झामुमो की नई केंद्रीय समिति की भी घोषणा की गई, जिसमें कुल 284 सदस्य शामिल किए गए। जिलावार रूप से साहिबगंज, दुमका और रांची सहित विभिन्न जिलों से सदस्यों को चुना गया। प्रमुख नामों में खुद हेमंत सोरेन, पंकज मिश्रा, शिबू सोरेन, नलिन सोरेन, बसंत सोरेन, मधु मंसूरी और महुआ माजी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

    हेमंत सोरेन की राजनीतिक यात्रा. 

    हेमंत सोरेन का राजनीतिक सफर संघर्ष, धैर्य और रणनीतिक दूरदर्शिता से भरा रहा है। 2003 में छात्र मोर्चा से शुरुआत करने वाले हेमंत पहली बार 2009 में राज्यसभा के लिए चुने गए। उसी वर्ष दुमका से विधानसभा चुनाव जीतकर राज्य की राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज की। 2010 में वे उपमुख्यमंत्री बने और 2013 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने पार्टी को शानदार सफलता दिलाई, जिसके कारण वे झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री बने।

    हालांकि उनका सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 2024 में उन्हें ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया, जिससे उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। लेकिन जमानत पर बाहर आने के बाद वे फिर से चुनावी मैदान में उतरे और झामुमो के नेतृत्व में INDIA गठबंधन को रिकॉर्ड 56 सीटें दिलाकर सत्ता में वापसी की।

    कल्पना सोरेन की भूमिका. 

    इस कठिन दौर में हेमंत की पत्नी कल्पना सोरेन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब हेमंत जेल में थे, तब कल्पना ने पार्टी के लिए स्टार प्रचारक के रूप में प्रचार किया। उन्होंने न केवल कार्यकर्ताओं को संगठित किया, बल्कि महिला मतदाताओं में भी झामुमो के लिए समर्थन जुटाया। उनके समर्पण और संगठन क्षमता ने हेमंत को जेल से बाहर आने के बाद एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित करने में मदद की।

    झामुमो का भविष्य: राष्ट्रीय विस्तार की योजना. 

    राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत सोरेन ने पार्टी के विस्तार की योजनाओं की घोषणा की। उनका लक्ष्य झारखंड के बाहर, विशेषकर ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में झामुमो को मजबूत करना है। उनका मानना है कि झामुमो सिर्फ एक पार्टी नहीं बल्कि एक आंदोलन है, जिसे राष्ट्रीय मंच पर ले जाने की जिम्मेदारी अब उनकी है।

    नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव. 

    शिबू सोरेन ने 1972 में झामुमो की स्थापना की थी। उनके नेतृत्व में पार्टी ने आदिवासी अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और झारखंड राज्य की मांग को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। अब यह विरासत हेमंत सोरेन के हाथों में है, जो इसे आधुनिक दौर की राजनीति में नई पहचान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

    हेमंत सोरेन का नेतृत्व केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि वैचारिक रूप से भी पार्टी को नई दिशा देगा। उन्होंने अपने पहले दो कार्यकालों में जनहितकारी योजनाएं लागू की, जैसे “अबुआ आवास योजना”, महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता और आरक्षण नीति में बदलाव। इन पहलों ने उन्हें जनता के बीच एक जननेता के रूप में स्थापित किया।

    हेमंत सोरेन का केंद्रीय अध्यक्ष बनना न केवल झामुमो के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि झारखंड की राजनीति में स्थिरता और निरंतरता का संकेत भी है। शिबू सोरेन की विरासत को आगे बढ़ाते हुए, हेमंत एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी—पार्टी की मूल विचारधारा को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर झामुमो को मजबूती प्रदान करना।

  • झामुमो के संविधान में बड़े बदलाव के संकेत : हेमंत सोरेन अध्यक्ष, शिबू सोरेन को संस्थापक संरक्षक का पद

    रांची में आयोजित झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के 13वें महाधिवेशन मे  एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए दिशोम गुरु शिबू सोरेन को   “संस्थापक संरक्षक” का नया पद दिया  है। वहीं अब तक कार्यकारी अध्यक्ष रहे हेमंत सोरेन को सर्वसम्मति से पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है । इस निर्णय पर मंगलवार को फ़ाइनल  मुहर लगेगी ।

    खेलगांव में दिखा झामुमो कार्यकर्ताओं का जोश, जय झारखंड के गगनभेदी नारे. 

    रांची के खेलगांव में चल रहे इस दो दिवसीय महाधिवेशन में राज्यभर से आए लगभग 3500 प्रतिनिधियोंकी उपस्थिति रही। जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व्हीलचेयर पर गुरुजी यानी शिबू सोरेन को मंच तक लेकर पहुंचे, तो पूरा पंडाल “जय झारखंड” के नारों से गूंज उठा।

    हालांकि स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के बावजूद शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन पूरे कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद रहे। उन्होंने हाथ उठाकर उपस्थित कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद भी दिया। इस भावुक क्षण ने उपस्थित सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गहरे तौर पर प्रेरित किया।

    मंगलवार को लगेगी अंतिम मुहर, नई केंद्रीय समिति का गठन भी होगा. 

    महाधिवेशन के दूसरे और अंतिम दिन, इस संशोधन प्रस्ताव पर औपचारिक मुहर लगेगी। इसके साथ ही पार्टी की नई केंद्रीय समिति का भी गठन किया जाएगा, जो आने वाले वर्षों में संगठन की दिशा और रणनीति तय करेगी।

    हेमंत सोरेन की नेतृत्व यात्रा: संदेह से सम्मान तक. 

    2015 के जमशेदपुर महाधिवेशन में जब हेमंत सोरेन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, तब उनके नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए गए थे। लेकिन उन्होंने न केवल संगठन को मजबूत किया, बल्कि 2019 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी शिकस्त दी।

    विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने ‘संघर्ष यात्रा’ निकाल कर रघुवर दास सरकार के खिलाफ जनमत तैयार किया। परिणामस्वरूप झामुमो के नेतृत्व में गठबंधन ने सत्ता में वापसी की और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।

    इसके बाद हुए उपचुनावों में भी झामुमो ने बढ़त बरकरार रखी। जेल में रहते हुए भी उन्होंने गठबंधन के लिए ऐतिहासिक जीत दर्ज करवाई – पांचों आदिवासी आरक्षित लोकसभा सीटें झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने जीतीं।

    2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी को 34 सीटों पर जीत दिलाई और कांग्रेस, राजद, वाम दलों के साथ मिलकर 56 सीटों के बहुमत से दोबारा सरकार बनाई।

    “देश ने देखा – झामुमो सिर्फ राज्य बना नहीं सकता, चला भी सकता है” – हेमंत सोरेन. 

    महाधिवेशन के उद्घाटन भाषण में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झामुमो की ऐतिहासिक भूमिका और झारखंड आंदोलन के बलिदानों को याद किया। उन्होंने कहा:

    “झारखंड को अलग राज्य बनाने का सपना हमारे दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में साकार हुआ। आज वह सपनों का झारखंड बनाने की जिम्मेदारी हमारी है।”

    उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि राज्य के गठन के बाद की सरकारें जनभावनाओं से विमुख रहीं – किसानों की आत्महत्याएं, भूख से मौतें, और सांप्रदायिक तनाव इसी का परिणाम थे।

    उन्होंने झामुमो के नेतृत्व को जन-आंदोलनों से उपजी शक्ति बताते हुए कहा:

    “झारखंड न तो कभी झुका है और न कभी डरा है। हमने देश की सबसे बड़ी पार्टी को भी चुनौती दी और सफल होकर दिखाया।”

    आपकी बदौलत बदला राज्य का भविष्य’ – कार्यकर्ताओं से बोले हेमंत. 

    हेमंत सोरेन ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह जीत केवल किसी एक नेता की नहीं, बल्कि झामुमो के हर जुझारू सिपाही की जीत है। उन्होंने आह्वान किया कि अब चुनौती सिर्फ सत्ता में आना नहीं, बल्कि गांव-गरीब के जीवन में बदलाव लाना है।

    “हमारा उद्देश्य है झारखंड के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना। ये महाधिवेशन पहले से कहीं ज्यादा भव्य है, और यह हमारी जिम्मेदारियों को और बड़ा करता है।”

    16 राजनीतिक प्रस्ताव पारित, बाबा साहेब के नाम पर प्रांगण

    महाधिवेशन की शुरुआत शिबू सोरेन ने की। पहले दिन राज्य सरकार के मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने 108 पन्नों का सांगठनिक दस्तावेज पेश किया, जबकि स्टीफन मरांडी ने 16 राजनीतिक प्रस्ताव पेश किए जिन्हें पारित किया गया।

    इस आयोजन स्थल को “बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर प्रांगण” नाम दिया गया, और इसका संचालन अध्यक्षीय समिति के सदस्य विनोद पांडेय ने किया।झामुमो के इस महाधिवेशन ने न केवल संगठनात्मक बदलावों की आधारशिला रखी है, बल्कि झारखंड की राजनीति में पार्टी की दीर्घकालीन भूमिका को भी और अधिक स्पष्ट कर दिया है। शिबू सोरेन की विरासत को अब हेमंत सोरेन और नए नेतृत्व ने पूरी तरह से संभाल लिया है – और उनकी रणनीति साफ है: सत्ता में बने रहना नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना।