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  • रांची में फिर बर्ड फ्लू का प्रकोप, बिरसा वेटनरी कॉलेज में H5N1 की पुष्टि

    रांची में एक बार फिर बर्ड फ्लू का खतरा मंडरा रहा है। बिरसा वेटनरी कॉलेज के पोल्ट्री फार्म में मुर्गों में एच5एन1 एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस की पुष्टि हुई है। भोपाल स्थित आईसीएआर-एनएएसएडीइएच की जांच में 6 फरवरी को यह संक्रमण पाया गया। इस पर केंद्र सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने झारखंड के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर एहतियाती कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। अब प्रशासन की ओर से संक्रमण को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।10 किमी के दायरे में रखी जाएगी सख्त निगरानी.

    संक्रमण की पुष्टि के बाद एक से दस किलोमीटर के दायरे में विशेष निगरानी रखी जाएगी। वन क्षेत्रों में भी पक्षियों के नमूने इकट्ठे किए जाएंगे ताकि संक्रमण का

    प्रसार रोका जा सके। आरआरटी टीम (रैपिड रिस्पांस टीम) बिरसा वेटनरी कॉलेज के शेष मुर्गों का वैज्ञानिक तरीके से निपटारा करेगी। साथ ही, संक्रमित क्षेत्र की पूरी तरह से सफाई और सैनिटाइजेशन किया जाएगा।

    इसके अलावा, संक्रमण केंद्र से 1 किलोमीटर के दायरे में कुक्कुट पालन सर्वेक्षण किया जाएगा। इस काम के लिए जिला प्रशासन की सहायता ली जाएगी। पूरे इलाके का डिजिटल नक्शा तैयार किया जाएगा, जिसमें एक से दस किलोमीटर तक का क्षेत्र सर्विलांस जोन घोषित होगा।

    सैनिटाइजेशन और नष्ट किए जाएंगे संक्रमित पक्षी.

    बर्ड फ्लू की पुष्टि होते ही स्वास्थ्य विभाग की टीमें एक्टिव हो गईं। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए संबंधित इलाके को सैनिटाइज करना शुरू कर दिया गया है।

    शनिवार को प्रशासन द्वारा एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी पोल्ट्री फार्म के पक्षियों को मार दिया जाएगा और उसके बाद पूरे क्षेत्र को अच्छी तरह से सैनिटाइज किया जाएगा। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है ताकि संक्रमण को अन्य क्षेत्रों तक फैलने से रोका जा सके।

    बर्ड फ्लू: सतर्कता बेहद जरूरी.

    बर्ड फ्लू एक गंभीर बीमारी है, जो सिर्फ पक्षियों तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि इंसानों तक भी पहुंच सकती है। इसलिए, एहतियात बरतना बेहद जरूरी है।

    👉 अगर आप किसी मरे हुए या बीमार पक्षी को देखें, तो उसे हाथ न लगाएं और तुरंत प्रशासन को सूचना दें।
    👉 अपने हाथों को बार-बार साबुन और पानी से धोएं।
    👉 कच्चा मांस और अंडे अच्छी तरह पका कर ही खाएं।
    👉 संक्रमित इलाके में जाने से बचें और पूरी सतर्कता बरतें।

    बर्ड फ्लू के लक्षणों में बुखार, खांसी, गले में खराश, सांस लेने में दिक्कत, मांसपेशियों में दर्द और थकान शामिल हैं। अगर इनमें से कोई भी लक्षण महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

    सरकार और प्रशासन मुस्तैद, जनता भी सतर्क रहे.

    सरकार और स्थानीय प्रशासन बर्ड फ्लू को नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए विशेष निगरानी टीमों को तैनात किया गया है।

    सावधानी बरतें, सतर्क रहें और अफवाहों से बचें। याद रखें, सतर्कता ही बचाव है!

  • JMM : संघर्ष से सत्ता तक, 53 साल का सफर

    धनबाद मे स्थापना दिवस आज 

    परवेज़ आलम की खास रिपोर्ट ………..

    झारखंड की राजनीति में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का नाम सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि संघर्ष और सफलता की कहानी है। 4 फरवरी 1972 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में हुई एक ऐतिहासिक रैली के दौरान इस पार्टी की नींव रखी गई थी।  53 साल बाद, झामुमो न केवल सत्ता का केंद्र बना हुआ है, बल्कि झारखंड की पहचान और राजनीतिक धारा को भी निर्धारित कर रहा है।

    34 वर्षों से शिबू सोरेन के हाथों में झामुमो की बागडोर।

    पार्टी के संस्थापक शिबू सोरेन पिछले 34 वर्षों से झामुमो के अध्यक्ष हैं। यह भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ घटना है कि एक ही व्यक्ति इतने लंबे समय तक किसी पार्टी की कमान संभाले रहे। 2021 में हुए अधिवेशन में उन्हें 10वीं बार अध्यक्ष और हेमंत सोरेन को तीसरी बार कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया।

    शिबू सोरेन: उम्र भले बढ़ी, पर प्रभाव बरकरार।

    हालांकि, बढ़ती उम्र के कारण शिबू सोरेन की सक्रियता कम हो गई है, लेकिन वह आज भी झारखंड की राजनीति के अहम किरदार हैं। जब तक वह हैं, झामुमो की अध्यक्षता को लेकर कोई दूसरी चर्चा नहीं हो सकती। उनके बाद उनके बेटे हेमंत सोरेन पार्टी के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे हैं और बीते एक दशक से कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका निभा रहे हैं।

    पांच बार सत्ता में झामुमो, हर बार सोरेन परिवार का दबदबा।

    15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बनने के बाद, झामुमो अब तक पांच बार सत्ता में आ चुका है। दिलचस्प बात यह है कि हर बार मुख्यमंत्री सोरेन परिवार से ही बना।

    • शिबू सोरेन ने 2005, 2008 और 2009 में मुख्यमंत्री पद संभाला।
    • हेमंत सोरेन ने 2013-14 में पहली बार और फिर 2019 से लगातार सत्ता में बने हुए हैं।

    हालांकि, झामुमो की चार सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं। कुछ महज़ कुछ दिन टिकीं, कुछ 6 महीने तो कुछ 14 महीने चलीं।

    2019 और 2024 में झामुमो की ऐतिहासिक जीत।

    2019 के चुनाव में हेमंत सोरेन की अगुवाई में झामुमो ने 81 में से 30 सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस और आरजेडी के साथ सरकार बनाई।

    2024 में झामुमो ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।

    • पार्टी ने 34 सीटों पर जीत दर्ज की।
    • गठबंधन ने 81 में से 56 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की।

    संघर्ष के दिन: जब शिबू सोरेन को अंडरग्राउंड होना पड़ा।

    शिबू सोरेन जब 12 साल के थे, तब सूदखोरों ने उनके पिता सोबरन मांझी की हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने महाजनों और शोषण के खिलाफ संघर्ष शुरू किया, जिसने कई बार हिंसक रूप ले लिया। वह कई बार अंडरग्राउंड भी रहे। धनबाद के जिलाधिकारी के.बी. सक्सेना और कांग्रेस नेता ज्ञानरंजन की पहल से उन्होंने आत्मसमर्पण किया और दो महीने जेल में बिताने के बाद बाहर आए।

    ‘सोनोत संताल’ और ‘शिवाजी समाज’ के विलय से बनी झामुमो।

    1972 में सोनोत संताल और विनोद बिहारी महतो के नेतृत्व वाले शिवाजी समाज के विलय से झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ। इसमें ट्रेड यूनियन लीडर ए.के. राय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

    • विनोद बिहारी महतो पार्टी के पहले अध्यक्ष बने।
    • शिबू सोरेन पहले महासचिव बने।

    1980 में पहली बार सांसद बने शिबू सोरेन।

    1980 में शिबू सोरेन दुमका से सांसद चुने गए। इसी साल, बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी ने संथाल परगना की 18 में से 9 सीटें जीतकर पहली बार अपने मजबूत राजनीतिक वजूद का एहसास कराया।

    1991 में विनोद बिहारी महतो के निधन के बाद शिबू सोरेन पार्टी के अध्यक्ष बने और तब से पार्टी की कमान उन्हीं के हाथों में है।

    हेमंत सोरेन की नई लीडरशिप।

    2015 में जमशेदपुर में हुए अधिवेशन में हेमंत सोरेन को पहली बार कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया। इसके बाद झामुमो एक नए दौर में प्रवेश कर गया और आज वह झारखंड की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बना हुआ है।

    संघर्ष से सत्ता तक का सफर जारी…

    झामुमो की यह यात्रा सिर्फ सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं है। यह झारखंड की आत्मा से जुड़ा आंदोलन है, जिसने झारखंड के लोगों को पहचान, हक और नेतृत्व देने का काम किया है। अब सवाल यह है कि पार्टी आने वाले वर्षों में अपनी सत्ता और सिद्धांतों के बीच कैसे संतुलन बनाए रखती है,यह वक्त बताएगा।

     

  • झारखंड: गिरिडीह को मिलेगा मेडिकल कॉलेज !

    रांची :  झारखंड सरकार के आगामी बजट की तैयारियां अब अपने अंतिम दौर में हैं। तीन मार्च को पेश होने वाले इस बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाएगी। खासतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर जोर रहेगा। रांची, जामताड़ा, गिरिडीह और खूंटी में नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के लिए बजट में विशेष राशि का प्रावधान किया जाना तय है।

    स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि राज्य में नए मेडिकल कॉलेज और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की जाएगी। वहीं, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इस दिशा में बड़े फैसले ले चुके हैं और स्वास्थ्य विभाग को विशेष निर्देश दिए हैं।

    सूत्रों के मुताबिक, झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के विस्तार के लिए भी बजट में खास व्यवस्था की जाएगी। मुख्यमंत्री पहले ही इसके लिए एक विस्तृत कार्य योजना तैयार करने का निर्देश दे चुके हैं।

    सरकार का मानना है कि नए मेडिकल कॉलेज और स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना से झारखंड के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी। खासकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में सुधार आएगा। अब देखना यह होगा कि बजट में इन योजनाओं के लिए कितना बड़ा प्रावधान किया जाता है।

     

  • अनुराग गुप्ता बने झारखंड के रेगुलर DGP, सरकार की मुहर!

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट …………..

    झारखंड को आखिरकार अपना नियमित पुलिस महानिदेशक (DGP) मिल गया है! वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अनुराग गुप्ता को राज्य सरकार ने रेगुलर डीजीपी के रूप में नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है। उनकी नियुक्ति दो साल के लिए होगी।

    प्रभारी डीजीपी थे,अब रेगुलर डीजीपी नियुक्त।
    1990 बैच के आईपीएस अधिकारी अनुराग गुप्ता पहले से ही झारखंड के प्रभारी डीजीपी की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। इससे पहले विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने उन्हें इस पद से हटा दिया था और अजय कुमार सिंह को डीजीपी नियुक्त कर दिया गया था। लेकिन, 28 नवंबर 2024 को सरकार ने दोबारा उन्हें प्रभारी डीजीपी बना दिया था और अब, सरकार ने उनकी स्थायी नियुक्ति पर मुहर लगा दी है।

    कब से शुरू होगा कार्यकाल?
    सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया है कि उनके दो साल के कार्यकाल की गिनती कब से होगी। बस इतना कहा गया है कि यह नियुक्ति ‘महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक, झारखंड (पुलिस बल प्रमुख) का चयन एवं नियुक्ति नियमावली 2025’ के नियम 10(1) के तहत की गई है, जिसके अनुसार कार्यकाल दो साल का होगा।

    कई अहम जिम्मेदारियों को संभाल चुके हैं।
    अनुराग गुप्ता के करियर की बात करें, तो उन्होंने गढ़वा, गिरिडीह और हजारीबाग में एसपी के रूप में सेवाएं दी हैं। इसके अलावा, वे रांची के एसएसपी भी रह चुके हैं। वर्तमान में वे सीआईडी और एसीबी के डीजी का अतिरिक्त प्रभार भी संभाल रहे हैं।

    एक मजबूत प्रशासनिक अधिकारी के रूप में पहचान।
    साल 2022 में उन्हें डीजी रैंक में प्रमोट कर डीजी ट्रेनिंग का पद सौंपा गया था। इसके बाद 26 जुलाई 2024 को उन्हें झारखंड का प्रभारी डीजीपी नियुक्त किया गया था। अब, उनकी स्थायी नियुक्ति के साथ झारखंड को एक अनुभवी और तेजतर्रार डीजीपी मिल गया है, जिनसे राज्य की कानून-व्यवस्था को और मजबूत करने की उम्मीद की जा रही है।

  • झारखंड में लागू नहीं होंगे UCC, CAA और NRC- हेमंत सोरेन

    झारखंड दिवस के रूप में मना समारोह.

    झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने केंद्र सरकार के प्रमुख एजेंडों को सीधे नकारते हुए साफ कर दिया है कि झारखंड में समान नागरिक संहिता (UCC), नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लागू नहीं किया जाएगा।  दुमका में आयोजित पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में पार्टी ने 50 सूत्री प्रस्ताव पारित करते हुए यह बड़ा ऐलान किया। झामुमो का स्थापना दिवस पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया गया। पार्टी का पूरा कुनबा इस खास मौके पर दुमका में मौजूद रहा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष ने इस ऐतिहासिक अवसर पर पार्टी का झंडा फहराकर 46वें स्थापना दिवस समारोह का विधिवत उद्घाटन किया।

    झामुमो का केंद्र से दो-दो हाथ का मूड!

    झामुमो ने सिर्फ CAA-NRC-UCC पर ही नहीं, बल्कि कोयला रॉयल्टी मद के 1.36 लाख करोड़ रुपये बकाया का मुद्दा भी उठाया। पार्टी ने साफ कर दिया कि इस रकम को लेकर सदन से सड़क तक संघर्ष जारी रहेगा और कानूनी मोर्चे पर भी केंद्र से लड़ाई लड़ी जाएगी।

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सत्ता में वापसी के बाद झामुमो अपने कोर एजेंडे पर कायम रहेगा। पार्टी ने 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति लागू करने, संताल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT एक्ट) और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT एक्ट) को और मजबूती देने की अपनी प्रतिबद्धता जताई।

    झारखंड में होनी चाहिए PSU कंपनियों का मुख्यालय।

    झामुमो ने झारखंड में काम कर रही कंपनियों के मुख्यालय को राज्य में लाने की मांग को फिर से दोहराया। पार्टी का कहना है कि कोल इंडिया और दामोदर घाटी निगम (DVC) जैसी कंपनियां झारखंड से संसाधन निकालकर मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन उनका मुख्यालय यहां नहीं है। झामुमो का मानना है कि इन कंपनियों के मुख्यालय झारखंड में लाने से राज्य की अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा मिलेगा। झामुमो ने अपने पारंपरिक गढ़ संताल परगना को बचाने और भाजपा की सेंधमारी को रोकने के लिए केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने का संकेत दिया है।

    स्थापना दिवस समारोह झारखंड दिवस के रूप में मनाया गया, जिसमें हजारों की संख्या में पार्टी के मंत्री, सांसद, विधायक, कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए। इस मौके  पर झारखंड सरकार के कई मंत्री, सांसद और विधायक उपस्थित रहे। इनमें मंत्री सुदिव्य सोनू, हफीजुल हसन, दुमका सांसद नलिन सोरेन, राजमहल सांसद विजय हांसदा, विधायक कल्पना सोरेन, बसंत सोरेन ,मथुरा महतो, स्टीफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू, आलोक कुमार सोरेन, लुईस मरांडी और उदय शंकर सिंह जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं ।

     छह जिलों से उमड़ी भीड़, सुरक्षा रही चाक-चौबंद।
    इस मेगा इवेंट में संथाल परगना के सभी छह जिलों—दुमका, देवघर, जामताड़ा, पाकुड़, साहिबगंज और गोड्डा से भारी संख्या में कार्यकर्ता और जनता शामिल हुई। इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। दुमका जिला पुलिस बल के अलावा अन्य जिलों से भी सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी। गांधी मैदान में करीब 400 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था , जिनमें कांस्टेबल से लेकर डीएसपी स्तर तक के अधिकारी शामिल थे।

    चार्टर प्लेन से पहुंचे मुख्यमंत्री।

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी पत्नी एवं गांडेय विधायक कल्पना सोरेन के साथ चार्टर प्लेन से दुमका पहुंचे। हवाई अड्डे पर उनका भव्य स्वागत किया गया और प्रशासन की ओर से उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। एयरपोर्ट से मुख्यमंत्री सीधे अपने खिजुरिया स्थित आवास पहुंचे, जहां कुछ समय विश्राम करने के बाद वे गांधी मैदान पहुंचे और समारोह की शुरुआत की।

    भाजपा को बड़ा झटका, दिनेश चौधरी झामुमो में शामिल।

    झामुमो को उस समय बड़ी सफलता मिली, जब भाजपा के ओबीसी मोर्चा के पूर्व जिला पदाधिकारी और अनगड़ा निवासी दिनेश कुमार चौधरी ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।

    झामुमो के इस ऐतिहासिक स्थापना दिवस ने न सिर्फ कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया, बल्कि झारखंड की सियासत में भी एक मजबूत संदेश दिया कि पार्टी की पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत है!

  • भाजपा मे इतना सन्नाटा क्यूँ है भाई !

    परवेज़ आलम की खास रिपोर्ट ………..

    झारखंड में भाजपा की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है जैसे कोईपहलवान दो मुकाबलों में लगातार पटखनी खाकर चारों खाने चित हो गया हो। विधानसभा चुनाव में दूसरी बार हार का स्वाद चखने के बाद पार्टी की सक्रियता पर मानो विराम लग गया है। जो नेता चुनावी मौसम में चौबीसों घंटे दौरे कर रहे थे, वे अब अपने-अपने पुराने कामों में लौट गए हैं। आलम यह है कि संगठन का काम ठप पड़ा है और नेता प्रतिपक्ष का चयन भी अब तक नहीं हो पाया है।

    रघुवर दास की ‘घर वापसी’ पर सवाल.
    भाजपा की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ओडिशा के राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर झारखंड लौटे रघुवर दास भी पार्टी में किसी जिम्मेदारी के इंतजार में हैं। चर्चाएं थीं कि उन्हें संगठन में बड़ा पद दिया जाएगा, लेकिन फिलहाल उनकी भूमिका सिर्फ प्राथमिक सदस्यता तक ही सीमित रह गई है। पार्टी के अंदरखाने में यह कयास भी लगाए जा रहे थे कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं बढ़ा है। जिस जोश और उमंग के साथ उन्होंने भाजपा में दोबारा कदम रखा था, वह अब ठंडा पड़ता दिख रहा है।

    नेता प्रतिपक्ष का पेंच फंसा.
    विधानसभा का दूसरा सत्र 24 फरवरी से शुरू होने वाला है और भाजपा अब तक नेता प्रतिपक्ष के नाम की घोषणा नहीं कर पाई है। सूत्रों की मानें तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद इस पर निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ही इस दौड़ में सबसे आगे दिख रहे हैं। अगर पार्टी उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखती है, तो रांची से सातवीं बार विधायक चुने गए चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह (सीपी सिंह) को यह जिम्मेदारी मिल सकती है।

    आयोगों की नियुक्तियां अटकीं, कोर्ट सख्त.
    भाजपा की निष्क्रियता का असर सरकार के कामकाज पर भी पड़ रहा है। सूचना आयोग समेत कई महत्वपूर्ण आयोगों में नियुक्तियां अब तक लटकी हुई हैं, क्योंकि इसके लिए नेता प्रतिपक्ष की सहमति जरूरी होती है। हाई कोर्ट ने कई बार सरकार को फटकार लगाई है कि अगर नेता प्रतिपक्ष का चयन नहीं हो पा रहा है तो विपक्ष अपने किसी सदस्य को नामित करे, लेकिन अदालत की बात भी अनसुनी ही रह गई है। सूचना आयोग में वर्षों से मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के पद खाली हैं, लेकिन नियुक्तियों को लेकर कोई ठोस पहल नहीं दिख रही।

    सोशल मीडिया पर सक्रियता, जमीनी स्तर पर सन्नाटा.
    झारखंड भाजपा की मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो लगता है कि पार्टी अभी तक हार के ग़म से उबर नहीं पाई है। चुनावी साल में जो उर्जा और सक्रियता भाजपा में देखने को मिल रही थी, वह अब लगभग गायब हो गई है। पार्टी के नेता सिर्फ सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते नजर आ रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बड़ा आंदोलन या अभियान नहीं दिख रहा। ऐसा लगता है कि भाजपा अब अगली बार चुनावी बिगुल बजने तक ‘मौन व्रत’ में ही रहने वाली है।

     

  • तो इस साल भी नहीं होगी जनगणना? NPR पर भी संदेह, बजट के आंकड़ों से समझिए

    परवेज़ आलम की खास रिपोर्ट ………..

    क्या भारत में 2025 में भी जनगणना नहीं होगी? क्या सरकार का ध्यान इस दिशा में नहीं है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि इस साल के बजट में जनगणना के लिए महज 574.80 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह राशि इतनी कम है कि इससे इस विशाल प्रक्रिया की शुरुआत भी मुश्किल लगती है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या सरकार जनगणना कराने के मूड में नहीं है?

    2019 में मिली थी मंजूरी, लेकिन अब तक अधर में योजना।

    2019 में केंद्र सरकार ने 2021 की जनगणना और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) को अपडेट करने की मंजूरी दी थी। तब सरकार ने अनुमानित खर्च जनगणना के लिए 8,754.23 करोड़ रुपये और NPR के लिए 3,941.35 करोड़ रुपये तय किया था। लेकिन फिर आया कोरोना, और पूरा कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। तब से अब तक सरकार ने नए सिरे से इसकी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है।

    बजट में भारी कटौती, 12,000 करोड़ के अनुमान के मुकाबले 574 करोड़!

    अब अगर 2025-26 के बजट की बात करें, तो जनगणना, सर्वेक्षण और सांख्यिकी विभाग (RGI) को सिर्फ 574.80 करोड़ रुपये मिले हैं। यह 2021-22 के 3,768 करोड़ रुपये की तुलना में बहुत कम है। इससे पहले 2024-25 में भी केवल 572 करोड़ रुपये ही मिले थे। अब सवाल उठता है—अगर जनगणना करानी है, तो इसके लिए जरूरी फंड कहां से आएगा? क्योंकि अधिकारियों के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में 12,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च आने की संभावना है।

    डिजिटल होगी अगली जनगणना, लेकिन पोर्टल अब तक लॉन्च नहीं।

    जब भी अगली जनगणना होगी, यह पूरी तरह डिजिटल होगी। सरकार नागरिकों को सेल्फ-एन्यूमरेशन (Self-Enumeration) यानी खुद अपने डेटा भरने की सुविधा देगी। इसके लिए NPR को अपडेट करना अनिवार्य होगा। लेकिन अब तक इस प्रक्रिया के लिए जो डिजिटल पोर्टल बनाया जाना था, वह भी लॉन्च नहीं हुआ है।

    आधार और मोबाइल नंबर जरूरी, ये सवाल पूछे जाएंगे।

    जनगणना के दौरान नागरिकों से आधार या मोबाइल नंबर देना अनिवार्य होगा। साथ ही, इनसे जुड़े कई सवाल पूछे जाएंगे, जैसे:

    • परिवार के पास टेलीफोन, इंटरनेट, मोबाइल या स्मार्टफोन है या नहीं?
    • घर में साइकिल, स्कूटर, बाइक या कार है?
    • परिवार मुख्य रूप से कौन सा अनाज खाता है?
    • पीने के पानी का मुख्य स्रोत क्या है?
    • घर में बिजली, शौचालय, स्नानघर, रसोई और गैस कनेक्शन है या नहीं?
    • खाना पकाने के लिए कौन सा ईंधन इस्तेमाल किया जाता है?
    • घर की दीवार, छत और फर्श किस सामग्री से बनी है?
    • परिवार के मुखिया की जाति, लिंग और विवाहित जोड़ों की संख्या क्या है?

    सरकार की चुप्पी, क्या 2025 में भी नहीं होगी जनगणना?

    जनगणना देश के विकास और नीतियों के लिए बेहद जरूरी प्रक्रिया है। इससे देश की आर्थिक, सामाजिक और जनसंख्या से जुड़ी सही तस्वीर सामने आती है। लेकिन मौजूदा बजट और सरकार की ओर से अब तक किसी भी आधिकारिक बयान की गैरमौजूदगी ने इस पर संदेह गहरा कर दिया है। क्या सरकार इसे आगे और टालने की योजना बना रही है? या फिर कोई नया फैसला आने वाला है?

  • झारखंड में 26 हजार शिक्षकों की नियुक्ति रास्ता साफ, शिक्षा मंत्री ने दी जानकारी

    चाईबासा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद झारखंड में 26 हजार शिक्षकों की बहाली का रास्ता साफ हो गया है। इससे राज्य के विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। इस संबंध में झारखंड के शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन ने चाईबासा परिसदन में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि राज्य सरकार शिक्षा के सुधार के लिए लगातार प्रयासरत है।

    मंत्री ने बताया कि विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है, लेकिन कई बार तकनीकी अड़चनों के कारण इसे पूरी तरह से हल नहीं किया जा सका। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेश के बाद अब झारखंड में 26 हजार शिक्षकों की नियुक्ति का मार्ग पूरी तरह साफ हो गया है।

    शिक्षकों की कमी होगी दूर

    शिक्षा मंत्री ने कहा कि जल्द ही इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा, जिससे विद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर हो सके। उन्होंने बताया कि सरकार का लक्ष्य छात्र-शिक्षक अनुपात को संतुलित करना है। 26 हजार शिक्षकों की नियुक्ति के बाद भी इस दिशा में निरंतर कार्य किया जाएगा ताकि राज्य की शिक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।

    पूर्ववर्ती सरकार पर हमला

    मंत्री ने पूर्ववर्ती सरकार, विशेष रूप से भाजपा, पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने राज्य की शिक्षा व्यवस्था को बिगाड़कर रख दिया था। शिक्षकों को 16-17 वर्षों से प्रमोशन नहीं मिलने के कारण माध्यमिक और उच्च विद्यालयों में प्रधानाध्यापकों की भारी कमी हो गई है। लेकिन अब इस स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। पंचायत, प्रखंड, जिला और राज्य स्तर पर शिक्षा सुधार की दिशा में ठोस कार्य शुरू किया जा चुका है।

    नई शिक्षा नीति के तहत सुधार

    मंत्री ने बताया कि राज्य सरकार नई शिक्षा नीति के तहत विभिन्न सुधारों को लागू कर रही है। क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा की शुरुआत की जा चुकी है। शिक्षकों को गैर-शिक्षण कार्यों में लगाए जाने की परंपरा बिहार सरकार के समय से चली आ रही थी, लेकिन अब इसमें बदलाव किया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि सरकार का मुख्य उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। राज्य के प्रत्येक प्रखंड में मॉडल स्कूल संचालित किए जा रहे हैं, जबकि सीएम एक्सीलेंस स्कूलों में सीबीएसई पैटर्न की पढ़ाई शुरू हो चुकी है। सरकार बुनियादी शिक्षा को मजबूत करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है।

    इससे पहले उपायुक्त कुलदीप चौधरी, पुलिस अधीक्षक आशुतोष शेखर, जिला शिक्षा पदाधिकारी टोनी राज टोप्पो और जिला शिक्षा अधीक्षक प्रवीण कुमार ने शिक्षा मंत्री का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया। बैठक के दौरान शिक्षा विभाग से संबंधित विभिन्न परियोजनाओं और मुद्दों पर भी चर्चा की गई।

  • गिरिडीह: महिलाओं के नाम पर 50 लाख का लोन लेकर फरार हुआ पारा शिक्षक, ऐसे पकड़ा गया मामला

    गिरिडीह में 84 महिलाओं से लाखों की ठगी, सहायक अध्यापक पर आरोप

    गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड के अड़वारा पंचायत में 84 महिलाओं के साथ धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। इस ठगी का आरोप गांव के ही सहायक अध्यापक पवन सिंह पर लगा है, जो घटना के बाद से फरार है।

    पीड़ित महिलाओं के अनुसार, पवन सिंह ने आधार कार्ड और वोटर कार्ड अपडेट करने के नाम पर उनके दस्तावेज लिए थे। इसके बाद उसने फिंगरप्रिंट लेकर कहा कि यह पुष्टि के लिए जरूरी है। लेकिन वास्तव में, उसने इन दस्तावेजों का इस्तेमाल माइक्रो फाइनेंस कंपनी से लोन पास कराने के लिए किया और फिर महिलाओं के नाम पर लिए गए लोन की रकम निकालकर फरार हो गया।

    इस धोखाधड़ी का खुलासा तब हुआ जब फाइनेंस कंपनी के अधिकारी गांव पहुंचे और महिलाओं से लोन की राशि चुकाने को कहा। महिलाओं ने हैरानी जताई कि उन्होंने कभी लोन के लिए आवेदन ही नहीं किया था, जबकि कंपनी का कहना है कि सभी दस्तावेज उनके पास मौजूद हैं और लोन उन्हीं के नाम पर दिया गया है, इसलिए उन्हें ही भुगतान करना होगा।

    सूत्रों के अनुसार, प्रत्येक महिला के नाम पर ₹22,000 से लेकर ₹1,00,000 तक का लोन पास किया गया था, जिससे कुल ठगी की रकम ₹50 लाख से अधिक हो गई। पीड़ित महिलाओं ने बगोदर पुलिस से शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस अवर निरीक्षक अंजन कुमार ने बताया कि पूरे मामले की जांच की जा रही है और जल्द ही उचित कार्रवाई की जाएगी।

  • क्या सीता सोरेन की JMM में वापसी होगी ? सियासी गलियारों में चर्चा तेज

    परवेज़ आलम की खास रिपोर्ट………………….

    झारखंड की राजनीति में इन दिनों सीता सोरेन की घरवापसी की चर्चाएं जोरों पर हैं। भाजपा नेता और शिबू सोरेन की बड़ी पुत्र वधू  सीता सोरेन एक बार फिर अपने पुराने राजनीतिक घराने में लौटने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन इस राह में सबसे बड़ी चुनौती उनके ही परिवार से आ रही है।

    राजनीतिक भविष्य को लेकर बढ़ी बेचैनी।

    लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद सीता सोरेन की स्थिति डगमगाने लगी है। उन्हें लगने लगा है कि भाजपा में रहकर संथाल परगना में अपनी सियासी पकड़ मजबूत करना मुश्किल है, क्योंकि यहां जेएमएम का जनाधार काफी मजबूत है। यही वजह है कि अब  वे  वापसी का रास्ता तलाश रही हैं। इस फैसले के पीछे सिर्फ उनकी सियासत ही नहीं, बल्कि अपनी बेटियों का राजनीतिक भविष्य भी एक बड़ी वजह बताया जा रहा है।

    हेमंत और कल्पना की सहमति का इंतजार।

    हालांकि, जेएमएम में वापसी इतनी आसान नहीं दिख रही। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन इस पर सहमत नहीं दिख रहे हैं। दरअसल, भाजपा में शामिल होते वक्त सीता सोरेन ने हेमंत और कल्पना पर गंभीर आरोप लगाए थे। दिवंगत दुर्गा सोरेन को लेकर दिए गए उनके बयानों ने भी परिवार को झकझोर दिया था। यही कारण है कि हेमंत-कल्पना उन्हें वापस लेने के मूड में नहीं हैं।

    शिबू सोरेन चाहते हैं परिवार एक हो।

    जेएमएम के संरक्षक और दिग्गज नेता शिबू सोरेन हमेशा से अपने परिवार को एकजुट देखना चाहते हैं। 11 जनवरी को सीता सोरेन जब शिबू सोरेन को जन्मदिन की बधाई देने उनके घर पहुंचीं, तो इस चर्चा को और बल मिल गया कि वो जेएमएम में वापसी की कोशिशों में जुटी हैं।

    परिवार के भीतर ही सियासी संघर्ष!

    अब सवाल यह उठता है कि क्या हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन पारिवारिक दबाव में झुकेंगे? परिवार के सदस्य और जेएमएम के कुछ नेता हेमंत और कल्पना को मनाने में लगे हैं, ताकि सीता की वापसी की राह आसान हो सके। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं होगा, क्योंकि हेमंत और कल्पना को यह डर भी है कि पुराने विवाद कहीं दोबारा ना उठ खड़े हों।

    भाजपा से मोहभंग, जेएमएम में फायदा!

    भाजपा में रहते हुए सीता सोरेन को दो बड़े चुनावों में हार का सामना करना पड़ा—दुमका लोकसभा और जामताड़ा विधानसभा। इस हार ने उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया। ऐसे में, जब जेएमएम सत्ता में है, तो पार्टी में वापसी से उन्हें और उनके परिवार को राजनीतिक लाभ मिल सकता है।

    अब आगे क्या?

    अब सबकी निगाहें हेमंत और कल्पना सोरेन के फैसले पर टिकी हैं। अगर उन्होंने सीता सोरेन की वापसी को मंजूरी दे दी, तो झारखंड की सियासत में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। लेकिन अगर विरोध जारी रहा, तो सीता को एक नए राजनीतिक रास्ते की तलाश करनी होगी।