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  • हेमंत सोरेन: “हम अपना हक लेकर रहेंगे

    परवेज़ आलम की विशेष रिपोर्ट……..

    हेमंत सोरेन का अंदाज़ वही, जो झारखंड की मिट्टी को रास आता है – साफ, सीधा और बिंदास। झारखंड के मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार और भाजपा के नेताओं पर तीखा हमला बोलते हुए सवाल दागा है, “कब मिलेगा 1.36 लाख करोड़?” यह केवल एक सवाल नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा का आक्रोश है।

    “यह हमारी मेहनत का पैसा है”
    सोरेन ने कहा, “हम झारखंडी हवा में बात नहीं करते। ये हमारी मेहनत का पैसा है। हर झारखंडी का हक है और इसे लेकर रहेंगे। भाजपा नेताओं को चाहिए था कि वो हमारी आवाज़ में आवाज़ मिलाते, लेकिन वो तो विरोध में खड़े हो गए। दुखद है, पर लड़ाई हम जीतेंगे।”

    झारखंड का चुनावी सुपरहिट मुद्दा. 
    कोयला रॉयल्टी का 1.36 लाख करोड़ बकाया हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द बना। सोरेन ने इसे झारखंड के हर घर तक पहुंचा दिया। उनकी पत्नी कल्पना सोरेन भी इस मोर्चे पर आक्रामक रहीं।

    चुनावी माहौल में इस मुद्दे ने सियासी तापमान बढ़ा दिया। अब जब केंद्र सरकार कह रही है कि “झारखंड का कोई बकाया नहीं”, तो राजनीति और गरमा गई है। झामुमो ने साफ कह दिया है कि बकाया नहीं मिला तो “झारखंड से एक ढेला कोयला भी बाहर नहीं जाएगा।”

    कानूनी लड़ाई का बिगुल बजा.
    सोरेन सरकार ने केंद्र के इंकार के बाद कानूनी रास्ता अख्तियार करने का फैसला लिया है। कैबिनेट ने वरीय अधिवक्ताओं का पैनल तैयार कर लिया है। मामला अब अदालत तक जाएगा।

    क्या होगा कोयले का भविष्य?
    झारखंड सरकार ने खनन कंपनियों को अल्टीमेटम दे दिया है। भूमि सुधार विभाग ने सभी कंपनियों से जवाब मांगा है। स्थिति साफ नहीं हुई तो खनन और आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

    हेमंत का संदेश: “झारखंड चुप नहीं बैठेगा”
    सोरेन के शब्द झारखंडियों की धड़कन बन गए हैं। “हम लड़ेंगे, क्योंकि ये लड़ाई झारखंड के भविष्य की है। ये लड़ाई हमारी मिट्टी के सम्मान की है। ये 1.36 लाख करोड़ का सवाल नहीं, ये झारखंड की आत्मा का सवाल है।”

    देखना दिलचस्प होगा कि झारखंड की यह गूंज दिल्ली के गलियारों में कितनी दूर तक सुनाई देती है।

  • हेमंत सोरेन: सीएम को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत!

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……….

    झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन , जो ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के निशाने पर तो हैं, लेकिन हाईकोर्ट से मिली राहत ने उनकी मुश्किलों को कुछ कम कर दिया है।

    क्या है मामला?
    हेमंत सोरेन पर ईडी ने जमीन घोटाले के मामले में 10 समन जारी किए थे। लेकिन इन 10 में से उन्होंने केवल दो बार ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद ईडी ने समन की अवहेलना का मामला कोर्ट में ले जाकर शिकायतवाद दर्ज कराया।

    हाईकोर्ट का फैसला। 
    झारखंड हाईकोर्ट की जस्टिस ए.के. चौधरी की बेंच ने सोमवार को इस मामले में सुनवाई करते हुए हेमंत सोरेन को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी। हाईकोर्ट ने ईडी को 16 जनवरी तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

    हाईकोर्ट ने पहले ही एमपी-एमएलए कोर्ट द्वारा जारी हेमंत सोरेन के खिलाफ हाजिरी के आदेश पर रोक लगा दी थी। अब इस राहत के बाद हेमंत सोरेन को फिलहाल अदालत में पेश होने की जरूरत नहीं है।

    ईडी का आरोप। 
    ईडी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि हेमंत सोरेन ने समन की बार-बार अवहेलना की है। 10 समन में केवल 20 और 31 जनवरी को ही वे ईडी के सामने पेश हुए। ईडी इसे कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन मान रहा है।

    हेमंत सोरेन कहां हैं?
    जब झारखंड हाईकोर्ट से राहत की खबर आई, उस समय हेमंत सोरेन दिल्ली में थे। वे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से शिष्टाचार मुलाकात के लिए गए हैं। साथ में उनकी पत्नी कल्पना सोरेन भी मौजूद हैं।

    दिल्ली दौरे के दौरान उन्होंने पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे जैसे दिग्गज नेताओं से मुलाकात की थी। अब वे उज्जैन जाकर महाकाल की पूजा-अर्चना करने की योजना में हैं।

    क्या यह राहत स्थायी है?
    हालांकि हेमंत सोरेन को हाईकोर्ट से मिली यह छूट एक अस्थायी राहत है। ईडी 16 जनवरी तक जवाब दाखिल करेगा, और उसके बाद अदालत का अगला कदम क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

    बड़ा सवाल?

    • क्या ईडी का यह केस झारखंड की राजनीति को नया मोड़ देगा?
    • क्या यह मामला सिर्फ कानूनी है, या इसके पीछे राजनीतिक साजिशें भी हैं?
    • और सबसे अहम, क्या हाईकोर्ट से मिली राहत हेमंत सोरेन को लंबे समय तक बचा पाएगी?
  • झारखंड में भाजपा का नंबर गेम कमजोर, राज्यसभा मे नहीं मिलेगी सीटें

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक  रपट …..

    झारखंड की सियासत में भाजपा के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की शानदार जीत के बाद, भाजपा के लिए राज्यसभा चुनाव में भी राहें कठिन नजर आ रही हैं। सिर्फ 21 विधायकों के साथ, भाजपा की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह राज्यसभा में अपने दम पर किसी भी उम्मीदवार को जीत दिला सके।

    नंबर गेम में पिछड़ती भाजपा.
    राज्यसभा चुनाव में जीतने के लिए 27 विधायकों का समर्थन आवश्यक है। भाजपा के पास वर्तमान में सिर्फ 21 विधायक हैं। एनडीए के घटक दलों—आजसू, जदयू और लोजपा (रामविलास)—को मिलाकर यह संख्या 24 तक पहुंचती है। लेकिन यह आंकड़ा भी जीत के लिए नाकाफी है।

    भाजपा की परेशानी यहां खत्म नहीं होती। अगले पांच साल में राज्यसभा की चार सीटें रिक्त होंगी, जिनमें से दो फिलहाल भाजपा के पास हैं। लेकिन मौजूदा हालात में ये दोनों सीटें महागठबंधन की झोली में जाती दिख रही हैं।

    झामुमो का बढ़ता प्रभाव.
    वर्तमान में राज्यसभा में झारखंड मुक्ति मोर्चा के तीन सदस्य और भाजपा के तीन सदस्य हैं। लेकिन अगर राजनीतिक समीकरण ऐसे ही बने रहे, तो झामुमो-कांग्रेस गठबंधन राज्यसभा में भी अपनी पकड़ मजबूत कर लेगा। यह भाजपा के लिए झारखंड में राजनीतिक हाशिये पर जाने का संकेत हो सकता है।

    समाप्त होती उम्मीदें.
    भाजपा के वर्तमान राज्यसभा सदस्यों में दीपक प्रकाश और आदित्य साहू का कार्यकाल क्रमश: 2026 और 2028 में समाप्त हो रहा है। अगर भाजपा की स्थिति विधानसभा में ऐसी ही रही, तो 2029 तक झारखंड से राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व समाप्त हो सकता है।

    फिलवक्त , शिबू सोरेन, महुआ माजी और सरफराज अहमद झारखंड मुक्ति मोर्चा से और दीपक प्रकाश, आदित्य साहू एवं प्रदीप वर्मा भाजपा से राज्यसभा में सदस्य हैं।

    शिबू सोरेन       झामुमो 21 जून 2026 तक

    दीपक प्रकाश  भाजपा 21 जून 2026 तक

    आदित्य साहू    भाजपा 7 जुलाई 2028 तक

    महुआ माजी     झामुमो 7 जुलाई 2028

    प्रदीप वर्मा       भाजपा 3 मई 2030

    सरफराज अहमद  झामुमो 3 मई 2030

    झारखंड की सियासत का नया अध्याय। 
    झामुमो, कांग्रेस और राजद के गठबंधन ने झारखंड में सत्ता के साथ-साथ अब राज्यसभा पर भी अपनी नज़रें जमा ली हैं। शिबू सोरेन, महुआ माजी और डॉक्टर  सरफराज अहमद जैसे नेता इस स्थिति को मजबूत करने में जुटे हैं। भाजपा के पास अभी समय है, लेकिन सवाल है—क्या वहगठबंधन को चुनौती दे पाएगी?

    भाजपा के लिए अलार्म.
    झारखंड में भाजपा के लिए यह राजनीतिक अलार्म है। विधानसभा और राज्यसभा में कमजोर होती स्थिति पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़े कर रही है। क्या भाजपा इन हालातों से उबरने का रास्ता तलाश पाएगी, या फिर झारखंड की राजनीति में यह गठबंधन उसकी पकड़ को और कमजोर करेगा?

     

  • रांची स्मार्ट सिटी में मंत्रियों के लिए बने आवास का सीएम ने निरीक्षण

    RANCHI: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आज रांची स्मार्ट सिटी में राज्य सरकार के मंत्रियों के लिए बनाए जा रहे नवनिर्मित आवासीय परिसर का निरीक्षण किया। मुख्यमंत्री ने निर्माण कार्यों की प्रगति का जायजा लिया और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि 15 जनवरी 2025 तक सभी कार्य पूरे कर लिए जाएं, ताकि मंत्रियों को उनके आवास आवंटित किए जा सकें।

    क्लब हाउस से लेकर बच्चों के खेल स्थान तक सुविधाओं का जायजा. 
    मुख्यमंत्री ने आवासीय परिसर में बने क्लब हाउस, बैडमिंटन कोर्ट और पुलिस बैरक का भी निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि बच्चों के खेलने के लिए उचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। मुख्यमंत्री ने आवासीय परिसर की सभी सुविधाओं को समय पर पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    निरीक्षण के दौरान मौजूद विधायक और अधिकारी.
    इस मौके पर गांडेय विधायक कल्पना सोरेन, मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव अविनाश कुमार, नगर विकास विभाग के प्रधान सचिव सुनील कुमार, भवन निर्माण विभाग के सचिव अरवा राजकमल, स्मार्ट सिटी के सीईओ अमीत कुमार और जीएम राकेश नंदकुलियार समेत अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

    विधानसभा सत्र की शुरुआत.
    इसी बीच, झारखंड विधानसभा का चार दिवसीय सत्र आज से शुरू हो गया। पहले दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का विधानसभा स्थित मुख्यमंत्री कक्ष में मुख्य सचिव अलका तिवारी और डीजीपी अनुराग गुप्ता समेत अन्य अधिकारियों ने स्वागत किया। वहीं, डुमरी से विधायक जयराम महतो ने अनोखे अंदाज में नमन करते हुए विधानसभा में प्रवेश किया, जो चर्चा का विषय बना रहा।

    15 जनवरी की डेडलाइन पर टिकी नजरें.
    रांची स्मार्ट सिटी में मंत्रियों के लिए बनाए जा रहे इस आवासीय परिसर को लेकर मुख्यमंत्री की सक्रियता और निर्देश यह संकेत देते हैं कि सरकार इस परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। अब सभी की निगाहें 15 जनवरी 2025 की डेडलाइन पर हैं।

  • कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंत्री सुदिव्य सोनू का किया भव्य स्वागत

    परवेज़ आलम की कलम से …..
    गिरिडीह: रविवार को झारखंड सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह कांग्रेस भवन में पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। इस अवसर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मंत्री का फूलों के बुके और शॉल देकर भव्य स्वागत किया। जिला कांग्रेस अध्यक्ष धनंजय सिंह ने मंत्री को सम्मानित करते हुए कहा कि उनका पार्टी कार्यालय में आना कार्यकर्ताओं के प्रति उनके सम्मान और प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

    मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने इस मौके पर कहा, “कांग्रेस मेरा परिवार है, और मैं हमेशा आपके लिए उपलब्ध रहूंगा। कांग्रेस कार्यालय आकर मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। कार्यकर्ताओं की मेहनत और सम्मान को बनाए रखना मेरी प्राथमिकता है।”

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी एक पार्टी के नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और महागठबंधन के मंत्री हैं। “मेरी जिम्मेदारी है कि मैं हर कार्यकर्ता की भावनाओं का सम्मान करूं और किसी को निराश न होने दूं। गिरिडीह और झारखंड के विकास के लिए मैं पूरी तरह प्रतिबद्ध हूं,” उन्होंने कहा।

    जिला अध्यक्ष धनंजय सिंह ने मंत्री की प्रशंसा करते हुए कहा, “मंत्री बनने के तुरंत बाद कांग्रेस कार्यालय आना यह दर्शाता है कि सोनू जी कार्यकर्ताओं के प्रति संवेदनशील हैं। उनकी मेहनत और सहयोग से ही गठबंधन सरकार बनी है, और हमें विश्वास है कि वे इसे ध्यान में रखेंगे।”

    प्रदेश सचिव अजय सिन्हा मंटू ने मंत्री सोनू की मिलनसार प्रवृत्ति की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान किया है। उनके मंत्री बनने से गिरिडीह की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है।

    इस कार्यक्रम में कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता उपस्थित रहे, जिनमें कार्यकारी अध्यक्ष सतीश केडिया, मदन लाल विश्वकर्मा, जेएमएम नेता मो. हसनैन अली, शाहनवाज़ अंसारी, प्रो. कमाल नयन, और प्रो. मंजूर अंसारी जैसे प्रमुख नाम शामिल थे।

    कार्यक्रम का माहौल उत्साह और एकजुटता से भरा हुआ था, जो दर्शाता है कि झारखंड कांग्रेस का यह गठबंधन मजबूती से आगे बढ़ने के लिए तैयार है।

  • आदिवासी युवा महोत्सव 2024:ब्रांड एंबेसडर शिल्पी नेहा तिर्की

     

    रांची में इस दिसंबर, झारखंड की मिट्टी से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं की गूंज हर कोने में सुनाई देगी। “आदिवासी युवा महोत्सव 2024” का आयोजन राजधानी के रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में 14 और 15 दिसंबर को होने जा रहा है। इस महोत्सव की ब्रांड एंबेसडर मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की होंगी, जो आदिवासी युवाओं की पहचान और नेतृत्व का चेहरा बनकर सामने आई हैं।

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। यह आयोजन न केवल झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति का उत्सव है, बल्कि युवाओं के लिए अपनी जड़ों को पहचानने और अपनी भाषा, जीवनशैली, और प्रकृति प्रेम के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी प्रयास है।

    मंच पर आदिवासी गौरव और आधुनिकता का संगम

    33 आदिवासी समुदायइस महोत्सव में भाग ले रहे हैं। पारंपरिक नृत्य, गीत, और स्वादिष्ट आदिवासी व्यंजनों से लेकर फैशन शो और रॉक बैंड प्रदर्शन तक, यह आयोजन आधुनिकता और परंपरा का संगम होगा।

    कार्यक्रम में सामाजिक मुद्दों पर आधारित नाटक, आदिवासी उद्यमियों का मेला, पैनल चर्चा, और नेतृत्व विकास कार्यशालाएं भी होंगी। इन गतिविधियों के जरिए युवा अपनी सांस्कृतिक धरोहर को समझने के साथ-साथ करियर के नए रास्तों की तलाश भी कर सकेंगे।

    नेतृत्व में युवाओं की भूमिका

    महोत्सव का नेतृत्व युवा समाजसेवी और आयोजन समिति के अध्यक्ष बिपिन टोप्पो और कार्यकारी अध्यक्ष शशि पन्ना कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह महोत्सव आदिवासी युवाओं को मंच देने का एक अवसर है, जहां वे अपनी सांस्कृतिक विरासत और समाज में अपनी भूमिका को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सकें।

    झारखंड का संदेश: अपनी जड़ों से जुड़ो

    यह महोत्सव सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक संदेश है। झारखंड के युवाओं के लिए यह मंच उनकी पहचान, उनकी संस्कृति और उनके गौरव को समझने और आगे बढ़ाने का माध्यम बनेगा।

    “आदिवासी युवा महोत्सव 2024” झारखंड की आत्मा को फिर से जगाने का प्रयास है। यह महोत्सव बताता है कि परंपराओं का सम्मान ही विकास का पहला कदम है। जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, तो वे न केवल अपने भविष्य को रोशन करते हैं, बल्कि अपनी विरासत को भी दुनिया के सामने गर्व से रखते हैं।

  • झारखंड की सियासत में सत्ता के नए समीकरण !

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रपट ……..

    झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने मंत्रिपरिषद का विभागीय बंटवारा कर दिया है। ये सिर्फ विभागों का आवंटन नहीं, बल्कि सियासी बिसात पर बिछाई गई पहली चाल है। अहम विभागों को खुद के पास रखकर सोरेन ने अपनी पकड़ मजबूत दिखाई, लेकिन सवर्ण और महिला प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल भी खड़े हो गए हैं।

    जब मईया सम्मान योजना के तहत महिलाओं को केंद्र में रखकर फैसले हुए थे, तो लगा था कि सोरेन महिलाओं को सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी देंगे। लेकिन इस बार उनकी झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के कोटे से शपथ लेने वाले छह मंत्रियों में एक भी महिला नहीं हैं। यह वही राज्य है, जहां इस बार विधानसभा में कुल 12 महिला विधायक पहुंची हैं। कांग्रेस ने अपने हिस्से से दो महिलाओं – दीपिका पांडेय सिंह और शिल्पी नेहा तिर्की – को मंत्रिमंडल में जगह दी, जबकि जेएमएम ने इस पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

    सवाल यह भी उठता है कि सोरेन ने अपने मंत्रिमंडल से सवर्णों को बाहर क्यों रखा? 2005 से भाजपा के कद्दावर नेता भानु प्रताप शाही को हराकर पहुंचे अनंत प्रताप देव मंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे। लेकिन सवर्णों को किनारे करने की रणनीति ने झारखंड की सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। सोरेन का यह कदम झारखंड की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ रहा है, जहां बहसें सिर्फ पावर के बंटवारे पर नहीं, बल्कि जातीय समीकरणों पर भी केंद्रित हो गई हैं।

    अहम विभागों की बंटवारे की तस्वीर
    हेमंत सोरेन ने कार्मिक, गृह, पथ निर्माण और भवन निर्माण जैसे संवेदनशील विभाग खुद के पास रखे।
    राधा कृष्ण किशोर को वित्त, वाणिज्य कर और संसदीय कार्य सौंपा गया।
    इरफान अंसारी स्वास्थ्य, खाद्य आपूर्ति और आपदा प्रबंधन संभालेंगे।
    रामदास सोरेन के जिम्मे स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग आए।
    दीपिका पांडेय सिंह को ग्रामीण विकास जैसे अहम क्षेत्रीय विभाग मिले।
    शिल्पी नेहा तिर्की को कृषि, पशुपालन और सहकारिता विभाग की जिम्मेदारी दी गई।

    राजनीतिक संकेत और संभावनाएं
    झारखंड के इस नए समीकरण में सवाल यह है कि सोरेन सरकार विपक्ष के सवालों का कैसे जवाब देगी? क्या महिला और सवर्ण प्रतिनिधित्व का यह अभाव उनकी छवि पर असर डालेगा? या फिर यह उनके जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का नतीजा है?

    बहरहाल, नौ नवंबर को विधानसभा का विशेष सत्र इन बहसों को और तेज कर देगा।

  • पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं मंत्री हफीजुल हसन

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ………

    आज हम बात करेंगे झारखंड की राजनीति के उस चेहरे की, जो अपने। मधुपुर की जनता के लिए यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। राजनीति में पिता के साये में पले-बढ़े हफीजुल ने जिस सफर की शुरुआत की, आज वह झारखंड की सत्ता का एक अहम चेहरा हैं।”

    हफीजुल हसन अंसारी, झामुमो के दिवंगत नेता हाजी हुसैन अंसारी के पुत्र हैं। पिता के निधन के बाद, उन्होंने सरकारी नौकरी को छोड़कर राजनीति की ओर रुख किया।

    “चलिए, थोड़ा पीछे चलते हैं। यह कहानी 2020 से शुरू होती है, जब कोरोना के संक्रमण ने झारखंड की सियासत से हाजी हुसैन अंसारी जैसे कद्दावर नेता को छीन लिया। हेमंत सोरेन की कैबिनेट में मंत्री रहे हाजी साहब का  जाना झारखंड के लिए एक बड़ी क्षति थी। लेकिन सवाल उठा कि उनकी खाली हुई जगह को कौन भरेगा?”

    2021 का उपचुनाव आया। मधुपुर विधानसभा की सीट पर झामुमो ने हफीजुल को मौका दिया और उन्होंने न सिर्फ जीत हासिल की, बल्कि यह दिखा दिया कि वे राजनीति में अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलने के लिए तैयार हैं।

    “लेकिन सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं था। सवाल था, क्या वे अपने पिता की तरह जनता के विश्वास पर खरे उतरेंगे? और यहीं से उनके सियासी सफर की असली शुरुआत होती है।”

    बीआईटी सिंदरी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले हफीजुल ने झारखंड राज्य खनिज निगम में बतौर सर्वेयर करियर शुरू किया। लेकिन राजनीति शायद उनके खून में थी। पिता के साथ 1995 से ही साये की तरह रहे हफीजुल ने राजनीति के गुर वहीं सीखे।

    “यह कहना आसान है कि राजनीति विरासत में मिली। लेकिन क्या यह विरासत इतनी आसान थी? हफीजुल ने अपने पिता के अभियान में शामिल होकर जमीनी राजनीति की वो हर बारीकी सीखी, जो सिर्फ किताबों में नहीं मिलती।”

    2021 से लेकर आज तक हफीजुल हसन अंसारी ने मंत्री पद संभाला। चाहे चंपाई सोरेन की कैबिनेट हो, या फिर हेमंत सोरेन की सत्ता वापसी, हर बार उन्होंने अपनी भूमिका निभाई। लेकिन सवाल यह है—क्या मधुपुर की जनता उन्हें सिर्फ अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में देखती है, या उनकी खुद की पहचान भी बन चुकी है?

    “चार भाइयों में सबसे बड़े हफीजुल हसन अंसारी की यह यात्रा सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि एक संघर्ष की है। लेकिन यह संघर्ष अब भी जारी है। राजनीति में जनता का विश्वास जितना कठिन है, उसे बनाए रखना उससे भी कठिन। और यही हफीजुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।”

    “तो क्या वे झारखंड की राजनीति में अपने पिता की तरह कद्दावर नेता बन पाएंगे? या फिर यह कहानी भी सियासत की भूल-भुलैया में खो जाएगी?”

  • मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू हेमंत सोरेन के भरोसेमंद ,आवाम के विश्वास पर खरा उतरना असली कसौटी

    गिरिडीह से परवेज़ आलम की रिपोर्ट …….

    बात झारखंड की राजनीति में उभरते हुए उस चेहरे की, जिसे हेमंत सोरेन के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिना जाता है—सुदिव्य कुमार सोनू । मंत्री पद की शपथ लेने वाले इस नेता का सफर राजनीति की ऊंचाइयों और संघर्षों का दिलचस्प दस्तावेज़ है।”

    गिरिडीह के इस विधायक ने झामुमो के टिकट पर पहली बार 2009 में चुनाव लड़ा। तब छठे स्थान पर रहे। आठ हजार वोट हासिल कर राजनीति में एक छोटे कदम से शुरुआत की। लेकिन यही कदम धीरे-धीरे उस शख्सियत को आकार देने लगे, जिसे आज गिरिडीह की जनता अपने ‘जनप्रतिनिधि’ के रूप में देखती है।

    “पर राजनीति में हर कदम आसान नहीं होता। 2014 में मोदी लहर के बीच वे बीजेपी के विधायक निर्भय कुमार शहबादी से हार गए। लेकिन हार का यह घाव उनकी जिजीविषा को और तीखा कर गया।”

    2019 का चुनाव आया। कहानी बदल गई। सुदिव्य कुमार सोनू ने वही सीट जीती, जहां से 2014 में हारकर लौटे थे। 15 हजार से ज्यादा वोटों से बीजेपी के उसी प्रत्याशी को हराया। यह जीत सिर्फ जीत नहीं थी। यह उस संघर्ष का नतीजा था, जो राजनीति में धैर्य और मेहनत से लिखा गया।

    “गौर करने वाली बात यह है कि सुदिव्य कुमार का ग्राफ हर चुनाव के साथ बढ़ता गया। 2009 में छठा स्थान। 2014 में दूसरे स्थान पर छलांग। और 2019 में विजय। यह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस जमीनी राजनीति का सबूत है, जो धीरे-धीरे जनता के दिलों में जगह बनाती है।”

    हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री बनने वाले सुदिव्य कुमार सोनू का नाम उनकी मुखरता और सियासी सूझबूझ के लिए भी जाना जाता है। विधानसभा में उनकी आवाज़ झामुमो के लिए एक ताकत मानी जाती है। लेकिन राजनीति में सवाल सिर्फ पद का नहीं होता। सवाल यह है कि यह पद जनता के लिए कितना सार्थक साबित होता है।

    “तो क्या गिरिडीह के इस नेता का यह नया कद झारखंड की जनता के सपनों को पूरा करने का जरिया बनेगा? या फिर यह भी सिर्फ सत्ता की सियासत का एक और नाम होगा?”

    शपथ लेने के बाद अब नजरें उनके अगले कदमों पर हैं। गिरिडीह की जनता उनके साथ है। लेकिन राजनीति में जनता का विश्वास सबसे बड़ी चुनौती होती है। इस पर खरा उतरना ही असली कसौटी है।

    “आप सवाल पूछते रहिए। क्योंकि लोकतंत्र की ताकत सवालों में ही है।”

  • मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को मिली हाइ कोर्ट से राहत

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……

    आज की खबर झारखंड की राजनीति के गलियारों से है, जहां की सांस ली। झारखंड हाईकोर्ट ने ईडी के समन को लेकर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित होने के आदेश से अंतरिम राहत दी है।

    अब कहानी की परतें खोलते हैं।
    रांची की एमपी-एमएलए कोर्ट ने 25 नवंबर को हेमंत सोरेन को 4 दिसंबर को कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया था। मामला ईडी की ओर से दाखिल शिकायतवाद का है, जिसमें आरोप लगाया गया कि हेमंत सोरेन ने जमीन घोटाले में पूछताछ के लिए भेजे गए 10 समनों में से केवल दो पर उपस्थिति दर्ज कराई। बाकी बार वह अनुपस्थित रहे।

    इस आदेश के खिलाफ हेमंत सोरेन ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। और वहां, जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की बेंच ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश पर रोक लगा दी। कोर्ट ने ईडी से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 16 दिसंबर को तय की है।

    अब जरा रुकिए। यह केवल एक कानूनी मसला नहीं है। यह एक राजनीतिक कथा भी है।
    ईडी के समन, सीजेएम कोर्ट का आदेश, फिर मामला एमपी-एमएलए कोर्ट में पहुंचना और अब हाईकोर्ट में राहत मिलना—यह सब क्या संकेत देता है? राजनीति और कानून के इस ताने-बाने में, असल मुद्दा जनता के सरोकारों से कहीं छूट तो नहीं गया?

    हेमंत सोरेन के खिलाफ 19 फरवरी 2024 को शिकायत दर्ज की गई थी। ईडी का आरोप है कि जमीन घोटाले में उनका नाम सामने आया है। समन पर अनुपस्थिति को पीएमएलए की धारा 63 और आईपीसी की धारा 174 के तहत गैरकानूनी बताया गया। लेकिन, यह भी देखना होगा कि क्या यह मामला केवल कानून का पालन न करने का है, या इसके पीछे कोई और कहानी छुपी है?

    राजनीति और कानून के इस खेल में हमेशा सवाल उठते हैं।
    क्या हेमंत सोरेन को दी गई यह राहत उनकी स्थायी सुरक्षा की गारंटी है, या सिर्फ कुछ समय के लिए मिली राजनीतिक सांस? ईडी का अगला कदम क्या होगा? और 16 दिसंबर को अदालत का रुख क्या होगा?

    जब एक मुख्यमंत्री को अदालत में हाजिर होने से राहत मिलती है, तो यह सिर्फ एक कानूनी खबर नहीं होती। यह लोकतंत्र की बारीकियों को समझने का मौका भी होता है।