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  • झारखंड, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में ईडी की बड़ी कार्रवाई, 21 ठिकानों पर छापेमारी

    परवेज़ आलम

    प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शुक्रवार को झारखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 21 स्थानों पर एक साथ छापेमारी कर तहलका मचा दिया। सूत्रों के अनुसार, इस छापेमारी का मुख्य उद्देश्य मेडिकल सेक्टर में हो रहे कथित भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग को उजागर करना है। यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत की गई।

    ईडी के अभियान में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी

    संघीय जांच एजेंसी ने इस छापेमारी के दौरान केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की सुरक्षा के साथ कई ठिकानों की तलाशी ली। अधिकारियों के अनुसार, यह छापेमारी आयुष्मान भारत योजना से जुड़े एक बड़े घोटाले की जांच का हिस्सा है। ईडी की टीमों ने रांची, जमशेदपुर और कोलकाता सहित कई बड़े शहरों में छानबीन की।

    विधायक सरयू राय का समर्थन

    झारखंड के जमशेदपुर पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र के विधायक सरयू राय ने इस कार्रवाई का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि वह लंबे समय से इस घोटाले की जांच की मांग कर रहे थे और अब ईडी के कदम से संतोष महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य विभाग में पिछले पांच वर्षों में जो अनियमितताएं हुई हैं, उनकी गहराई तक जांच होनी चाहिए।

    हवाला डीलरों के ठिकानों पर भी छापेमारी

    सूत्रों की मानें तो झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी (JSAS) से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के ठिकानों के साथ-साथ कई थर्ड-पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (TPA) कंपनियों जैसे ‘एमडी इंडिया’, ‘सेफवे’ और ‘मेडी असिस्ट’ पर भी छापेमारी की गई। इसके अलावा, कोलकाता में हवाला डीलरों के कुछ ठिकानों पर भी ईडी की टीम पहुंची।

    रांची में कई स्थानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी

    ईडी की टीमों ने झारखंड की राजधानी रांची के अशोक नगर, पीपी कंपाउंड, एदलहातू, बरियातू, लालपुर और चिरौंदी जैसे इलाकों में छापेमारी की। इसके अतिरिक्त, जमशेदपुर के राष्ट्रीय राजमार्ग-33 के किनारे स्थित मैंगो क्षेत्र में एक घर और एक नर्सिंग होम की तलाशी ली गई।

    सीएजी रिपोर्ट के बाद ईडी की जांच तेज

    आयुष्मान भारत योजना में कथित अनियमितताओं की जांच भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के आधार पर की जा रही है। सीएजी की रिपोर्ट संसद में पेश होने के बाद ईडी ने इसे संज्ञान में लिया और प्रारंभिक जांच रिपोर्ट (ECIR) दर्ज की। इसके बाद, स्वास्थ्य विभाग और झारखंड स्टेट हेल्थ सोसायटी से इस योजना में हुए घोटालों पर स्पष्टीकरण मांगा गया।

    फर्जी दावों के जरिए करोड़ों रुपये की हेराफेरी

    ईडी को संदेह है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत अस्पतालों के पैनल में फर्जीवाड़ा किया गया और फर्जी दावों के माध्यम से बड़े पैमाने पर धनशोधन हुआ। इस योजना के तहत भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के गठजोड़ के जरिए अवैध रूप से धन अर्जित किया गया। गौरतलब है कि यह योजना केंद्र सरकार की एक प्रमुख स्वास्थ्य योजना है, जिसका उद्देश्य देशभर के नागरिकों को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करना है।

    ईडी की छापेमारी से कई बड़े नामों पर गिरेगी गाज?

    ईडी की कार्रवाई के बाद कई बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि ईडी की टीमें सुबह 4 बजे से ही विभिन्न स्थानों पर सक्रिय थीं। बरियातू रोड स्थित श्यामा इनक्लेव, राधा गोविंद अपार्टमेंट, मोहराबादी स्थित बुधिया एजेंसी, सिंदुवार के ललिता ऑर्किड और अरविंद मार्क के रश्मि इनक्लेव सहित कई स्थानों पर छापेमारी की गई।

    फिलहाल, इस मामले में बन्ना गुप्ता या उनके निजी सचिव की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ईडी अपनी जांच को और आगे बढ़ा रही है और जल्द ही और बड़े नामों के सामने आने की संभावना है।

     

  • स्वास्थ्य विभाग में वेतन और EPF गड़बड़ी पर JLKM करेगा आंदोलन

    तीन चरणों में होगा विरोध प्रदर्शन

    रिपोर्ट  सुदर्शन

    गिरिडीह: स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मियों को वेतन कटौती और भविष्य निधि (EPF) में अनियमितताओं का सामना करना पड़ रहा है। लंबे समय से चली आ रही इस समस्या को लेकर पहले भी कई बार आवाज़ उठाई गई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला। अब झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) ने एक बार फिर सरकार और प्रशासन के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया है।

    JLKM ने किया प्रशासन को आगाह

    JLKM के केंद्रीय सचिव नागेंद्र चंद्रवंशी ने जानकारी देते हुए बताया कि गिरिडीह स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत कर्मचारियों को वेतन में कटौती और EPF में गड़बड़ी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस संबंध में 18 जनवरी 2025 को संगठन ने गिरिडीह के उपायुक्त (DC), झारखंड सरकार के स्वास्थ्य मंत्री और मुख्य सचिव को ज्ञापन सौंपा था, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इससे कर्मचारियों में भारी आक्रोश है।

    तीन चरणों में होगा आंदोलन

    JLKM ने सरकार को चेतावनी देते हुए तीन चरणों में आंदोलन करने का निर्णय लिया है—

    1. 24 मार्च 2025 – सभी आउटसोर्सिंग कर्मचारी काला बिल्ला लगाकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करेंगे। यह कदम सरकार और प्रशासन को चेतावनी देने के लिए उठाया जाएगा।
    2. 2 अप्रैल 2025 – प्रशासन की निष्क्रियता के खिलाफ मशाल जुलूस निकाला जाएगा। यह जुलूस गिरिडीह शहर के विभिन्न इलाकों से गुजरते हुए जिला प्रशासन पर दबाव बनाएगा।
    3. 7 अप्रैल 2025 – यदि सरकार अब भी निष्क्रिय रही, तो जिला मुख्यालय के सामने विशाल धरना प्रदर्शन किया जाएगा, जिसमें जिले भर के आउटसोर्सिंग कर्मचारी शामिल होंगे।

    JLKM ने दी कड़ी चेतावनी

    नागेंद्र चंद्रवंशी ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि कर्मचारियों की वेतन और EPF से जुड़ी समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं किया गया, तो आंदोलन को और तेज़ किया जाएगा। उन्होंने प्रशासन को आगाह किया कि अभी तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन यदि मांगे नहीं मानी गईं, तो आंदोलन उग्र रूप ले सकता है।

    कर्मचारियों में गहरी नाराजगी, परिवारों पर असर

    आउटसोर्सिंग कर्मियों का कहना है कि वेतन में कटौती और EPF गड़बड़ी के कारण उनके जीवन-यापन में कठिनाई हो रही है। उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है, यहां तक कि बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है। कई कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला है, जिससे उनके सामने रोज़मर्रा की जरूरतों को पूरा करने का संकट खड़ा हो गया है।

    प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

    JLKM ने सवाल उठाया है कि अब तक सरकार और प्रशासन इस गंभीर समस्या पर चुप क्यों है? आखिर गरीब कर्मचारियों को उनका हक़ क्यों नहीं मिल रहा? सरकार की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया न आने के कारण नाराजगी और बढ़ गई है।

    आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श जारी

    JLKM के कार्यकर्ता और प्रभावित कर्मचारी लगातार बैठकें कर रहे हैं और भविष्य की रणनीति तैयार कर रहे हैं। यदि सरकार और प्रशासन अब भी निष्क्रिय रहे, तो आंदोलन को और बड़े स्तर पर ले जाने की योजना बनाई जा रही है।

    अब देखना यह होगा कि सरकार इस मामले को गंभीरता से लेकर उचित कदम उठाती है या फिर कर्मचारियों को अपना हक़ पाने के लिए उग्र आंदोलन करना पड़ेगा।

     

  • घोड़थम्भा : हिंसक झड़प के बाद अब स्थिति पूरी तरह सामान्य

    झारखंड के गिरिडीह जिले के घोड़थम्भा में होली  के दिन हुई हिंसक झड़प  के बाद अब स्थिति पूरी तरह  सामान्य है  । इलाके मे  पुलिस का कडा पहरा है ।  गिरिडीह एसपी डॉ. विमल कुमार खुद मौके पर मौजूद रह कर  माहौल को पुरसकुन बनाने मे लगे है ।  एसपी ने बताया कि पुलिस घटना को अंजाम देने वाले उपद्रवियों की पहचान कर रही है और उन्हें जल्द ही गिरफ्तार किया जाएगा । उपद्रवियों की पहचान  के लिए सीसीटीवी फुटेज को खंगाला जा रहा है । इलाके मे पुलिस की निगरानी बढ़ा दी गई है। पुलिस-प्रशासन की ओर से काफी मशक्कत के बाद स्थिति को नियंत्रण में किया जा सका। इस दौरान एसपी ने कहा कि किसी भी सूरत में शांति भंग करने वाले लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा स्थिति पूरी पुलिस प्रशासन के काबू में है। उन्होंने लोगों से अफवाह पर ध्यान न देने की अपील की है। इधर डीडीसी स्मिता कुमारी ने बताया कि कुछ अज्ञात लोगों ने व्यवस्था ख़राब करने करने की कोशिश की थी, लेकिन अब सब कुछ सामान्य है। उन्होंने कहा, “कुछ दुकानों को जलाया गया है. कुछ बाइक और वाहनों में भी आग लगाई गई है. इसके पीछे जो भी वजह है, उसकी जांच की जा रही है.।

    गौरतलब है  कि होली के दिन दो पक्षों के  बीच गिरिडीह के घोड़थम्भा में विवाद ने हिंसक रूप ले लिया था  जिसके बाद पथराव और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। उपद्रवियों ने दुकानों और वाहनों में आग लगा दी, जिससे क्षेत्र में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी

    घटना की जानकारी मिलते ही गिरिडीह एसपी डॉ. विमल कुमार के नेतृत्व में खोरीमहुआ एसडीपीओ राजेंद्र प्रसाद सहित कई पुलिस थानों की टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने काफी मशक्कत के बाद हालात पर काबू पाया और उपद्रवियों को खदेड़ा। पूरे इलाके में भारी पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है और अन्य थाना क्षेत्रों को भी अलर्ट किया गया है।

    प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, यह विवाद होली के जुलूस के दौरान भड़का। जुलूस में डीजे  बजाने को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हुई, जो जल्द ही हिंसक झड़प में बदल गई। इसके बाद उपद्रवियों ने पथराव किया और दुकानों एवं वाहनों को आग के हवाले कर दिया।

    इस घटना पर सियासी बयानबाजी भी शुरू हो गई है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने प्रशासन और सरकार को विफल करार देते हुए कहा कि त्योहारों के दौरान हिंसा एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है। उन्होंने राज्य सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया।

    इधर जेएमएम के वरिष्ठ नेता इरशाद अहमद वारिस ने कहा कि कुछ शरारती तत्व हेमंत सरकार को  बदनाम करने के लिए पर्व की  आड़ ले कर माहौल खराब करने का प्रयास करते  है । उन्होने कहा कि हेमन्त 02 की सरकार ऐसे तत्वों से निबटना जानती है । उन्होने  पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच  की मांग करते हुये कहा कि दोषी बक्से न जाएं पर निर्दोष पर झूठे मुकदमे नही हो, पुलिस प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए ।

     

  • झारखंड मुक्ति मोर्चा में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना !

    -परवेज़ आलम 

    जेएमएम के 13वें केंद्रीय महाधिवेशन मे झारखंड मुक्ति मोर्चा के  नेतृत्व परिवर्तन के कयास लगाए जा रहे हैं ।  विधायक कल्पना मूर्मु सोरेन व पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष शिबू सोरेन की पुत्र वधू  को पार्टी में केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष  या महासचिव जैसे बड़े पद दिए जा सकते हैं । यह कदम पार्टी के संगठन को और धारदार बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इसके अलावा, केंद्रीय अध्यक्ष का चुनाव भी होगा, और पार्टी सूत्रों के अनुसार, शिबू सोरेन को एक बार फिर अध्यक्ष चुने जाने की संभावना है।

    झारखंड मुक्ति मोर्चा झारखंड राज्य में एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी है, और अपने 13वें केंद्रीय महाधिवेशन की तैयारी में जुटा है। यह अधिवेसन 14-15 अप्रैल 2025 को रांची में आयोजित होगा, जो पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। झमुमो, जिसकी स्थापना 1972 में हुई थी, ने झारखंड को बिहार से अलग राज्य बनाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया और 2000 में इस लक्ष्य को प्राप्त किया। पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष शिबू सोरेन हैं, और कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन, जो वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री भी हैं, हैं।

    आयोजन की विस्तृत जानकारी

    महाधिवेशन का आयोजन रांची के खेलगांव स्थित इन्डोर स्टेडियम में होगा, और इसका प्रारम्भ 14 अप्रैल को, जो डॉ. भीमराव अम्बेकर के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है, पर होगा। यह दो-दिवसीय अधिवेसन 15 अप्रैल को समाप्त होगा।

    प्रतिनिधियों का विवरण

    महाधिवेशन में करीब 3900 प्रतिभागी भाग लेंगे, जो झारखंड के अलावा बिहार, प. बंगाल, ओडिशा, असम और तमिलनाडु जैसे अन्य प्रदेशों से आएंगे। इन प्रदेशों में झममो की सांगठनिक इकाइयां हैं, जो इस विस्तार को दर्शाती हैं। इसके अलावा, अंडमान-निकोबार से भी अतिथि के रूप में प्रतिभागी शामिल होंगे, जो इस महाधिवेशन को और अधिक व्यापक बनाता है।

    रजिस्ट्रेशन और तैयारी

    प्रतिभागियों का रजिस्ट्रेशन अप्रैल के पहले सप्ताह में शुरू होगा, ताकि व्यवस्था बनाने में आसानी हो। सदस्यता अभियान 31 मार्च 2025 तक चलेगा, और इसके बाद संगठन की इकाइयों का गठन होगा। यह प्रक्रिया पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर पर पूरी करने में करीब 30-35 दिन लगेंगे। अधिवेसन से पहले, 16 जनवरी 2025 से ही राज्य में पंचायत से लेकर जिला स्तर की कमेटियां भंग की जा चुकी हैं।

    चर्चा के मुख्य मुद्दे

    महाधिवेशन में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होगी, जिसमें पार्टी की भविष्य की रणनीतियां शामिल हैं। विशेष रूप से, बिहार और प. बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति बनाई जाएगी, क्योंकि पार्टी इन दोनों राज्यों में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहती है। इसके अलावा, देश की आर्थिक स्थिति, जो पार्टी के अनुसार खस्ताहाल है, और केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना भी की जाएगी। पार्टी अगले तीन वर्षों के लिए अपनी कार्य-योजना भी प्रस्तुत करेगी।

    मणिपुर और असम के आदिवासियों के हित से जुड़े मुद्दे भी चर्चा का हिस्सा होंगे, जिसमें हेमंत सोरेन की नेतृत्व क्षमता को रेखांकित किया जाएगा। हेमंत सोरेन को देश के आदिवासी समाज के लिए एक उम्मीद की किरण माना जाता है, खासकर उनके तानाशाही के खिलाफ संघर्ष के लिए।

    संगठनात्मक परिवर्तन और लक्ष्य

    महाधिवेशन में केंद्रीय समिति भंग की जाएगी, और संचालन मंडली व अध्यक्ष मंडली का गठन होगा। सदस्यता अभियान का लक्ष्य 60 लाख सदस्य बनाना है, जो पिछले 50 लाख के लक्ष्य से अधिक है। यह अभियान अब अपने अंतिम चरण में है, और इसके बाद संगठन पंचायत, प्रखंड और जिला कमेटियों के गठन में जुट जाएगा।

    ऐतिहासिक संदर्भ

    यह अधिवेसन 2021 के 12वें केंद्रीय महाधिवेसन से अलग है, जो कोविड-19 महामारी के कारण केवल एक दिन के लिए और 500 से कम प्रतिभागियों के साथ आयोजित हुआ था। इस बार, यह तीन दिनों तक चलेगा, और सात से आठ राज्यों के प्रतिभागी शामिल होंगे, जो इसकी व्यापकता को दर्शाता है।

    तालिका: अधिवेशन के मुख्य बिंदु

    राजनीतिक दल अधिवेशन मे पार्टी की रणनीति और भविष्य की दिशा तय करते है

    राजनीतिक दलों के केंद्रीय अधिवेशन किसी भी संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर होते हैं, जहां नीतिगत फैसलों से लेकर नेतृत्व के चुनाव तक, विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जाती है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के हालिया अधिवेशन में भी यही देखा गया, जहां पार्टी ने केंद्रीय नीतियों का विरोध करने से लेकर आगामी चुनावों की रणनीति तक कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए।

    नीतिगत चर्चा और विरोध के प्रस्ताव

    जेएमएम ने अपने अधिवेशन से पहले कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए, जिनमें जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा और राज्य के विकास से जुड़े मुद्दों पर विशेष जोर दिया गया। पार्टी ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), समान नागरिक संहिता (UCC) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को खारिज करने का प्रस्ताव पारित किया, जिसकी संपुष्टि इसी अधिवेशन मे होनी है  । यह निर्णय झारखंड जैसे राज्यों में जनजातीय समुदायों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की दिशा में पार्टी की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

    नेतृत्व चुनाव और निरंतरता

    राजनीतिक दलों के अधिवेशन नेतृत्व परिवर्तन और पुनर्निर्वाचन के लिए भी जाने जाते हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा में नेतृत्व की निरंतरता देखने को मिली, जब 2021 में शिबू सोरेन को लगातार 10वीं बार पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुना गया। उनके पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कार्यकारी अध्यक्ष बने रहे। यह नेतृत्व की स्थिरता और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे की मजबूती को दर्शाता है।

    पार्टी कार्यकर्ताओं का एकीकरण

    अधिवेशन का एक प्रमुख उद्देश्य झारखंड के साथ-साथ बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे पड़ोसी राज्यों में पार्टी कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाना है । यह केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि इससे कार्यकर्ताओं के बीच संवाद और समन्वय को भी बल मिला।

    अधिवेशन आयोजित करने के प्रमुख कारण

    राजनीतिक दल समय-समय पर अधिवेशन आयोजित करते हैं, जिससे संगठनात्मक जरूरतों और बाहरी राजनीतिक चुनौतियों का समाधान निकाला जा सके।

    • आंतरिक संगठनात्मक आवश्यकताएँ: नेतृत्व परिवर्तन, नीति अद्यतन और पार्टी के भीतर संरचनात्मक बदलाव।
    • बाहरी राजनीतिक चुनौतियाँ: केंद्रीय सरकार की नीतियों के विरोध में रणनीति बनाना, जैसे कि भूमि अधिकारों से संबंधित मुद्दे।
    • संगठनात्मक मजबूती: कार्यकर्ताओं को संगठित करना, सदस्यता बढ़ाना और पार्टी की पकड़ को मजबूत करना।

    अधिवेशन के आयोजक और प्रमुख प्रतिनिधि

    झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा अधिवेशन का आयोजन किया जाता है, जिसमें पार्टी के अध्यक्ष, महासचिव और जिला एवं राज्य स्तरीय समितियाँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं। प्रतिभागियों में सांसद, विधायक, मंत्री और प्रमुख कार्यकर्ता शामिल होते हैं। 13वें अधिवेशन के लिए भी यह योजना बनाई गई है  कि इसमें विभिन्न राज्यों से प्रतिनिधियों की भागीदारी होगी।

    नेतृत्व की स्थिरता और पार्टी का भविष्य

    जेएमएम जैसे क्षेत्रीय दलों में नेतृत्व की निरंतरता एक महत्वपूर्ण विषय है। शिबू सोरेन 1997 से अध्यक्ष बने हुए हैं और 2021 में 10वीं बार पुनर्निर्वाचित हुए, जिससे पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व पर उनकी पकड़ साफ दिखाई देती है। यह नेतृत्व परिवर्तन के उस प्रवृत्ति से भिन्न है जो अन्य कई क्षेत्रीय दलों में देखी जाती है। साथ ही, हेमंत सोरेन की भूमिका पार्टी की उत्तराधिकार योजना की ओर भी संकेत करती है।

    झामुमो का गठन और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

    झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना 19वीं सदी के महान आदिवासी योद्धा बिरसा मुंडा की जयंती पर हुई थी। बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था, और उनकी याद में झारखंड राज्य का गठन भी 15 नवंबर 2000 को किया गया। पार्टी के प्रमुख संस्थापकों में बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन और कॉमरेड डॉ. एके रॉय शामिल थे। 4 फरवरी 1972 को पार्टी का औपचारिक संगठन किया गया, जिसमें बिनोद बिहारी महतो को अध्यक्ष और शिबू सोरेन को महासचिव बनाया गया। प्रारंभिक दौर में पार्टी ने आदिवासी, दलित और अन्य पिछड़े समुदायों के औद्योगिक एवं खनन श्रमिकों को अपने साथ जोड़ा।

    झामुमो का राजनीतिक संघर्ष और विकास

    झामुमो का प्रारंभिक दौर संघर्षों से भरा रहा। पार्टी ने औद्योगिक और खनन क्षेत्रों में काम करने वाले आदिवासियों और दलितों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। इस बीच, शिबू सोरेन के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से नज़दीकियों के कारण पार्टी में असंतोष पनपा और इसके कुछ युवा नेताओं ने ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) का गठन किया। 1980 में, झामुमो नेता बिनोद बिहारी महतो ने कांग्रेस के साथ गठबंधन के विरोध में “झामुमो (बी)” नामक एक अलग गुट बनाया। हालांकि, 1990 में यह गुट वापस झामुमो में शामिल हो गया। 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद पार्टी में उथल-पुथल मची, लेकिन राम दयाल मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी संगठनों को एकजुट कर झारखंड अलग राज्य की मांग को फिर से गति दी गई। 1988-89 में झामुमो और आजसू ने मिलकर कई आर्थिक नाकाबंदियां और आंदोलन किए, जिससे राज्य निर्माण की मांग को मजबूती मिली।

    झारखंड राज्य का गठन और झामुमो की भूमिका 

    2000 में बिहार विधानसभा ने झारखंड राज्य निर्माण के लिए विधेयक पारित किया और 15 नवंबर 2000 को झारखंड भारत का 28वां राज्य बना। इसके बाद झामुमो ने कई राजनीतिक गठबंधन किए और सत्ता में अपनी जगह बनाई। 2005 में झामुमो के नेता शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत न होने के कारण जल्द ही इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि, उन्होंने तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा, मनमोहन सिंह सरकार में वे कोयला मंत्री भी रहे। हेमंत सोरेन ने 13 जुलाई 2013 को झारखंड के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 2019 में एक बार फिर झामुमो ने बहुमत हासिल किया और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।

    झारखंड मुक्ति मोर्चा का सफर संघर्ष, सत्ता और समझौतों से भरा रहा है। आदिवासी और श्रमिक हितों की रक्षा से शुरू हुआ यह आंदोलन अब राज्य की सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। झामुमो ने झारखंड राज्य निर्माण में अहम भूमिका निभाई और आज भी राज्य की राजनीति में इसकी गहरी पकड़ बनी हुई है।

    Key Points

    -झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की 13वीं केंद्रीय महाधिवेशन 14-15 अप्रैल 2025 को रांची में आयोजित होगा, जिसमें नेतृत्व परिवर्तन की संभावना है।

    – शिबू सोरेन को फिर से अध्यक्ष चुने जाने की संभावना है, जबकि कल्पना मूर्मु सोरेन को केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष या महासचिव जैसे बड़े पद दिए जा सकते हैं।

    – यह परिवर्तन पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने और युवा नेतृत्व को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम हो सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

     

     

  • झारखंड की राजनीति में बड़ा उलटफेर: बाबूलाल मरांडी बने नेता प्रतिपक्ष

    -परवेज़ आलम

    ………आखिरकार  इंतजार खत्म हुआ। चार महीने की राजनीतिक उथल-पुथल, अटकलों का बाजार, गुप्त बैठकों और सियासी कयासों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में बड़ा फैसला ले लिया है। पार्टी ने अनुभवी नेता और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को विधायक दल का नेता चुन लिया है। यानी अब वह झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाएंगे।

    चार महीने की देरी: भाजपा की रणनीति या आंतरिक असमंजस?

    झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही भाजपा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी। इस पद के लिए कई दिग्गज नेताओं के नाम सामने आए, जिनमें नवीन जायसवाल, नीरा यादव, और सीपी सिंह  का नाम प्रमुख था। लेकिन आखिरकार बाजी बाबूलाल मरांडी के हाथ लगी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इस निर्णय पर मुहर लगा दी। पर्यवेक्षक भूपेंद्र यादव ने विधायकों से चर्चा की । पर्यवेक्षक भूपेन्द्र यादव ने कहा कि विधायकों ने सर्वसम्मति से बाबूलाल मरांडी को नेता चुना है। नवीन जायसवाल,नीरा यादव, राज सिन्हा ने इसके लिए प्रस्ताव रखा। इसे सभी विधायकों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।और सर्वसम्मति से मरांडी को नेता चुने जाने की घोषणा की।

    लेकिन सवाल यह उठता है कि यह फैसला आने में चार महीने क्यों लगे? क्या भाजपा के भीतर मतभेद थे, या फिर यह किसी रणनीति का हिस्सा था? पार्टी सूत्रों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व शुरू से ही मरांडी को लेकर स्पष्ट था, लेकिन सत्ता संतुलन साधने के लिए समय लिया गया और जब आखिरी फैसला हुआ, तो अनुभव और कद को ध्यान में रखते हुए बाबूलाल मरांडी के नाम पर मुहर लगी।

     

     

    बता दें कि छठी विधानसभा के गठन के बाद से भाजपा विधायक दल के पास नेता नहीं था। भाजपा विधायक दल के नेता ही नेता प्रतिपक्ष होंगे। इस तरह से बाबूलाल मरांडी झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होंगे। वे अभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं।

    मरांडी की प्रतिक्रिया: पीएम मोदी के सपने को साकार करने की प्रतिबद्धता

    नेता प्रतिपक्ष चुने जाने के बाद बाबूलाल मरांडी ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत का जो संकल्प लिया है, उसे पूरा करने में हम भी अपना योगदान देंगे। झारखंड के लोगों की सेवा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हम पूरी ताकत से काम करेंगे।”

    भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद से जल्द देंगे इस्तीफा

    बाबूलाल मरांडी इस समय झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। अब जब वे नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, तो जल्द ही प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर संगठन में नए अध्यक्ष की नियुक्ति का रास्ता साफ करेंगे। भाजपा नेतृत्व अब इस पर फैसला करेगा कि झारखंड में संगठन की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए।

    बाबू लाल मरंडी की झारखंड की  राजनीति मे वापसी 

    बाबूलाल मरांडी की राजनीति कभी भाजपा तो कभी अलग राह पकड़ती रही। लेकिन यह भी सच है कि वह एक मजबूत जननेता के रूप में उभरे हैं। 2006 में उन्होंने भाजपा से अलग होकर झारखंड विकास मोर्चा बनाया, लेकिन 2020 में दोबारा भाजपा में वापसी कर ली।

    उनका सियासी कद केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहा। वाजपेयी सरकार में उन्होंने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में राज्य मंत्री की भूमिका भी निभाई।

    बाबूलाल मरांडी: झारखंड की राजनीति का बड़ा नाम

    बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं और झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे हैं। उन्होंने हमेशा से प्रदेश की राजनीति में एक अहम भूमिका निभाई है। आइए, उनके राजनीतिक सफर पर एक नजर डालते हैं:

    • जन्म और शिक्षा: 11 जनवरी 1958 को गिरिडीह जिले के कोदईबांक गांव में जन्मे बाबूलाल मरांडी ने रांची विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर किया है।
    • संघ से जुड़ाव: पढ़ाई के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए और बाद में झारखंड क्षेत्र के विश्व हिंदू परिषद (VHP) का संगठन सचिव बने।
    • मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल: 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन के बाद वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने और 17 मार्च 2003 तक इस पद पर रहे।
    • झारखंड विकास मोर्चा की स्थापना: 2006 में भाजपा से अलग होकर उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) की स्थापना की। हालांकि, 2020 में उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया।
    • लोकसभा में भूमिका: वे 12वीं, 13वीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा में सांसद रह चुके हैं। 1998 से 2000 के बीच एनडीए सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय) भी रहे।
    • विधानसभा में वापसी: 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने धनवार सीट से जीत दर्ज की और फिर से झारखंड विधानसभा में सक्रिय हो गए।

    नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारी

    अब जब बाबूलाल मरांडी झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। आइए, जानते हैं कि विपक्ष के नेता के रूप में उनकी प्रमुख भूमिकाएं क्या होंगी:

    1. विपक्ष का नेतृत्व: सभी विपक्षी दलों को एकजुट करना और उनकी आवाज को विधानसभा में मजबूती से उठाना।
    2. सरकार की नीतियों पर नजर: सरकार के फैसलों की समीक्षा करना और जनता के हितों के खिलाफ नीतियों का विरोध करना।
    3. विधानसभा में प्रभावी बहस: सदन में सरकार को जवाबदेह ठहराना और बहस के दौरान ठोस तर्क प्रस्तुत करना।
    4. जनता की समस्याओं पर ध्यान: जनता की समस्याओं को विधानसभा में उठाना और सरकार से समाधान की मांग करना।
    5. सरकार की जवाबदेही तय करना: किसी भी गलत फैसले या नीतिगत चूक पर सरकार से सवाल पूछना और उसे जवाबदेह ठहराना।

    भाजपा की आगे की रणनीति?

    अब जब भाजपा ने झारखंड में नेता प्रतिपक्ष का चयन कर लिया है, तो पार्टी की अगली रणनीति सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्ष खड़ा करने की होगी। झारखंड में भाजपा अब आगामी चुनावों के लिए जमीन तैयार करेगी और हेमंत सोरेन सरकार को घेरने की योजना बनाएगी।

    बाबूलाल मरांडी का झारखंड की राजनीति में कद काफी बड़ा है। उन्होंने मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और प्रदेश अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर काम किया है। अब नेता प्रतिपक्ष के रूप में वे झारखंड में भाजपा के लिए एक मजबूत चेहरा होंगे। भाजपा की रणनीति, झारखंड की राजनीति और विधानसभा में उनकी भूमिका पर सभी की नजरें टिकी होंगी। देखना दिलचस्प होगा कि वे विपक्ष की भूमिका को कितनी मजबूती से निभाते हैं और सरकार को कितनी कड़ी चुनौती देते हैं।

     

  • केंद्र सरकार झारखंड का हक नहीं देगी , तो राज्य की कोयला खदानें बंद कर दूंगा – सीएम हेमंत

    एक छटाक भी खनिज झारखंड से बाहर नहीं जाने दूंगा-हेमंत सोरेन 

    परवेज़ आलम

    झारखंड की सियासत में एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकार की तलवारें खिंच गई हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंगलवार को गिरिडीह में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के 52वें स्थापना दिवस पर केंद्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया और 1.36 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि की मांग को लेकर सख्त लहजे में चेतावनी दे डाली।

    दिल्ली बनाम झारखंड: सौतेला व्यवहार का आरोप

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंच से साफ कहा कि अगर केंद्र सरकार झारखंड का हक नहीं देती है, तो राज्य की खदानें बंद कर दी जाएंगी। एक छटाक भी खनिज राज्य से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा। यह कोई सामान्य बयान नहीं, बल्कि एक बड़े संघर्ष की शुरुआत का ऐलान था। झारखंड खनिज संपदाओं से भरपूर है, लेकिन इसके बावजूद आर्थिक असमानता और सरकारी फंडिंग में भेदभाव की बातें लंबे समय से उठती रही हैं। हेमंत सोरेन ने कहा कि राज्य की आर्थिक बदहाली के लिए पिछली सरकार जिम्मेदार है, लेकिन अब विकास की रफ्तार पकड़ ली गई है।

    अबुआ आवास योजना: जब दिल्ली ने पीठ फेर ली तो…

    झारखंड में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत राज्य को राशि नहीं मिली, जिससे मजबूरन राज्य सरकार को अपनी योजना शुरू करनी पड़ी। हेमंत सोरेन की सरकार ने अबुआ आवास योजना लॉन्च की, जिससे गरीबों को अपने सिर पर छत नसीब हो सके। यह योजना बताती है कि राज्य सरकार अपने संसाधनों के बलबूते भी जनता को राहत देने को तैयार है। लेकिन यह भी एक हकीकत है कि केंद्रीय सहायता के बिना किसी भी राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो सकती।

    नीति आयोग की रिपोर्ट: झारखंड की नई उड़ान

    हेमंत सोरेन ने कहा कि नीति आयोग भी यह मान रहा है कि झारखंड देश के चार सबसे तेजी से विकास करने वाले राज्यों में से एक है। यह बयान विपक्षी दलों को नागवार गुजर रहा है, क्योंकि झारखंड की यह छवि उनके राजनीतिक एजेंडे में फिट नहीं बैठती। मुख्यमंत्री का यह दावा एक उम्मीद जगाता है कि अगर सही दिशा में योजनाओं का क्रियान्वयन हुआ, तो राज्य गरीबी और पिछड़ेपन के धब्बे से उबर सकता है।

    मंईयां योजना पर फर्जीवाड़े का सवाल

    महिलाओं के लिए शुरू की गई ‘मंईयां सम्मान योजना’ का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ लोग फर्जी तरीके से इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। पुरुषों द्वारा महिलाओं के नाम पर पैसा निकालने की खबरें सामने आई हैं। यह सवाल वाकई गंभीर है कि क्या राज्य की योजनाएं उन्हीं लोगों के हाथ में जा रही हैं, जिनके लिए वे बनाई गई हैं? मुख्यमंत्री ने इसे रोकने की बात कही और भ्रष्टाचार पर सख्ती बरतने की चेतावनी दी।

    महिलाओं के विकास के लिए आधा बजट

    महिलाओं की आर्थिक मजबूती के लिए झारखंड सरकार आधे बजट का इस्तेमाल कर रही है। मंईयां सम्मान योजना को 1000 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये किया गया। लेकिन इस योजना में फर्जीवाड़े की खबरों ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या सरकार की योजनाओं का असल लाभ जनता तक पहुंच रहा है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जब-जब सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी होती है, तो इसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।

    झारखंड बनाम केंद्र: कोयले की राजनीति

    झारखंड की अर्थव्यवस्था में कोयले का बड़ा योगदान है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चेतावनी दी कि अगर राज्य को 1.36 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि नहीं दी गई, तो कोयले की खदानें बंद कर दी जाएंगी। यह चेतावनी सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक बड़े संघर्ष का संकेत है। झारखंड की खदानें देशभर में ऊर्जा की आपूर्ति करती हैं। अगर यहां उत्पादन रोका गया, तो इसका असर पूरे देश पर पड़ सकता है।

    गांवों से चलेगी सरकार

    हेमंत सोरेन ने कहा कि उनकी सरकार सिर्फ रांची से नहीं, बल्कि गांवों से भी चलेगी। उन्होंने पंचायतों और गांवों में जाकर समस्याओं के समाधान की बात कही। जाति, आय और निवासी प्रमाण पत्र अब पंचायत स्तर पर ही बनने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इससे गांव के लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से राहत मिलेगी।

    कल्पना सोरेन की भावनात्मक अपील

    जेएमएम स्थापना दिवस समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन भी शामिल हुईं। उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए भावुक होकर कहा कि जब हेमंत सोरेन जेल में थे, तब झारखंड की जनता ने उनके परिवार को सहारा दिया। कल्पना सोरेन ने कहा कि झारखंड की जनता ने उन्हें बहू नहीं, बल्कि बेटी की तरह अपनाया। यह बयान राजनीतिक रूप से भी अहम था, क्योंकि इससे झामुमो कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसके पूर्व झामुमो गिरिडीह जिला कमिटी की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के सर पर ताज पहनाकर एवं भारी भरकम फूलों का माला पहना दोनों का भव्य स्वागत किया गया। वहीं पार्टी के 52वें जन्मदिन के अवसर पर केक भी काटा गया। बाद में दोनों ने शहीदों के वेदी पर माल्यार्पण किया।

    कल्पना मुर्मू सोरेन ने राजनीतिक जीवन की पहली वर्षगांठ  मनाई

    इंडिया गठबंधन की स्टार प्रचारक और झारखंड मुक्ति मोर्चा की नेत्री कल्पना मुर्मू सोरेन 4 मार्च 2024 को गिरिडीह मे ही पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की थी. गिरिडीह के ऐहतिहासिक झंडा मैदान में पार्टी के  स्थापना दिवस समारोह मे  कल्पना सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा का दामन थामा था. यहां पर पार्टी की विधिवत सदस्यता लेने के बाद कल्पना मुर्मू सोरेन ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी थी.

    भविष्य की राह: क्या वाकई बदलेगा झारखंड?

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दावा किया कि झारखंड को अगले 5 सालों में इतना आगे बढ़ाया जाएगा कि पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या झारखंड इस विकास की रफ्तार को बनाए रख पाएगा? राज्य की सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पारदर्शिता है। अगर इन दोनों मोर्चों पर सरकार मजबूत कदम उठाने में सफल रही, तो झारखंड वाकई उन राज्यों में शुमार हो सकता है, जो तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

    यह राज्य झारखंडियो की सोच से चलेगा-सोनू

    सभा को संबोधित करते हुये नगर विकास व पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने कहा कि जिस पौधा को गिरिडीह में 51 साल पहले शिबू सोरेन ने रोपा था वह आज विशाल वृक्ष का रूप ले लिया है। उन्होने ने कहा कि जनता ने हेमंत सोरेन को 56 सीटों का बहुमत दिया, हेमंत पर यह भरोसा जताया है कि जो काम अधूरे रह गए हैं उसे पूरा करना है. दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने जिस सोना झारखंड की कल्पना की थी वह सोना झारखण्ड धरातल पर उतारने का समय है. मैं आपको भरोसा देना चाहता हूं राजनीतिक साजिश करने वाले कितनी भी ताकत लगा ले लेकिन गिरिडीह के इस ऐतिहासिक झंडा मैदान से यह संदेश स्पष्ट है कि यह राज्य झारखंडियो की सोच से चलेगा.

    सभा को सम्बोधित करते राज्यसभा सांसद सरफराज अहमद ने कहा कि हेमंत सोरेन के जेल जाने से कल्पना के रूप में एक बड़ी नेत्री का जन्म हुआ है। इससे भाजपा पश्चाताप कर रहा होगा। हेमंत सोरेन की तरह कल्पना सोरेन को जनता का प्यार मिला. कल जब हेमंत सोरेन की सरकार ने बजट पेश किया तो झारखंडी होने का सबूत भी दिया. सभा को पूर्व विधायक निजामुद्दीन अंसारी, केदार हाजरा, बेबी देवी, प्रणव वर्मा आदि ने भी संबोधित किया। समारोह की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष संजय सिंह ने एवं संचालन अजीत कुमार पप्पू, महालाल सोरेन, शहनवाज ने किया।

    संघर्ष जारी रहेगा!

    झारखंड के सियासी मंच से एक बार फिर साफ हो गया कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच टकराव जारी रहेगा। कोयला खदानों को बंद करने की चेतावनी, महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की सक्रियता और केंद्र से बकाया राशि की मांग—ये सारे मुद्दे आने वाले समय में झारखंड की राजनीति को गर्माने वाले हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का बयान एक चेतावनी थी, लेकिन यह चेतावनी कब एक बड़े आंदोलन में बदल जाएगी, यह देखने वाली बात होगी।

    गिरिडीह शहर को दुल्हन की तरह सजाया गया था

    बता दें कि स्थापना दिवस को लेकर यह पहला मौका था जब झामुमो जिला समिति द्वारा पूरे शहर को दुल्हन की तरह सजाया गया था । शहरी क्षेत्र के सभी प्रमुख मार्गों एवं सभी चौक-चौराहे  और सड़कों हरे लाइट से सजाया गया था । जगह-जगह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, दिशोम गुरु शिबू सोरेन, मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन के बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए थे । वहीं  पूरा शहर पार्टी के झंडे से पाट दिया गया था ।

  • हेमंत सोरेन 2.0 सरकार का पहला बजट पेश , हेमंत सोरेन अपने आत्मबल से लबरेज दिखे

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

    झारखंड विधानसभा में जब वित्त मंत्री डॉ. राधाकृष्ण किशोर ने 1.45 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया, तो कागज़ पर यह एक महत्वाकांक्षी दस्तावेज़ लगा। लेकिन जब इस बजट की तह में उतरते हैं, तो सवाल उठते हैं कि क्या यह वास्तव में झारखंड की जनता के सपनों और उम्मीदों का बजट है या फिर आंकड़ों की बाजीगरी मात्र?

    बजट का आकार बड़ा, लेकिन क्या प्रभाव भी बड़ा?

    झारखंड सरकार ने इस बार का बजट 1,45,400 करोड़ रुपये का रखा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 13% अधिक है। सरकार ने यह भी दावा किया कि राजस्व व्यय में 20.48% की वृद्धि हुई है और पूंजीगत व्यय में 7.81% की बढ़ोतरी की गई है। लेकिन असली सवाल यह है कि इस बढ़े हुए बजट का लाभ किसे मिलेगा?

    सरकार ने दावा किया कि सामाजिक क्षेत्र के लिए 62,840 करोड़ रुपये और आर्थिक क्षेत्र के लिए 44,675 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। लेकिन यह पैसा किन योजनाओं में और किस तरह खर्च होगा, इसकी ठोस रूपरेखा बजट भाषण में नदारद रही।

    क्या बजट सिर्फ सरकारी आश्वासन है?

    राज्य की अर्थव्यवस्था को 2030 तक 10 ट्रिलियन रुपये तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इसके लिए ठोस रणनीति क्या होगी? बजट में इसका जवाब नहीं मिलता।

    मंईयां सम्मान योजना के तहत 18 से 50 साल की महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये देने का वादा किया गया है। इसके लिए 13,363 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। लेकिन दो महीने तक राशि रुकी रही, और अब सरकार होली के पहले एकमुश्त 7500 रुपये देने का वादा कर रही है। सवाल यह है कि अगर बजट में धनराशि पहले से आवंटित थी, तो यह देरी क्यों हुई?

    मंईयां सम्मान योजना

    झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार की सत्ता में वापसी के बाद पेश पहले बजट में मंईयां सम्मान का असर दिखा. मंईयां सम्मान देने वाले विभाग का बजट एक झटके में लगभग डबल हो गया. 11 से अधिक विभागों के बजट में कटौती करते हुए सरकार ने एक विभाग का बजट 95 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है. झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने शिक्षा और कल्याण विभाग को छोड़ सभी विभागों के बजट पर कैंची चला दी है. वर्ष 2025-26 के बजट में सबसे बड़ा फायदा कल्याण एवं समाज कल्याण विभाग को हुआ है. इस मद में सरकार ने वर्ष 2024-25 के बजट में कुल बजट की राशि का 8.96 फीसदी का प्रावधान किया था. वर्ष 2025-26 के बजट में इसमें बंपर बढ़ोतरी करते हुए 17.47 प्रतिशत कर दिया है. यह पिछले बजट की तुलना में करीब 95 प्रतिशत अधिक है. शिक्षा विभाग के बजट में 0.69 प्रतिशत की वृद्धि की गयी है. ओल्ड पेंशन स्कीम लागू होने की वजह से सरकार ने पेंशन मद में बजट में 0.22 प्रतिशत की वृद्धि की गयी

    रोजगार और आर्थिक विकास: सिर्फ़ दावे या कोई ठोस योजना?

    झारखंड में बेरोजगारी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। इस बजट में युवाओं के लिए कितनी नौकरियां सृजित होंगी? इसका कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया। राज्य सरकार ने यह तो बताया कि आर्थिक विकास दर 7.5% रहेगी, लेकिन इस विकास दर का आम जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा, यह स्पष्ट नहीं किया गया।

    कृषि क्षेत्र और छोटे व्यापारियों के लिए बजट में क्या ठोस योजनाएं हैं? राज्य में लाखों किसान सूखे और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं, लेकिन उनके लिए सिर्फ़ कर्ज़माफी के दावे हैं, स्थायी समाधान नहीं।

    बजट में कर्ज़ और घाटे का गणित

    सरकार ने दावा किया कि राजकोषीय घाटा 1.1% तक सीमित रखा गया है और ऋण-जीडीपी अनुपात को 27.3% पर लाने का लक्ष्य है। लेकिन यह आंकड़े तब तक बेकार हैं जब तक कि राज्य के राजस्व स्रोतों को बढ़ाने के लिए कोई ठोस रणनीति न बने। सरकार का अनुमान है कि 2025-26 में 61,056 करोड़ रुपये राजस्व आएगा, लेकिन यह कैसे आएगा, इसका स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया।

    क्या यह जनता का बजट है?

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार का यह पहला बजट कई मायनों में प्रतीकात्मक है। यह बजट राज्य की राजनीतिक मजबूरियों को दर्शाता है। इसमें विकास के दावे हैं, लेकिन योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल उठते हैं।

    झारखंड जैसे राज्य, जहां के संसाधनों का बड़ा हिस्सा बाहरी कंपनियों और राज्यों को जाता है, वहाँ यह बजट आत्मनिर्भरता का संदेश नहीं देता। रोजगार के अवसरों को बढ़ाने और राज्य की जनता को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बजट में कोई ठोस पहल नहीं दिखती।

    क्या यह बजट जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप है?

    झारखंड का यह बजट आंकड़ों और दावों से भरा पड़ा है, लेकिन जब हम इसकी गहराई में जाते हैं, तो यह कहीं न कहीं खोखला नज़र आता है। बजट भाषण में ‘स्वाभिमान’, ‘स्वावलंबन’ और ‘विकास’ जैसे शब्दों की भरमार थी, लेकिन क्या यह सिर्फ़ भाषण तक सीमित रह जाएगा, या ज़मीनी हकीकत में भी बदलाव लाएगा? यह देखना अभी बाकी है।

  • इनर व्हील क्लब गिरिडीह सनशाइन ने सर्वाइकल कैंसर जागरूकता के लिए भव्य कार रैली का आयोजन किया

    गिरिडीह: इनर व्हील क्लब ऑफ गिरिडीह सनशाइन ने सर्वाइकल कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से एक भव्य कार रैली का आयोजन किया। यह आयोजन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सप्ताह “अपराजिता” के तहत किया गया और डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन अलकनंदा बक्सी द्वारा दिए गए लक्ष्य के अनुरूप था।

    कार्यक्रम का भव्य उद्घाटन

    रैली की शुरुआत पूर्व डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन पूनम सहाय द्वारा गुब्बारे उड़ाकर की गई। इस अवसर पर उपस्थित सभी सदस्यों ने सर्वाइकल कैंसर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की और जागरूकता फैलाने की शपथ ली। आयोजन में शामिल सभी कारों को विभिन्न प्रकार के संदेशों और पोस्टरों से सजाया गया था, जिससे कैंसर से बचाव के उपायों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।

    कार्यक्रम के दौरान क्लब की सदस्यों ने सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है, लेकिन समय रहते इसका पता चल जाए तो इसे रोका जा सकता है।

     

    रैली में उत्साहपूर्वक शामिल हुए क्लब के सदस्य

    रविवार की सुबह आयोजित इस विशेष रैली में 20 कारों ने भाग लिया, जिनमें क्लब की 40 से अधिक महिलाएँ शामिल हुईं। इस रैली का मुख्य उद्देश्य सर्वाइकल कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाना और इसके रोकथाम के उपायों के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाना था। गिरिडीह की मुख्य सड़कों से गुज़रती हुई इन सजी-धजी गाड़ियों ने शहरवासियों का ध्यान आकर्षित किया। कारों पर लगाए गए स्लोगन और बैनर लोगों के लिए प्रेरणादायक संदेश दे रहे थे। इनमें से कुछ प्रमुख संदेश थे:

    • “सर्वाइकल कैंसर से बचाव संभव है, जागरूकता ही सुरक्षा है!”
    • “नियमित जांच कराएं, स्वस्थ जीवन अपनाएं!”
    • “टीकाकरण से करें बचाव, सर्वाइकल कैंसर को भगाएं दूर!”

    सर्वश्रेष्ठ कारों को किया गया सम्मानित

    इस रैली के दौरान सबसे सुंदर और संदेशपरक तरीके से सजाई गई कारों को सम्मानित किया गया।

    • सर्वश्रेष्ठ कार: सचिन राखी झुनझुनवाला की कार को पहला स्थान प्राप्त हुआ।
    • द्वितीय स्थान: पूनम सहाय की कार को दूसरा स्थान मिला।
    • तृतीय स्थान: आईपीपी सुमन गौरीसरिया की कार तीसरे स्थान पर रही।

    इन विजेताओं को आगामी 8 मार्च को विशेष पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। कार्यक्रम के दौरान महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि इस तरह के आयोजनों से समाज में जागरूकता फैलाने में कितनी मदद मिलती है।

    जागरूकता अभियान को बढ़ावा देने का प्रयास

    इस अभियान के तहत इनर व्हील क्लब ऑफ गिरिडीह सनशाइन ने महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम और समय पर टीकाकरण के महत्व के बारे में जानकारी दी। क्लब की अध्यक्ष सोनाली तरवे ने बताया कि इस तरह के आयोजन समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा, “हमारा उद्देश्य केवल जागरूकता बढ़ाना ही नहीं, बल्कि लोगों को सही जानकारी देना भी है, ताकि वे समय पर इस बीमारी से बचाव के लिए कदम उठा सकें।”

    क्लब सचिव राखी झुनझुनवाला ने बताया कि क्लब की सदस्य समय-समय पर विभिन्न स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करती रहती हैं। उन्होंने बताया कि महिलाओं को इस विषय पर खुलकर बातचीत करनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोगों तक यह जानकारी पहुँच सके।

    कार्यक्रम में क्लब के सभी पदाधिकारी रहे सक्रिय

    इस कार्यक्रम को सफल बनाने में क्लब की कई प्रमुख सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। क्लब सचिव राखी झुनझुनवाला, आईपीपी सुमन गौरीसरिया, कोषाध्यक्ष स्मृति आनंद, आईएसओ सुनीता शर्मा, और संपादक दीप्ति सिन्हा ने मिलकर इस आयोजन को प्रभावशाली बनाया।

    कार्यक्रम के दौरान डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी महिलाओं को जानकारी दी और बताया कि कैंसर से बचने के लिए शुरुआती लक्षणों को पहचानना कितना ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि महिलाओं को अगर बार-बार असामान्य रक्तस्राव, पीठ दर्द, पेशाब में जलन, या असहजता महसूस हो रही हो तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

    सर्वाइकल कैंसर क्या  है?

    सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाला एक गंभीर लेकिन रोके जाने योग्य कैंसर है, जो गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि के कारण होता है। गर्भाशय ग्रीवा, गर्भाशय  और योनि  को जोड़ने वाला निचला हिस्सा होता है।

    सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण

    सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) संक्रमण है। HPV एक सामान्य वायरस है, जो मुख्य रूप से असुरक्षित यौन संपर्क के माध्यम से फैलता है। हालांकि, यह संक्रमण आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह कैंसर में परिवर्तित हो सकता है।

    सर्वाइकल कैंसर: एक गंभीर मुद्दा

    सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) संक्रमण के कारण होता है। यह एक धीमी गति से बढ़ने वाला कैंसर है, जिसे यदि प्रारंभिक अवस्था में पहचान लिया जाए तो सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, निम्नलिखित उपाय अपनाकर इस बीमारी से बचा जा सकता है:

    1. HPV टीकाकरण: यह 9 से 26 वर्ष की आयु की लड़कियों और महिलाओं के लिए अत्यधिक प्रभावी होता है।
    2. नियमित पैप स्मीयर टेस्ट: यह जांच सर्वाइकल कैंसर के प्रारंभिक संकेतों का पता लगाने में मदद करती है।
    3. सुरक्षित यौन संबंध: जागरूकता और सुरक्षा उपाय अपनाने से इस वायरस के संक्रमण को रोका जा सकता है।
    4. स्वस्थ जीवनशैली: धूम्रपान से बचाव, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से कैंसर का खतरा कम किया जा सकता है।

    इनर व्हील क्लब का सामाजिक योगदान

    इनर व्हील क्लब ऑफ गिरिडीह सनशाइन हमेशा से सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित रहा है। यह क्लब न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य और सशक्तिकरण पर काम करता है, बल्कि समाज के अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी सक्रिय रहता है। क्लब की सदस्याओं का कहना है कि भविष्य में भी इस तरह के जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता रहेगा, ताकि समाज में स्वास्थ्य और शिक्षा को बढ़ावा मिल सके।

    इनर व्हील क्लब ने इस जागरूकता अभियान के तहत कुछ प्रमुख संकल्प लिए:

    • महिलाओं को मुफ्त सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग की सुविधा प्रदान करने के लिए स्थानीय अस्पतालों से संपर्क करना।
    • स्कूलों और कॉलेजों में जाकर युवा लड़कियों को HPV वैक्सीन के महत्व के बारे में जागरूक करना।
    • कैंसर सर्वाइकल के अलावा अन्य प्रकार के कैंसर जैसे स्तन कैंसर पर भी जागरूकता अभियान चलाना।
    • समाज में स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी कार्य करना।

    इस आयोजन की सफलता ने साबित कर दिया कि यदि समाज के सभी वर्ग मिलकर किसी समस्या के समाधान की दिशा में कार्य करें, तो एक बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इस रैली ने न केवल गिरिडीह में बल्कि आसपास के इलाकों में भी सर्वाइकल कैंसर जागरूकता की एक नई लहर पैदा की है।

  • जेल ब्रेक: सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल, 6 कक्षपाल निलंबित

    रिपोर्ट-परवेज़ आलम

    …….तो आखिर वही हुआ जिसका डर था। एक और जेल ब्रेक, एक और सुरक्षा में सेंध, और प्रशासन के हाथ-पांव फूले हुए! रांची के होटवार स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा से फरार PLFI उग्रवादी समीर तिर्की का 24 घंटे बाद भी कोई सुराग नहीं मिला। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस जेल से कैदी इतने आराम से फरार कैसे हो जाते हैं?

    तीन लेयर की सुरक्षा में आखिर सेंध कैसे?

    बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। तीन परतों की सुरक्षा व्यवस्था होने का ढोल पीटा जाता है। लेकिन हकीकत यह है कि इन दावों के बीच से ही समीर तिर्की चकमा देकर निकल गया! सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि जेल प्रशासन की नाक के नीचे आखिर यह हुआ कैसे? क्या यह सिर्फ लापरवाही है, या फिर कुछ और?

    जेल प्रशासन की घोर लापरवाही, 6 कक्षपाल निलंबित

    हर बार की तरह इस बार भी लापरवाही का ठीकरा जेल प्रशासन पर फूटा है। जेल आईजी सुदर्शन मंडल ने आनन-फानन में छह कक्षपालों को निलंबित कर दिया है। इनमें बीचा मुण्डा, सतन नायक, सोमन लोहार, राकेश कुमार सिंह, रामजीत महतो और गोपाल सिंह के नाम शामिल हैं। इन पर आरोप है कि इनकी लापरवाही के चलते समीर तिर्की फरार हो सका। लेकिन क्या सिर्फ इन छह लोगों की गलती है, या फिर इसमें कोई अंदरूनी मिलीभगत भी है?

    जेलर और अधीक्षक का पद खाली, फिर कौन जिम्मेदार?

    अब ज़रा इस जेल की व्यवस्था पर गौर कीजिए। बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में न तो स्थायी अधीक्षक है और न ही स्थायी जेलर। मतलब यह कि जो लोग वहां तैनात हैं, वे केवल प्रभार में काम कर रहे हैं। तो फिर सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या यह पूरा तंत्र ही ध्वस्त हो चुका है?

    कैदी निकला, कैमरे देखते रहे!

    कैदी के फरार होने का CCTV फुटेज भी सामने आया है। इसमें साफ दिख रहा है कि समीर तिर्की जेल के मुख्य गेट की ओर बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब मुख्य गेट पर 10 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, तो फिर समीर कैसे बच निकला? कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने जानबूझकर इसे अनदेखा किया? क्या यह एक सुनियोजित जेल ब्रेक था?

    समीर तिर्की: कौन है यह फरार कैदी?

    गुमला का रहने वाला समीर तिर्की कोई साधारण अपराधी नहीं था। वह पहले पहाड़ी चिता नामक उग्रवादी संगठन से जुड़ा था, फिर जोनल कमांडर परमेश्वर गोप और एरिया कमांडर बसंत तिर्की के साथ कई वारदातों को अंजाम दिया। 2013 में अपहरण और हत्या के मामले में उसे पकड़ा गया था, और 2022 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

    प्रशासन की नींद अब तक नहीं खुली!

    24 घंटे बाद भी पुलिस के हाथ खाली हैं। तमाम संभावित ठिकानों पर छापेमारी हो रही है, लेकिन नतीजा शून्य! रांची के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन से लेकर गुमला स्थित उसके घर तक, हर जगह तलाशी ली जा रही है, मगर कोई सुराग नहीं।

    जेल प्रशासन पर बड़े सवाल

    1. कैसे तीन लेयर की सुरक्षा में सेंध लगी?
    2. कैमरों के सामने कैदी बाहर निकलता रहा, कोई कुछ क्यों नहीं बोला?
    3. स्थायी अधीक्षक और जेलर की पोस्टिंग क्यों नहीं हुई?
    4. क्या यह किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है?

    इन सवालों के जवाब किसके पास हैं? या फिर यह भी किसी और जेल ब्रेक की तरह धीरे-धीरे भुला दिया जाएगा? प्रशासन मौन है, सरकार मौन है, लेकिन यह मामला मौन नहीं रहेगा।

  •  मैट्रिक की हिंदी और विज्ञान परीक्षा रद्द , जैक ने नए शेड्यूल का किया ऐलान

    झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) ने मैट्रिक परीक्षा के दो अहम विषय—हिंदी और विज्ञान—की रद्द परीक्षा की नई तारीखों का ऐलान कर दिया है ।  गौरतलब है कि  सोशल मीडिया पर पेपर लीक की खबर  सुर्खियां बनी थी और बाद मे जैक ने इन दोनों विषयों  की  परीक्षा रद्द कर दी  ।

    जैक की ओर से जारी बयान में कहा गया कि 18 फरवरी 2025 को आयोजित हिंदी (कोर्स A और B) और 20 फरवरी 2025 को हुई विज्ञान की परीक्षा को अमान्य घोषित कर दिया गया है। यानी इन परीक्षाओं को दोबारा आयोजित किया जाएगा।

    नया परीक्षा शेड्यूल जारी

    अगर आप भी उन छात्रों में शामिल हैं जिन्होंने यह परीक्षा दी थी, तो नए डेट्स नोट कर लीजिए—
    📌 हिंदी A और हिंदी B की पुनर्परीक्षा: 7 मार्च 2025 (शुक्रवार)
    📌 विज्ञान की पुनर्परीक्षा: 8 मार्च 2025 (शनिवार)

    अब छात्रों को दोबारा अपनी तैयारी करनी होगी, लेकिन सवाल यही है—बार-बार परीक्षा रद्द होने से छात्रों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?