परवेज़ आलम.
द न्यूज़ पोस्ट4यू डेस्क.
गिरिडीह: झारखंड के कई जिलों की तरह गिरिडीह भी चुनावी तनाव और छिटपुट हिंसा का इतिहास देखता रहा है, लेकिन अब तक यह धारणा बनी हुई थी कि ऐसी घटनाएँ मुख्यतः नक्सल प्रभाव वाले ग्रामीण इलाकों तक सीमित रहती थी । गिरिडीह शहर को अपेक्षाकृत शांत और नियंत्रित माना जाता था। लेकिन 2026 के नगर निगम चुनाव में वार्ड नंबर 18 में हुई फायरिंग की घटना ने इस धारणा को तोड़ दिया है। मतदान के बीच चली गोलियों में दो लोग घायल हो गए। यह घटना सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि शहरी राजनीति के बदलते चरित्र का संकेत बनकर उभरी है।
विवादों के केंद्र में शिवम आज़ाद.
इस पूरे घटनाक्रम में जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है शिवम श्रीवास्तव उर्फ शिवम आज़ाद । वे गिरिडीह नगर निगम के पूर्व वार्ड पार्षद रह चुके हैं। उनकी मां सरिता श्रीवास्तव भी वार्ड 18 से पार्षद रह चुकी हैं और इस बार भी चुनाव मैदान में थीं।
स्थानीय स्तर पर शिवम का नाम लंबे समय से विवादों से जुड़ता रहा है। बस स्टैंड क्षेत्र में उनके कारोबार की चर्चा होती रही है। ठेकेदारी से लेकर अन्य गतिविधियों में उनकी सक्रियता को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न हिंदी अखबारों में उनके खिलाफ शराब कारोबार में कथित संलिप्तता, तड़ीपार होने के बाद गिरफ्तारी और अन्य मामलों का जिक्र सामने आता रहा है। सूत्रों का कहना है कि उनके खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामले दर्ज हैं, जिनमें सीसी एक्ट और अंतरराज्यीय शराब तस्करी से जुड़े आरोप भी शामिल रहे हैं। हालांकि सभी मामले अदालतों मे लंबित हैं।
राजनीतिक सफर: भाजपा से झामुमो तक.
शिवम आज़ाद की राजनीतिक यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं रही। वे पहले भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा का दामन थाम लिया।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे विवादित चेहरों का सत्तारूढ़ या प्रभावशाली दलों से जुड़ाव प्रशासनिक सख्ती को प्रभावित करता रहा है। चुनाव के दौरान आमतौर पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों पर नजर रखी जाती है, हथियारों की जांच होती है और आवश्यकतानुसार गिरफ्तारी की कार्रवाई भी की जाती है। ऐसे में वार्ड 18 की घटना ने पुलिस और प्रशासन की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रशासन पर उठते सवाल.
फायरिंग की घटना के बाद टाउन थाना प्रभारी ज्ञान रंजन को निलंबित कर दिया गया है। इनके खिलफ़ आरोप है है कि इनहोने शिवम आज़ाद को संरक्षण दे रखा था । लेकिन घटना के 24 घंटे बाद तक किसी की गिरफ्तारी न होने को लेकर जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन न केवल हिंसा को रोकने में विफल रहा, बल्कि कार्रवाई में भी तेज़ी नहीं दिख रही है। गौरतलब है कि गिरिडीह का शहरी इलाका अब तक चुनावी गोलीबारी से लगभग अछूता माना जाता था। ऐसे में यह घटना कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही है।
झामुमो की त्वरित कार्रवाई.
घटना के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा ने तत्काल कदम उठाते हुए शिवम आज़ाद को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया। साथ ही केंद्रीय कमेटी को उनके निलंबन के लिए पत्र भेजा गया है। राजनीतिक हलकों में इसे पार्टी की छवि बचाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। संदेश स्पष्ट है—कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं। हालांकि अंतिम परीक्षा प्रशासनिक कार्रवाई की होगी।
पहले भी रहे हैं विवाद.
शिवम आज़ाद का नाम पूर्व में मारपीट और अन्य आपराधिक मामलों में सामने आता रहा है। दिसंबर माह में भी एक मारपीट प्रकरण में उनका नाम चर्चा में आया था।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि वर्षों से मामलों का सामना करने के बावजूद उनका प्रभाव बना रहना राजनीतिक संरक्षण की ओर इशारा करता है।
वीडियो में पलटवार.
इसी बीच शिवम आज़ाद ने एक वीडियो जारी कर ट्रांसपोर्टर राजू खान पर चुनावी हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है। अब यह सिर्फ गोलीबारी का मामला नहीं, बल्कि आरोप-प्रत्यारोप की जंग बन चुका है।
नजर जिला प्रशासन पर.
अब सबकी नजर जिला प्रशासन पर है।
- क्या फायरिंग के आरोपियों की गिरफ्तारी होगी?
- और क्या भविष्य में शहरी इलाकों में चुनावी हिंसा रोकने के लिए ठोस रणनीति बनाई जाएगी?
गिरिडीह, जिसे अब तक शहर के स्तर पर अपेक्षाकृत शांत माना जाता था, वहां हुई यह घटना आने वाले दिनों में न केवल स्थानीय राजनीति, बल्कि प्रशासन की साख को भी प्रभावित कर सकती है। अब देखना यह है कि यह घटना एक अपवाद साबित होती है या फिर शहर की चुनावी राजनीति के नए और खतरनाक दौर की शुरुआत।






