Author: The News Post4u

  • राष्ट्रीय लोक अदालत: 63,389 मामलों का हुआ ऑन द स्पॉट समाधान

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट

    गिरिडीह की धरती पर न्याय का ऐसा महाकुंभ लगा, जिसे कहते हैं राष्ट्रीय लोक अदालत। शनिवार को व्यवहार न्यायालय परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम में 63,389 मामलों का समाधान हुआ। सोचिए, यह सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उन हजारों चेहरों पर लौटी मुस्कान की कहानी है।
    कितना हुआ समाधान?
    इस लोक अदालत में प्री-लिटिगेशन और लंबित मामलों का निपटारा किया गया। इसके साथ ही 20 करोड़ 40 लाख 74 हजार 719 रुपए की राशि संबंधित पक्षों को दी गई, जिसमें राजस्व के रूप में भी राशि शामिल है।
    कौन-कौन हुआ शामिल?
    कार्यक्रम का उद्घाटन हुआ दीप प्रज्वलन से। मंच पर थे प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार पांडेय, उपायुक्त नमन प्रियेश लकड़ा, एसपी डॉक्टर विमल कुमार, और बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रकाश सहाय। इनके साथ अन्य न्यायिक दंडाधिकारी भी शामिल हुए।
    क्या बोले न्यायाधीश?
    प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार पांडेय ने बताया कि राष्ट्रीय लोक अदालत का उद्देश्य छोटे-छोटे विवादों का ऑन द स्पॉट समाधान करना है। खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां लंबित मामलों का बोझ अक्सर परिवारों पर भारी पड़ता है।
    प्रशासन की भूमिका
    डीसी नमन प्रियेश लकड़ा और एसपी डॉक्टर विमल कुमार ने भी इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ विवाद सुलझाने का मंच नहीं, बल्कि विश्वास लौटाने की प्रक्रिया है।” जिला और पुलिस प्रशासन समय-समय पर लोगों को इस पहल के प्रति जागरूक करता है।
    अधिवक्ता संघ की अपील
    जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष प्रकाश सहाय ने लोक अदालत की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए पक्षकारों से अधिक से अधिक मामले निपटाने की अपील की।
    कार्यक्रम का संचालन
    कार्यक्रम को विधिक सेवा प्राधिकार की सचिव सोनम बिश्नोई ने कुशलता से संचालित किया।
    तोलोक अदालत से यह साफ हो गया कि समाधान मुश्किल नहीं, बस एक सही मंच की जरूरत है। गिरिडीह ने एक बार फिर यह साबित किया कि न्याय और आपसी सुलह से बड़ी कोई जीत नहीं।

  • झारखंड में मंईयां सम्मान योजना :लाभुकों की संख्या में भारी बढ़ोतरी

    RANCHI: झारखंड सरकार की महत्वाकांक्षी मंईयां सम्मान योजना ने हेमंत सोरेन सरकार की सत्ता में वापसी में निर्णायक भूमिका निभाई। चुनाव के चार महीने पहले शुरू की गई इस योजना का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। चुनावी नतीजों के बाद सिर्फ 15 दिनों में इस योजना के लाभुकों की संख्या में पांच लाख की बढ़ोतरी हुई, जो अब बढ़कर 64 लाख 62 हजार तक पहुंच चुकी है।

    चुनाव से पहले और बाद का अंतर
    महिला एवं बाल विकास कल्याण विभाग के अनुसार, चुनाव से पहले आचार संहिता लागू होने तक इस योजना के तहत पंजीकृत लाभुकों की संख्या 59 लाख थी। चुनाव के बाद 15 दिनों के भीतर यह आंकड़ा 64 लाख पार कर गया। इनमें से 53 लाख 65 हजार 345 लाभुकों को सहायता राशि प्रदान करने की स्वीकृति भी मिल चुकी है।

    क्रिसमस पर महिलाओं को मिलेगा बड़ा तोहफा
    दिसंबर में महिलाओं के खातों में इस योजना के तहत 1000 रुपये के बजाय 2500 रुपये ट्रांसफर किए जाएंगे। यह राशि 18 से 20 दिसंबर के बीच रिलीज होने की संभावना है, ताकि क्रिसमस से पहले इसे महिलाओं के बैंक खाते में पहुंचाया जा सके। इसके बाद हर महीने महिलाओं को 2500 रुपये की सहायता राशि दी जाएगी।

    गलत लाभ लेने वालों पर सख्त कार्रवाई
    सरकार ने इस योजना के तहत गलत तरीके से लाभ उठाने वालों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। समाज कल्याण आयुक्त ने सभी उपायुक्तों को निर्देश दिया है कि जो लोग केंद्र या राज्य सरकार से जुड़ी किसी भी संस्था में कार्यरत हैं, उन्हें योजना का लाभ लेने से रोका जाए। ऐसे मामलों में वसूली का आदेश भी जारी किया गया है।

    21 जिलों में लाभुकों की संख्या 1 लाख से अधिक
    राज्य के 24 में से 21 जिलों में योजना के लाभुकों की संख्या एक लाख से अधिक है। सबसे अधिक लाभुक रांची जिले में हैं, जहां 5.23 लाख महिलाओं ने पंजीकरण कराया है। इनमें से 4.29 लाख के खाते में राशि ट्रांसफर की जाएगी। वहीं, सबसे कम लाभ सिमडेगा जिले में है, जहां 83 हजार महिलाएं इस योजना से जुड़ी हैं।

    खूंटी, लोहरदगा और सिमडेगा पिछड़े
    केवल तीन जिले, लोहरदगा, खूंटी और सिमडेगा, ऐसे हैं जहां लाभुकों की संख्या एक लाख से कम है। बाकी जिलों में यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।

    मंईयां सम्मान योजना ने न केवल महिलाओं के जीवन में आर्थिक सुधार लाया है बल्कि चुनावी राजनीति में भी अपनी अहमियत साबित की है।

  • गिरिडीह में डेटोनेटर ब्लास्ट: दो जवान घायल धनबाद रेफर

    GIRIDIH: गिरिडीह जिले के लटकटो-2 पिकेट में शनिवार सुबह का वक्त था जब अचानक डेटोनेटर ब्लास्ट हुआ। इस हादसे में झारखंड आर्म्ड पुलिस (जैप) के दो जवान घायल हो गए। घटना मधुबन थाना क्षेत्र की है।

    धनबाद रेफर किए गए घायल जवान
    घायल जवानों को तुरंत मधुबन से धनबाद के शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एसएनएमएमसीएच) ले जाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है। घायल जवानों में जैप-5 के हवलदार अशोक कुमार और सिपाही गौतम कुमार शामिल हैं।

    जांच में सामने आई गंभीर स्थिति
    जांच में पता चला कि दोनों जवान डेटोनेटर जमा कराने जा रहे थे। इसी दौरान एक डेटोनेटर ब्लास्ट हो गया। हादसे में हवलदार अशोक कुमार का हाथ गंभीर रूप से जख्मी हो गया, जबकि सिपाही गौतम कुमार की उंगली उड़ गई।

    घायल जवानों का परिचय
    हवलदार अशोक कुमार बिहार के लखीसराय जिले के रहने वाले हैं, जबकि कांस्टेबल गौतम कुमार साहिबगंज जिले से हैं। दोनों जवानों की हालत चिंताजनक बताई जा रही है।

    ब्लास्ट की वजह क्या?
    इस हादसे के बाद घटना की जांच तेज कर दी गई है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, डेटोनेटर के रख-रखाव में लापरवाही ब्लास्ट का कारण हो सकता है। घटना ने सुरक्षा तैयारियों और उपकरणों के प्रबंधन को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    घटना से जुड़ी अपडेट के लिए पढ़ते रहिए The News Post4U

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पर महाभियोग !

    NEW DELHI : इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश शेखर कुमार यादव के खिलाफ विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव देना क्या न्यायपालिका पर सीधा हमला है, या फिर न्याय की परिभाषा पर खुद न्यायपालिका को सोचने का मौका?

    एक कार्यक्रम में न्यायमूर्ति यादव की कथित टिप्पणियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। राज्यसभा में 55 विपक्षी सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, पी चिदंबरम,  रणदीप सिंह सुरजेवाला, प्रमोद तिवारी, विवेक तन्खा, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, मनोज कुमार झा, साकेत गोखल, मुकुल वासनिक, नसीर हुसैन, राघव चड्ढा, फौजिया खान, संजय सिंह, एए रहीम, वी शिवदासन और रेणुका चौधरी  जैसे नेता इस प्रस्ताव के केंद्र में हैं। सवाल यह है कि जब न्यायाधीश से संवैधानिक दायित्वों का पालन अपेक्षित है, तो क्या यह मामला संविधान के अनुच्छेद 51ए (ई) के खिलाफ जाता है, जो सद्भाव को बढ़ावा देने की बात करता है?

    “न्याय का चेहरा और राजनीति का साया”
    विहिप के मंच पर अल्पसंख्यकों को लेकर कथित टिप्पणी क्या एक न्यायाधीश के सार्वजनिक व्यवहार के मानदंडों का उल्लंघन है? या फिर यह उस विचारधारा का हिस्सा है, जो संविधान के सेकुलर फ्रेमवर्क को चुनौती देती है?

    सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया।इलाहाबाद हाईकोर्ट से रिपोर्ट मांगी गई। पर विपक्ष ने इसी बीच राज्यसभा में नोटिस देकर यह जता दिया कि इस बार बात सिर्फ भाषण की नहीं, न्यायपालिका की गरिमा की है।

    “महाभियोग और बहुसंख्यकवाद की राजनीति”
    नोटिस में आरोप है कि न्यायमूर्ति यादव की टिप्पणियां पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। क्या यह महज संयोग है कि यह टिप्पणी बहुसंख्यकवाद को प्राथमिकता देने वाली राजनीति के करीब नजर आती है? विपक्ष के नेता कहते हैं कि न्यायपालिका का कोई भी हिस्सा अगर संविधान से भटकेगा, तो उस पर सवाल उठेंगे।

    “आखिर न्याय कौन करेगा?”
    महाभियोग प्रस्ताव के इस नोटिस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका कितनी स्वतंत्र है? और अगर स्वतंत्र है, तो क्या वह राजनीति से प्रभावित हो रही है?

    न्याय की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के हर शब्द की कीमत होती है। पर जब वह शब्द संविधान से टकराते हैं, तो जवाबदेही तय करना जरूरी हो जाता है।

    अब देखना यह है कि राज्यसभा के सभापति इस नोटिस को मंजूरी देते हैं या नहीं। और क्या यह मामला न्यायपालिका में सुधार की नई बहस की शुरुआत करेगा?

  • प्रदीप यादव और राजेश कच्छप का कांग्रेस पार्टी दफ़्तर किया गया स्वागत

    RANCHI : कांग्रेस नेता प्रदीप यादव ने कहा कि पार्टी को राहुल गांधी के नेतृत्व में जिस लड़ाई को पूरे देश में मजबूती से आगे बढ़ाना है, वह उनकी पहली प्राथमिकता होगी। उन्होंने संगठन को सशक्त बनाने और पार्टी के विचारों को घर-घर तक पहुंचाने का आह्वान किया। यादव ने दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए इसे जनविरोधी और देशविरोधी करार दिया। उन्होंने कहा, “ऐसी सरकार को सत्ता से बेदखल करना हमारा मकसद है। तमाम विधायकों और नेताओं के साथ मिलकर एक ठोस रोडमैप तैयार करेंगे ताकि आगामी चुनावों में सफलता सुनिश्चित हो सके।”
    प्रदीप यादव: कांग्रेस विचारधारा को हर घर तक पहुंचाने का संकल्प। 
    प्रदीप यादव ने जोर देकर कहा कि संगठन को मजबूत करना और कांग्रेस के विचारों को जनता तक पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, “परिश्रम करने वालों के लिए रास्ते खुद-ब-खुद बनते हैं। अगर ईमानदारी से काम किया जाए, तो सफलता जरूर मिलती है। हमारा उद्देश्य देश को एक मजबूत विकल्प देना है।”
    राजेश कच्छप ने जताया शीर्ष नेतृत्व का आभार।
    कांग्रेस विधायक दल के उपनेता राजेश कच्छप ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का धन्यवाद करते हुए कहा, “मुझे जो जिम्मेदारी मिली है, वह सरकार और पार्टी के बीच समन्वय स्थापित करने की है। मैं इस पर पूरी निष्ठा से खरा उतरने की कोशिश करूंगा। पार्टी कार्यकर्ताओं के सहयोग से सरकार की योजनाओं को धरातल पर लाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।”
    प्रदीप यादव के अनुभव पर भरोसा। 
    राजेश कच्छप ने प्रदीप यादव के अनुभव की सराहना करते हुए कहा, “उन्हें संसदीय कार्य प्रणाली का लंबा अनुभव है। उनके साथ मिलकर डिप्टी सीएलपी के तौर पर जिम्मेदारी निभाऊंगा और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप तालमेल बनाकर काम करूंगा।”
    नेतृत्व के फैसले पर खुशी।
    पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने कहा, “पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अनुभवी नेता प्रदीप यादव को विधायकों की कमान सौंपकर संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय की नींव रखी है। साथ ही, राजेश कच्छप को सहयोगी बनाना कार्यकर्ताओं के मनोबल को ऊंचा करने वाला फैसला है।”
    कांग्रेस ने संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच अपनी जगह बनाने के लिए एक ठोस रणनीति तैयार की है।

  • मुख्यमंत्री हेमंत और कल्पना ने की भगवान भोलेनाथ की पूजा

    देवघर : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी धर्मपत्नी, गांडेय की विधायक कल्पना सोरेन ने आज देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना की। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तीर्थ पुरोहितों ने विधिवत शिवलिंग का जलाभिषेक कराया। मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी ने झारखंडवासियों की सुख-समृद्धि और उन्नति के लिए बाबा से प्रार्थना की।

    देवघर एयरपोर्ट पर हुआ भव्य स्वागत. 
    देवघर एयरपोर्ट पर मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी का स्वागत जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने किया। सारठ के विधायक उदय शंकर सिंह, संथाल परगना कमिश्नर लालचंद दादेल, आई.जी. क्रांति कुमार, डी.आई.जी. संजीव कुमार, उपायुक्त विशाल सागर और पुलिस अधीक्षक अजीत पीटर डुंगडुंग ने मुख्यमंत्री का अभिवादन किया। मौके पर मुख्यमंत्री को गॉर्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।

    बासुकीनाथ धाम में बाबा भोलेनाथ की पूजा. 
    इसके बाद मुख्यमंत्री और कल्पना सोरेन दुमका जिले के प्रसिद्ध बासुकीनाथ धाम पहुंचे। वहां भी तीर्थ पुरोहितों ने पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना संपन्न कराई। मुख्यमंत्री ने राज्य की खुशहाली और प्रगति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की।

    धार्मिक आस्था और झारखंड की पहचान.
    बाबा बैद्यनाथ और बासुकीनाथ धाम न केवल झारखंड की धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक धरोहर भी हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह धार्मिक दौरा झारखंड की परंपरा और धार्मिक भावनाओं से जुड़ाव को दर्शाता है।

    मुख्यमंत्री के इस दौरे ने न केवल धार्मिक महत्त्व को बल दिया है, बल्कि राज्य के विकास और जनहित के लिए उनकी प्रतिबद्धता को भी उजागर किया है।

  • मंईयां सम्मान योजना का इंतजार खत्म: जानिए किस तारीख को महिलाओं के खाते में आएंगे 2500 रुपये

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट……
    झारखंड में लाखों महिलाओं के लिए राहत भरी खबर आई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की महत्वाकांक्षी योजना मंईयां सम्मान योजना के तहत लाभुकों के खाते में 2500 रुपये की राशि इसी महीने से ट्रांसफर की जाएगी। माना जा रहा है कि सीएम सोरेन 14 दिसंबर को अपने विधानसभा क्षेत्र बरहेट से इस योजना की पांचवी किस्त जारी करेंगे।
    बरहेट से होगी योजना की शुरुआत। 
    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन 14 दिसंबर को अपने दो दिवसीय संताल दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वे वीर शहीद सिदो-कान्हू और फूलो-झानो की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करेंगे। जनसभा को संबोधित करते हुए, महिला लाभुकों के खातों में 2500 रुपये ट्रांसफर करने की संभावना है।
    आर्थिक मदद के लिए बजट पास। 
    हाल ही में सोरेन सरकार ने 2024-25 के लिए दूसरा अनुपूरक बजट पेश किया, जिसमें महिला, बाल विकास और सामाजिक सुरक्षा विभाग को प्रमुखता दी गई। मंईयां सम्मान योजना इसी विभाग के अंतर्गत संचालित हो रही है। बजट पास होने के बाद वित्त विभाग से राशि नोडल विभाग को ट्रांसफर की जाएगी।
    महिलाओं को जल्द मिलेगा लाभ। 
    योजना का लाभ पाने के लिए महिलाएं लंबे समय से इंतजार कर रही थीं। हालांकि इस महीने देरी का कारण अनुपूरक बजट की प्रक्रिया रही। विभागीय सूत्रों के अनुसार, एक-दो दिन में सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएंगी।
    संताल दौरे पर सोरेन परिवार। 
    मुख्यमंत्री के साथ उनकी पत्नी और गांडेय की विधायक कल्पना सोरेन भी दौरे पर रहेंगी। सीएम देवघर बाबाधाम और दुमका के बासुकिनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगे। इसके बाद बरहेट में जनसभा को संबोधित करते हुए महिला लाभुकों के खातों में राशि भेजने की शुरुआत करेंगे।

    मंईयां सम्मान योजना के तहत इस किस्त से झारखंड की लाखों महिलाओं को आर्थिक सहायता मिलेगी। यह योजना न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति को सशक्त बनाएगी बल्कि आने वाले चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

  • रांची के पूर्व DC छवि रंजन को बड़ा झटका, कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज की

    रांची के पूर्व डीसी छवि रंजन को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह मामला सेना की जमीन की अवैध खरीद-फरोख्त से जुड़ा हुआ है। गुरुवार को विशेष PMLA कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए उनकी याचिका को नामंजूर कर दिया। सोमवार को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रखा था।

    प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में कांड संख्या 01/2023 के तहत जांच शुरू की थी। मामले में ED के विशेष लोक अभियोजक शिव कुमार उर्फ काका जी ने अपनी दलीलें पेश कीं।

    अब तक की जांच में ED ने इस जमीन घोटाले के सिलसिले में अमित अग्रवाल, दिलीप घोष, पूर्व डीसी छवि रंजन, बड़ागाईं अंचल के राजस्व उप निरीक्षक भानु प्रताप प्रसाद, कथित रैयत प्रदीप बागची, और जमीन कारोबारी अफसर अली, इम्तियाज खान, तल्हा खान, फैयाज खान, व मोहम्मद सद्दाम को गिरफ्तार किया है। फिलहाल सभी आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं।

  • धनखड़ की कार्यशैली पर विपक्ष अब किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठेगा-डॉ सरफराज

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट ……..

    संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है, और इस बार जो संसद में हो रहा है, वह न केवल संसदीय राजनीति का एक ताजातरीन रूप है, बल्कि यह लोकतंत्र के साख और मंशा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। हंगामा, शोरगुल, और आरोपों-प्रतयारोपों  का दौर अब संसद के हर कोने से उठ रहा है। इन हालात में, राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ पर विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है। करीब 60 सांसदों के हस्ताक्षर से इस प्रस्ताव का समर्थन किया गया है। लेकिन सत्ता पक्ष अपने बहुमत का हवाला देते हुए कह रहा है कि यह प्रस्ताव सफल नहीं हो पाएगा।

    अब, विपक्ष ने जो आरोप लगाए हैं, वह न केवल जगदीप धनखड़ की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं, बल्कि यह भी एक सख्त संदेश देते हैं कि विपक्ष अब किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठेगा। विपक्ष का कहना है कि न तो वह झुकेंगे, न दबेंगे, न रुकेंगे। संविधान, संसदीय मर्यादाओं और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर कुर्बानी के लिए तैयार हैं। दस महत्वपूर्ण बिंदुओं में विपक्ष ने अपनी बात रखी, जिन पर गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है।राज्यसभा सांसद डॉ सरफराज अहमद ने जगदीप धनखड़ के खिलाफ लाये गए अविश्वास प्रस्ताव  का समर्थन करते हुये कहा कि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर एक साथ है । उन्होने कह कि उनके 40 साल के संसदीय जीवन मे एसी स्थिति कभी नहीं देखि है ।

    पहला बिंदु है – संसद में बात कहने का अधिकार। विपक्ष का आरोप है कि सभापति महोदय लगातार उन्हें बोलने से रोकते हैं। जबकि सत्ता पक्ष के सदस्य बेझिजक झूठ बोलते हैं, मीडिया की खबरों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी विपक्ष पर थोपते हैं।

    दूसरा गंभीर आरोप है – सभापति का दुरुपयोग। विपक्ष का कहना है कि सभापति ने अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करते हुए कई बार सदस्यों को एकतरफा निलंबित किया।

    तीसरा आरोप यह है कि सभापति सदन के बाहर भी विपक्षी नेताओं की आलोचना करते हैं और उनकी आलोचना भाजपा के पक्ष में की जाती है। यह पारंपरिक संसदीय गरिमा से काफी दूर का मामला है।

    इतिहास में इस पद को गरिमा के साथ संभालने वालों ने कभी अपनी राजनीति या पार्टी का पक्ष नहीं लिया, लेकिन धनखड़ साहब ने तो सीधे-सीधे RSS की प्रशंसा की और स्वयं को ‘RSS का एकलव्य’ घोषित कर दिया, जो संविधान की भावना से खिलवाड़ है।

    टीवी कवरेज का भी विरोध किया गया है। विपक्ष का कहना है कि संसद के अंदर होने वाले विरोध प्रदर्शन और उनकी आवाज़ को जानबूझकर मीडिया से हटा दिया जाता है। कैमरे केवल सत्ता पक्ष के सांसदों को दिखाते हैं और विपक्षी नेताओं की आवाज़ को काले पर्दे में छिपा दिया जाता है।

    रूल 267 का उल्लंघन करते हुए विपक्षी सदस्य को नोटिस भी नहीं दिए जाते, जबकि सत्ता पक्ष के सांसदों को इसे लेकर कोई प्रतिबंध नहीं होता।

    समझिए, यह कोई हल्का-फुल्का मुद्दा नहीं है। यह सीधे तौर पर हमारे संसदीय लोकतंत्र की धारा और दिशा से जुड़ा है। जहां तक सवाल विपक्ष के सवालों का है, तो इस पूरे मामले में यही कहा जा सकता है कि संसद अब सिर्फ एक मुकदमे की तरह न सिमट जाए। यह खामोशी नहीं, एक निर्णायक आवाज़ की बुनियाद है।

  • मस्जिदों या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर नए दावे दाखिल करने पर रोक – सुप्रीम कोर्ट

    By- Perwez Alam

    नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा आदेश एक बार फिर उस बहस को सामने लेकर आया है, जो भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे के मूल में छिपी है। सुप्रीम कोर्ट ने उपासना स्थल अधिनियम, 1991 के तहत मस्जिदों या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर नए दावे दाखिल करने पर रोक लगा दी है। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक अदालत इस कानून की वैधता पर फैसला नहीं सुना देती।
    यह अधिनियम 15 अगस्त, 1947 की स्थिति को बनाए रखने की बात करता है, और धार्मिक स्थलों के स्वरूप में किसी भी बदलाव या दावों पर रोक लगाता है। मगर सवाल यह है—क्या यह कानून सभी को समान रूप से न्याय दे पा रहा है? या यह अतीत के घावों को भरने के बजाय उन्हें और कुरेदने का कारण बन रहा है?
    फैसले का राजनीतिक और कानूनी प्रभाव
    प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक इस कानून पर सुनवाई पूरी नहीं होती, कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं होगा। लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि लंबित मामलों में कोई अंतिम फैसला भी फिलहाल नहीं दिया जाएगा।
    वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद मामले से लेकर मथुरा के शाही ईदगाह विवाद तक, कई मामले इस अधिनियम की छाया में हैं। इन मुकदमों का दावा है कि इन मस्जिदों का निर्माण प्राचीन मंदिरों को तोड़कर किया गया था। लेकिन क्या इस तरह के मुकदमे एक नई न्यायिक परंपरा की मांग कर रहे हैं, या यह समाज को विखंडित करने वाली राजनीति का हिस्सा हैं?
    सवाल जो अदालत से परे हैं
    मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य राजनीतिक समूह इस कानून को देश की एकता और धर्मनिरपेक्षता के लिए आवश्यक मानते हैं। लेकिन याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह अधिनियम न्याय पाने के मूल अधिकार को छीनता है।
    राजनीति इस मामले में गहराई तक जुड़ी हुई है। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता जहां इसे हिंदू धर्म के साथ न्याय करने का अवसर मानते हैं, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे अपनी धार्मिक आजादी और सामाजिक शांति के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
    क्या वाकई शांति का मार्ग प्रशस्त होगा?
    सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से फिलहाल विवादों पर विराम लगा है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। सवाल यह है कि क्या हमारा समाज बीते समय की गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ेगा, या इन गलतियों को दोहराकर वर्तमान को और जटिल बनाएगा?
    यह देखना दिलचस्प होगा कि जब अदालत इस कानून पर अंतिम निर्णय देगी, तो वह केवल कानूनी पहलू को ध्यान में रखेगी या सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक नतीजों का भी आकलन करेगी।
    जैसा कि एक पुरानी कहावत है—“न्याय में देरी करना, न्याय से इनकार करने के समान है।” लेकिन क्या इस न्याय की परिभाषा अब बदलनी चाहिए? यह जवाब अदालत के फैसले और समाज की प्रतिक्रिया में छिपा है।