*झारखंड के दिशोम गुरु: शिबू सोरेन की अंतिम यात्रा
*झारखंड आंदोलन के पुरोधा का अवसान
* नेमरा से संसद तक: शिबू सोरेन की अमर गाथा
परवेज़ आलम.
The News Post4u.
11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का जीवन महज 15 वर्ष की उम्र में एक त्रासदी से बदल गया। उनके पिता शोबरन सोरेन, जो शिक्षक थे और महाजनी प्रथा के खिलाफ मुखर थे, की हत्या स्थानीय साहूकारों ने कर दी। यही घटना शिबू सोरेन के भीतर न्याय के लिए एक ऐसी आग जगा गई, जिसने उन्हें ताउम्र आदिवासी अधिकारों की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया।
संघर्ष की शुरुआत और आंदोलन की जड़ें.
गरीब किसान परिवार से आने वाले शिबू सोरेन ने हजारीबाग के गोला हाई स्कूल से मैट्रिक पास की। 1962 में रूपी सोरेन से विवाह किया। उनके चार संतानें हैं — तीन पुत्र और एक पुत्री। बड़े बेटे दुर्गा सोरेन का निधन 2009 में हुआ, बेटी अंजनी ओडिशा में पार्टी की कमान संभाल रही हैं, बसंत सोरेन विधायक हैं, जबकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को सशक्त रूप में आगे बढ़ाया है।
1970 के दशक में जब आदिवासी समाज महाजनी शोषण, जमीन हड़प और शराब माफिया के चंगुल में था, तब शिबू सोरेन ने गिरिडीह, पारसनाथ और धनबाद के जंगलों में भूमिगत रहकर आंदोलन छेड़ा। हर रात तीन-तीन बार ठिकाने बदलते, महाजनों के खिलाफ ‘धनकटी आंदोलन’ चलाते और जनसभाओं के माध्यम से आदिवासियों को संगठित करते।
70 के दशक में, शिबू सोरेन गिरिडीह के पारसनाथ जंगलों में छिपकर आंदोलन कर रहे थे। उनके आंदोलन की आवाज पटना से दिल्ली तक सुनाई दे रही थी। सरकार उन्हें मुख्यधारा में लाना चाहती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी इसके लिए गंभीर थीं। धनबाद के तत्कालीन डीसी के.बी. सक्सेना ने यह काम शुरू किया। टुंडी के तत्कालीन थाना प्रभारी बी. किचिंगिया ने इसे पूरा किया।
पारसनाथ के जंगलों में भूमिगत रहकर आंदोलन.
शिबू सोरेन 70 के दशक में पारसनाथ के जंगलों में भूमिगत रहकर आंदोलन कर रहे थे। उस समय बिहार और दिल्ली में भी उनके आंदोलन की चर्चा थी। सरकार चाहती थी कि शिबू सोरेन मुख्यधारा में शामिल हों। इंदिरा गांधी ने भी इस पर ध्यान दिया। धनबाद के डीसी के.बी. सक्सेना ने इसकी शुरुआत की। टुंडी के थाना प्रभारी बी. किचिंगिया ने इस काम को पूरा किया। शिबू सोरेन के पुराने साथियों का कहना है कि किचिंगिया ने सरकारी नौकरी में रहते हुए भी शिबू के आंदोलन में मदद की थी। किचिंगिया ने संवैधानिक नियमों का पालन करते हुए यह काम किया। शिबू सोरेन को भूमिगत जीवन छोड़कर राजनीति में लाने का श्रेय किचिंगिया को ही जाता है।
राजनीतिक उदय और झारखंड आंदोलन की नींव.
4 फरवरी 1972 को उन्होंने एके राय और विनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। यह संगठन न केवल आदिवासी अधिकारों बल्कि अलग राज्य झारखंड के गठन के लिए भी प्रतिबद्ध था। शिबू सोरेन की आवाज़ पर हजारों आदिवासी एकत्र हो जाते थे। 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड का गठन हुआ, तो इसमें सबसे बड़ा योगदान दिशोम गुरु का ही था।
संसद से मुख्यमंत्री तक का सफर.
- 1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा पहुंचे।
- 1989, 1991, 1996 और 2004, 2009, 2014 में भी सांसद चुने गए।
- 2004 में केंद्र की यूपीए सरकार में कोयला मंत्री बने।
- तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने, हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण कार्यकाल अधिक लंबा नहीं हो सका।
विवाद, जेल और फिर बेदाग वापसी.
उनका जीवन संघर्षों से ही नहीं, विवादों से भी जुड़ा रहा। 1975 के चिरुडीह हत्याकांड और 1994 में अपने निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के आरोपों ने उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया। 2006 में उन्हें उम्रकैद की सजा हुई, लेकिन बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। इसके बावजूद उनकी जनप्रियता कभी कम नहीं हुई।
2007 में जब उन्हें जेल ले जाया जा रहा था, तब उनके काफिले पर बम से हमला हुआ। वे बाल-बाल बचे।
संघर्ष से सत्ता तक: सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका
शिबू सोरेन का योगदान सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने टुंडी और आसपास के इलाकों में आदिवासियों के लिए शिक्षा अभियान शुरू किया। टुंडी के एक महादेव मंदिर में आदिवासियों को प्रवेश दिलाने की ऐतिहासिक पहल की। वह सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाले नेता थे।
राजनीति से मार्गदर्शक की भूमिका तक.
लगभग चार दशकों तक झामुमो के अध्यक्ष रहे शिबू सोरेन ने अप्रैल 2025 में सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर पार्टी की कमान बेटे हेमंत सोरेन को सौंप दी। वे पार्टी के मार्गदर्शक बन गए।
अंतिम दिन और राष्ट्र की श्रद्धांजलि.
शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 की रात दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले एक महीने से किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगातार अस्पताल में मौजूद रहे।
सोमवार सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में अस्पताल पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित की और उन्हें आदिवासी समाज का नायक बताते हुए श्रद्धांजलि दी।
उनका पार्थिव शरीर रांची लाया गया, जहां मोरहाबादी स्थित आवास, झामुमो कार्यालय और विधानसभा में आम जन और नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। मंगलवार 5 अगस्त को दोपहर तीन बजे रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राज्यपाल, मंत्री, सांसद-विधायक समेत देशभर से आए नेताओं की उपस्थिति में उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी।
एक युग का अंत
शिबू सोरेन सिर्फ नेता नहीं थे, वे आदिवासी चेतना, संघर्ष, आत्मसम्मान और राजनीतिक सशक्तिकरण के प्रतीक थे। झारखंड को उन्होंने सिर्फ राजनीतिक नक्शे पर नहीं रखा, बल्कि इसे इतिहास में सम्मान की जगह दिलाई। उनके निधन से झारखंड ही नहीं, देश ने एक जननायक खो दिया — और उनके साथ ही एक युग समाप्त हो गया।







