गैर-दलीय चुनाव में ‘भाजपा समर्थित’ पोस्टरों का खेल, आचार संहिता पर सवाल—FIR के बाद भी शहर में जस के तस बैनर

परवेज़ आलम.

द न्यूज़ पोस्ट4यू.

गिरिडीह:नगर निगम का चुनाव गैर-दलीय है। कागज़ पर यह साफ लिखा है कि चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं, व्यक्ति के नाम और काम पर लड़ा जाएगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहानी कह रही है। पूरे शहर में “भाजपा समर्थित उम्मीदवार” लिखे पोस्टरों और बैनरों ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। सवाल यह है—जब चुनाव गैर-दलीय है, तो फिर ‘पार्टी समर्थित’ का शोर किस नियम के तहत?

चुनाव आयोग ने मामले का संज्ञान लिया। आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में दो दिन पहले गिरिडीह नगर निगम के मेयर प्रत्याशी शैलेंद्र चौधरी के खिलाफ नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि एफआईआर के बाद भी वे बैनर-पोस्टर शहर की दीवारों पर अब भी टंगे हुए हैं—मानो व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहे हों।

शहर के कई प्रमुख चौक-चौराहों से लेकर गलियों तक लगे बैनरों में साफ तौर पर “भाजपा समर्थित” लिखा दिखाई देता है। यह स्थिति केवल पोस्टरों तक सीमित नहीं है। पचम्बा थाना और मुफस्सिल थाना क्षेत्र में प्रचार वाहनों के जरिए भी बाकायदा यह प्रचार किया जा रहा है कि “मैं भाजपा का समर्थित उम्मीदवार हूँ।” लाउडस्पीकर से प्रसारित संदेशों में पार्टी समर्थन का दावा खुलकर दोहराया जा रहा है।

जबकि नियम स्पष्ट हैं—नगर निकाय चुनाव में किसी भी दल के अधिकृत प्रत्याशी की अवधारणा लागू नहीं होती। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश है? क्या यह आचार संहिता की खुली अवहेलना नहीं है?

जिला प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जो अधिकारी “नियम-कानून” का पालन सुनिश्चित कराने के लिए तैनात हैं, क्या उन्हें यह सब दिखाई नहीं दे रहा? एफआईआर दर्ज होने के बाद अपेक्षा थी कि पोस्टर-बैनर हटाए जाएंगे, प्रचार वाहनों पर रोक लगेगी और कड़ी कार्रवाई होगी। लेकिन अब तक ज़मीनी स्तर पर कोई सख्ती नजर नहीं आई है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि गैर-दलीय चुनाव में पार्टी का नाम जोड़ना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भावना के विपरीत है। इससे चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगता है।

अब देखना यह है कि चुनाव आयोग और जिला प्रशासन आगे क्या कदम उठाते हैं—क्या नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा या फिर यह मामला भी कागज़ी कार्रवाई तक ही सीमित रह जाएगा?

नगर निगम चुनाव में मुद्दे विकास, जल संकट, सफाई और आधारभूत सुविधाओं के होने चाहिए थे। लेकिन फिलहाल चर्चा पोस्टरों, बैनरों और आचार संहिता उल्लंघन की है। सवाल सीधा है—क्या गैर-दलीय चुनाव वाकई गैर-दलीय रह पाएगा?

 

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