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  • शिबू सोरेन पंचतत्व में विलीन: नेमरा गांव में लाखों नम आंखों ने दी अंतिम विदाई

    परवेज़ आलम.

    The News Post4u.

    रामगढ़, झारखंड: झारखंड आंदोलन के जननायक, पूर्व मुख्यमंत्री ‘दिशोम गुरु’  शिबू सोरेन को उनके पैतृक गांव रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड स्थित नेमरा में पूरे राजकीय सम्मान के साथ मंगलवार को अंतिम संस्कार किया गया। झमाझम बारिश और गम के माहौल के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। इसी के साथ झारखंड की राजनीति का एक युग समाप्त हो गया।

    अंतिम यात्रा: पहाड़ों की गोद में उमड़ा जनसैलाब.

    नेमरा गांव, जो पहाड़ों की तलहटी में बसा एक शांत और साधारण गांव है, मंगलवार को लाखों लोगों की भीड़ से भर गया। आम जनता से लेकर झारखंड आंदोलन के पुराने सिपाही, झामुमो कार्यकर्ता, राजनेता, नौकरशाह,पत्रकार और परिजन—हर कोई ‘दिशोम गुरु’ को अंतिम बार देखने और श्रद्धांजलि देने पहुंचा।

    गांव की गलियों में नारे गूंजते रहे—“शिबू सोरेन अमर रहें”, “जब तक सूरज चांद रहेगा, गुरुजी तेरा नाम रहेगा”।

    बारिश की फुहारों के बीच शाम 6:45 बजे उनका अग्नि संस्कार किया गया। लोग छातों के नीचे भींगते हुए अंतिम विदाई में शामिल होते रहे। मानो आसमान भी इस विदाई में रो रहा हो।

    “गुरुजी को अंतिम जोहार”, “विनम्र श्रद्धांजलि”—ऐसे शब्दों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स रांची से रामगढ़ तक पूरे रास्ते भर लोगों की आंखें नम करते रहे।

    विधानसभा से उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई और फिर पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव नेमरा लाया गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, उनके भाई बसंत सोरेन, और परिवार के अन्य सदस्य पार्थिव शरीर के साथ यात्रा में शामिल रहे।

    सादगी में श्रद्धा: संथाली परंपरा से हुआ अंतिम संस्कार.

    नेमरा गांव पहुंचने के बाद शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार संथाली रीति-रिवाज और परंपराओं के अनुसार किया गया। वहीं, उनका दाह संस्कार उसी बड़का नाला श्मशान घाट में किया गया, जहां उनके पूर्वजों की भी अंत्येष्टि होती रही है।

    मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी पुत्र हेमंत सोरेन ने निभाई। जैसे ही चिता को अग्नि दी गई, गांव के हर कोने से नारे उठे—“शिबू सोरेन अमर रहें”। बारिश की बूंदें उस वक्त भी थमी नहीं थीं, लेकिन लोगों की श्रद्धा के आगे मौसम भी झुक गया।

    राजकीय सम्मान और राष्ट्रीय नेतृत्व की उपस्थिति.

    झारखंड सरकार ने शिबू सोरेन के निधन पर 6 अगस्त तक तीन दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की। साथ ही, 4 और 5 अगस्त को सभी सरकारी दफ्तर बंद रखे गए।

    राजकीय सम्मान के तहत उनकी चिता के पास झंडा फहराया गया, गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया, और शोक ध्वनि के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई।

    इस दौरान कई राष्ट्रीय नेता नेमरा पहुंचे, जिनमें प्रमुख रूप से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोक सभा मे विपक्ष के नेता राहुल गांधी,तेजस्वी यादव (राजद),संजय सिंह (आप), शताब्दी रॉय (टीएमसी), पप्पू यादव ( सांसद पूर्णिया )

    भारी बारिश के कारण कई नेता हेलिकॉप्टर से नहीं आ सके, और उन्होंने सड़क मार्ग से ही नेमरा गांव पहुंचकर ‘दिशोम गुरु’ को अंतिम सलामी दी।

    प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था.

    गुरुजी की अंतिम यात्रा के दौरान मुख्य सचिव अलका तिवारी, डीजीपी अनुराग गुप्ता, प्रधान सचिव अविनाश कुमार, तथा कई जिलों के डीसी और एसपी सहित उच्चस्तरीय प्रशासनिक अमला मौजूद था। सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रही, लेकिन सादगी और अनुशासन के साथ श्रद्धा का वातावरण भी बना रहा।

    आमजन का जुड़ाव.

    गांव की गलियों में, पहाड़ों के बीच, बारिश से भीगते छतरियों के नीचे खड़े आम लोग—हर आंख नम थी। हर दिल गमगीन। लोगों ने बताया—“गुरुजी सिर्फ नेता नहीं थे, वो आंदोलन थे, वो आवाज थे हमारे हक की”। दुकानें, बाजार, स्कूल—हर जगह मातम पसरा रहा। कुछ विद्यालयों में दिवंगत नेता की आत्मा की शांति के लिए विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित की गईं।

    शिबू सोरेन का जाना, सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है। यह उस संघर्ष का अंत है, जिसने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाया।

    उनकी अंतिम यात्रा सिर्फ एक शारीरिक विदाई नहीं थी, बल्कि झारखंड के इतिहास में लिखी गई एक अविस्मरणीय घटना थी। उनका जीवन संघर्ष, आंदोलन और आदिवासी अस्मिता की मिसाल था।

    गुरुजी चले गए, लेकिन उनकी विचारधारा, उनकी आवाज, उनकी पहचान—हमेशा जीवित रहेगी।
    “दिशोम गुरु अमर रहें!”

  • दिशोम गुरु शिबू सोरेन: झारखंड आंदोलन का जननायक, एक युग का अवसान

    *झारखंड के दिशोम गुरु: शिबू सोरेन की अंतिम यात्रा

             *झारखंड आंदोलन के पुरोधा का अवसान

    * नेमरा से संसद तक: शिबू सोरेन की अमर गाथा   

    परवेज़ आलम.

    The News Post4u.

    11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का जीवन महज 15 वर्ष की उम्र में एक त्रासदी से बदल गया। उनके पिता शोबरन सोरेन, जो शिक्षक थे और महाजनी प्रथा के खिलाफ मुखर थे, की हत्या स्थानीय साहूकारों ने कर दी। यही घटना शिबू सोरेन के भीतर न्याय के लिए एक ऐसी आग जगा गई, जिसने उन्हें ताउम्र आदिवासी अधिकारों की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया।

    संघर्ष की शुरुआत और आंदोलन की जड़ें.

    गरीब किसान परिवार से आने वाले शिबू सोरेन ने हजारीबाग के गोला हाई स्कूल से मैट्रिक पास की। 1962 में रूपी सोरेन से विवाह किया। उनके चार संतानें हैं — तीन पुत्र और एक पुत्री। बड़े बेटे दुर्गा सोरेन का निधन 2009 में हुआ, बेटी अंजनी ओडिशा में पार्टी की कमान संभाल रही हैं, बसंत सोरेन विधायक हैं, जबकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को सशक्त रूप में आगे बढ़ाया है।

    1970 के दशक में जब आदिवासी समाज महाजनी शोषण, जमीन हड़प और शराब माफिया के चंगुल में था, तब शिबू सोरेन ने गिरिडीह, पारसनाथ और धनबाद के जंगलों में भूमिगत रहकर आंदोलन छेड़ा। हर रात तीन-तीन बार ठिकाने बदलते, महाजनों के खिलाफ ‘धनकटी आंदोलन’ चलाते और जनसभाओं के माध्यम से आदिवासियों को संगठित करते।

    70 के दशक में, शिबू सोरेन गिरिडीह के पारसनाथ  जंगलों में छिपकर आंदोलन कर रहे थे। उनके आंदोलन की आवाज पटना से दिल्ली तक सुनाई दे रही थी। सरकार उन्हें मुख्यधारा में लाना चाहती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी इसके लिए गंभीर थीं। धनबाद के तत्कालीन डीसी के.बी. सक्सेना ने यह काम शुरू किया। टुंडी के तत्कालीन थाना प्रभारी बी. किचिंगिया ने इसे पूरा किया।

    पारसनाथ के जंगलों में भूमिगत रहकर आंदोलन.

    शिबू सोरेन 70 के दशक में पारसनाथ के जंगलों में भूमिगत रहकर आंदोलन कर रहे थे। उस समय बिहार और दिल्ली में भी उनके आंदोलन की चर्चा थी। सरकार चाहती थी कि शिबू सोरेन मुख्यधारा में शामिल हों। इंदिरा गांधी ने भी इस पर ध्यान दिया। धनबाद के डीसी के.बी. सक्सेना ने इसकी शुरुआत की। टुंडी के थाना प्रभारी बी. किचिंगिया ने इस काम को पूरा किया। शिबू सोरेन के पुराने साथियों का कहना है कि किचिंगिया ने सरकारी नौकरी में रहते हुए भी शिबू के आंदोलन में मदद की थी। किचिंगिया ने संवैधानिक नियमों का पालन करते हुए यह काम किया। शिबू सोरेन को भूमिगत जीवन छोड़कर राजनीति में लाने का श्रेय किचिंगिया को ही जाता है।

    राजनीतिक उदय और झारखंड आंदोलन की नींव.

    4 फरवरी 1972 को उन्होंने एके राय और विनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। यह संगठन न केवल आदिवासी अधिकारों बल्कि अलग राज्य झारखंड के गठन के लिए भी प्रतिबद्ध था। शिबू सोरेन की आवाज़ पर हजारों आदिवासी एकत्र हो जाते थे। 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड का गठन हुआ, तो इसमें सबसे बड़ा योगदान दिशोम गुरु का ही था।

    संसद से मुख्यमंत्री तक का सफर.

    • 1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा पहुंचे।
    • 1989, 1991, 1996 और 2004, 2009, 2014 में भी सांसद चुने गए।
    • 2004 में केंद्र की यूपीए सरकार में कोयला मंत्री बने।
    • तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने, हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण कार्यकाल अधिक लंबा नहीं हो सका।

    विवाद, जेल और फिर बेदाग वापसी.

    उनका जीवन संघर्षों से ही नहीं, विवादों से भी जुड़ा रहा। 1975 के चिरुडीह हत्याकांड और 1994 में अपने निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के आरोपों ने उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया। 2006 में उन्हें उम्रकैद की सजा हुई, लेकिन बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। इसके बावजूद उनकी जनप्रियता कभी कम नहीं हुई।

    2007 में जब उन्हें जेल ले जाया जा रहा था, तब उनके काफिले पर बम से हमला हुआ। वे बाल-बाल बचे।

    संघर्ष से सत्ता तक: सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका

    शिबू सोरेन का योगदान सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने टुंडी और आसपास के इलाकों में आदिवासियों के लिए शिक्षा अभियान शुरू किया। टुंडी के एक महादेव मंदिर में आदिवासियों को प्रवेश दिलाने की ऐतिहासिक पहल की। वह सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाले नेता थे।

    राजनीति से मार्गदर्शक की भूमिका तक.

    लगभग चार दशकों तक झामुमो के अध्यक्ष रहे शिबू सोरेन ने अप्रैल 2025 में सक्रिय राजनीति से खुद को अलग कर पार्टी की कमान बेटे हेमंत सोरेन को सौंप दी। वे पार्टी के मार्गदर्शक बन गए।

    अंतिम दिन और राष्ट्र की श्रद्धांजलि.

    शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 की रात दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले एक महीने से किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगातार अस्पताल में मौजूद रहे।

    सोमवार सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में अस्पताल पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित की और उन्हें आदिवासी समाज का नायक बताते हुए श्रद्धांजलि दी।

    उनका पार्थिव शरीर रांची लाया गया, जहां मोरहाबादी स्थित आवास, झामुमो कार्यालय और विधानसभा में आम जन और नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। मंगलवार 5 अगस्त को दोपहर तीन बजे रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राज्यपाल, मंत्री, सांसद-विधायक समेत देशभर से आए नेताओं की उपस्थिति में उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी।

    एक युग का अंत

    शिबू सोरेन सिर्फ नेता नहीं थे, वे आदिवासी चेतना, संघर्ष, आत्मसम्मान और राजनीतिक सशक्तिकरण के प्रतीक थे। झारखंड को उन्होंने सिर्फ राजनीतिक नक्शे पर नहीं रखा, बल्कि इसे इतिहास में सम्मान की जगह दिलाई। उनके निधन से झारखंड ही नहीं, देश ने एक जननायक खो दिया — और उनके साथ ही एक युग समाप्त हो गया।

     

  • झारखंड के जननायक शिबू सोरेन नहीं रहे: पूरे राज्य में शोक की लहर

    नेमरा गांव में मंगलवार को होगा राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार.

    परवेज़ आलम.

    The News Post4u.

    झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन के निधन की खबर से झारखंड समेत पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। 81 वर्षीय शिबू सोरेन का निधन रविवार रात दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में हुआ। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

    सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली स्थित अस्पताल पहुंचकर शिबू सोरेन के पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। उनका जीवन जनजातीय समाज के कल्याण के लिए समर्पित रहा। उनके परिजनों से मिलकर अपनी संवेदनाएं प्रकट कीं।”

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर सोमवार शाम तक विशेष विमान से रांची लाया जाएगा। सबसे पहले उनके शव को बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से मोरहाबादी स्थित उनके आवास पर ले जाया जाएगा, जहां परिजन व करीबी उन्हें अंतिम बार श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे।

    मंगलवार 5 अगस्त को सुबह उनका पार्थिव शरीर झामुमो के केंद्रीय कार्यालय में आम जनों के दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसके बाद करीब 11 बजे उन्हें झारखंड विधानसभा भवन ले जाया जाएगा, जहां राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और प्रशासनिक अधिकारी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

    विधानसभा से उनका पार्थिव शरीर रामगढ़ जिले के उनके पैतृक गांव नेमरा ले जाया जाएगा, जहां मंगलवार दोपहर 3 बजे उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान और आदिवासी परंपराओं के अनुसार किया जाएगा। इस अंतिम यात्रा में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित झामुमो, कांग्रेस, भाजपा और अन्य दलों के नेता मौजूद रहेंगे। केंद्र और राज्य सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी और सांसद-विधायक भी इस मौके पर उपस्थित रहेंगे।

    नेमरा गांव में शोक का माहौल है। गांव की गलियां सूनी हैं, और शिबू सोरेन का आवास खामोशी में डूबा हुआ है। घर के आंगन में लगे वो पौधे, जिन्हें गुरुजी ने खुद अपने हाथों से लगाया था, आज जैसे उन्हें ही निहार रहे हों। आवास के भीतर वो झूला, जिस पर कभी शिबू सोरेन अपने परिजनों संग बैठा करते थे, आज खाली है — मानो उनका इंतजार कर रहा हो।

    परिवार और ग्रामीणों की आंखें नम हैं, लेकिन गर्व भी है कि उनके गांव ने देश को एक ऐसा जननायक दिया जिसने झारखंड के अस्तित्व की लड़ाई लड़ी और आदिवासी अस्मिता को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया।

    शिबू सोरेन सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, वे झारखंड के संघर्षों, परंपराओं और सपनों का प्रतीक थे। उनके जाने से एक युग का अंत हो गया है।

  • झारखंड : शिबू सोरेन की हालत गंभीर, वेंटिलेटर पर रखा गया

    लंबा राजनीतिक सफर, स्वास्थ्य पर संकट.

    परवेज़ आलम.

    The News Post4u.

    रांची: झारखंड की राजनीति में चार दशकों से अधिक समय तक अपनी मजबूत पकड़ बनाने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की हालत इस समय बेहद नाजुक बताई जा रही है। उन्हें दिल्ली स्थित सर गंगा राम अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया है। जानकारी के मुताबिक, उन्हें जून के अंतिम सप्ताह में गंभीर किडनी संबंधी परेशानियों के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तब से अब तक उनका इलाज जारी है, लेकिन उनकी सेहत में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है।

    हेमंत सोरेन ने दी थी जानकारी.

    शिबू सोरेन के बेटे और वर्तमान झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 24 जून को अस्पताल पहुंचकर पिता के स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। हेमंत ने मीडिया से कहा था कि “पिता जी की तबीयत को लेकर चिकित्सकीय जांच चल रही है। स्थिति अभी स्थिर है, लेकिन पूरी तरह ठीक होने में समय लग सकता है।”

    एक महीना से ज्यादा समय से अस्पताल में भर्ती.

    सूत्रों के मुताबिक, 81 वर्षीय शिबू सोरेन को लगभग पिछले एक महीने से अस्पताल में भर्ती रखा गया है, जहां डॉक्टरों की एक विशेष टीम उनकी देखभाल कर रही है। हालांकि डॉक्टरों ने उनकी रिकवरी को लेकर अभी कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई है।

    स्वास्थ्य के मोर्चे पर संकट के साथ-साथ पार्टी में चिंता.

    झामुमो के लिए यह समय बेहद संवेदनशील है। पार्टी के वरिष्ठ नेता के स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई जा रही है। दूसरी ओर, राज्य के शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन को भी ब्रेन स्ट्रोक के चलते दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया है। दोनों शीर्ष नेताओं की सेहत पार्टी के लिए एक बड़ा धक्का है।

    शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन: संघर्ष, सत्ता और सजा.

    शिबू सोरेन ने 18 वर्ष की उम्र में “संथाल नवयुवक संघ” की स्थापना की थी। इसके बाद 1972 में उन्होंने ए.के. रॉय और बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गठन किया और इसके महासचिव बने। आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई में वह एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।

    संसद और मंत्रालय

    • 1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
    • 1989, 1991, 1996 में भी लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।
    • 2002 में राज्यसभा पहुंचे, लेकिन दुमका सीट से उपचुनाव जीतने पर इस्तीफा दे दिया।
    • 2004 में केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में कोयला मंत्री बने।

    विवादों और कानूनी मामलों में फंसे

    2004 में ही चिरुडीह हत्याकांड (1975 की घटना) में गिरफ्तारी वारंट जारी होने पर मंत्री पद छोड़ना पड़ा। गिरफ्तारी के बाद जेल गए और बाद में जमानत मिली।
    2006 में अपने निजी सचिव शशिनाथ झा के अपहरण और हत्या के मामले में दोषी पाए गए। CBI के आरोपपत्र के अनुसार, झा झामुमो और कांग्रेस के बीच हुए कथित सौदे की जानकारी रखता था।

    • 5 दिसंबर 2006 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
    • हालांकि बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले से बरी कर दिया।

    जानलेवा हमले से बाल-बाल बचे.

    2007 में जब उन्हें दुमका जेल ले जाया जा रहा था, तब उनके काफिले पर बम से हमला किया गया। हालांकि, वह बाल-बाल बच गए थे।

    शिबू सोरेन न केवल झारखंड की राजनीति का एक स्तंभ रहे हैं, बल्कि उन्होंने आदिवासी समाज के हक और अस्तित्व की लड़ाई को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। आज जब उनकी तबीयत नाजुक है, तो सिर्फ उनका परिवार या पार्टी ही नहीं, बल्कि पूरा राज्य उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहा है।

  • झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र शुरू, पहले दिन शोक प्रस्ताव

    सदन के बाहर SIR पर चलती रही सियासत.

    रांची ब्यूरो रिपोर्ट The News Post4u.

    रांची : झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र शुक्रवार से प्रारंभ हो गया। सत्र की शुरुआत विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो के संबोधन से हुई, जिसमें उन्होंने लोकतंत्र के मूल मूल्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि सदन में अल्पमत का भी उतना ही सम्मान होना चाहिए जितना बहुमत का। उन्होंने रचनात्मक बहस, लोकतांत्रिक संवाद और जन आकांक्षाओं की पूर्ति पर जोर दिया।

    सत्र 7 अगस्त तक चलेगा और इस दौरान वित्तीय वर्ष 2025-26 का पहला अनुपूरक बजट सदन में पेश किया जाएगा।

    पहले दिन दिवंगत आत्माओं को दी गई श्रद्धांजलि.

    सत्र की शुरुआत शोक प्रस्तावों के साथ हुई। पूर्व सांसद चंद्रशेखर सिंह, तिलकधारी सिंह और वैज्ञानिक डॉ. के. कस्तूरीरंगन सहित हाल में दिवंगत कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सदन ने याद किया। इसके अलावा अहमदाबाद विमान हादसे और जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में मारे गए लोगों को भी श्रद्धांजलि दी गई। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने उनके योगदानों को याद किया। सदन में दो मिनट का मौन रखकर शोक प्रकट किया गया, जिसके बाद कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी गई।

    स्पीकर ने दी संवैधानिक मूल्यों की याद.

    अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो ने कहा, “हमें संविधान सभा की उस भावना को हमेशा याद रखना चाहिए, जिसमें यह कहा गया था कि हमने इस संविधान के माध्यम से देश की जनता को अपनी तकदीर खुद लिखने की ताकत दी है।” उन्होंने दिशोम गुरु शिबू सोरेन के जल्द स्वस्थ होने की कामना की और उनके राज्य के लिए योगदान को स्मरण किया।

    सत्र के दौरान स्पीकर ने पांच सभापतियों — स्टीफन मरांडी, सीपी सिंह, निरल पूर्ति, रामचंद्र सिंह और नीरा यादव — के नामों की घोषणा की। कार्यमंत्रणा समिति में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी समेत कई सदस्य शामिल हैं। दीपक बिरूआ और मथुरा महतो जैसे कई लोगों को विशेष आमंत्रित सदस्य भी नामित किया गया है।

    सदन के बाहर गरमाई सियासत SIR और अटल क्लीनिक पर घमासान.

    विधानसभा सत्र की शुरुआत के साथ ही सदन के बाहर राजनीतिक माहौल गरमा गया। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए ‘अटल मोहल्ला क्लीनिक’ का नाम बदलकर ‘मदर टेरेसा क्लीनिक’ किए जाने को “राजनीतिक गुंडागर्दी” बताया। उन्होंने कहा कि यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा है और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता का अपमान है, जो झारखंड के निर्माता माने जाते हैं।

    राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने भी भाजपा के बांग्लादेशी घुसपैठ के आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि पिछली बार भी ऐसे दावे झूठे साबित हुए थे और राज्य में एक भी बांग्लादेशी घुसपैठिया नहीं मिला। उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह SIR के माध्यम से आम जनता का मतदान अधिकार छीनना चाहती है।

    अगले हफ्ते सदन में बढ़ेगी राजनीतिक गरमी.

    सत्र का पहला दिन भले ही शोक प्रस्तावों और श्रद्धांजलियों के साथ शांतिपूर्ण रहा हो, लेकिन सदन के बाहर जिस तरह से SIR और नाम परिवर्तन जैसे मुद्दों पर टकराव दिखा, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में सदन की कार्यवाही तीखी बहस और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से भरपूर रहने वाली है।

     

     

  • झारखंड विधानसभा मानसून सत्र की तैयारी तेज़,1 अगस्त से 7 अगस्त तक चलेगा सत्र

    अध्यक्ष ने दिए सख्त निर्देश, मंत्री की चिंता

    The News Post4u.

    झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र 1 अगस्त से 7 अगस्त तक चलेगा और इसे सुचारु व व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष रवीन्द्रनाथ महतो की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई। बैठक में संसदीय कार्य मंत्री सह वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, मुख्य सचिव अलका तिवारी, पुलिस महानिदेशक अनुराग गुप्ता, रांची के एसएसपी व डीआईजी चंदन कुमार सिन्हा, सभी विभागों के सचिव, जनसंपर्क विभाग के प्रतिनिधि और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

    अध्यक्ष ने दिए निर्देश.

    विधानसभा अध्यक्ष रवीन्द्रनाथ महतो ने अधिकारियों से कहा कि सत्र के दौरान किसी भी प्रकार की तकनीकी, प्रशासनिक या सुरक्षा संबंधी समस्या नहीं आनी चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी विभाग समय से पहले तैयारी पूरी कर लें और विधानसभा में आने वाले सभी प्रश्नों के उत्तर तय समयसीमा में उपलब्ध कराएं।

    सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि विधानसभा परिसर की सुरक्षा पूरी तरह चाक-चौबंद होनी चाहिए। आगंतुकों के लिए पास प्रणाली को और सख्त करने तथा CCTV निगरानी को सुदृढ़ करने के निर्देश दिए। उन्होंने आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए एक विशेष त्वरित प्रतिक्रिया दल को तैयार रखने की बात कही।

    इसके अलावा, उन्होंने सदन की कार्यवाही के डिजिटलीकरण, ध्वनि प्रणाली की गुणवत्ता, लाइव प्रसारण, मीडिया कवरेज, विधायकों की सुविधा और आगंतुक प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देने को कहा।

    मीडिया और समन्वय पर विशेष ध्यान.

    अध्यक्ष ने मीडिया प्रतिनिधियों के लिए उचित स्थान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए, ताकि वे बिना किसी असुविधा के सदन की कार्यवाही को कवर कर सकें। साथ ही, सभी विभागों को सत्र के दौरान आपसी समन्वय बनाए रखने का निर्देश दिया गया ताकि जनहित के मुद्दों पर प्रभावी और सार्थक चर्चा हो सके। उन्होंने कहा कि इस बार का सत्र कई महत्वपूर्ण जनहित विषयों पर आधारित होगा, इसलिए सभी संबंधित पक्षों को इसकी गरिमा बनाए रखनी होगी।

    संसदीय कार्य मंत्री की चिंता.

    बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने प्रशासनिक लापरवाही पर नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि पिछले बजट सत्र में शून्यकाल के तहत 391 प्रश्न पूछे गए थे, लेकिन अब तक केवल 31 प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हुए हैं। आश्वासन समिति में 1371 मामले लंबित हैं और निवेदन समिति में 135 में से केवल 9 मामलों के ही उत्तर मिले हैं।

    उन्होंने कहा कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और इससे यह स्पष्ट होता है कि कार्यपालिका सदन के प्रति गंभीर नहीं है। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि जबतक कार्यपालिका समयबद्ध उत्तर नहीं देती, तब तक सदन की गरिमा और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहेंगे।

    इस बैठक के माध्यम से विधानसभा अध्यक्ष और संसदीय कार्य मंत्री ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि इस बार का सत्र पूरी तैयारी और पारदर्शिता के साथ संचालित किया जाएगा। जनहित के सवालों पर गंभीरता से चर्चा हो और विधायकों को संतोषजनक जवाब मिले — यही सत्र की प्राथमिकता रहेगी।

     

  •  ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की ओर एक मजबूत कदम- खुली डिजिटल दुकान

    The News Post4u.

    पलामू जिले के केचकी क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए, मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने वित मंत्री  राधा कृष्ण किशोर और मानिका विधायक रामचंद्र सिंह की उपस्थिती मे  एक डिजिटल दुकान का उद्घाटन किया। यह दुकान स्वयं सहायता समूहों, विशेषकर सखी मंडल की महिलाओं द्वारा वन विभाग के सहयोग से स्थापित की गई है। इस मौके पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीण महिलाओं की उपस्थिति ने आयोजन को खास बना दिया।

    “अबुआ सरकार” की इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को डिजिटल तकनीक के माध्यम से स्वावलंबी बनाना है। इन डिजिटल दुकानों के माध्यम से न केवल आधार कार्ड से संबंधित सेवाएं, बिजली बिल भुगतान, बैंकिंग, मोबाइल रिचार्ज जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी, बल्कि यह ग्रामीण समुदाय की रोजमर्रा की आवश्यकताओं को भी डिजिटल माध्यम से पूरा करेंगी।

    इस पहल से महिलाओं को स्वरोजगार का अवसर मिलेगा, साथ ही वे तकनीकी ज्ञान और सेवा वितरण में भी दक्ष होंगी। यह प्रयास न केवल उनके आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल जागरूकता और सेवा पहुंच को भी मजबूत बनाएगा।

    सखी मंडल की महिलाओं द्वारा उठाया गया यह कदम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगा। यह पहल यह साबित करती है कि यदि महिलाओं को संसाधन, प्रशिक्षण और अवसर मिलें, तो वे समाज में बदलाव की प्रेरक शक्ति बन सकती हैं।

  • झारखंड सरकार खेलों को बना रही विकास की रीढ़, SAJHA बैठक में लिए गए अहम फैसले

    The News Post4u.

    रांची : झारखंड सरकार ने राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास में खेलों की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य सरकार खेल को केवल शारीरिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि युवा सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और सामाजिक समरसता के माध्यम के रूप में देख रही है। इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए सोमवार को झारखंड मंत्रालय में खेल , कला व युवा मामलों के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू  की अध्यक्षता में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ झारखंड (SAJHA) की कार्यकारी समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई।

    इस बैठक में राज्य के खेल परिदृश्य को सशक्त करने की दिशा में कई अहम बिंदुओं पर विचार-विमर्श हुआ। बैठक का फोकस राज्य के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में खेलों की पहुंच और गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर था।

    बैठक के मुख्य बिंदु:

    खेल अवसंरचना का आधुनिकीकरण.
    राज्य के विभिन्न जिलों में खेल मैदानों, स्टेडियमों और प्रशिक्षण केंद्रों के उन्नयन की योजना पर चर्चा की गई। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं का विस्तार प्राथमिकता में रखा गया।

    ग्रामीण व जिला स्तरीय खेल संवर्धन.
    गांव-गांव तक खेलों को लोकप्रिय बनाने और प्रतिभाओं को मंच देने के लिए ब्लॉक और जिला स्तर पर नियमित टूर्नामेंट्स आयोजित करने का प्रस्ताव रखा गया।

    खिलाड़ियों का प्रशिक्षण और सहायता.
    राज्य के उभरते खिलाड़ियों को तकनीकी प्रशिक्षण, पोषण, मानसिक कोचिंग और आर्थिक सहायता जैसे पहलुओं में सहयोग देने की रणनीति बनाई गई।

    खेल नीति और योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन.
    झारखंड की खेल नीति को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए निगरानी तंत्र को और मजबूत करने पर सहमति बनी।

    युवा प्रतिभाओं की खोज और प्रोत्साहन.
    स्कूल और कॉलेज स्तर पर प्रतिभा खोज कार्यक्रम चलाकर योग्य खिलाड़ियों को चिन्हित करने तथा उन्हें विशेष छात्रवृत्ति व कोचिंग देने का प्रस्ताव आया।

    इस अवसर पर यह दोहराया गया कि हेमंत सरकार खेलों को राज्य के भविष्य का निर्माणकर्ता मानती है, और राज्य के हर बच्चे को खेल के माध्यम से आगे बढ़ने का अवसर देना चाहती है। SAJHA की यह बैठक, खेल को समग्र नीति और प्रशासनिक एजेंडा का हिस्सा बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हुई है।

  • अब बिहार में विधान परिषद सदस्यों को भी कहा जाएगा “विधायक”, केंद्र सरकार का बड़ा फैसला

    परवेज़ आलम.

    For The News Post4u.

    पटना :  केंद्र सरकार ने एक अहम निर्णय लेते हुए बिहार विधान परिषद के सदस्यों (MLC) को अब “विधायक” के रूप में संबोधित करने का फैसला लिया है। यह निर्णय न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया को सरल और स्पष्ट बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है, बल्कि इसका उद्देश्य विधानमंडल के दोनों सदनों – विधानसभा और परिषद – के बीच समानता स्थापित करना भी है।

    अब विधान परिषद सदस्य भी होंगे “विधायक”.

    बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने इस बदलाव की पुष्टि करते हुए कहा कि जिस प्रकार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य को आमतौर पर “सांसद” कहा जाता है, उसी तर्ज पर अब विधानसभा और विधान परिषद – दोनों सदनों के सदस्यों को “विधायक” कहा जाएगा।

    उन्होंने बताया कि वर्षों से विधान परिषद के सदस्यों को ‘पार्षद’ के रूप में पहचाना जाता रहा है, जिससे अक्सर भ्रम की स्थिति पैदा होती थी, खासकर उन राज्यों में जहां विधान परिषद जैसी संस्था मौजूद नहीं है। बहुत से लोग MLC को नगर निगम के पार्षद से जोड़ देते थे। ऐसे में यह नया संबोधन आम जनता के बीच समझ को आसान बनाएगा।

    समान दर्जा, बढ़ेगा सम्मान.

    यह निर्णय न सिर्फ भाषाई रूप से स्पष्टता लाएगा, बल्कि विधान परिषद के सदस्यों को भी वही सामाजिक और प्रशासनिक सम्मान दिलाएगा, जो विधानसभा के विधायकों को मिलता है। अब वे भी जनता के बीच “विधायक” की पहचान के साथ कार्य कर सकेंगे।

    दस्तावेजों में भी आएगा बदलाव.

    सरकारी और संवैधानिक दस्तावेजों में अब विधान परिषद के सदस्यों को “विधायक” के रूप में दर्ज किया जाएगा। इससे भाषा में एकरूपता आएगी और संचार में आसानी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम देश भर में एक समान राजनीतिक पहचान की ओर एक महत्वपूर्ण पहल है।

    भविष्य के लिए संकेत.

    इस पहल को एक व्यापक सुधार के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। संभव है कि आने वाले समय में अन्य राज्य भी इसी प्रणाली को अपनाएं, जिससे भारत के संघीय ढांचे में भाषाई और प्रशासनिक एकता और भी सशक्त हो सके।

    यह निर्णय सिर्फ एक शब्द का बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा कदम है जो जन प्रतिनिधियों की पहचान को स्पष्ट, समान और सम्मानजनक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

  • हेमंत सरकार द्वारा अटल क्लिनिक का नाम बदलने पर भड़की बीजेपी

    रघुवर दास ने कहा- सरकार की मानसिक दिवालियापन की निशानी.

    The News Post4u.

    झारखंड में अटल क्लिनिक का नाम बदलकर “मदर टेरेसा एडवांस हेल्थ क्लिनिक” रखने के फैसले के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जमकर विरोध जताया है। शुक्रवार  को राज्य के कई जिलों में भाजपा कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया।

    पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा, “अटल बिहारी वाजपेयी जी जैसे महान नेता के नाम पर शुरू की गई स्वास्थ्य योजना का नाम बदलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और सरकार की गिरती मानसिकता को दिखाता है। सरकार ओछी राजनीति कर रही है।”

    रघुवर दास ने कहा कि वे मदर टेरेसा का सम्मान करते हैं, लेकिन कुछ संस्थाओं के जरिए उनके नाम पर जो काम हुए, वह देश जानता है। उन्होंने आरोप लगाया कि “निर्मल हृदय” संस्था पर नवजात बच्चों की बिक्री जैसे गंभीर आरोप लगे थे। ऐसे में लोगों के मन में सवाल है कि क्या यह नाम परिवर्तन धर्मांतरण की चल रही गतिविधियों से जुड़ा हुआ कदम तो नहीं है?

    उन्होंने आगे कहा कि “यह फैसला अटल जी जैसे राष्ट्र निर्माता को जनता की स्मृति से मिटाने की एक साजिश लगती है। न तो आदिवासी समाज और न ही आम जनता इसे स्वीकार करेगी।”

    पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी सुझाव दिया कि अगर सरकार मदर टेरेसा के नाम पर योजना शुरू करना चाहती थी, तो वह नई योजना लेकर आती। उन्होंने कहा, “पुरानी योजनाओं का नाम बदलकर अपनी नाकामी छुपाने का काम हो रहा है। सरकार स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर कुछ नया करने में असफल रही है।”

    रघुवर दास ने याद दिलाया कि “16 अगस्त 2019 को अटल जी की पुण्यतिथि पर गरीबों को सस्ती और अच्छी स्वास्थ्य सेवा देने के लिए अटल क्लिनिक की शुरुआत की गई थी।” उन्होंने सरकार से मांग की कि “वह अटल क्लिनिक का नाम वापस बहाल करे और इस तरह के राजनीतिक निर्णयों से बचे।”