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  • प्रदीप यादव बने कांग्रेस विधायक दल के नेता

    By -Perwez Alam

    RANCHI: झारखंड की राजनीति में सस्पेंस खत्म हुआ! आखिरकार कांग्रेस ने विधायक दल के नेता और उपनेता के नामों पर मोहर लगा दी है। पोड़याहाट से छठी बार विधायक बने प्रदीप यादव को कांग्रेस विधायक दल नेता चुना गया है, और खिजरी से लगातार दूसरी बार विधायक बने राजेश कच्छप को उपनेता की जिम्मेदारी दी गई है।

    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने विधानसभा स्पीकर रबींद्रनाथ महतो को एक सीलबंद लिफाफे में इन नामों की सूचना दी। वहीं, दूसरी तरफ झामुमो ने भी बड़ा फैसला लेते हुए टुंडी से चार बार के विधायक मथुरा प्रसाद महतो को मुख्य सचेतक की जिम्मेदारी सौंप दी है।

    प्रदीप यादव: सियासत का पुराना खिलाड़ी. 
    प्रदीप यादव की बात करें तो पोड़याहाट की जनता ने उन्हें लगातार छह बार विधानसभा पहुंचाया है। वो कभी बीजेपी का चेहरा रहे, फिर झारखंड विकास मोर्चा के टिकट पर चुनाव जीते, और अब कांग्रेस के नेता के रूप में पहचान बना रहे हैं। उनकी इस राजनीतिक यात्रा ने उन्हें एक अनुभवी और कद्दावर नेता बना दिया है।

    राजेश कच्छप: युवा और ऊर्जावान चेहरा. 
    राजेश कच्छप, जो खिजरी से लगातार दूसरी बार विधायक बने हैं, कांग्रेस के लिए एक युवा और भरोसेमंद नेता माने जाते हैं। उनकी नियुक्ति यह संकेत देती है कि कांग्रेस युवा नेताओं को आगे लाने का मन बना चुकी है।

    झामुमो का दांव: मथुरा प्रसाद महतो बने मुख्य सचेतक
    अब बात झामुमो की। टुंडी से चार बार के विधायक मथुरा प्रसाद महतो को पार्टी ने मुख्य सचेतक बना दिया है। दिलचस्प बात यह है कि मथुरा महतो का नाम पहले कैबिनेट मंत्री पद के लिए चर्चा में था, लेकिन पार्टी ने इस जिम्मेदारी के लिए गोमिया के विधायक योगेंद्र महतो को चुना। योगेंद्र महतो को पेयजल और मध निषेध विभाग सौंपा गया है।

    सियासत का गणित और गठबंधन का संतुलन
    झारखंड की राजनीति में कांग्रेस और झामुमो गठबंधन का संतुलन बनाना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन इन नियुक्तियों से दोनों दलों ने अपने-अपने पत्ते खोल दिए हैं। प्रदीप यादव का अनुभव, राजेश कच्छप की ऊर्जा और मथुरा महतो की लोकप्रियता, सब कुछ अगले चुनाव की रणनीति का हिस्सा है

    झारखंड की सियासत गर्म है और यह तो तय है कि आने वाले दिन और भी दिलचस्प होंगे।

  • I.N.D.I.A की कमान पर मचा घमासान: JMM ने सुझाया फार्मूला

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग ………

    I.N.D.I.A यानी विपक्षी दलों का सबसे बड़ा गठबंधन। इसका नेतृत्व कौन करेगा? ये सवाल अब सियासत के गलियारों में गूंज रहा है। इस बीच झारखंड से झामुमो का बयान आया है। महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने जो कहा, उसका मतलब साफ है—नेतृत्व ऐसा हो जो परिपक्व हो, अनुभव से भरा हो। लेकिन इस बयान के मायने क्या हैं?

    झामुमो का संदेश: नाम नहीं, मगर इशारा साफ। 
    झामुमो ने किसी का नाम नहीं लिया। पर क्या इस बयान का मतलब ममता बनर्जी के समर्थन में है, या कांग्रेस पर सवाल ? झारखंड में सत्ता चला रही।  झामुमो का वजन अब राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ रहा है। हेमंत सोरेन की पार्टी न सिर्फ गठबंधन का अहम हिस्सा है, बल्कि खुद सोरेन I.N.D.I.A की कोर कमेटी में भी हैं।

    सार्वजनिक बहस पर रोक की वकालत
    भट्टाचार्य ने कहा कि नेतृत्व जैसे मुद्दे पर सार्वजनिक मंच से चर्चा नहीं होनी चाहिए। यह इशारा किस तरफ है? हाल के दिनों में लालू यादव और शरद पवार ने ममता बनर्जी के नेतृत्व की वकालत की है। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल भी उठे हैं।

    ममता बनर्जी: विपक्ष की धुरी या सवालों का केंद्र?
    ममता बनर्जी को लेकर विपक्ष में चर्चा गर्म है। बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता, विपक्ष की रणनीति में अहम मानी जाती हैं। पर क्या कांग्रेस इस पर सहमत होगी? राहुल गांधी की हालिया सक्रियता और कांग्रेस का इरादा क्या ममता के पक्ष में जाएगा?

    हेमंत सोरेन का दांव: गठबंधन की सीख। 
    हेमंत सोरेन ने झारखंड में गठबंधन को सफलतापूर्वक संभाला। कांग्रेस, राजद और वाम दलों के बीच तालमेल बैठाया। सीट शेयरिंग से लेकर मंत्री पद तक—हर जगह गठबंधन का धर्म निभाया। झारखंड में यह मॉडल I.N.D.I.A के लिए सबक हो सकता है।

    क्या बोले सियासी संकेत?
    झामुमो का बयान, झारखंड की सीमाओं से आगे जाकर संदेश दे रहा है। विपक्ष को बेहतर समन्वय और तालमेल का रास्ता दिखाने की कोशिश। लेकिन क्या इस ‘परिपक्व और अनुभवी’ नेता की परिभाषा पर सभी दल सहमत होंगे?

    कहानी अभी बाकी है…
    तो सवाल फिर वही है—I.N.D.I.A का नेतृत्व किसके हाथ में होगा? झामुमो का बयान, लालू-ममता की वकालत, कांग्रेस की दुविधा—ये सब इस राजनीति की गहराई को और बढ़ाते हैं।

    नेतृत्व पर निर्णय भले देर से हो, लेकिन एक बात साफ है—यह चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा दांव है। और जब दांव बड़ा हो, तो हर कदम संभलकर उठाना होता है।

  • ‘जीनत’ की दस्तक, जंगलों से शहर तक दहशत ! कौन है ज़ीनत ?

    जमशेदपुर : झारखंड के चाकुलिया एरोड्रम के पास बाघिन ‘जीनत’ की मौजूदगी ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है। सिमलीपाल टाइगर रिजर्व से भागकर आई इस बाघिन ने वन विभाग को खूब दौड़ाया। जीनत के गले में बंधे रेडियो कॉलर से उसके हर कदम की खबर तो मिल रही है, लेकिन उसे पकड़ना अब तक नामुमकिन साबित हो रहा है।

    “जीनत का सफर और गांवों में खौफ”
    ओडिशा से निकलकर गुड़ाबांधा के रास्ते चाकुलिया पहुंची तीन साल की जीनत ने मंगलवार को पूरा दिन गोदराशोल जंगल में बिताया। यह जंगल चाकुलिया शहर से महज दो किलोमीटर दूर है। रेडियो कॉलर के जरिए उसकी हरकतें ट्रैक की जा रही हैं, लेकिन गांवों के लोग अब खौफ में हैं। आसपास के गांव जैसे मोरबेड़ा, राजाबासा, और सानघाटी के लोग घर से बाहर निकलने से डर रहे हैं। यहां तक कि मवेशियों को भी जंगल की ओर नहीं भेज रहे।

    “वन विभाग की टीमें और जीनत की चालाकी”
    जीनत की निगरानी के लिए ओडिशा और झारखंड से वन विभाग की 80 सदस्यीय टीम जुटी है। सिमलीपाल टाइगर रिजर्व से आए विशेषज्ञों की 20 सदस्यीय टीम और चाकुलिया वन क्षेत्र के 60 वनकर्मी अलग-अलग पाली में काम कर रहे हैं। लेकिन जीनत इतनी चालाक है कि दिनभर इन टीमों को चकमा देती रही। वन विभाग की आरसीसीएफ स्मिता पंकज के मुताबिक, “जीनत अब तक सीधी दिशा में बढ़ रही है। वह राजाबासा और गोदराशोल के जंगलों में आराम कर रही है। अगर यह सीधे बढ़ती है तो रेलवे लाइन या रिहाइशी इलाका आ सकता है।”

    “बेहोश करके ओडिशा लौटाने की तैयारी”
    वन विभाग की योजना है कि अगर जरूरत पड़ी तो जीनत को ट्रेंकुलाइज करके सिमलीपाल वापस भेजा जाएगा। विशेषज्ञ एस साई का कहना है कि बाघिन अब तक इंसानों का शिकार नहीं कर चुकी है, जो राहत की बात है। लेकिन उसकी हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

    गांववालों के लिए जीनत सिर्फ एक बाघिन नहीं, बल्कि डर का दूसरा नाम बन गई है। बच्चे घरों में कैद हैं, और झुंड में रहने वाले ग्रामीण जंगल की ओर झांकने तक से कतरा रहे हैं। वन विभाग की टीमें अपनी जगह मुस्तैद हैं, लेकिन जीनत का अगला कदम क्या होगा, ये सवाल सबके दिलों में खौफ पैदा कर रहा है।

  • गिरिडीह के खंडोली में साइबेरियन मेहमानों का स्वागत, झील बनी नयनाभिराम

    परवेज़ आलम
    गिरिडीह का खंडोली पर्यटन स्थल इन दिनों साइबेरियन पक्षियों के स्वागत में सराबोर है। झील के शांत पानी पर तैरते ये सफेद परिंदे और उनके कलरव से खंडोली का माहौल और भी मोहक हो गया है। अक्टूबर-नवंबर में हर साल साइबेरियन पक्षी यहां प्रवास के लिए आते हैं, लेकिन इस बार इनकी संख्या ने लोगों को और भी उत्साहित कर दिया है।

    “झील पर पक्षियों का जलवा”
    साइबेरियन क्रेन, गूज और स्वान की उपस्थिति खंडोली की झील को जैसे जीवंत बना देती है। ये पक्षी तिब्बत, मंगोलिया और मध्य एशिया से हजारों किलोमीटर का सफर तय कर यहां पहुंचते हैं। झील के इर्द-गिर्द हरे-भरे जंगल और पहाड़ियों का सौंदर्य, इन परिंदों की खूबसूरती को और बढ़ा देता है।

    “पर्यटकों के लिए खंडोली बना परिंदों का स्वर्ग”
    पक्षी दर्शन और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए खंडोली इन दिनों हॉटस्पॉट बन गया है। नौका विहार करते हुए पर्यटक इन परिंदों की तस्वीरें लेने से खुद को रोक नहीं पाते। खंडोली झील पर पंछियों के साथ बिताए पल, यहां आने वाले हर व्यक्ति के लिए यादगार बन जाते हैं।

    “प्रकृति को बचाने की गुहार”
    पक्षी शोधकर्ताओं  ने खंडोली जलाशय को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि  ये पक्षी दिसंबर से जनवरी तक यहां प्रवास करते हैं और मार्च के अंत में अपने देश लौट जाते हैं। “प्राकृतिक आवास और सुरक्षा इन पक्षियों के लिए अनिवार्य है। प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए,”

    “साइबेरियन परिंदों के साथ खंडोली का जादू”
    खंडोली की झील इन परिंदों के साथ पर्यावरण प्रेमियों और सैलानियों के लिए एक खूबसूरत तोहफा है। झारखंड के इस छोटे से कोने में हर साल ये मेहमान प्रकृति का जादू बिखेरते हैं। अगर आपने अभी तक इनका दीदार नहीं किया, तो यह मौका हाथ से जाने मत दीजिए।

  • JPSC अध्यक्ष की नियुक्ति पर हाईकोर्ट सख्त

    RANCHI: झारखंड हाईकोर्ट में आज JPSC अध्यक्ष की नियुक्ति से संबंधित रिट याचिका पर सुनवाई हुई। जस्टिस एस.एन. पाठक की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की गंभीरता पर जोर दिया। याचिका के माध्यम से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने अदालत को बताया कि 22 अगस्त से JPSC अध्यक्ष का पद खाली है, जिससे परीक्षाओं और उनकी प्रक्रियाओं में देरी हो रही है।

    “हजारों छात्रों का भविष्य अधर में”
    याचिकाकर्ता ने कोर्ट से गुहार लगाई कि JPSC अध्यक्ष की नियुक्ति में हो रही देरी छात्रों के भविष्य को खतरे में डाल रही है। कोर्ट ने सरकार और JPSC के वकीलों से तुरंत इस समस्या का समाधान निकालने और अध्यक्ष की नियुक्ति के आदेश दिए।

    “पद खाली क्यों, जब अन्य भरे जा रहे हैं?”
    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा, “जब DGP और अन्य महत्वपूर्ण पदों की नियुक्ति तुरंत हो रही है, तो JPSC अध्यक्ष का पद अब तक खाली क्यों है?” कोर्ट ने इस देरी को अनुचित ठहराते हुए कहा कि यह न केवल पॉलिसी का मामला है, बल्कि हजारों बच्चों के भविष्य से जुड़ा हुआ भी है।

    हाईकोर्ट ने सरकार से कहा कि एक पॉपुलर गवर्नमेंट होने के बावजूद, इस तरह की देरी सवाल खड़े करती है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह इस मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए अध्यक्ष की नियुक्ति की प्रक्रिया शीघ्र पूरी करे।

    इस सुनवाई के बाद JPSC और सरकार पर दबाव बढ़ गया है, और अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि नियुक्ति प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होती है।

  • झारखंड में लाल खतरा: CM से विधायक तक सुरक्षा का कड़ा पहरा

    RANCHI:   झारखंड में विधानसभा सत्र के दौरान माहौल तनातनी का है। नक्सली खतरे के अलर्ट ने पुलिस और प्रशासन को चौकन्ना कर दिया है। CM हेमंत सोरेन से लेकर विधायकों तक, हर किसी की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। स्पेशल ब्रांच (SB) की रिपोर्ट ने कई इलाकों को संवेदनशील घोषित किया है।

    “लाल इलाकों की पहचान, सुरक्षा का ब्लूप्रिंट तैयार”
    SB की रिपोर्ट में रांची से लेकर गिरिडीह और गुमला तक, कई इलाकों को खतरनाक बताया गया है। इन रास्तों पर नेताओं के आवागमन के दौरान सुरक्षा कड़ी रहेगी। तैमारा घाटी, चुटूपालू और टाटीझरिया जैसे इलाके लिस्ट में टॉप पर हैं। यहां पुलिस गश्त बढ़ाई जाएगी और लांग रेंज पेट्रोलिंग शुरू होगी।

    “सड़कों पर निगरानी, जंगलों पर नजर”
    सुरक्षा की योजना सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है। रांची-लातेहार, खूंटी-चाईबासा, और गुमला-सिमडेगा जैसे जंगलों वाले रास्तों पर पुलिस की मुस्तैदी और बढ़ा दी गई है। बेतला, अमझारिया और महुआडांड़ घाटियों में पुलिस चौकसी बढ़ गई है। “हर घात को नाकाम करना हमारा लक्ष्य है,” पुलिस अधिकारियों का कहना है।

    “नेताओं पर मंडराता खतरा”
    SB का कहना है कि उग्रवादियों ने पहले भी विधानसभा सत्र के दौरान घटनाओं को अंजाम दिया है। इस बार संभावित हमलों के मद्देनजर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। “सड़क से सदन तक, हर नेता सुरक्षित रहेगा,” प्रशासन ने दावा किया।

    “यहां है सबसे ज्यादा खतरा”
    तैमारा घाटी, चुटूपालू, टाटीझरिया से लेकर चंदवा और बड़कागांव तक, खतरे की लिस्ट लंबी है। इन इलाकों में पुलिस की 24×7 निगरानी रहेगी। गढ़वा, बोकारो और चाईबासा के जंगल भी सूची में शामिल हैं।

    “सरकार का वादा: कोई चूक नहीं”
    इस बार सरकार और प्रशासन नक्सली चुनौतियों को लेकर खासा सतर्क हैं। “हमारे नेता सुरक्षित हैं और रहेंगे,” मुख्यमंत्री कार्यालय का बयान आया है।

    सुरक्षा के इस पुख्ता इंतजाम के साथ झारखंड सरकार ने साफ कर दिया है कि नक्सली खतरों को जवाब देने के लिए वो हर कदम उठाने को तैयार है। अब देखना है कि सुरक्षा की यह दीवार कितनी मजबूत साबित होती है।

  • भाजपा की बैठक में चंपई सोरेन का नया रूप

    RANCHI: मंगलवार को भाजपा विधायक दल की बैठक झारखंड प्रदेश कार्यालय में सजी। माहौल गर्म, चर्चा तीखी, और नेतृत्व दमदार। इस बार मंच पर दिखा चंपई सोरेन का नया अवतार। प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और चंपई सोरेन ने विधायकों को संबोधित किया, लेकिन चर्चाओं का केंद्र रहे चंपई सोरेन।
    “जनादेश हमारा, विपक्ष मजबूत”
    दोनों नेताओं ने साफ-साफ कहा कि जनता ने भले सरकार बनाने का मौका नहीं दिया, लेकिन मजबूत विपक्ष का कंधा हमें सौंपा है। “हम सड़क पर भी लड़ेंगे और सदन में भी, सरकार की गलत नीतियों को उजागर करेंगे,” चंपई ने बुलंद आवाज में कहा।
    “अब वक्त है तैयार होने का”
    चंपई सोरेन ने बिना किसी घुमाव के विधायकों से दो टूक बात की, “चुनाव के नतीजों से बाहर निकलिए और आगे की रणनीति पर ध्यान दीजिए। विपक्ष का काम सिर्फ आलोचना करना नहीं है, बल्कि सकारात्मक कार्यों का समर्थन भी करना होगा। लेकिन जहां गलती होगी, वहां सरकार को घेरने में हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।”
    मरांडी का निशाना: जेएसएससी और सीजीएल परीक्षा में गड़बड़ियां
    प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर सीधा हमला बोला। जेएसएससी और सीजीएल परीक्षाओं में धांधली का आरोप लगाते हुए मरांडी ने सीबीआई जांच की मांग की। उन्होंने कहा, “एक क्रम में अभ्यर्थियों का पास होना, परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। छात्रों में बेचैनी है, सरकार को स्पष्ट करना होगा। भाजपा, छात्र हित में, सड़क से सदन तक आवाज बुलंद करेगी।”
    चंपई का चुनावी खेल
    इस चुनाव में भाजपा ने चंपई सोरेन और उनके बेटे बाबूलाल सोरेन दोनों को मैदान में उतारा। हालांकि, बाबूलाल घाटशिला से हार गए, लेकिन चंपई ने सरायकेला सीट से झामुमो प्रत्याशी गणेश महली को 20,447 वोटों से हराकर परचम लहराया।
    चंपई की जीत न केवल भाजपा के लिए बड़ी राहत है, बल्कि यह भी दिखाता है कि वह अपने क्षेत्र में अब भी अपराजेय हैं। कभी हेमंत सोरेन के खास माने जाने वाले चंपई, अब उनके लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।

    झारखंड की राजनीति एक नए मोड़ पर है। चंपई के नेतृत्व में भाजपा ने विपक्ष के तौर पर अपने इरादे साफ कर दिए हैं। अब देखना है कि यह रणनीति सरकार पर कितना असर डालती है।

  • झारखंड विधानसभा के ऐतिहासिक पल और नई राहें

    परवेज़ आलम की रिपोर्ट……

    झारखंड विधानसभा के पहले सत्र के तीसरे दिन ने इतिहास रच दिया। राज्यपाल संतोष गंगवार के अभिभाषण ने झारखंड की राजनीति और विकास की दिशा को नई ऊर्जा दी। उनके शब्दों ने न केवल सरकार के वादों को पुख्ता किया, बल्कि झारखंड के भविष्य का एक रोडमैप भी सामने रखा।

    महिलाओं के लिए नई उम्मीद
    सबसे बड़ा ऐलान सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33% आरक्षण का रहा। यह कदम झारखंड में महिलाओं के लिए नई संभावनाओं का द्वार खोलने वाला है। चुनावी वादे को निभाते हुए, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि महिलाओं को रोजगार में बराबरी का हक मिले।

    सरना धर्म कोड और आरक्षण पर जोर
    राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में बताया कि झारखंड सरकार ने सरना धर्म कोड बिल पास किया है, जो अब केंद्र की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इसके साथ ही आदिवासियों को 28%, ओबीसी को 27%, और एससी को 12% आरक्षण देने की बात दोहराई गई। यह झारखंड के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम है।

    किसानों और गरीबों के लिए राहत पैकेज
    किसानों को ज़ीरो ब्याज पर लोन देने का ऐलान झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देगा। साथ ही, गरीबों के लिए 7 किलो चावल और 2 किलो दाल उपलब्ध कराने की योजना ने आम जनता की बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता दी है।

    शिक्षा और खेल को मिलेगा बढ़ावा
    राज्यपाल ने घोषणा की कि झारखंड में 500 सीएम स्कूल ऑफ एक्सलेंस और 4,500 पंचायत स्तरीय आदर्श विद्यालय खोले जाएंगे। इन स्कूलों में स्वास्थ्य और संगीत जैसे विषयों के शिक्षक नियुक्त किए जाएंगे। स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी की स्थापना और खिलाड़ियों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के जरिए खेल को भी एक नई पहचान देने का प्रयास किया गया है।

    गांव और शहर में संतुलित विकास
    अबुआ आवास योजना के तहत 25 लाख गरीब परिवारों को तीन कमरों के सुंदर घर मुहैया कराए जाएंगे। शहरी क्षेत्रों में पुराने मकानों के नक्शे का नियमितीकरण भी राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

    वित्तीय मजबूती की ओर कदम
    राज्यपाल ने बताया कि झारखंड सरकार केंद्र और उसकी कंपनियों के बकाए ₹1.36 लाख करोड़ को कानूनी रास्ते से वसूलने का प्रयास करेगी। यह कदम राज्य की आर्थिक स्थिति को स्थिरता देगा।

    सहारा इंडिया के पीड़ित निवेशकों के लिए लड़ाई लड़ने से लेकर नई पेंशन योजना के तहत जमा धनराशि वापस लाने तक, राज्य सरकार ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं।

    झारखंड विधानसभा के इस सत्र ने केवल घोषणाएं नहीं कीं, बल्कि झारखंड के विकास की नई नींव भी रखी। राज्यपाल के शब्दों में उन्नत, समृद्ध, और सुखी झारखंड का सपना झलकता है। अब देखना यह होगा कि ये योजनाएं जमीन पर कैसे उतरती हैं।

  • छठी विधानसभा के पहले सत्र में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी खाली रहेगी, जानिए इसका कारण।

    झारखंड की छठी विधानसभा के पहले सत्र में कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं रहेगा। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने बताया कि पार्टी में अभी तक विधायक दल का नेता तय नहीं किया गया है। पार्टी जल्द ही विधायक दल का नेता तय करेगी। बता दें कि बीजेपी विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और उसके विधायक दल का नेता ही सदन में नेता प्रतिपक्ष बनेगा।

    जल्द होगा विधायक दल के नेता का चयन: बाबूलाल मरांडी
    बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पार्टी के विधायकों के साथ बैठक के बाद विधायक दल के नेता का नाम तय किया जाएगा। उन्होंने कहा कि बीजेपी अपनी पूरी ताकत के साथ सदन में विपक्ष की भूमिका निभाएगी। बीजेपी के पास कुल 21 विधायक हैं, जो सदन में उसे सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनाते हैं।

    9 से 12 दिसंबर तक चलेगा सत्र
    हेमंत सोरेन की सरकार बनने के बाद विधानसभा सत्र सोमवार, 9 दिसंबर से शुरू हुआ। सत्र की समाप्ति 12 दिसंबर को होगी। पहले दिन विधायकों को शपथ दिलाई गई, जिसकी अध्यक्षता प्रोटेम स्पीकर स्टीफन मरांडी ने की। मंगलवार को भी शपथ ग्रहण का सिलसिला जारी रहेगा और इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा।

  • झारखंड में भाजपा का नंबर गेम कमजोर, राज्यसभा मे नहीं मिलेगी सीटें

    परवेज़ आलम की विश्लेषणात्मक  रपट …..

    झारखंड की सियासत में भाजपा के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की शानदार जीत के बाद, भाजपा के लिए राज्यसभा चुनाव में भी राहें कठिन नजर आ रही हैं। सिर्फ 21 विधायकों के साथ, भाजपा की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह राज्यसभा में अपने दम पर किसी भी उम्मीदवार को जीत दिला सके।

    नंबर गेम में पिछड़ती भाजपा.
    राज्यसभा चुनाव में जीतने के लिए 27 विधायकों का समर्थन आवश्यक है। भाजपा के पास वर्तमान में सिर्फ 21 विधायक हैं। एनडीए के घटक दलों—आजसू, जदयू और लोजपा (रामविलास)—को मिलाकर यह संख्या 24 तक पहुंचती है। लेकिन यह आंकड़ा भी जीत के लिए नाकाफी है।

    भाजपा की परेशानी यहां खत्म नहीं होती। अगले पांच साल में राज्यसभा की चार सीटें रिक्त होंगी, जिनमें से दो फिलहाल भाजपा के पास हैं। लेकिन मौजूदा हालात में ये दोनों सीटें महागठबंधन की झोली में जाती दिख रही हैं।

    झामुमो का बढ़ता प्रभाव.
    वर्तमान में राज्यसभा में झारखंड मुक्ति मोर्चा के तीन सदस्य और भाजपा के तीन सदस्य हैं। लेकिन अगर राजनीतिक समीकरण ऐसे ही बने रहे, तो झामुमो-कांग्रेस गठबंधन राज्यसभा में भी अपनी पकड़ मजबूत कर लेगा। यह भाजपा के लिए झारखंड में राजनीतिक हाशिये पर जाने का संकेत हो सकता है।

    समाप्त होती उम्मीदें.
    भाजपा के वर्तमान राज्यसभा सदस्यों में दीपक प्रकाश और आदित्य साहू का कार्यकाल क्रमश: 2026 और 2028 में समाप्त हो रहा है। अगर भाजपा की स्थिति विधानसभा में ऐसी ही रही, तो 2029 तक झारखंड से राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व समाप्त हो सकता है।

    फिलवक्त , शिबू सोरेन, महुआ माजी और सरफराज अहमद झारखंड मुक्ति मोर्चा से और दीपक प्रकाश, आदित्य साहू एवं प्रदीप वर्मा भाजपा से राज्यसभा में सदस्य हैं।

    शिबू सोरेन       झामुमो 21 जून 2026 तक

    दीपक प्रकाश  भाजपा 21 जून 2026 तक

    आदित्य साहू    भाजपा 7 जुलाई 2028 तक

    महुआ माजी     झामुमो 7 जुलाई 2028

    प्रदीप वर्मा       भाजपा 3 मई 2030

    सरफराज अहमद  झामुमो 3 मई 2030

    झारखंड की सियासत का नया अध्याय। 
    झामुमो, कांग्रेस और राजद के गठबंधन ने झारखंड में सत्ता के साथ-साथ अब राज्यसभा पर भी अपनी नज़रें जमा ली हैं। शिबू सोरेन, महुआ माजी और डॉक्टर  सरफराज अहमद जैसे नेता इस स्थिति को मजबूत करने में जुटे हैं। भाजपा के पास अभी समय है, लेकिन सवाल है—क्या वहगठबंधन को चुनौती दे पाएगी?

    भाजपा के लिए अलार्म.
    झारखंड में भाजपा के लिए यह राजनीतिक अलार्म है। विधानसभा और राज्यसभा में कमजोर होती स्थिति पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़े कर रही है। क्या भाजपा इन हालातों से उबरने का रास्ता तलाश पाएगी, या फिर झारखंड की राजनीति में यह गठबंधन उसकी पकड़ को और कमजोर करेगा?