जहरीले सांपों को गले में लपेटकर करते हैं पूजा, नहीं होता जहर का असर

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रांची के बुंडू में सदियों से जारी है अनोखी परंपरा.

द न्यूज़ पोस्ट4यू डेस्क

रांची जिले के बुंडू अनुमंडल क्षेत्र में हर साल मनसा पूजा के मौके पर ऐसा अद्भुत नज़ारा देखने को मिलता है, जिसे सुनकर आम इंसान सहम जाए। यहां श्रद्धालु अपनी आस्था और परंपरा के तहत विषैले सांपों को गले में लपेटते हैं, यहां तक कि उन्हें खुद को डसने तक देते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इन ग्रामीणों पर सांप के जहर का कोई असर नहीं होता। श्रद्धालु इसे नागों की देवी और भगवान शिव की मानस पुत्री मां मनसा की कृपा मानते हैं।

कैसे निभाई जाती है परंपरा?

स्थानीय लोगों के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र के दौरान जब खेती-बाड़ी का काम पूरा हो जाता है, तब गांववाले जंगलों में जाकर जहरीले सांप पकड़कर लाते हैं। इन्हें करीब एक महीने तक घरों में रखकर उनकी सेवा-देखभाल करते हैं। जब मनसा पूजा का समय आता है, तब ये श्रद्धालु उन्हीं सांपों को हाथों में लेकर, शरीर पर लपेटकर और यहां तक कि उनके डसने तक का सामना करते हैं।

पूजा समाप्त होने के बाद इन्हीं सांपों को सम्मानपूर्वक दोबारा जंगलों में छोड़ दिया जाता है। इस दौरान ग्रामीण यह मानते हैं कि मां मनसा की शक्ति के कारण सांप उनके मित्र बन जाते हैं और उनके विष का असर नहीं होता।

सिर्फ सांप नहीं, लोहे की छड़ भी शरीर में भोंकते हैं श्रद्धालु.

मनसा पूजा केवल सांपों तक सीमित नहीं है। इस अवसर पर भक्त अपने शरीर में लोहे की नुकीली छड़ भोंकते हैं। सामान्य व्यक्ति के लिए यह दृश्य विचलित कर देने वाला हो सकता है, लेकिन भक्तों का विश्वास है कि मां मनसा की कृपा से उन्हें दर्द महसूस नहीं होता। ग्रामीणों का कहना है कि इस पूजा से सांपदोष दूर होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

पौराणिक मान्यताएं और मां मनसा का महत्व

हिंदू मान्यता के अनुसार मां मनसा, भगवान शिव की मानस पुत्री और नागों की देवी मानी जाती हैं। उन्हें नागमाता, विष की देवी और कश्यप पुत्री के नाम से भी जाना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि मां मनसा की आराधना करने से सर्पदंश और बिच्छू जैसे विषैले जीव-जंतुओं से सुरक्षा मिलती है।

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र – खासकर पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिलों – में मनसा पूजा बड़े धूमधाम से आयोजित होती है। वहीं पश्चिम बंगाल और सीमावर्ती इलाकों में भी यह प्रमुख त्योहारों में गिनी जाती है।

जांत और झापान : पूजा का खास आकर्षण.

मनसा पूजा के दौरान दो प्रमुख आयोजन – जांत और झापान – होते हैं।

  • जांत में भक्त मंडली वाद्ययंत्रों के साथ मां मनसा के गुणगान करती है, भजन-कीर्तन होते हैं और देवी की कहानियां गीतों के रूप में सुनाई जाती हैं।
  • झापान में श्रद्धालु जहरीले सांपों के साथ हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यह परंपरा केवल दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि देवी के प्रति उनकी गहरी आस्था का प्रतीक है।

बलि और पारंपरिक अनुष्ठान.

मनसा पूजा के दौरान कई जगहों पर बकरे, बतख और मुर्गे की बलि भी दी जाती है। मंदिरों में मां की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती है और चारों ओर मनसा मंगल और जात के गीतों की गूंज सुनाई देती है। पवित्र जलाशयों और नदियों से कलश लाकर मंदिर में स्थापित करने के बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों से पूजा-अर्चना की जाती है।

इस तरह झारखंड का बुंडू इलाका आज भी अपनी सदियों पुरानी लोकपरंपरा को जीवित रखे हुए है, जहां श्रद्धालु विषैले सांपों के साथ खेलते हुए भी अपनी आस्था को सर्वोपरि मानते हैं।

 

The News Post4u

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