परवेज़ आलम.
The News Post4u.
नेमरा / रामगढ़ : झारखंड आंदोलन के जननायक, पूर्व मुख्यमंत्री और दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद अब उनके पुत्र और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने पिता के अंतिम संस्कार से जुड़ी हर धार्मिक प्रक्रिया में पूर्ण रूप से भाग लेने का निर्णय लिया है। वे आगामी दस दिनों तक अपने पैतृक गांव नेमरा में ही रहेंगे और वहीं से राज्य के कार्यों का संचालन भी करेंगे।
बीते मंगलवार को शिबू सोरेन का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनके गांव नेमरा में किया गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता को मुखाग्नि दी थी । परिवार के सूत्रों के मुताबिक, गुरुजी का श्राद्धकर्म 10 दिनों तक चलेगा, और इस अवधि में हेमंत सोरेन पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ हर विधि-विधान में सम्मिलित रहेंगे।
नेमरा में अपने पिता की स्मृतियों के बीच रहना हेमंत सोरेन के लिए एक भावनात्मक अनुभव होगा। वे परिवार के साथ समय बिताते हुए, अपने पिता के संघर्षों और योगदान को आत्मसात करने का अवसर भी प्राप्त कर रहे हैं। यह न केवल एक बेटे की जिम्मेदारी है, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक वारिस की भावनात्मक यात्रा भी है जो अपने पिता की विरासत को संभाल रहा है।
प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह सक्रिय.
मुख्यमंत्री के नेमरा प्रवास को देखते हुए प्रशासनिक व्यवस्था भी पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। नेमरा गांव में सड़क, बिजली, पेयजल और मोबाइल नेटवर्क की समस्याओं को दूर करने के लिए तेज़ी से कार्य किए जा रहे हैं। अंतिम यात्रा के दौरान लाखों लोगों की उपस्थिति से गांव की बुनियादी सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ा था। खासकर मोबाइल नेटवर्क ठप हो जाने और संकरी सड़कों पर घंटों जाम लगने से लोगों को खासी परेशानी हुई।
इस जाम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजद नेता तेजस्वी यादव तक फंस गए थे। भारी भीड़ और अव्यवस्था के बीच सुरक्षा बलों और प्रशासनिक अधिकारियों की चुनौतियाँ कई गुना बढ़ गई थीं।
नेमरा में फिर जुटेगी भीड़.
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, गुरुजी के श्राद्धकर्म के अंतिम दिन एक बार फिर नेमरा में भारी जनसैलाब उमड़ने की संभावना है। लाखों लोग अंतिम बार उनके चित्र पर पुष्प अर्पित करने और परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए वहां पहुँच सकते हैं।
गांव के लोगों का कहना है कि गुरुजी की लोकप्रियता केवल एक नेता के रूप में नहीं थी, बल्कि एक जननायक और प्रेरणा स्रोत के रूप में थी। यही कारण है कि उनकी अंतिम विदाई में न केवल झारखंड, बल्कि बिहार, ओडिशा और बंगाल से भी श्रद्धालु उमड़े थे, और अब उनके श्राद्ध में भी यही दृश्य दोहराया जा सकता है।







