Blog

  • कांग्रेस ने सीपी सिंह की सदस्यता रद्द करने की मांग की, कहा- “मानसिक कुंठा के शिकार हैं विधायक”

    रांची ब्यूरो।
    भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक सीपी सिंह के मुसलमानों को लेकर दिए गए विवादित बयान ने झारखंड की सियासत में तूफान ला दिया है। कांग्रेस ने इस बयान की तीखी आलोचना करते हुए इसे न केवल समाज को बांटने वाला बल्कि राज्य की सांप्रदायिक सौहार्द के लिए गंभीर खतरा बताया है। पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष से मांग की है कि सीपी सिंह की विधान सभा की सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द की जाए।

    प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष शहजादा अनवर ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा विधायक पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “सीपी सिंह मानसिक कुंठा के शिकार हो गए हैं। भाजपा में वे न तो प्रदेश अध्यक्ष बन पाए, न ही विधायक दल के नेता। यही कारण है कि वे निराशा में ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं जो समाज को गहरे तक बांट सकती है।”

    शहजादा अनवर ने भाजपा नेतृत्व और केंद्र सरकार से तीखे सवाल भी पूछे। उन्होंने कहा, “क्या भाजपा अपने वरिष्ठ मुस्लिम नेताओं जैसे शहनवाज हुसैन, मुख्तार अब्बास नकवी, जफर इस्लाम और यहां तक कि बिहार के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान को भी ‘जिहादी’ समझती है? जो मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आज़ादी के लिए जान की बाज़ी लगाई, क्या वे भी भाजपा की नजर में जिहादी थे?”

    इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रदेश मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा, मीडिया चेयरमैन सतीश पाल मुजनी, प्रवक्ता सोन शांति, अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य एम तौसीफ और गजेंद्र सिंह समेत कई नेता मौजूद थे। सभी ने एक सुर में कहा कि ऐसे बयानों को किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    इस बीच कांग्रेस नेता शमशेर आलम ने विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो को पत्र लिखकर सीपी सिंह के बयान की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि जांच में यह बयान सत्य पाए जाते हैं, तो विधानसभा से उनकी सदस्यता रद्द की जाए। शमशेर आलम ने कहा, “एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि होकर सीपी सिंह ने समाज को उस दिशा में धकेलने का काम किया है, जहां न केवल सामाजिक तानेबाने को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि पूरे देश की एकता भी खतरे में पड़ सकती है।”

    कांग्रेस का कहना है कि झारखंड जैसे संवेदनशील राज्य में शांति बनाए रखने के लिए ऐसे बयानों पर तत्काल प्रभाव से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि समाज में नफरत फैलाने की कोशिश करने वालों को सख्त संदेश दिया जा सके।

  • मंत्री हफीजुल हसन ने दी सफाई , भाजपा बर्खास्तगी की मांग पर अड़ी  

    झारखंड की सियासी फिजा इन दिनों एक बयान से राजनीति गरमाई हुई है। राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीजुल हसन का एक कथित बयान— “शरीयत संविधान से ऊपर है” — राजनीतिक हलकों में बीते चार दिनों से हलचल मचा रखा  है। विपक्षी दल भाजपा ने इस बयान को लेकर मंत्री पर सीधा हमला बोला है और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से उनकी तत्काल बर्खास्तगी की मांग की है।

    लेकिन क्या मंत्री ने सचमुच ऐसा कहा था? या फिर बयान को संदर्भ से काट कर, अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुसार परोसा गया? राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप नई बात नहीं, लेकिन जब बात संविधान और धार्मिक मूल्यों की हो, तो सावधानी और संवेदनशीलता दोनों की जरूरत होती है।

    भाजपा का हमला: ‘संविधान से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं’

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस कथन को भारतीय संविधान का अपमान बताते हुए तीखा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि हसन का यह बयान सामाजिक सौहार्द्र के लिए खतरा है और झारखंड जैसे विविधता वाले राज्य में इस तरह की सोच की कोई जगह नहीं हो सकती। मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से साफ शब्दों में मांग की कि हसन को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया जाए।

    मंत्री की सफाई: ‘बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया’

    इस पूरे विवाद के बीच मंत्री हफीजुल हसन ने मीडिया के सामने आकर सफाई दी और कहा कि उनका बयान गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा, “मैं बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बनाए संविधान को सर्वोपरि मानता हूं। मेरी राजनीति हमेशा सामाजिक न्याय, समावेशिता और बराबरी के सिद्धांतों पर आधारित रही है। मैं ऐसे किसी भी बयान का समर्थन नहीं करता जो देश के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध हो।”

    हसन ने आगे जोड़ा, “संविधान ही हमें धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। मेरा विश्वास उसी संविधान पर है, जिसने हमें यह आजादी और अधिकार दिए हैं।”

    भाजपा नेताओं पर पलटवार: ‘नफरत की राजनीति बंद हो’

    हसन ने अपनी सफाई में भाजपा नेताओं पर भी पलटवार किया। उन्होंने कहा, “देश के कई केंद्रीय मंत्री मंच से अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ बातें करते आए हैं— किसी ने ‘गोली मारो’ के नारे लगवाए, तो किसी ने देश छोड़ने की धमकी दी। क्या वह संविधान की रक्षा है या संविधान से खिलवाड़?”

    उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म को लेकर प्रेम होना स्वाभाविक है, लेकिन यह प्रेम दूसरे धर्म के प्रति नफरत नहीं बन जाना चाहिए। “हम सबको अपने-अपने धर्म से लगाव हो सकता है, लेकिन उस लगाव में दूसरों के धर्म का अपमान न हो, यही संविधान की आत्मा है,” उन्होंने कहा।

    “संवैधानिक मूल्यों से नहीं हटूंगा”: हसन का संकल्प.

    बयान के अंत में हसन ने यह स्पष्ट किया कि वे अपने संवैधानिक कर्तव्यों से कभी पीछे नहीं हटेंगे। “मैं झारखंड के हर समुदाय के लिए न्याय, समानता और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हूं। संविधान मेरी राजनीति की धुरी है और वही मेरी सोच की दिशा तय करता है।”

    यह विवाद केवल एक बयान का नहीं है। यह एक बड़े विमर्श का हिस्सा है—धर्म और संविधान के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती का। जब राजनीतिक दल इस संतुलन को अपने-अपने नजरिए से तोड़ते-मरोड़ते हैं, तो सवाल उठता है: क्या वाकई चिंता संविधान की है या उसका इस्तेमाल सियासी लाभ के लिए हो रहा है?

     

  • हेमंत सोरेन का स्पेन-स्वीडन दौरा: झारखंड में निवेश लाने की तैयारी

    रांची: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन 18 अप्रैल से 27 अप्रैल तक एक 11 सदस्यीय उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ स्पेन और स्वीडन के दौरे पर रवाना होंगे। इस विदेश यात्रा का मकसद स्पष्ट है — वैश्विक निवेशकों को झारखंड में निवेश के लिए आमंत्रित करना और राज्य को एक उभरते औद्योगिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत करना। इस यात्रा के लिए मुख्यमंत्री को केंद्र सरकार से राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है।

    निवेश बढ़ाने की रणनीति के तहत दौरा.

    मुख्यमंत्री की यह यात्रा राज्य के उद्योग विभाग के नेतृत्व में की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, यह दौरा “झारखंड में औद्योगिक निवेश के नए रास्ते खोलने” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल स्पेन के मैड्रिड, बार्सिलोना और स्वीडन के गोथेनबर्ग जैसे प्रमुख शहरों में उद्यमियों और कॉर्पोरेट प्रतिनिधियों से मिलेगा।

    मुख्य ठिकाने और कार्यक्रम:

    • 19 अप्रैल: प्रतिनिधिमंडल मैड्रिड पहुंचेगा
    • 21 अप्रैल: प्रमुख कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात
    • 22 अप्रैल:
      • मैड्रिड में खनन और इस्पात क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के साथ बैठक
      • बार्सिलोना में कृषि मंत्रालय के अधिकारियों से संवाद
    • 25 अप्रैल: गोथेनबर्ग (स्वीडन) में क्लीन एनर्जी कंपनियों से मुलाकात
    • 26 अप्रैल: वन-टू-वन बैठकें, संभावित निवेशकों से सीधी बातचीत
    • 27 अप्रैल: भारत वापसी

    दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल नेशनल रिन्यूएबल एनर्जी सेंटर (Spain) भी जाएगा, जो सौर ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी रिसर्च केंद्र है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड की पहचान बनाने की कोशिश.

    मुख्यमंत्री के इस दौरे का एक बड़ा उद्देश्य झारखंड की ब्रांडिंग भी है। राज्य सरकार “हरित ऊर्जा, स्मार्ट सिटी, तकनीकी नवाचार और औद्योगिक विकास” को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक मंचों पर झारखंड की छवि को उभारना चाहती है। इस दौरे से निवेशकों के साथ प्रत्यक्ष संवाद का अवसर मिलेगा, जिससे आगामी परियोजनाओं में साझेदारी की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।

    प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन होंगे शामिल?

    मुख्यमंत्री के साथ जो टीम विदेश यात्रा पर जा रही है, उसमें प्रशासनिक, तकनीकी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन दिखता है। टीम में शामिल हैं:

    • कल्पना सोरेन (विधायक)
    • अलका तिवारी (मुख्य सचिव)
    • अविनाश कुमार (सीएम के अपर मुख्य सचिव)
    • ए.के. रस्तोगी (सेवानिवृत्त आईएफएस)
    • अरवा राजकमल (उद्योग सचिव)
    • राहुल कुमार सिन्हा (एमडी, जेएसएमडीसी)
    • सुशांत गौरव (उद्योग निदेशक)
    • वरुण रंजन (एमडी, जेआईआईडीसीओ)
    • प्रणव कुमार पाल (संयुक्त निदेशक, उद्योग)
    • अजय कुमार सिंह (सीएम के निजी सुरक्षा अधिकारी)

    क्या कहती है यह यात्रा झारखंड की दिशा के बारे में?

    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह दौरा उस बदले हुए दृष्टिकोण का संकेत है जिसमें राज्य सरकार सिर्फ खनन पर निर्भरता छोड़कर हरित ऊर्जा, स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी नवाचार की ओर कदम बढ़ा रही है। यह यात्रा न केवल आर्थिक निवेश की राह खोलेगी, बल्कि झारखंड को वैश्विक मंचों पर एक प्रगतिशील और निवेश-मैत्रीपूर्ण राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में अहम साबित हो सकती है।

     

  •  झारखंड में वक्फ संशोधन कानून नहीं होगा लागू -मंत्री हफीजुल हसन का बड़ा बयान

    BJP पर साधा निशाना

    परवेज़ आलम. 

    झारखंड के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीजुल हसन ने साफ़ तौर पर ऐलान किया है कि झारखंड में वक्फ संशोधित कानून लागू नहीं किया जाएगा। बुधवार को रांची स्थित हज हाउस में आयोजित हज प्रशिक्षण शिविर के दौरान मंत्री ने कहा कि यह कानून मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने की एक कोशिश है, जिसे भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से संसद से पारित कराया है।

    हफीजुल हसन ने इस मौके पर कहा, “यह कानून मुसलमानों को परेशान करने के इरादे से लाया गया है। लेकिन झारखंड में इसे हम लागू नहीं होने देंगे।”

    हज यात्रा की तैयारियों की समीक्षा. 

    हज यात्रा पर रवाना होने वाले झारखंड के आज़मीन-ए-हज के लिए बुधवार को एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन हुआ, जिसमें रांची, खूंटी और सिमडेगा जिलों से आए कुल 248 हज यात्रियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में झारखंड सरकार के स्वास्थ्य मंत्री और राज्य हज कमेटी के चेयरमैन डॉ. इरफान अंसारी भी उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि सरकार हज यात्रियों को हर जरूरी सुविधा उपलब्ध कराएगी।

    “झारखंड से लेकर मक्का-मदीना तक, सरकार हर मोड़ पर ज़ायरीनों के साथ खड़ी रहेगी,” – डॉ. इरफान अंसारी ने कहा। उन्होंने हज यात्रियों से देश में अमन, चैन और भाईचारे की दुआ करने की अपील भी की।

    संसद से पारित हुआ वक्फ संशोधन कानून, देशभर में हो रहा विरोध. 

    हाल ही में संसद में वक्फ संशोधन विधेयक पारित किया गया, जिस पर राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी मिल चुकी है। यानी यह विधेयक अब कानून बन चुका है। इस कानून के खिलाफ देशभर के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह कानून वक्फ संपत्तियों की स्वायत्तता पर हमला है और इससे अल्पसंख्यकों के अधिकारों में कटौती होगी।

    इस साल हज यात्रा पर 1301 जायरीन जाएंगे, रांची से नहीं मिलेगी सीधी उड़ान. 

    राज्य हज कमेटी के कार्यपालक पदाधिकारी आफताब अहमद ने जानकारी दी कि इस साल झारखंड से कुल 1301 हज यात्री मक्का-मदीना के लिए रवाना होंगे। हालांकि, इस बार भी रांची से कोई सीधी उड़ान सेवा उपलब्ध नहीं होगी। हज यात्रियों को पहले कोलकाता जाना होगा, और वहां से वे जेद्दा के लिए उड़ान भरेंगे।

    हज यात्रा पर खर्च और सुविधाएं.

    इस साल एक हज यात्री को लगभग ₹3.58 लाख खर्च करना होगा। इसके अतिरिक्त, कुर्बानी के लिए अलग से राशि देनी होगी। हज यात्रियों की सहायता के लिए 9 स्टेट हज इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए हैं, जिनमें एक महिला इंस्पेक्टर भी शामिल हैं।

    हज प्रशिक्षण शिविर में यात्रियों को हज से जुड़ी प्रक्रियाएं, नियमावली, स्वास्थ्य संबंधी उपायों और यात्रा से जुड़े तमाम जरूरी दिशा-निर्देशों की जानकारी दी गई। शिविर का उद्देश्य हज यात्रा को सुरक्षित, सुव्यवस्थित और सरल बनाना है।

    झारखंड सरकार ने वक्फ संशोधन कानून को राज्य में लागू न करने का ऐलान करके अल्पसंख्यक समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया है कि वह उनके हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। वहीं, हज यात्रा की तैयारियों से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार धार्मिक यात्राओं में सहभागी जनता के लिए गंभीर प्रयास कर रही है, चाहे वह सुविधाओं की बात हो या मार्गदर्शन की।

     

  • झारखंड के बाहर पांव पसारने की तैयारी में JMM, बिहार और बंगाल  की  सीटों पर नजर

    परवेज़ आलम.  

    झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति पर काम कर रही है। हाल ही में रांची के खेलगांव में संपन्न हुए 13वें महाधिवेशन में यह स्पष्ट संकेत मिला कि JMM अब राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के विस्तार को लेकर गंभीर है। इसका सीधा असर बिहार और पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ सकता है ।

    बिहार में JMM की ‘दबाव की राजनीति‘?

    बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और झामुमो ने यहां कम से कम 12 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और अन्य संभावित सहयोगी दलों के साथ तालमेल के पक्ष में है, लेकिन सीटों के बंटवारे पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है।

    गौरतलब है कि झारखंड में राजद और JMM के बीच गठबंधन पहले से है और राजद को हेमंत सरकार में प्रतिनिधित्व भी मिला हुआ है। ऐसे में बिहार में गठबंधन की संभावना तो बनी हुई है, लेकिन JMM अब “बराबरी के साझेदार” के रूप में बात करना चाहता है — और यहीं से तेजस्वी यादव की राजनीतिक गणित गड़बड़ा सकती है।

    JMM जिन 12 सीटों पर नजर बनाए हुए है, वे सभी झारखंड से सटे सीमावर्ती जिले हैं — जमुई, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, भागलपुर और बांका जैसे क्षेत्र, जहां आदिवासी और झारखंडी मूल के लोगों की आबादी भी कम नहीं है। यहां पार्टी के संगठन को पहले से ही सक्रिय करने के निर्देश दिए जा चुके हैं।

    पश्चिम बंगाल में भी रणनीतिक एंट्री

    JMM की रणनीति सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। पार्टी की नजर पश्चिम बंगाल की उन सीमावर्ती आदिवासी बहुल सीटों पर भी है, जहां वह पहले भी उम्मीदवार खड़ा कर चुकी है — जैसे झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा, अलीपुरद्वार, पश्चिम वर्धमान और बीरभूम। पिछली बार भले ही JMM ने आखिरी समय में तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दे दिया था, JMM तृणमूल कांग्रेस से तालमेल कर चुनाव मे आना चाहती है । पर क्या ममता बनर्जी जेएमएम को मनमाफिक सीटें देंगी इस पर सवाल है । बता दें कि इन जिलों में आदिवासी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है और JMM इस आधार पर ममता बनर्जी से सीटें मांग सकता है।

    भाजपा शासित राज्यों पर भी नजर

    JMM की राजनीतिक दृष्टि सिर्फ पड़ोसी गैर-भाजपा राज्यों तक सीमित नहीं है। पार्टी ने ओडिशा और असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में भी अपने संगठन को मजबूत करने की योजना बनाई है। ओडिशा के मयूरभंज, क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों में पार्टी पहले से संगठनात्मक सक्रियता बढ़ा रही है। साथ ही, असम में भी आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान और जनजातीय पहचान की मांग को लेकर आंदोलन शुरू करने की घोषणा की गई है। गौर तलब है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने झारखंड चुनाव के दौरान भाजपा के लिए सक्रिय प्रचार किया था। ऐसे में JMM का यह कदम भाजपा के लिए भी चुनौती बन सकता है।

    राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर झामुमो का कदम

    पार्टी के महाधिवेशन में पारित प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा गया है कि JMM अब केवल झारखंड की पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका निभाने की दिशा में बढ़ेगी। हेमंत सोरेन की यह महत्वाकांक्षा न केवल राज्य की सीमाओं को चुनौती देती है, बल्कि पुराने क्षेत्रीय समीकरणों को भी नया रूप देने की संभावना पैदा करती है।

    राजनीतिक संकेत क्या हैं?

    JMM की इस रणनीति का संदेश साफ है — वह अब ‘सहायक पार्टी’ की भूमिका से आगे बढ़कर खुद को निर्णायक ताकत के रूप में देखना चाहता है। यह तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी जैसे सहयोगियों को असहज कर सकता है, जो अब तक इन इलाकों में अपनी मजबूत पकड़ मानते रहे हैं।

    आने वाले विधानसभा चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि JMM की यह नई रणनीति उसे कितनी सफलता दिला पाती है, और विपक्षी एकता के नाम पर बनते-बिगड़ते रिश्तों पर इसका क्या असर होता है।

  • “क्या अब मुसलमानों को हिन्दू धार्मिक ट्रस्टों में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी-सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम और संवेदनशील सवाल के जरिए वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली बहस को एक नए मोड़ पर पहुंचा दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा – “क्या अब मुसलमानों को हिन्दू धार्मिक ट्रस्टों में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी?” यह सवाल केवल कानूनी नहीं, बल्कि धर्म, समानता और राज्य की तटस्थता से भी जुड़ा हुआ है।

    चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार और के वी विश्वनाथन की बेंच ने इस अधिनियम की कई धाराओं पर गंभीर सवाल उठाए, खासकर ‘वक्फ बाय यूजर’ की धारणा पर।

    क्या है ‘वक्फ बाय यूजर’? और कोर्ट को इसमें आपत्ति क्यों?

    ‘वक्फ बाय यूजर’ एक पारंपरिक इस्लामी अवधारणा है, जिसके अनुसार यदि कोई संपत्ति वर्षों से धार्मिक या समाजसेवी कार्यों के लिए इस्तेमाल हो रही हो, तो उसे वक्फ संपत्ति माना जा सकता है – चाहे इसके आधिकारिक दस्तावेज हों या नहीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया, “ऐसी संपत्तियों को रजिस्टर कैसे किया जाएगा? उनके पास दस्तावेज़ नहीं हैं। इससे संभावित गड़बड़ियाँ भी हो सकती हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हर मामला झूठा है।”

    न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि वे इस प्रथा के पक्ष-विपक्ष में पूर्व ब्रिटिश प्रिवी काउंसिल के फैसलों की समीक्षा कर चुके हैं, जिनमें इस व्यवस्था को मान्यता मिली थी। बेंच का मानना था कि इस धारणा को पूरी तरह से ख़त्म कर देना व्यावहारिक समस्याएँ पैदा कर सकता है।

    केंद्र की दलील और सुप्रीम कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया.

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि “कई मुस्लिम खुद नहीं चाहते कि वे वक्फ अधिनियम के तहत आएं।”

    इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “तो क्या इसका मतलब यह है कि अब आप मुसलमानों को हिंदू धर्मस्थलों के प्रबंधन में शामिल करेंगे? कृपया यह बात स्पष्ट करें।” यह टिप्पणी संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की ओर संकेत करती है।

    बेंच ने यह भी साफ किया कि “100 साल पहले वक्फ घोषित की गई संपत्तियों को मनमाने तरीके से दोबारा वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। कोई भी विधानमंडल किसी न्यायिक निर्णय, आदेश या डिक्री को रद्द नहीं कर सकता – केवल आधार को ही चुनौती दी जा सकती है।”

    क्या यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सुना जाना चाहिए या हाईकोर्ट भेजा जाए?

    बेंच ने याचिकाकर्ताओं और केंद्र से यह भी जानना चाहा कि क्या इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर होनी चाहिए या इसे संबंधित हाईकोर्ट्स को भेजा जाए?

    चीफ जस्टिस खन्ना ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे दो बातें स्पष्ट करें –

    1. क्या यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचार योग्य है?
    2. आप इस कानून में किन प्रमुख मुद्दों पर बहस करना चाहते हैं?

    उन्होंने जोड़ा – “हम यह नहीं कह रहे कि सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार नहीं कर सकता, लेकिन स्पष्टता ज़रूरी है।”

    वरिष्ठ वकीलों की दलीलें: सिब्बल और सिंघवी की आपत्ति.

    याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह अधिनियम असंवैधानिक है क्योंकि यह केवल मुसलमानों को वक्फ बनाने की अनुमति देता है। उन्होंने पूछा – “राज्य यह कैसे तय कर सकता है कि कोई मुसलमान है या नहीं? और यदि कोई पिछले पाँच वर्षों से इस्लाम का पालन कर रहा है तभी वह वक्फ बना सकता है – यह बात राज्य कैसे तय कर सकता है?”

    वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि यह मामला पूरे देश को प्रभावित करता है, इसलिए इसे किसी एक हाईकोर्ट में ट्रांसफर नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार यह एक ‘ऑल इंडिया इश्यू’ है और सुप्रीम कोर्ट को ही इसकी निगरानी करनी चाहिए।

    वक्फ संशोधन अधिनियम 2025: राजनीतिक और कानूनी पृष्ठभूमि.

    वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को संसद के दोनों सदनों से लंबी बहसों के बाद पारित किया गया और 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।

    • राज्यसभा: 128 समर्थन में, 95 विरोध में
    • लोकसभा: 288 समर्थन में, 232 विरोध में

    इस कानून के खिलाफ अब तक 72 याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं, जिनमें प्रमुख नाम हैं:

    • असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM)
    • ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB)
    • जमीयत उलेमा-ए-हिंद
    • DMK
    • कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और मोहम्मद जावेद

    केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की है ताकि कोर्ट कोई भी अंतरिम आदेश पारित करने से पहले केंद्र की दलील सुने।

    वक्फ की कानूनी अवधारणा क्या है?

    वक्फ एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ होता है – किसी संपत्ति को स्थायी रूप से धार्मिक या परोपकारी कार्यों के लिए दान करना। यह संपत्ति किसी मस्जिद, मदरसे, कब्रिस्तान, स्कूल, अनाथालय आदि के लिए इस्तेमाल हो सकती है, लेकिन इसे बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।

    विवाद का मूल बिंदु क्या है?

    विवाद का मुख्य बिंदु ‘वक्फ बाय यूजर’ की मान्यता को समाप्त करना है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह इस्लामी परंपरा का हिस्सा है और इसे अचानक खत्म करना मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है। वहीं सरकार का तर्क है कि इस प्रथा के नाम पर कई फर्जी दावे होते हैं और संपत्तियों पर अवैध कब्जे को वैधता दी जा रही है।

    यह मामला केवल एक कानून की संवैधानिकता नहीं, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मूलभूत सिद्धांतों को परखने वाला बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल – “क्या मुसलमान हिन्दू ट्रस्टों में शामिल हो सकते हैं?” – दरअसल संविधान की आत्मा की परीक्षा है।

    अगली सुनवाई में तय होगा कि यह मामला किस दिशा में जाएगा – लेकिन इतना तो तय है कि ‘वक्फ अधिनियम 2025’ आने वाले समय में देश के धार्मिक और संवैधानिक विमर्श के केंद्र में रहेगा।

  • जस्टिस बी.आर. गवई बनेंगे देश के 52वें CJI, दलित समुदाय से दूसरे न्यायाधीश

    देश की न्यायिक व्यवस्था में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई (B.R. Gavai) भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश होंगे । मौजूदा चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के बाद, जस्टिस संजीव खन्ना ने परंपरा के तहत उनके उत्तराधिकारी के रूप में जस्टिस गवई के नाम की सिफारिश कानून मंत्रालय को भेज दी है। यह कदम भारतीय न्यायपालिका की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है जिसमें वरिष्ठता के आधार पर सर्वोच्च न्यायाधीश का चयन किया जाता है।
    जस्टिस गवई की नियुक्ति कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है। वे भारत के दूसरे दलित मुख्य न्यायाधीश होंगे। इससे पहले न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन इस पद को सुशोभित कर चुके हैं। सामाजिक न्याय और समावेशिता के दृष्टिकोण से यह एक बड़ा कदम है।
    कब संभालेंगे जिम्मेदारी?
    वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना का कार्यकाल 13 मई 2025 को समाप्त हो रहा है। इसके बाद वरिष्ठता क्रम के अनुसार जस्टिस बी.आर. गवई देश के 52वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे। उनका कार्यकाल लगभग छह महीने का होगा, और वे 23 नवंबर 2025 को सेवानिवृत्त होंगे।
    जस्टिस बी.आर. गवई: एक सधी हुई न्यायिक यात्रा. 
    जस्टिस गवई का जन्म 24 नवंबर 1960 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले में हुआ था। उन्होंने 1985 में वकालत की शुरुआत की और अपने प्रारंभिक वर्षों में वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व महाधिवक्ता बैरिस्टर राजा एस. भोसले के मार्गदर्शन में अनुभव प्राप्त किया।
    इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में स्वतंत्र वकालत की और विभिन्न सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थाओं के लिए कानूनी प्रतिनिधि के रूप में सेवाएं दीं। अमरावती नगर निगम, नागपुर नगर निगम और अमरावती विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठानों के लिए वे स्थायी अधिवक्ता रहे।
    सरकारी सेवा और न्यायपालिका में पदोन्नति. 
    जस्टिस गवई अगस्त 1992 से जुलाई 1993 तक सहायक सरकारी वकील और अतिरिक्त पब्लिक प्रॉसीक्यूटर के रूप में काम कर चुके हैं। 17 जनवरी 2000 को उन्हें नागपुर खंडपीठ के लिए पब्लिक प्रॉसीक्यूटर नियुक्त किया गया। इसके तीन साल बाद, 14 नवंबर 2003 को वे बॉम्बे हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश बने और 12 नवंबर 2005 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
    24 मई 2019 को उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति मिली और तब से वे कई संवैधानिक पीठों का हिस्सा रहे हैं, जहाँ उन्होंने ऐतिहासिक निर्णय सुनाए।
    महत्वपूर्ण फैसले जिनमें गवई रहे निर्णायक भूमिका में. 
    जस्टिस गवई सुप्रीम कोर्ट की कई संविधान पीठों का हिस्सा रह चुके हैं, जिनके फैसले देश की संवैधानिक दिशा को तय करने वाले रहे:
    1. अनुच्छेद 370 पर फैसला (2023): पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाने के केंद्र सरकार के फैसले को सर्वसम्मति से सही ठहराया। जस्टिस गवई भी इस पीठ में शामिल थे।
    2. चुनावी बॉन्ड योजना: एक अन्य संविधान पीठ ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक करार दिया। यह निर्णय लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
    3. नोटबंदी मामला (2016): पाँच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से केंद्र की नोटबंदी योजना को वैध ठहराया। इसमें जस्टिस गवई भी शामिल थे।
    4. आरक्षण में उप-वर्गीकरण: सात न्यायाधीशों की पीठ ने 6:1 के बहुमत से फैसला दिया कि राज्यों को अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण का अधिकार है, ताकि अधिक पिछड़े वर्गों को लक्ष्यित लाभ मिल सके।
    5. मध्यस्थता कानून में व्याख्या: पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर किसी अनुबंध में मुहर न लगी हो तो भी उसमें मध्यस्थता क्लॉज लागू हो सकता है। इससे व्यवसायिक विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया आसान हुई।
    6. बुलडोजर कार्रवाई पर दिशा-निर्देश: जस्टिस गवई की अध्यक्षता में पीठ ने यह ऐतिहासिक आदेश दिया कि बिना ‘कारण बताओ नोटिस’ के किसी भी संपत्ति को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। 15 दिन का समय देना अनिवार्य होगा।
    7. वन एवं पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई: वर्तमान में जस्टिस गवई उस पीठ का नेतृत्व कर रहे हैं, जो वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अहम मुद्दों पर सुनवाई कर रही है।
    जस्टिस बी.आर. गवई की मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति सिर्फ वरिष्ठता का पालन नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्यायपालिका में सामाजिक समावेशिता और न्यायिक योग्यता का प्रतीक भी है। उनका अब तक का न्यायिक सफर, कानूनी दृष्टिकोण और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता यह दर्शाती है कि न्याय का चक्र अब और भी सशक्त हाथों में सौंपा जा रहा है।

  • जेल की सलाख़ें से निकल कर हेमंत सोरेन मज़बूत नेता बन कर उभरे

    हेमंत सोरेन के जीवन पर एक नज़र.

    परवेज़ आलम

    रांची, झारखंड : “क्या एक नेता का जेल जाना, उसकी छवि को तोड़ता है या निखारता है? क्या संघर्ष की आग में तपकर ही असली नेता बनता है? और क्या झारखंड अब एक नए नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, या पुराने नामों का ही नया संस्करण देख रहा है?”

    ये सवाल तब ज़्यादा ज़रूरी हो जाते हैं, जब एक नेता जेल से बाहर आते ही न सिर्फ़ फिर से मुख्यमंत्री बनता है, बल्कि अब पूरे संगठन की कमान भी संभाल लेता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हेमंत सोरेन की, जो अब झारखंड मुक्ति मोर्चा के नए केंद्रीय अध्यक्ष हैं। एक दौर में छात्र मोर्चा से राजनीति की शुरुआत करने वाला नौजवान, आज पार्टी का सर्वोच्च चेहरा बन चुका है।

    “हेमंत नहीं रुके, थमे नहीं, झुके नहीं…”

    जेल गए, लेकिन लड़ाई नहीं छोड़ी। 5 महीने के राजनीतिक वनवास के बाद जब हेमंत बाहर आए, तो सिर्फ़ एक नेता नहीं, एक प्रतीक बनकर उभरे — सत्ता के दमन के ख़िलाफ़, अपने अधिकारों के लिए लड़ते झारखंडी स्वाभिमान के प्रतीक।

    हेमंत सोरेन की कहानी कोई सामान्य राजनीतिक यात्रा नहीं है। यह कहानी है नेमरा के एक किसान परिवार से उठे उस बेटे की, जिसने राजनीतिक विरोधियों से लेकर सत्ता तक, सबका सामना किया।

    और अब, 2025 की गर्मियों में — शिबू सोरेन के 38 साल लंबे अध्यक्षीय कार्यकाल का अंत कर, बेटे हेमंत ने वह कुर्सी संभाल ली है, जो कभी उनके पिता के लिए भी संघर्षों की तपिश में गढ़ी गई थी।

    जनता का सवाल — “जेल से नेतृत्व तक, क्या यही लोकतंत्र की परिभाषा है?”

    झारखंड की जनता जानना चाहती है — क्या खनन घोटाले में जेल जाना, राजनीतिक साज़िश थी या सच्चाई?

    लेकिन सच्चाई ये है कि हेमंत जब जेल से बाहर आए, तो पार्टी और ज़्यादा संगठित दिखी। कल्पना सोरेन, उनकी पत्नी, सामने आईं — एक नेता के रूप में, एक रणनीतिकार के रूप में। ये कोई साधारण वापसी नहीं थी, ये एक जोड़ी की ताक़त थी — जिसने सत्ता को फिर से अपनी मुट्ठी में किया।

    संघर्ष की जड़ें — नेमरा से बरहेट तक का रास्ता आसान नहीं था

    नेमरा गांव का एक बच्चा, जो सरकारी स्कूल में पढ़ा, पटना में इंटर तक पहुंचा, और बीआईटी मेसरा जैसे संस्थान में दाखिला लेकर भी राजनीति की पुकार पर पढ़ाई छोड़ दी — आज उसी का नाम झारखंड की हर पंचायत में गूंज रहा है।

    2005 में जब पहली बार चुनाव लड़े, तो हार मिली। खुद के ही दल के सीनियर नेता ने हराया। लेकिन यही वो समय था जब हेमंत ने सीखा — राजनीति में सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है? धैर्य।

    2009 में भाई दुर्गा सोरेन की मौत ने हेमंत को परिवार और राजनीति — दोनों का उत्तराधिकारी बना दिया।

    सियासत का सवाल — “क्या JMM अब हेमंत की पार्टी है?”

    जब दिशोम गुरु यानी शिबू सोरेन ने हेमंत के नाम का प्रस्ताव रखा, तो हज़ारों कार्यकर्ताओं ने नारा लगाया — “हेमंत ही भविष्य है!”

    JMM की केंद्रीय समिति में अब 289 सदस्य हैं। लेकिन सवाल ये भी है — क्या ये सिर्फ़ एक खानदान की विरासत है, या जनआंदोलन की नई शक्ल?

    झारखंड की जनता का सवाल — “कितना बदलेगा हेमंत का झारखंड?”

    2019 में उन्होंने भाजपा को सत्ता से बेदखल किया, 2024 में जेल से आकर फिर मुख्यमंत्री बने। अब पार्टी की कमान भी उन्हीं के हाथ में है। लेकिन क्या इससे झारखंड की ज़मीन पर बदलाव आएगा?

    क्या आदिवासियों की ज़मीन बचेगी? क्या युवाओं को रोज़गार मिलेगा? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर नई नीति बनेगी?

    या फिर, ये भी वही राजनीति निकलेगी — चेहरे बदलते रहेंगे, हालात वही रहेंगे?

     

  • हेमंत सोरेन बने झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष, शिबू सोरेन ने सौंपी विरासत

    परवेज़ आलम.

    झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। 2025 में हुए पार्टी के 13वें महाधिवेशन में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सर्वसम्मति से झामुमो का केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया। यह निर्णय पार्टी के लिए एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है, जहां 38 वर्षों तक अध्यक्ष रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने पुत्र को पार्टी की बागडोर सौंपी।

    महाधिवेशन का आयोजन रांची के खेलगांव में हुआ, जहां हजारों की संख्या में कार्यकर्ता और प्रतिनिधि मौजूद थे। पार्टी के वरिष्ठ नेता नलिन सोरेन ने शिबू सोरेन को संस्थापक संरक्षक के रूप में प्रस्तावित किया, जिसका समर्थन मथुरा महतो ने किया। इसके बाद शिबू सोरेन ने मंच से हेमंत सोरेन को पार्टी का केंद्रीय अध्यक्ष घोषित किया। घोषणा के तुरंत बाद, मंच पर मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तालियों और नारों से नए अध्यक्ष का जोरदार स्वागत किया।

    पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की घोषणा. 

    महाधिवेशन में झामुमो की नई केंद्रीय समिति की भी घोषणा की गई, जिसमें कुल 284 सदस्य शामिल किए गए। जिलावार रूप से साहिबगंज, दुमका और रांची सहित विभिन्न जिलों से सदस्यों को चुना गया। प्रमुख नामों में खुद हेमंत सोरेन, पंकज मिश्रा, शिबू सोरेन, नलिन सोरेन, बसंत सोरेन, मधु मंसूरी और महुआ माजी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

    हेमंत सोरेन की राजनीतिक यात्रा. 

    हेमंत सोरेन का राजनीतिक सफर संघर्ष, धैर्य और रणनीतिक दूरदर्शिता से भरा रहा है। 2003 में छात्र मोर्चा से शुरुआत करने वाले हेमंत पहली बार 2009 में राज्यसभा के लिए चुने गए। उसी वर्ष दुमका से विधानसभा चुनाव जीतकर राज्य की राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज की। 2010 में वे उपमुख्यमंत्री बने और 2013 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने पार्टी को शानदार सफलता दिलाई, जिसके कारण वे झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री बने।

    हालांकि उनका सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 2024 में उन्हें ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया, जिससे उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। लेकिन जमानत पर बाहर आने के बाद वे फिर से चुनावी मैदान में उतरे और झामुमो के नेतृत्व में INDIA गठबंधन को रिकॉर्ड 56 सीटें दिलाकर सत्ता में वापसी की।

    कल्पना सोरेन की भूमिका. 

    इस कठिन दौर में हेमंत की पत्नी कल्पना सोरेन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब हेमंत जेल में थे, तब कल्पना ने पार्टी के लिए स्टार प्रचारक के रूप में प्रचार किया। उन्होंने न केवल कार्यकर्ताओं को संगठित किया, बल्कि महिला मतदाताओं में भी झामुमो के लिए समर्थन जुटाया। उनके समर्पण और संगठन क्षमता ने हेमंत को जेल से बाहर आने के बाद एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित करने में मदद की।

    झामुमो का भविष्य: राष्ट्रीय विस्तार की योजना. 

    राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत सोरेन ने पार्टी के विस्तार की योजनाओं की घोषणा की। उनका लक्ष्य झारखंड के बाहर, विशेषकर ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में झामुमो को मजबूत करना है। उनका मानना है कि झामुमो सिर्फ एक पार्टी नहीं बल्कि एक आंदोलन है, जिसे राष्ट्रीय मंच पर ले जाने की जिम्मेदारी अब उनकी है।

    नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव. 

    शिबू सोरेन ने 1972 में झामुमो की स्थापना की थी। उनके नेतृत्व में पार्टी ने आदिवासी अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और झारखंड राज्य की मांग को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। अब यह विरासत हेमंत सोरेन के हाथों में है, जो इसे आधुनिक दौर की राजनीति में नई पहचान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

    हेमंत सोरेन का नेतृत्व केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि वैचारिक रूप से भी पार्टी को नई दिशा देगा। उन्होंने अपने पहले दो कार्यकालों में जनहितकारी योजनाएं लागू की, जैसे “अबुआ आवास योजना”, महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता और आरक्षण नीति में बदलाव। इन पहलों ने उन्हें जनता के बीच एक जननेता के रूप में स्थापित किया।

    हेमंत सोरेन का केंद्रीय अध्यक्ष बनना न केवल झामुमो के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि झारखंड की राजनीति में स्थिरता और निरंतरता का संकेत भी है। शिबू सोरेन की विरासत को आगे बढ़ाते हुए, हेमंत एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी—पार्टी की मूल विचारधारा को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर झामुमो को मजबूती प्रदान करना।

  • झामुमो के संविधान में बड़े बदलाव के संकेत : हेमंत सोरेन अध्यक्ष, शिबू सोरेन को संस्थापक संरक्षक का पद

    रांची में आयोजित झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के 13वें महाधिवेशन मे  एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए दिशोम गुरु शिबू सोरेन को   “संस्थापक संरक्षक” का नया पद दिया  है। वहीं अब तक कार्यकारी अध्यक्ष रहे हेमंत सोरेन को सर्वसम्मति से पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है । इस निर्णय पर मंगलवार को फ़ाइनल  मुहर लगेगी ।

    खेलगांव में दिखा झामुमो कार्यकर्ताओं का जोश, जय झारखंड के गगनभेदी नारे. 

    रांची के खेलगांव में चल रहे इस दो दिवसीय महाधिवेशन में राज्यभर से आए लगभग 3500 प्रतिनिधियोंकी उपस्थिति रही। जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व्हीलचेयर पर गुरुजी यानी शिबू सोरेन को मंच तक लेकर पहुंचे, तो पूरा पंडाल “जय झारखंड” के नारों से गूंज उठा।

    हालांकि स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के बावजूद शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन पूरे कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद रहे। उन्होंने हाथ उठाकर उपस्थित कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद भी दिया। इस भावुक क्षण ने उपस्थित सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गहरे तौर पर प्रेरित किया।

    मंगलवार को लगेगी अंतिम मुहर, नई केंद्रीय समिति का गठन भी होगा. 

    महाधिवेशन के दूसरे और अंतिम दिन, इस संशोधन प्रस्ताव पर औपचारिक मुहर लगेगी। इसके साथ ही पार्टी की नई केंद्रीय समिति का भी गठन किया जाएगा, जो आने वाले वर्षों में संगठन की दिशा और रणनीति तय करेगी।

    हेमंत सोरेन की नेतृत्व यात्रा: संदेह से सम्मान तक. 

    2015 के जमशेदपुर महाधिवेशन में जब हेमंत सोरेन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था, तब उनके नेतृत्व को लेकर सवाल उठाए गए थे। लेकिन उन्होंने न केवल संगठन को मजबूत किया, बल्कि 2019 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी शिकस्त दी।

    विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने ‘संघर्ष यात्रा’ निकाल कर रघुवर दास सरकार के खिलाफ जनमत तैयार किया। परिणामस्वरूप झामुमो के नेतृत्व में गठबंधन ने सत्ता में वापसी की और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।

    इसके बाद हुए उपचुनावों में भी झामुमो ने बढ़त बरकरार रखी। जेल में रहते हुए भी उन्होंने गठबंधन के लिए ऐतिहासिक जीत दर्ज करवाई – पांचों आदिवासी आरक्षित लोकसभा सीटें झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने जीतीं।

    2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी को 34 सीटों पर जीत दिलाई और कांग्रेस, राजद, वाम दलों के साथ मिलकर 56 सीटों के बहुमत से दोबारा सरकार बनाई।

    “देश ने देखा – झामुमो सिर्फ राज्य बना नहीं सकता, चला भी सकता है” – हेमंत सोरेन. 

    महाधिवेशन के उद्घाटन भाषण में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झामुमो की ऐतिहासिक भूमिका और झारखंड आंदोलन के बलिदानों को याद किया। उन्होंने कहा:

    “झारखंड को अलग राज्य बनाने का सपना हमारे दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में साकार हुआ। आज वह सपनों का झारखंड बनाने की जिम्मेदारी हमारी है।”

    उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि राज्य के गठन के बाद की सरकारें जनभावनाओं से विमुख रहीं – किसानों की आत्महत्याएं, भूख से मौतें, और सांप्रदायिक तनाव इसी का परिणाम थे।

    उन्होंने झामुमो के नेतृत्व को जन-आंदोलनों से उपजी शक्ति बताते हुए कहा:

    “झारखंड न तो कभी झुका है और न कभी डरा है। हमने देश की सबसे बड़ी पार्टी को भी चुनौती दी और सफल होकर दिखाया।”

    आपकी बदौलत बदला राज्य का भविष्य’ – कार्यकर्ताओं से बोले हेमंत. 

    हेमंत सोरेन ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह जीत केवल किसी एक नेता की नहीं, बल्कि झामुमो के हर जुझारू सिपाही की जीत है। उन्होंने आह्वान किया कि अब चुनौती सिर्फ सत्ता में आना नहीं, बल्कि गांव-गरीब के जीवन में बदलाव लाना है।

    “हमारा उद्देश्य है झारखंड के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना। ये महाधिवेशन पहले से कहीं ज्यादा भव्य है, और यह हमारी जिम्मेदारियों को और बड़ा करता है।”

    16 राजनीतिक प्रस्ताव पारित, बाबा साहेब के नाम पर प्रांगण

    महाधिवेशन की शुरुआत शिबू सोरेन ने की। पहले दिन राज्य सरकार के मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने 108 पन्नों का सांगठनिक दस्तावेज पेश किया, जबकि स्टीफन मरांडी ने 16 राजनीतिक प्रस्ताव पेश किए जिन्हें पारित किया गया।

    इस आयोजन स्थल को “बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर प्रांगण” नाम दिया गया, और इसका संचालन अध्यक्षीय समिति के सदस्य विनोद पांडेय ने किया।झामुमो के इस महाधिवेशन ने न केवल संगठनात्मक बदलावों की आधारशिला रखी है, बल्कि झारखंड की राजनीति में पार्टी की दीर्घकालीन भूमिका को भी और अधिक स्पष्ट कर दिया है। शिबू सोरेन की विरासत को अब हेमंत सोरेन और नए नेतृत्व ने पूरी तरह से संभाल लिया है – और उनकी रणनीति साफ है: सत्ता में बने रहना नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना।