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  • झारखंड में आतंकी नेटवर्क का खुलासा – रांची से लेकर धनबाद तक फैला था जाल !

    परवेज़ आलम.  

    धनबाद/रांची।  झारखंड आतंकवाद निरोधक दस्ता [एटीएस] ने राज्य में आतंक के खिलाफ बड़ी कामयाबी हासिल की है। वासेपुर से गिरफ्तार की गई महिला संदिग्ध शबनम परवीन न केवल अलकायदा, आईएसआईएस और हिज्ब-उत-तहरीर जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों से जुड़ी रही, बल्कि इन संगठनों के झारखंड मॉड्यूल को सक्रिय रूप से संचालित करने में भी अहम भूमिका निभा रही थी।

    जांच में यह साफ हुआ है कि शबनम युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा के जरिए बहला-फुसलाकर आतंकी संगठनों में भर्ती करने का काम कर रही थी। खासकर 18 से 25 वर्ष की आयु के मुस्लिम युवाओं को वह धर्म के नाम पर गुमराह करती थी।

    चार आधार कार्ड, चार अलग उम्रें – असली पहचान पर सस्पेंस.

    एटीएस की छापेमारी के दौरान शबनम के पास से चार अलग-अलग आधार कार्ड बरामद हुए हैं, जिनमें उसकी उम्र अलग-अलग — 20, 25, 28 और 32 वर्ष दर्ज है। इससे स्पष्ट है कि वह पहचान छिपाने और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के नेटवर्क से भी जुड़ी हुई थी।

    शबनम धनबाद के गोविंदपुर की रहने वाली बताई जा रही है, लेकिन उसके मूल घर के बारे में पुलिस को कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली है। उसने आयान जावेद नामक युवक से प्रेम विवाह किया था, जो खुद भी एक संदिग्ध आतंकी है। लेकिन शादी के बाद वह जावेद के साथ अमन सोसायटी के घर में न रहकर शमशेर नगर में किराए के मकान में रह रही थी। यहीं से वह साइबर कैफे के माध्यम से युवाओं को प्रभावित करने का कार्य करती थी।

    झारखंड में आतंकी नेटवर्क का खुलासा – रांची से लेकर धनबाद तक फैला था जाल

    शबनम अकेली नहीं थी। गौरतलब है कि एटीएस की ओर से 26 अप्रैल को धनबाद में छापेमारी कर प्रतिबंध आतंकी संगठन के आतंकी शबनम के साथ गुलफाम हसन, अयान जावेद, और मोहम्मद शहजाद आलम  को गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।

    इनके पास से दो पिस्तौल, 12 जिंदा कारतूस, आतंकी संगठनों से जुड़े कई दस्तावेज, किताबें, और मोबाइल-लैपटॉप बरामद किए गए हैं।

    हथियारों का लेन देन ये लोग करते ही थे, लेकिन मूल काम युवाओं को आतंकी संगठनों से जोड़ना था। इसी माड्यूल पर रांची से गिरफ्तार हुआ डॉ. इश्तियाक भी काम करता रहा है।

    झारखंड एटीएस की टीम बुधवार को धनबाद के वासेपुर से गिरफ्तार आतंकी संगठन हिज्ब उत तहरीर से जुड़े महिला समेत चार संदिग्धों को तीन दिन की रिमांड पर ली थी । एटीएस की टीम ने न्यायालय में चारों संदिग्धों को रिमांड पर लेने के लिए आवेदन दिया था। आवेदन पर सुनवाई के बाद न्यायालय ने तीन दिन तक रिमांड दी है। अब इनसे एटीएस की टीम तीन दिन तक लगातार पूछताछ करेगी और उनके इरादों के साथ ही उनके संबंधों को की भी जांच की जाएगी। इसके अलावा एटीएस की टीम चारों संदिग्धों के विदेशी संबंधों की भी जांच करेगी।

    रिमांड मिलने के बाद टीम बुधवार को चारों संदिग्धों को बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा से एटीएस की टीम अपने साथ ले गई। इसके तुरंत बाद एटीएस ने चारों संदिग्धों से एटीएस ने पूछताछ शुरू कर दी है। मिली जानकारी के अनुसार, शुक्रवार शाम तक एटीएस उनसे पूछताछ करेगी।

    अम्मार यासर की गिरफ्तारी – इंडियन मुजाहिदीन से लेकर हिज्ब-उत-तहरीर तक का कनेक्शन.

    झारखंड एटीएस ने अम्मार यासर नामक एक संदिग्ध को भी गिरफ्तार किया है, जो पहले इंडियन मुजाहिदीन से जुड़ा रहा है। वर्ष 2014 में जोधपुर से गिरफ्तार हुआ था । यासर, हाल ही में 2024 में जेल से रिहा होने के बाद फिर से आतंकी गतिविधियों में सक्रिय हो गया था और हिज्ब-उत-तहरीर के झारखंड मॉड्यूल का हिस्सा बन गया। अयान जावेद से पूछताछ में अम्मार यासर का नाम सामने आया, जिसके आधार पर उसे गिरफ्तार किया गया। झारखंड के डीजीपी अनुराग गुप्ता ने इसकी गिरफ्तारी की पुष्टि की है

    क्या है ‘हिज्ब-उत-तहरीर‘?

    1953 में यरुशलम में गठित यह आतंकी संगठन एक इस्लामिक खिलाफत स्थापित करने के उद्देश्य से काम करता है। भारत में यह संगठन 2010 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसका मकसद लोकतांत्रिक सरकारों को गिराकर कट्टरपंथी इस्लामिक शासन लागू करना है।

    एटीएस की सतर्कता से टला खतरा, जांच अब विदेशी लिंक पर. 

    झारखंड एटीएस की सघन कार्रवाई से एक बड़े आतंकी नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। एटीएस अब इन सभी संदिग्धों के विदेशी कनेक्शन की पड़ताल में जुटी है। शुरुआती पूछताछ में कुछ अहम जानकारियां सामने आई हैं, लेकिन यह जांच अभी जारी है।
    झारखंड जैसे शांत राज्य में आतंक की ये घुसपैठ बेहद चिंताजनक है। युवाओं को धर्म के नाम पर भटकाना, फर्जी दस्तावेज बनाना और विदेशी संगठनों से जुड़ना — ये सारी गतिविधियां अब जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ एक मॉड्यूल था? या फिर एक बड़ा नेटवर्क धीरे-धीरे सामने आने वाला है?

  • झारखंड में मौसम ने ली अचानक करवट: तेज आंधी-बारिश से दिन में रात हो गई

    गिरिडीह /रांची।  झारखंड में मौसम ने अप्रत्याशित रूप से करवट ली है। चिलचिलाती धूप और 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के बीच लोग  बेहाल थे, वहीं अब आसमान में घने काले बादलों ने डेरा जमा लिया है और कई जिलों में तेज आंधी के साथ झमाझम बारिश ने लोगों को गर्मी से बड़ी राहत दी है।

    दिन में छाया अंधकार, चालकों को जलानी पड़ी हेडलाइटें.

    हजारीबाग, रांची, धनबाद, गिरिडीह और पाकुड़ समेत झारखंड के कई जिलों में दोपहर के समय ही ऐसा नजारा देखने को मिला मानो दिन में रात उतर आई हो। घने काले बादलों और धूलभरी आंधी के कारण दृश्यता काफी कम हो गई, जिससे सड़क पर चलने वाले वाहनों को हेडलाइट जलाकर चलना पड़ा।

    हजारीबाग में स्थिति इतनी विकट हो गई कि तेज तूफान के दौरान एक पेड़ एक चलती कार पर गिर पड़ा, जिससे एक दंपति के घायल होने की खबर है। वहीं, कई इलाकों में बिजली के पोल गिरने और कच्चे मकानों को नुकसान पहुंचने की सूचना भी सामने आई है।

    बारिश और तूफान से तापमान में भारी गिरावट.

    राज्य में तेज हवाओं की गति 50-60 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई। इसके बाद झमाझम बारिश ने मौसम को ठंडा बना दिया। रांची और इसके आसपास के क्षेत्रों में अचानक बारिश शुरू होने से गर्मी से परेशान लोगों को राहत मिली। मौसम विभाग के अनुसार, आने वाले कुछ दिनों तक राज्य के कई हिस्सों में इसी तरह का मौसम बना रहेगा।

    मौसम विभाग का अलर्ट: अगले कुछ दिन राहत, फिर लौटेगी गर्मी

    भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही अलर्ट जारी किया था कि झारखंड के विभिन्न जिलों में तेज हवाओं के साथ बारिश की संभावना है। अब एक नया अपडेट जारी करते हुए मौसम विभाग ने चेताया है कि यह राहत अस्थायी है। मई के दूसरे सप्ताह से एक बार फिर भीषण गर्मी और लू का प्रकोप झारखंड में देखने को मिलेगा, जब तापमान 45 डिग्री के पार जा सकता है।

    गिरिडीह में झमाझम बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त.

    गिरिडीह में भी तेज हवाओं और बारिश से जनजीवन प्रभावित हुआ है। बाजारों में सन्नाटा पसर गया और सड़कों पर वाहन कम नजर आए।
    झारखंड के मौसम में आया यह अचानक बदलाव न केवल लोगों को चिलचिलाती गर्मी से राहत दे रहा है, बल्कि कुछ क्षेत्रों में यह नुकसानदेह भी साबित हो रहा है। प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमों को अलर्ट रहने की जरूरत है क्योंकि अगले कुछ दिनों में भी मौसम इसी तरह अनिश्चित बना रह सकता है।

  • झारखंड में राशन व्यवस्था पर ओटीपी की नई शर्त: तकनीक के जाल में उलझे भूख से जूझते लोग

    By The News Post4U

    चाईबासा/लातेहार – झारखंड के ग्रामीण इलाकों में राशन जैसी बुनियादी जरूरत को हासिल करना अब सिर्फ पात्रता या ज़रूरत की बात नहीं रही। अब इसके लिए आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर और उस पर आने वाला ओटीपी यानी ‘वन टाइम पासवर्ड’ जरूरी हो गया है। यह सुनने में एक तकनीकी प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन ज़मीन पर इसके नतीजे भूख, अपमान और असहायता के रूप में सामने आ रहे हैं।

    लातेहार जिले की हमीदा बीबी (39) की कहानी इस व्यवस्था की जमीनी सच्चाई बयां करती है। हमीदा जुलाई 2024 में अपने दो नाबालिग बेटों का नाम राशन कार्ड में जुड़वाने के लिए जन सेवा केंद्र गई थीं। लेकिन वहां ऑपरेटर ने उन्हें बताया कि आवेदन को आगे बढ़ाने के लिए उनके आधार से लिंक मोबाइल नंबर पर आया ओटीपी दर्ज करना होगा। हमीदा ने फोन चेक किया, लेकिन कोई संदेश नहीं आया। कुछ देर बाद पता चला – उनका मोबाइल नंबर आधार से लिंक ही नहीं है।

    बदलते नियम, बिना सूचना.

    यह समस्या अकेली हमीदा की नहीं है। झारखंड की नई पीडीएस (जन वितरण प्रणाली) गाइडलाइन के तहत अब राशन कार्ड में किसी भी तरह का बदलाव — जैसे सदस्य जोड़ना या हटाना, नाम या उम्र में सुधार — बिना ओटीपी के नहीं हो सकता। पहले तक केवल मुखिया का आधार नंबर और राशन कार्ड नंबर काफी था, लेकिन अब ओटीपी के बिना सिस्टम आगे नहीं बढ़ता।

    राज्य के अधिकारी दावा करते हैं कि यह कदम सुरक्षा बढ़ाने और फर्जीवाड़ा रोकने के लिए उठाया गया है। लेकिन गांव की महिलाओं और सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए यह बदलाव एक नई दीवार बनकर खड़ा हो गया है।

    “मुखिया हैं, पर मोबाइल नहीं तो कुछ नहीं कर सकते”

    झारखंड के कई हिस्सों में महिलाएं ही घर की मुखिया हैं — यह व्यवस्था राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की एक प्रगतिशील पहल का हिस्सा है। लेकिन जब आधार से जुड़ा मोबाइल ही नहीं है, तो ये महिलाएं सिस्टम में अदृश्य हो जाती हैं।

    सरयू ब्लॉक के चोरहा पंचायत की एक महिला ने बताया कि वह अपनी सास की मृत्यु के बाद घर की मुखिया बनीं, लेकिन महीनों की कोशिश के बाद भी राशन कार्ड में अपना नाम नहीं जुड़वा सकीं। “कई बार प्रखंड और जिला मुख्यालय गई, लेकिन कोई हल नहीं निकला,” उन्होंने कहा, “अब तो हार मान ली है।”

    तकनीक बनी बाधा, ना कि समाधान.

    आधार और मोबाइल से जुड़ी यह नई अनिवार्यता ग्रामीण महिलाओं के लिए एक ऐसी तकनीकी बाधा बन गई है, जिसे पार करना कई बार असंभव होता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार झारखंड में 10% घरों में मोबाइल फोन ही नहीं है। और जिनके पास मोबाइल है भी, वहां अक्सर नंबर निष्क्रिय होते हैं, या किसी पुरुष रिश्तेदार के नाम पर होते हैं।

    2023 में NSSO के सर्वे के अनुसार, देश में 10 में से 7 गैर-मोबाइल उपयोगकर्ता महिलाएं हैं। ऐसे में ओटीपी आधारित प्रमाणीकरण की बाध्यता महिलाओं को अपने ही अधिकारों से वंचित कर रही है।

    बिचौलियों का खेल, बढ़ती जेब पर चोट.

    जहां सिस्टम जटिल है, वहां बिचौलियों की आमद तय मानी जाती है। बरहेट जैसे इलाकों में लोगों से आधार या राशन अपडेट कराने के लिए ₹500 से लेकर ₹1,600 तक वसूले गए। यह वे सेवाएं हैं जो सामान्यतः मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध होनी चाहिए थीं।

    कई लोगों को अपने दस्तावेज अपडेट कराने के लिए बार-बार प्रखंड कार्यालय जाना पड़ता है, जिससे ना सिर्फ परिवहन खर्च बढ़ता है, बल्कि उस दिन की मजदूरी भी चली जाती है।

    क्या राज्य अपने हकदारों को पहचानता है?

    राशन, सब्सिडी और जन-कल्याण की योजनाएं कोई उपकार नहीं हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत ये नागरिकों का कानूनी अधिकार हैं — और इसमें सबसे अहम पात्र हैं महिलाएं और गरीब। लेकिन आधार-ओटीपी प्रमाणीकरण जैसे तकनीकी बदलावों ने इन हकदारों को सिस्टम से दूर धकेलना शुरू कर दिया है।

    संवेदनशील समाधान की ज़रूरत.

    डिजिटलीकरण अपने आप में समस्या नहीं है — समस्या है उसका एकमुश्त और बिना तैयारी के लागू किया जाना। झारखंड सरकार को चाहिए कि वो:

    • वैकल्पिक प्रक्रिया लागू करे जहां ओटीपी की अनिवार्यता न हो।
    • मोबाइल-आधार लिंकिंग की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाए।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक आधार केंद्र स्थापित करे।
    • जन-जागरूकता के माध्यम से पात्र लोगों को बदलावों की जानकारी दे।
    • और सबसे जरूरी, महिलाओं की डिजिटल पहुंच को प्राथमिकता के साथ मजबूत किया जाए।

    जब तक यह सुनिश्चित नहीं किया जाता कि तकनीकी बदलावों का लाभ समाज के सबसे वंचित हिस्से तक पहुंचे — तब तक डिजिटलीकरण भूख, अपमान और असमानता का दूसरा नाम ही बना रहेगा।

    *लेखक लिबटेक इंडिया से जुड़े हैं, जो कोलेबरेटिव रिसर्च एंड डिसेमिनेशन (CORD) का एक केंद्र है।

  • जातीय जनगणना: कांग्रेस का हथियार अब बीजेपी की रणनीति?

      परवेज़ आलम .

    देश की राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ उस वक्त आया जब मोदी सरकार ने 2026 में होने वाली जनगणना के साथ-साथ जातीय जनगणना (Caste Census) करवाने का ऐलान कर दिया। यह वही मांग थी जिसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी पिछले कई सालों  से अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर पेश कर रहे थे। ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे नारों के जरिए कांग्रेस सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना चुकी थी। लेकिन अब यही मुद्दा, सत्ता पक्ष की रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है। बुधवार को केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट मीटिंग के बाद यह स्पष्ट किया कि सरकार अब जाति आधारित आंकड़ों को भी आधिकारिक रूप से एकत्र करेगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा इस मुद्दे पर असमंजस की स्थिति में रही है और कभी भी ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसे लागू नहीं किया। वैष्णव ने कहा कि मोदी सरकार ने समाज के हर वर्ग के हित में फैसले लिए हैं और यह निर्णय भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

     क्यों जातीय जनगणना का फैसला कांग्रेस के लिए झटका है?

    जातीय जनगणना की मांग पर सबसे मुखर रहे राहुल गांधी को यह उम्मीद थी कि यह मुद्दा बीजेपी के ओबीसी और दलित वोट बैंक में सेंध लगाएगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में इस मुद्दे ने विपक्ष को फायदा भी पहुंचाया। लेकिन अब जब मोदी सरकार ने खुद इसे स्वीकार कर लिया है, तो कांग्रेस की बढ़त पर पानी फिरता दिख रहा है। सरकार के इस फैसले ने राहुल गांधी के उस नैरेटिव को कमजोर कर दिया है, जिसमें वे बीजेपी को सामाजिक न्याय विरोधी बताकर घेरते थे।

    पहला असर: बिहार और बंगाल में बीजेपी को लाभ की उम्मीद.

    बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। जातीय जनगणना का मुद्दा यहां सबसे अधिक प्रभावी साबित हो सकता है, क्योंकि राज्य की राजनीति पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आधारित है। हालांकि नीतीश कुमार की सरकार ने पहले ही जातिगत सर्वे कराया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र की ओर से इसे करवाना, ओबीसी मतदाताओं को यह संकेत देगा कि नरेंद्र मोदी सरकार उनकी गिनती और हक़ को लेकर गंभीर है। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगियों, खासकर आरजेडी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

     

     उत्तर प्रदेश में समाजवादी समीकरण पर असर.

    2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण के सहारे बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में हैं। जातीय जनगणना, जिसे अब केंद्र सरकार लागू करेगी, इस समीकरण को भी प्रभावित कर सकती है। बीजेपी की कोशिश होगी कि वह ओबीसी वर्ग को यह भरोसा दिलाए कि पार्टी अब उनकी गिनती और हिस्सेदारी दोनों सुनिश्चित करने जा रही है। इस तरह से विपक्ष के लिए ‘सामाजिक न्याय’ का नैरेटिव खड़ा करना और कठिन हो जाएगा।

    राजनीतिक बढ़त से सामाजिक प्रभाव तक.

    1931 के बाद देश में जातियों की कोई आधिकारिक जनगणना नहीं हुई। आज़ाद भारत में यह पहली बार होगा जब केंद्र सरकार पूरे देश में जातीय आंकड़े जुटाएगी। यह कदम न केवल राजनीतिक असर डालेगा, बल्कि नौकरियों, शिक्षा, कल्याण योजनाओं और संसाधनों के वितरण में भी नए बदलाव की नींव रख सकता है। मोदी सरकार इसे ‘सामाजिक समावेश’ और ‘डाटा आधारित नीति निर्माण’ के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, जो कि कांग्रेस के पुराने वादों को अप्रासंगिक बना देगा।

    कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती.

    राहुल गांधी अब तक इस मुद्दे के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। उन्होंने न केवल केंद्र को घेरा, बल्कि कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस शासित सरकारों से जातीय आंकड़े जारी करने की मांग भी की। अब जबकि बीजेपी खुद यह पहल कर रही है, कांग्रेस के पास या तो इसका स्वागत करने का विकल्प है—जो उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर दिखा सकता है, या विरोध करने का विकल्प—जिससे वे विरोधाभासी नजर आएंगे। इस दोहरे संकट में कांग्रेस को अपनी रणनीति फिर से गढ़नी होगी।

    सत्ता की बाज़ी कैसे पलटी ?

    जातीय जनगणना का मुद्दा एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में मुद्दे स्थायी नहीं होते, बल्कि उनका उपयोग और नियंत्रण ही असली खेल है। कांग्रेस ने जिस सामाजिक न्याय के एजेंडे को खड़ा किया, अब उसी को अपनाकर बीजेपी उसे उलझाने की तैयारी में है। 2026 की जनगणना के साथ जातीय गणना का प्रस्ताव, न केवल राहुल गांधी के एजेंडे को कमजोर करता है, बल्कि 2027 तक बीजेपी को ओबीसी समाज में फिर से अपनी स्थिति मज़बूत करने का अवसर भी देता है।

     

  • धनबाद में एटीएस की बड़ी कार्रवाई: आतंकी संगठनों से जुड़े है तार , दर्जनों से पूछताछ जारी

    धनबाद, झारखंड : शनिवार  सुबह करीब साढ़े पांच बजे शुरू हुई इस व्यापक कार्रवाई में एटीएस ने धनबाद के वासेपुर, भूली और अन्य इलाकों में 20 से अधिक स्थानों पर दबिश दी। इस अभियान में एक दंपती समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया गया  है  हालांकि  गिरफ़्तरी की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गयी है छापेमारी के दौरान आरोपियों के पास से दो पिस्टल, 12 जिंदा कारतूस, कई मोबाइल फोन, लैपटॉप, प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े दस्तावेज और कट्टरपंथी साहित्य बरामद हुआ। इसके अलावा, करीब एक दर्जन संदिग्धों को भी हिरासत में लेकर अलग-अलग थानों में पूछताछ के लिए रखा गया है।

    युवाओं को बहकाने की साजिश.

    सूत्रों के मुताबिक, एटीएस को गुप्त सूचना मिली थी कि HTU, AQIS और ISIS जैसे संगठन झारखंड के युवाओं को सोशल मीडिया के जरिए कट्टरपंथ की ओर धकेल रहे हैं और उन्हें अपने नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को हवा देने की इस साजिश का भंडाफोड़ करने के लिए धनबाद पुलिस के सहयोग से विशेष टीमें गठित कर ताबड़तोड़ छापेमारी की गई।

    डीएसपी लॉ एंड ऑर्डर नौशाद आलम के नेतृत्व में बैंकमोड़ थाना प्रभारी प्रवीण कुमार समेत कई थानों के अधिकारी इस अभियान में शामिल रहे।

    किराए के मकान में चल रही थी संदिग्ध गतिविधियाँ.

    भूली के शमशेर नगर में पकड़े गए दंपति  जनवरी महीने से किराए पर रह रहे थे। मोहल्ले के लोगों को उन्होंने आधार कार्ड बनाने का काम करने वाला बताया था, लेकिन स्थानीय लोगों से उनका खास मेलजोल नहीं था। एटीएस की छापेमारी में उनके घर से बड़ी संख्या में प्रतिबंधित किताबें और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बरामद हुए।

    भागते हुये दोनों पकड़े गए.

    जब एटीएस ने वासेपुर और अमन सोसाइटी में दबिश दी तो  हसन और जावेद घर से फरार हो गए। दोनों ने एक स्कूटी से तोपचांची की ओर भागने की कोशिश की। लेकिन जीटी रोड सिक्स लेन ब्रह्मांडीहा फ्लाईओवर के पास एटीएस की टीम ने दोनों को धर दबोचा। तलाशी के दौरान दोनों के पास से हथियार, कारतूस, डायरी, नक्शा और मोबाइल फोन बरामद किए गए।

    सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाजार गर्म.

    एटीएस की कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया पर अफवाहों का दौर शुरू हो गया। किसी ने आतंकियों के पकड़े जाने की बात लिखी, तो किसी ने धर्म और जाति को लेकर भ्रामक जानकारियां वायरल कीं। हालांकि, एटीएस और स्थानीय पुलिस ने इस पूरे मामले पर अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है।

    सभी गिरफ्तार आरोपी 20-21 वर्ष के.

    गिरफ्तार किए गए चारों आरोपियों की उम्र महज 20-21 वर्ष है। हसन और जावेद की उम्र 21 वर्ष है। माना जा रहा है कि आतंकी संगठन जानबूझकर कम उम्र के युवाओं को अपने जाल में फंसा रहे हैं ताकि उन्हें आसानी से कट्टरपंथी विचारधारा में ढाला जा सके।

    पहली बार धनबाद में ऐसी बड़ी गिरफ्तारी.

    गौरतलब है कि भारत सरकार ने अक्टूबर 2024 में HTU, AQIS और ISIS जैसे संगठनों को प्रतिबंधित किया था। इसके बाद धनबाद में इनसे जुड़े लोगों की यह पहली बड़ी गिरफ्तारी है। सभी गिरफ्तार युवक धनबाद जिले के ही निवासी हैं।

    सीओ कार्यालय के कर्मचारी पर भी जांच.

    एटीएस ने जिन दर्जनभर लोगों को उठाया है, उनमें से एक स्थानीय सीओ कार्यालय का आउटसोर्स कर्मचारी भी बताया जा रहा है। फिलहाल, सभी संदिग्धों से गहन पूछताछ जारी है और उनके मोबाइल फोन, लैपटॉप तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच की जा रही है।

    सूत्रों के अनुसार, पूछताछ के बाद इस पूरे नेटवर्क के बारे में और चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।

  • स्वीडन में मुख्यमंत्री सोरेन का वोल्वो संयंत्र का दौरा, झारखंड में ट्रक फैक्ट्री खोलने पर मंथन

    स्पेशल कोरेस्पोंडेंट.

    रांची/गोटेनबर्ग — झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने स्वीडन दौरे के दौरान गोटेनबर्ग शहर में स्थित वोल्वो ट्रक निर्माण संयंत्र का दौरा किया। उनके साथ राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद था। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य झारखंड में औद्योगिक विकास के नए रास्ते तलाशना और राज्य में ट्रक निर्माण इकाई स्थापित करने की संभावनाओं पर बातचीत करना था।

    मुख्यमंत्री ने वोल्वो कंपनी के शीर्ष अधिकारियों के साथ गहन बातचीत की। उन्होंने बताया कि झारखंड में खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भारी संख्या में ट्रकों और डंपरों की जरूरत है। इस जरूरत को देखते हुए मुख्यमंत्री ने वोल्वो को झारखंड में एक ट्रक निर्माण संयंत्र लगाने का प्रस्ताव दिया। वोल्वो के अधिकारियों ने भी इस विचार में रुचि दिखाई और झारखंड की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ट्रक मॉडल विकसित करने की इच्छा जताई।

    वोल्वो की अत्याधुनिक तकनीकों का अनुभव.

    मुख्यमंत्री और उनके दल ने वोल्वो के ‘ट्रक एक्सपीरियंस सेंटर’ का भी दौरा किया। यहां उन्होंने कंपनी की नई-नई तकनीकों को करीब से देखा। इनमें मिरर-लेस कैमरा वाली ट्रक कैब, ट्रिपल पॉइंट सस्पेंशन सिस्टम और 440 किलोवाट मोटर से चलने वाले इलेक्ट्रिक ट्रक शामिल थे। मुख्यमंत्री ने वोल्वो की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में किए गए नवाचारों की तारीफ की। उन्होंने यह भी जाना कि ये इलेक्ट्रिक ट्रक ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर किस तरह बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

    झारखंड में फैक्ट्री बनने से रोजगार और विकास के नए अवसर.

    सूत्रों के मुताबिक, अगर बातचीत सफल रहती है, तो वोल्वो निकट भविष्य में झारखंड में ट्रक निर्माण संयंत्र लगा सकती है। इससे न केवल राज्य के औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

    स्वीडन में निवेशक संवाद कार्यक्रम में भी झारखंड की मजबूत मौजूदगी.

    अपने दौरे के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भारतीय दूतावास और झारखंड सरकार के संयुक्त प्रयास से गोटेनबर्ग में आयोजित निवेशक संवाद कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में स्वीडन की बड़ी कंपनियों के अधिकारी, निवेशक और भारतीय समुदाय के सदस्य मौजूद थे।

    कार्यक्रम में भारत के कार्यवाहक राजदूत राकेश तिवारी ने भारत और स्वीडन के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों और झारखंड में मौजूद निवेश अवसरों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी स्वीडिश कंपनियों को झारखंड में निवेश करने का खुला निमंत्रण दिया।

    चार प्रमुख क्षेत्रों में निवेश का विशेष निमंत्रण.

    मुख्यमंत्री ने खासतौर पर चार क्षेत्रों में निवेश के लिए स्वीडन की कंपनियों को आमंत्रित किया —

    1. खनिज अन्वेषण,
    2. खाद्य प्रसंस्करण,
    3. हरित (सस्टेनेबल) ऊर्जा,
    4. इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र।

    राज्य सरकार के अधिकारियों ने बताया कि झारखंड में खनन उपकरणों के निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी अपार संभावनाएं हैं। ड्रिलिंग रिग्स, बुलडोजर, हॉल ट्रक, मोटर ग्रेडर और एक्सकेवेटर जैसे भारी मशीनों के निर्माण में निवेश के बेहतरीन मौके हैं। इसके साथ ही, खनिज शोधन संयंत्र और ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट जैसे बेल्ट कन्वेयर और मोटर स्क्रैपर के निर्माण में भी बड़े अवसर हैं।


    खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड: निवेशकों के लिए स्वर्णिम अवसर.

    झारखंड देश के कुल खनिज भंडार का लगभग 40% हिस्सा रखता है। कोयला, लोहा, तांबा, बॉक्साइट, चूना पत्थर, मैंगनीज जैसे कई कीमती खनिज यहां बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। झारखंड को देश में कोकिंग कोल का एकमात्र उत्पादक राज्य होने का गौरव प्राप्त है। इसके अलावा, यह कोयला उत्पादन में दूसरा, लौह अयस्क में दूसरा, तांबा अयस्क में तीसरा और बॉक्साइट भंडार में सातवां स्थान रखता है।

    इन प्राकृतिक संपदाओं के चलते झारखंड निवेशकों के लिए बेहद आकर्षक राज्य बन गया है। राज्य सरकार खनिज ब्लॉकों की नीलामी और खनिज अन्वेषण परियोजनाओं के जरिए निजी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है।

    झारखंड सरकार का सतत और समावेशी विकास पर जोर.

    कार्यक्रम में झारखंड सरकार के प्रतिनिधियों ने राज्य की निवेश के अनुकूल नीतियों, उद्योगों के लिए बेहतर अवसंरचना, और सतत व समावेशी विकास के प्रयासों पर भी विस्तार से प्रस्तुति दी। स्वीडन की हरित तकनीकों में विशेषज्ञता और झारखंड के हरित औद्योगीकरण के लक्ष्य के बीच सहयोग की बड़ी संभावनाएं दिखाई दीं।

    इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सरकार से व्यवसाय (G2B) और सरकार से सरकार (G2G) के स्तर पर संवाद को मजबूत करना और भारत-स्वीडन के आर्थिक संबंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जाना था।

     

  • झारखंड में नक्सलवाद पर अंतिम प्रहार: कोल्हान बना आखिरी मोर्चा, शीर्ष नेतृत्व लगभग नेस्तनाबूद

    परवेज़ आलम.

    झारखंड के जंगलों में चल रही एक पुरानी जंग अब अपने अंतिम मोड़ पर है। बरसों से राज्य के विकास और सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने वाले माओवादियों के खिलाफ पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने निर्णायक मोर्चा खोल दिया है। डीजीपी अनुराग गुप्ता का बयान अब सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि मैदान पर उतर चुकी एक रणनीति का हिस्सा है।

    मार्च 2026 की डेडलाइन से पहले ही झारखंड करेगा निर्णायक वार.

    बोकारो में हाल ही में हुए मुठभेड़ के बाद आयोजित प्रेस वार्ता में झारखंड पुलिस प्रमुख डीजीपी अनुराग गुप्ता ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने भले ही मार्च 2026 तक माओवाद खत्म करने का लक्ष्य तय किया हो, लेकिन राज्य पुलिस उससे पहले ही सारंडा और कोल्हान जैसे नक्सल गढ़ों से माओवादियों का पूरी तरह सफाया करने की ओर अग्रसर है।

    लुगू पहाड़ी की मुठभेड़: माओवादियों को चेतावनी का संदेश.

    लुगू पहाड़ी में हुई मुठभेड़ को डीजीपी ने ‘टर्निंग पॉइंट’ बताया। यह वह घटना है जिससे नक्सलियों को न केवल सैन्य हार मिली, बल्कि मनोवैज्ञानिक झटका भी लगा। डीजीपी ने कहा कि यह घटना माओवादियों के लिए “सबक” है और उन्होंने उन्हें सरकार की आत्मसमर्पण नीति के तहत मुख्यधारा में लौटने की सलाह दी।

    अब कोई माओवादी ‘अदृश्य‘ नहीं.

    राज्य पुलिस के पास हर सक्रिय माओवादी की लोकेशन, नेटवर्क, फंडिंग स्रोत और गतिविधियों की जानकारी है। यह वही रणनीतिक जानकारी है जिसने माओवादियों के एक-एक किले को कमजोर किया है। डीजीपी के अनुसार, “अब वे न छिप सकते हैं, न बच सकते हैं।”

    तीन बचा, लेकिन घेरे में: करोड़ों के इनामी नक्सलियों की अंतिम सूची

    झारखंड में अब सिर्फ तीन नक्सली ऐसे बचे हैं जिनके सिर पर ₹1 करोड़ का इनाम है:

    1. मिसिर बेसरा – भाकपा माओवादी का ईआरबी सचिव
    2. पतिराम मांझी – सेंट्रल कमेटी मेंबर
    3. आकाश मंडल उर्फ अनमोल – कोल्हान में सक्रिय

    ये तीनों अब सुरक्षा बलों के निशाने पर हैं। साथ ही, एनकाउंटर से बच निकले एक अन्य नक्सली “प्रवेश” पर भी जल्द ₹1 करोड़ का इनाम घोषित किया जा सकता है।

    प्रयाग मांझी उर्फ विवेक: एनकाउंटर में मारे गए पहले करोड़पति नक्सली

    इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी सफलता थी – प्रयाग मांझी उर्फ विवेक की मुठभेड़ में मौत। वह झारखंड पुलिस द्वारा मारे गए पहले ₹1 करोड़ के इनामी नक्सली बने। उनके मारे जाने से उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में माओवाद का लगभग सफाया हो गया।

    नक्सलवाद का ढहता नेतृत्व: गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण की श्रृंखला

    झारखंड में नक्सल आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं की या तो गिरफ्तारी हो चुकी है या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है:

    • प्रशांत बोस उर्फ किशन दा: सेकेंड इन कमांड, गिरफ्तार
    • कंचन दा उर्फ कबीर: थिंक टैंक, गिरफ्तार
    • महाराज प्रमाणिक, विमल यादव, रिमी दी, अभय जी: आत्मसमर्पण

    2021 से फरवरी 2025 तक 1490 नक्सली गिरफ्तार हुए हैं। इनमें कई नाम जैसे प्रभा दी, सुधीर किस्कू, नंदलाल मांझी और बलराम उरांव शामिल हैं जिन पर 10 से 25 लाख तक का इनाम था।

    बूढ़ा पहाड़ से कोल्हान तक: कमजोर होता नक्सली नेटवर्क.

    कभी झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ का प्रमुख माओवादी किला माना जाने वाला बूढ़ा पहाड़ अब नेतृत्वविहीन हो चुका है।

    • देवकुमार सिंह (अरविंद जी) की मौत,
    • सुधाकरण का सरेंडर,
    • मिथिलेश महतो की गिरफ्तारी—
      इन घटनाओं ने संगठन को झकझोर दिया।

    अब नक्सली नेतृत्व केवल कोल्हान तक सिमट गया है, जहाँ अंतिम शेष शीर्ष माओवादी अब सुरक्षा बलों के रडार पर हैं।

    क्या यह नक्सलवाद का अंतिम अध्याय है?

    झारखंड में जो कभी नक्सलियों का अघोषित किला था, वहां अब पुलिस की रणनीति, जानकारी और जमीन पर पकड़ ने बागियों की रीढ़ तोड़ दी है।
    कोल्हान आखिरी मोर्चा है और माओवादियों के पास दो ही विकल्प बचे हैं—आत्मसमर्पण या अंतिम लड़ाई।

     

  • झारखंड सरकार का यूरोपीय दौरा: प्रवासी भारतीयों से संवाद

    विशेष संवाददाता.

    झारखंड में निवेश को लेकर एक नई सुबह दस्तक दे रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड सरकार का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल इन दिनों यूरोप के दो प्रमुख देशों——के दौरे पर है। इस कूटनीतिक और आर्थिक यात्रा का मकसद है: झारखंड को वैश्विक निवेश का गंतव्य बनाना।

    इस यात्रा के दौरान न केवल राज्य की संभावनाओं को प्रस्तुत किया गया, बल्कि कुछ अहम समझौते और प्रस्तावों की नींव भी रखी गई।

    खेल के क्षेत्र में ऐतिहासिक पहल: फुटबॉल कोचिंग के लिए RCD Espanyol का प्रस्ताव.

    स्पेन के बार्सिलोना में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान, विश्वप्रसिद्ध RCD Espanyol फुटबॉल क्लब ने झारखंड सरकार को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया। क्लब ने झारखंड में खेल—विशेषकर फुटबॉल—के विकास के लिए सहयोग की इच्छा जताई है। इसमें खासकर फुटबॉल कोचों के प्रशिक्षण के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) की पेशकश की गई है।

    यह प्रस्ताव बार्सिलोना के विकसित खेल पारिस्थितिकी तंत्र और झारखंड में युवाओं की खेल प्रतिभा को जोड़ने का सेतु बन सकता है। आने वाले समय में यह साझेदारी झारखंड को भारतीय खेल मानचित्र पर और मजबूत स्थान दिला सकती है।

    व्यापक क्षेत्रों में चर्चा: स्टार्टअप, क्लीन एनर्जी, बायो-फार्मा और अधिक.

    सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, झारखंड प्रतिनिधिमंडल की इस यात्रा में कई विविध क्षेत्रों पर संवाद हुआ। इसमें स्टार्टअप मेंटरशिप, क्लीन एनर्जी, पर्यावरणीय स्थिरता, सप्लाई चेन, बायो-फार्मास्यूटिकल्स, खेल विपणन, क्रिकेट टीम ओनरशिप, डीप-टेक बी2बी मार्केटिंग, लीगल, डेंटल साइंस और मेडटेक जैसे क्षेत्र प्रमुख रहे।

    प्रतिनिधिमंडल ने झारखंड में नवाचार आधारित एक जीवंत स्टार्टअप इकोसिस्टम तैयार करने हेतु वैश्विक विशेषज्ञों और कंपनियों से मार्गदर्शन और निवेश का अनुरोध किया ।

    झारखंड में गीगा फैक्ट्री? टेसला ग्रुप A.S. से CM की महत्वपूर्ण बैठक.

    इस यूरोपीय दौरे का सबसे आकर्षक पड़ाव रहा टेसला ग्रुप A.S. (चेकोस्लोवाकिया) के CEO और सह-संस्थापक डुशान लिचार्डस के साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मुलाकात। बातचीत के दौरान टेसला ग्रुप ने झारखंड में एक गीगा फैक्ट्री स्थापित करने की इच्छा जताई, जो मुख्य रूप से वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोग के लिए बैटरी भंडारण उत्पादों के असेंबली पर केंद्रित होगी।

    यह प्रस्ताव न केवल झारखंड को नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी बना सकता है, बल्कि इससे राज्य के तकनीकी और औद्योगिक बुनियादी ढांचे को भी नई दिशा मिलेगी।

    प्रवासी भारतीयों से संवाद: संभावनाओं को जोड़ने का प्रयास.

    यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने बार्सिलोना में बसे प्रवासी भारतीय व्यवसायियों और विशेषज्ञों से भी मुलाकात की। इस संवाद का उद्देश्य था—झारखंड की विकास गाथा से उन्हें जोड़ना और विदेशी धरती पर बसे भारतीय मस्तिष्क को अपनी धरती से जोड़ना।

    मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि स्पेनिश कंपनियों और निवेशकों के साथ सतत संवाद और सहयोग सुनिश्चित किया जाएगा। इस कड़ी में भविष्य में और बैठकें तथा कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
    मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई में झारखंड सरकार की यह यात्रा केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि निवेश और विकास की ओर बढ़ते भरोसे का संकेत है। यूरोपीय धरती पर झारखंड की आवाज़ अब सुनाई देने लगी है—चाहे वह खेल हो, तकनीक हो, या उद्योग। आने वाला समय बताएगा कि इन बैठकों का परिणाम धरातल पर किस तरह उतरता है, लेकिन शुरुआत आशाजनक है।

     

  • झारखंड में सुरक्षाबलों की बड़ी जीत: 8 नक्सली ढेर

    एक करोड़ का इनामी प्रयाग मांझी उर्फ विवेक दा मारा गया

    परवेज़ आलम.

    बोकारो/गिरिडीह: झारखंड में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान को सोमवार को बड़ी सफलता मिली जब सुरक्षाबलों ने बोकारो के लुगू पहाड़ क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में आठ नक्सलियों को मार गिराया। इन मारे गए नक्सलियों में सबसे बड़ा नाम है प्रयाग मांझी उर्फ विवेक दा का — जो भाकपा माओवादी की सेंट्रल कमेटी का सदस्य था और झारखंड-बिहार-छत्तीसगढ़-ओडिशा के नक्सली नेटवर्क का संचालन करता था। इस पर एक करोड़ रुपए का इनाम घोषित था ।

    मुठभेड़ रविवार रात से शुरू हुई, जब खुफिया सूत्रों से सुरक्षाबलों को नक्सलियों के जमावड़े की सूचना मिली। इलाके को घेरते हुए तड़के ऑपरेशन शुरू हुआ, और भारी गोलीबारी के बाद सुरक्षाबलों ने आठ नक्सलियों को ढेर कर दिया। फरार नक्सलियों की तलाश में इलाके में अभी भी व्यापक तलाशी अभियान जारी है।

    प्रयाग मांझी उर्फ विवेक दा कौन था?

    धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड के दलबुढ़ा गांव का रहने वाला प्रयाग मांझी, माओवादी सर्किट में “विवेक दा”, “करण दा”, “फुचना” और “नागो मांझी” जैसे नामों से जाना जाता था। उसने बेहद कम उम्र में माओवादी संगठन से जुड़ाव बना लिया था और सालों में वह संगठन का रणनीतिक दिमाग बन गया।

    वह न केवल झारखंड, बल्कि बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के नक्सली बेल्ट में सक्रिय था। गिरिडीह के पारसनाथ और बोकारो के लुगू व झुमरा पहाड़ उसके प्रभाव क्षेत्र थे। सिर्फ गिरिडीह में ही उसके खिलाफ 50 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे।

    रणनीतिकार, प्रशिक्षक और हथियारों का जानकार

    विवेक दा नक्सलियों के लिए सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि सैन्य रणनीतिकार, प्रशिक्षक और हथियारों का जानकार था। उसके दस्ते के पास एके-47, इंसास राइफल और भारी मात्रा में विस्फोटक थे। उसके साथ 50 से ज्यादा प्रशिक्षित नक्सली थे, जिनमें महिला माओवादी भी शामिल थीं।

    सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, हाल ही में उसे पारसनाथ क्षेत्र की कमान दी गई थी, ताकि वहां पुनः नक्सली गतिविधियों को सक्रिय किया जा सके।

    पत्नी भी थी माओवादी नेता, इलाज के दौरान हुई थी मौत.

    विवेक की पत्नी जया मांझी भी माओवादी संगठन में महिला विंग की प्रमुख सदस्य थी। 25 लाख की इनामी जया को गिरिडीह पुलिस ने जुलाई 2024 में धनबाद के एक निजी अस्पताल से गिरफ्तार किया था, जहां वह फर्जी नाम से गॉल ब्लैडर कैंसर का इलाज करवा रही थी। इलाज के दौरान 21 सितंबर 2024 को रांची के रिम्स अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी।

    माओवादियों को गहरा झटका.

    इस मुठभेड़ में मारे गए अन्य नक्सलियों में अरविंद यादव और साहेब राम मांझी भी शामिल थे, जो संगठन के पुराने और प्रभावशाली सदस्य थे। विवेक दा की मौत को सुरक्षाबलों के लिए न सिर्फ सैन्य सफलता, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।

    झारखंड पुलिस के अधिकारियों के अनुसार, यह पहली बार है जब राज्य में एक करोड़ के इनामी नक्सली को मार गिराया गया है। इससे गिरिडीह-बोकारो क्षेत्र में नक्सली नेटवर्क की कमर टूट गई है।

    लुगू और पारसनाथ: नक्सलियों का सुरक्षित अड्डा अब खतरे में.

    लुगू पहाड़ और पारसनाथ लंबे समय से नक्सलियों के सेफ जोन माने जाते रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में लगातार ऑपरेशनों के चलते माओवादी इन इलाकों से पीछे हटे थे। लेकिन हालिया मुठभेड़ से संकेत मिलता है कि नक्सली दोबारा इन्हीं क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना चाहते थे।

    पुलिस ने संकेत दिए हैं कि इन इलाकों में सघन अभियान जारी रहेगा ताकि बचे-खुचे माओवादी पूरी तरह खत्म किए जा सकें।

    नक्सलवाद के अंत की ओर एक कदम.

    प्रयाग मांझी की मौत को माओवादी संगठन के लिए बहुत बड़ा धक्का माना जा रहा है। उसकी रणनीतिक पकड़, राज्य के कई जिलों में असर और नेटवर्क को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि यह झारखंड के नक्सल इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है।

    पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अब बचे हुए माओवादियों की गिरफ्तारी और संगठन को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के लिए ज़मीनी स्तर पर ऑपरेशन को और तेज करने की तैयारी में हैं।

  • पूर्व सांसद व काँग्रेस नेता तिलकधारी सिंह नहीं रहे

    शिक्षक से सांसद तक का प्रेरणादायक सफर थमा.

    गिरिडीह: झारखंड की राजनीति ने एक अनुभवी और सज्जन नेता को खो दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और दो बार कोडरमा से लोकसभा सांसद रहे तिलकधारी सिंह का सोमवार को निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे और पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। गिरिडीह के नवजीवन अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

    तिलकधारी सिंह की तबीयत 8 अप्रैल से लगातार खराब चल रही थी। 19 अप्रैल को  राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी और नगर विकास मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने अस्पताल जाकर उनका हालचाल लिया था । इससे पहले पूर्व सीएम रघुवर दास, बाबू लाल मरंडी और केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने भी  अस्पताल जाकर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी । सोमवार की दोपहर टीडी सिंह के  जीवन का आखिरी पन्ना बंद हो गया। निधन की जानकारी उनके पुत्र किशोर सिंह ने दी।

    गांव से दिल्ली तक: शिक्षक से सांसद बनने की यात्रा.

    तिलकधारी सिंह का जन्म 8 जनवरी 1938 को गिरिडीह जिले के देवरी प्रखंड अंतर्गत चतरो गांव में हुआ था। शिक्षा के प्रति गहरी रुचि रखने वाले सिंह ने बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1962 में शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया। चकाई हाई स्कूल में वर्षों तक सेवा देने के बाद उन्होंने सामाजिक जीवन की ओर रुख किया।

    1968 में उन्होंने मुखिया पद का चुनाव लड़ा और जीतकर ग्रामीण राजनीति में प्रवेश किया। इसके बाद वे जिला परिषद के अध्यक्ष भी बने। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है – उन्होंने जिले में कई सरकारी स्कूलों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी।

    राजनीति में कांग्रेस का मजबूत चेहरा.

    1977 में वे कांग्रेस के गिरिडीह जिला अध्यक्ष बने। इसके बाद 1980 में धनवार विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए। फिर 1984 में कांग्रेस ने उन्हें कोडरमा लोकसभा सीट से टिकट दिया, और उन्होंने जीत दर्ज कर संसद में प्रवेश किया। इस चुनाव में उन्होंने बीजेपी के रीतलाल प्रसाद वर्मा को हराया था और 208731 वोट हासिल किए थे – जो कुल मतों का 58.8 प्रतिशत था।

    1999 में उन्होंने दूसरी बार कोडरमा से जीत दर्ज की और संसद पहुंचे। अपने राजनीतिक जीवन में वे सांसद के साथ-साथ विधायक, जिला परिषद अध्यक्ष, और कांग्रेस संगठन के अहम पदों पर रहे।

    राजनीतिक विरासत और परिवार.

    राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहते हुए, वृद्धावस्था में उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत अपने पुत्र धनंजय सिंह को सौंपी। वर्तमान में धनंजय सिंह कांग्रेस के गिरिडीह जिला अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं।

    सरल स्वभाव के कारण लोकप्रिय नेता.

    तिलकधारी सिंह को उनके सादे जीवन और सरल स्वभाव के लिए जाना जाता था। आम जनता से लेकर बड़े नेताओं तक, सभी को उनके बोलचाल की शैली और व्यवहार में विनम्रता आकर्षित करती थी। वे ज़िले मे भूमिहार समाज के बड़े नेता थे ।

    श्रद्धांजलियाँ और राजनीतिक शोक

    पूर्व सांसद के निधन पर पूरे गिरिडीह जिले में शोक की लहर दौड़ गई है। मंत्री सुदिव्य कुमार ने उन्हें गिरिडीह की राजनीति का ‘पितामह’ बताते हुए कहा, “उनकी कमी गिरिडीह की राजनीतिक धरातल पर हमेशा महसूस की जाएगी। उनका योगदान अमिट है ।

    शोक व्यक्त करने वालों में सासंद डॉ सरफराज अहमद ,बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रकाश सहाय, कांग्रेस नेता अजय सिन्हा, कार्यकारी अध्यक्ष सतीश केडिया, पूर्व विधायक निर्भय शाहबादी,अभय शाहबादी , लोजपा नेता राज कुमार राज सहित अनेक बुद्धिजीवी और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं।