परवेज़ आलम.
द न्यूज़ पोस्ट4यू .
राज्य के 48 शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव इस बार सीधे मुकाबले से निकलकर त्रिकोणीय जंग में बदल गए हैं। 23 फरवरी को मतदान होगा और चार दिन बाद तस्वीर साफ हो जाएगी। पांच साल बाद हो रहे इन चुनावों की खास बात यह है कि ये कागज़ पर गैर-दलीय हैं, लेकिन ज़मीन पर राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं।
सत्तारूढ़ इंडिया ब्लॉक के दो बड़े चेहरे—झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस—अब आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। संयुक्त उम्मीदवार पर सहमति नहीं बन पाई, और नतीजा यह कि दोनों दलों ने नौ नगर निगमों में महापौर पद के लिए अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही 20 नगर परिषदों और 19 नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद के लिए भी खुला समर्थन दिया गया है।
गैर-दलीय चुनाव, पर दलीय रणनीति
8 फरवरी को नाम वापसी की आखिरी तारीख बीतते ही तस्वीर साफ हो गई—गठबंधन की एकजुटता यहां नहीं दिखेगी। हालांकि, कांग्रेस और जेएमएम दोनों इसे “मतभेद” मानने से इनकार कर रहे हैं।
कांग्रेस प्रवक्ता का कहना है—“यह विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं है। यहां मुद्दे मोहल्लों के हैं, नालियों और सड़कों के हैं, हर वार्ड की अपनी प्राथमिकताएं हैं।”
जेएमएम प्रवक्ताभी यही तर्क देते हैं—“जब चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं हो रहा, तो स्थानीय चेहरा और उसकी स्वीकार्यता ज्यादा मायने रखती है।”
लेकिन सवाल यह है कि अगर चुनाव पूरी तरह स्थानीय है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर दलों की सक्रियता क्यों?
बीजेपी की शहरी पकड़
राज्य के प्रमुख शहरी केंद्र—रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, देवघर, हजारीबाग, गिरिडीह और मेदिनीनगर—परंपरागत रूप से भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे हैं। एनडीए खेमे में भाजपा को अपने सहयोगियों एजेएसयू, जद(यू) और लोजपा (रामविलास) से खास चुनौती नहीं दिख रही।
यानी मुकाबला असल में तीन कोनों वाला है—भाजपा, जेएमएम और कांग्रेस।
जेएमएम की शहरी परीक्षा
अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि यह दरअसल जेएमएम का “अर्बन एक्सपेरिमेंट” है। 81 सदस्यीय विधानसभा में जेएमएम की 34 सीटों में से करीब 90 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों से आती हैं। ग्रामीण इलाकों में मजबूत पकड़ के बावजूद बड़े शहरों में पार्टी अब तक सीमित रही है।
छह साल से सत्ता में रहने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जेएमएम अब शहरों में भी अपनी जमीन तलाश रही है। यही वजह है कि पार्टी ने कई मजबूत स्थानीय चेहरों—यहां तक कि दूसरे दलों के बागी नेताओं—को भी समर्थन दिया है।
गठबंधन पर असर?
क्या यह नगर निकाय चुनाव भविष्य में इंडिया ब्लॉक की एकता को प्रभावित करेगा?
फिलहाल दोनों दल इसे महज़ स्थानीय रणनीति बता रहे हैं। लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर नतीजे चौंकाने वाले रहे, तो इसका असर 2029 की बड़ी लड़ाइयों तक महसूस किया जा सकता है।
फिलहाल तस्वीर साफ है—
चुनाव भले ही “गैर-दलीय” हो,
लेकिन सियासत पूरी तरह “दलीय” है।
23 फरवरी को मतदाता तय करेंगे कि शहरों की कमान किसके हाथ जाएगी—परिणाम सिर्फ मेयर और अध्यक्ष नहीं चुनेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि झारखंड की शहरी राजनीति किस करवट बैठ रही है।






