HomeJharkhandGiridihसावन की पहली सोमवारी: भोलेनाथ की भक्ति में डूबा गिरिडीह

सावन की पहली सोमवारी: भोलेनाथ की भक्ति में डूबा गिरिडीह

– शिवालयों में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

बिनोद कुमार

Edited by: परवेज़ आलम

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गिरिडीह : सावन के पावन महीने की पहली सोमवारी को गिरिडीह जिले में शिवभक्ति की एक अद्भुत छवि देखने को मिली। शहर की फिजा “बम-बम भोले” और “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठी। जिले के विभिन्न शिवालयों में सुबह होते ही श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। मंदिरों की ओर जाने वाले मार्गों पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखी गईं, जो भगवान भोलेनाथ पर जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए घंटों से इंतज़ार कर रहे थे।

शिवभक्ति में लीन दिखे श्रद्धालु.
सुबह से ही श्रद्धालु अपने परिवार व मित्रों के साथ शिव मंदिरों का रुख करने लगे। पूरे जिले में शिवालयों की घंटियां बज रही थीं और भक्तों की भीड़ भक्तिभाव के साथ शिवलिंग पर बेलपत्र, दूध, गंगाजल और फूल चढ़ा रही थी। विशेष रूप से सदर प्रखंड के उदनाबाद स्थित प्रसिद्ध दुःखहरणनाथ मंदिर में अपार भीड़ उमड़ी। यहां की मान्यता है कि सावन में जो भी सच्चे मन से भोलेनाथ का पूजन करता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

पुजारी ने बताया सावन सोमवारी का महत्व.
दुःखहरणनाथ मंदिर के पुजारी सर्वेश पांडेय ने बताया कि सावन मास शिव उपासना के लिए अत्यंत शुभ और प्रभावकारी माना जाता है। खासकर सोमवारी के दिन बेलपत्र, गंगाजल और दूध से भगवान शिव का अभिषेक करने से समस्त दोष समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि इस पावन दिन पर यदि श्रद्धालु महामृत्युंजय मंत्र या गायत्री मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें, तो जीवन के समस्त कष्टों का नाश होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

सुरक्षा व्यवस्था रही चाक-चौबंद.
सोमवारी को लेकर जिला प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था भी सख्त रखी गई थी। मंदिरों के बाहर पुलिस बल तैनात किए गए थे ताकि भीड़ में कोई अव्यवस्था न हो। नगर निगम की ओर से साफ-सफाई और जल की व्यवस्था भी की गई थी।

भक्ति, आस्था और अनुशासन का अद्भुत संगम.
सावन की पहली सोमवारी ने गिरिडीह में भक्ति, आस्था और अनुशासन का ऐसा अद्भुत संगम दिखाया, जो वर्षों तक लोगों की स्मृतियों में रहेगा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर शिवभक्ति की चमक और मन में विश्वास का उजाला साफ नजर आ रहा था।

यह दिन शिवभक्तों के लिए केवल पूजा-पाठ का नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और प्रभु से जुड़ाव का भी पर्व बन गया।

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